इंसानियत की ख़ातिर………………!

इंसानियत की ख़ातिर………..! इस लेख को पूरा जरूर पढ़ें। उम्मीद है आपको सोचने के लिए काफी तथ्य यहाँ मिल जाएँगे।
इंसानियत की ख़ातिर

क्या हम इंसानियत की खातिर एक साथ रह सकते है…?

इंसानियत एक आदर्शवादी शब्द है, मुझे तो ये एक उच्चतम आदर्श की स्थिति लगती है। और उच्चतम आदर्श एक मृगमरीचिका (Mirage) की तरह होती है जहां हमें अपना लक्ष्य स्पष्ट दिखायी पड़ता है पर जैसे ही वहाँ पहुँचते है वो गायब हो जाता है और वहाँ से देखो तो फिर से हमें वो आगे दिखायी पड़ता है। हम उसकी तलाश में काफी आगे आ पहुँचते हैं पर हमें वो नहीं मिलता है जिसके लिए हम चले थे।

ज़िंदगी भर हम इंसानियत की बातें सुनते हैं, बुराई को कोसते है, इंसानियत के बारे में ज्ञान की उल्टियाँ करते हैं, पर सवाल ये है कि हम एक आदर्श समाज की स्थापना क्यों नहीं कर पाते हैं? हम इतने स्वार्थी क्यों हो जाते हैं? हम अपने छोटे-छोटे स्वार्थ की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक क्यों गिर जाते हैं? हम बस अपनी फीलिग्स को तवज्जो देते हैं हमें दूसरों की फीलिंग्स इतनी बेकार क्यूँ लगती है? क्या एक आदर्श समाज की स्थापना करना इतना मुश्किल है?, क्या इंसानियत की खातिर एक साथ रहना इतना मुश्किल है?

हाँ ऐसा कह सकते है क्योंकि अगर इंसानी विकास के दौर को देखे तो एक बात स्पष्ट हो जाती है कि हम अतीत में भी इंसानियत की खातिर एक साथ नहीं रहे है। और आज हम विकास के जिस दौर में है उसे देखकर यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि अगर हम इंसानियत की खातिर एक साथ नहीं भी रहे है तो हमें इसका कोई घाटा नहीं हुआ है।

हम अतीत के ऐसे कई दार्शनिकों एवं विचारकों को जानते है। जिन्होने इंसानी वैचारिक क्षमता को अपने समय में उच्चतम स्तर तक पहुंचा दिया। अतीत में बहुतेरे ऐसी कोशिशें हुई है। जब एक आदर्श समाज की स्थापना की कोशिश की गयी। या फिर इंसानियत की खातिर एक साथ रहने की कोशिश की गयी ।

हम सब इंसान है !
हमारा ईश्वर भी एक है !
हमारा धर्म भी कहीं-न-कहीं एक जैसी शिक्षा देता है !

इस तरह के ढेरों आदर्श वाक्य रचकर, इन्सानों ने कल्पना के सागर में गोते लगाकर एक-से-एक आदर्शतम स्थिति की खोज की। पर कभी इस स्थिति को प्राप्त नहीं कर पाये और क्यों नहीं कर पाये?

 क्योंकि – ज़िंदगी कभी बंधे नियम नहीं मानती

अगर हम सिर्फ पिछले 500 सालों के घटनाक्रम पर गौर करें तो पता चलता है कि – इन्सानों को नियमों में बांधने की बहुत कोशिश की गयी। इस संदर्भ में यूरोप की स्थिति तो और भी बदतर थी । जहां तो वैचारिक स्वतंत्रता को भी नियमों में बांध दिया गया था।

पर हुआ क्या ? भयानक लड़ाइयाँ, करोड़ों लोगों को खत्म कर देने वाले युद्ध, भ्रष्टाचार और न जाने क्या-क्या हुआ !

 इतनी भयानक से भयानक लड़ाइयाँ हुई ……. किसके बीच ? इन्सानों के बीच । मतलब !

 मतलब इन्सानों ने खुद इन्सानों को मारा है और अभी भी मारते है मगर किसलिए ………?इंसानियत को बरकरार रखने के लिए !

 है न कितनी बड़ी विडंबना, हम इन्सानों को मारते है इंसानियत के लिए

फिर भी ज़िंदगी की खूबसूरती तो देखिये इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी इन्सानों ने बेशुमार तरक्की की है। सबसे ज्यादा तरक्की तो इन्सानों ने इन्ही कुछ सौ सालों में की है ।

विश्व युद्ध में इतने बड़े पैमाने पर हुए नरसंहार को सोच कर भी रूह कांप जाती है पर उसके खातिर न जाने ऐसे कितने आविष्कार और खोजें हुई जो हमारी ज़िंदगी को आसान बना गयी और इंसानी सभ्यता को एक नए आयाम तक पहुंचा दी ।

 मतलब साफ है हमने हमेशा नियमें तोड़ी है और नए नियम बनाए है ये जानते हुए की एक दिन ये नियम भी बदल दी जाएंगी ।

वो कहते है न कि इंसान हमेशा नर्क में रहता है और स्वर्ग की कल्पना करता है ये जानते हुए भी की वो उसे कभी नहीं मिलेगा । जीते जी तो कभी नहीं !

 फिर भी हम कल्पना करते है क्योंकि हम जानते है कि हमें कुछ-न-कुछ तो जरूर मिलेगा। और सच तो ये है कि मिलता भी है।

पर एक बात तो बिल्कुल स्पष्ट है कि वाकई यहाँ सब कुछ एक-दूसरे के सापेक्ष (Relative) काम करता है। एक दूसरे के बिना सब अर्थहीन नजर आता है।

आप खुद ही सोचिए न कि हम इंसानियत की तो बात ही इसलिए करते है क्योंकि यहाँ हैवानियत नाम की चीज़ भी है । बिना हैवानियत के अस्तित्व के इंसानियत कितना प्रासंगिक होता !

 हम सच की बात इसलिए करते है क्यूंकी यहाँ झूठ नाम की चीज़ भी है । बिना झूठ के अस्तित्व के सच कितना प्रासंगिक होता !

 आप खुद ही सोचिए की बिना रावण के अस्तित्व के हमारा राम कैसा होता !!!

चलिये वर्तमान परिदृश्य को ही लेते है और मान लेते है हम सारे राग-द्वेष, बैर-भाव, उंच-नीच, अमीर-गरीब, जातिगत और धार्मिक असमानता को मिटाकर इंसानियत की खातिर एक साथ रह रहे है ।

अब न ही कोई विवाद है और न ही कोई दुश्मन देश है तो सोचिए अगर कोई दुश्मन देश ही नहीं होगा तो सारे देशों के करोड़ों सैनिकों का क्या होगा ! जब उसकी जरूरत ही नहीं रह जाएगी तो सोचिये बेरोजगारी का क्या आलम होगा !

उन देशों का क्या होगा जो एक तरफ भारत को भी हथियार बेचते है और दूसरी तरफ पाकिस्तान को भी। ये दोनों जितना लड़ते है उतना वे ताकतवर बनते है।

खुद सोचिये अगर अपराध नहीं होगा तो इतनी बड़ी-बड़ी न्यायिक व्यवस्था और पुलिस प्रतिष्ठानों का क्या होगा। उसकी कितनी अहमियत रह जाएगी ?

बिना गरीबों के अमीरों की क्या अहमियत रह जाएगी ! बिना दलितों के सवर्णों की क्या अहमियत रह जाएगी ! … ! आप इसके परिणामों के बारे में सोचते चले जाये पर शायद ही ये खत्म हो।

तो इसका क्या मतलब है की हमें इंसानियत की बात नहीं करनी चाहिए ? क्या हम इंसानियत की खातिर एक साथ नहीं रह सकते है ? क्या कभी नहीं रह पाएंगे? क्या हमें एक आदर्श समाज की स्थापना की बात नहीं करनी चाहिए।

 जी नहीं ऐसा नहीं है । यहाँ जो भी है सबकी अपनी अहमियत है । इंसानियत और हैवानियत दोनों ही हमारे अंदर है या यूं कहें की हम ऐसे ही हैं।

जी हाँ हम ऐसे ही हैं। हम शांति के नाम पर युद्ध करते हैं। हम पहले परमाणु बम बनाते है और फिर शांति की बात करते है । हम पहले आतंकवादी बनाते है और फिर इंसानियत के नाम पर उसे मारते भी है।

हमारे देश में दो तिहाई आबादी के पास जितनी संपत्ति है उतनी सिर्फ 10 शीर्ष अरबपतियों के पास है। अगर इंसानियत की खातिर वे अपनी आधी संपत्ति भी उन राज्यों के शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि जैसे बुनयादी चीजों में खर्च कर दें जो राज्य विकास के दौर में पीछे छुट गये है। तो पूरे भारत की दशा और दिशा बदल जाएगी। पर वे ऐसा नहीं करते है और ये गलत भी नहीं है।

हम ऐसे ही हैं – यहाँ कई लोग भूख से मर जाते है और दूसरी तरफ कई लोग खाते-खाते मर जाते है, – कई लोगों के पास पीने योग्य पानी नहीं है और दूसरी तरफ कई लोग पीते-पीते मर जाते हैं।

कई लोग इसलिए फटे कपड़े पहनते है क्यूंकी उसके पास पहनने को कपड़े नहीं हैं दूसरी तरफ कई लोग फटे कपड़े पहनने के लिए हजारों खर्च करते हैं। पहले वाले तो आर्थिक गरीबी के शिकार है और दूसरी वाली मानसिक गरीबी के । (हालांकि उसे फ़ैशन कहा जाता है। )

कुछ प्रतिभाशाली विद्यार्थी आर्थिक कारणों से या जरूरी साधन उपलब्ध नहीं होने के कारण वो नहीं कर पाते हैं जो वो कर सकते थे दूसरी तरफ कुछ विद्यार्थी को जबर्दस्ती इतना पढ़ाया जाता है कि वो पढ़ते-पढ़ते इंसान से कब वानर बन जाता है पता ही नहीं चलता । (हालांकि वो खुद को बुद्धिजीवी कहते हैं। )

आप इसे एक विडम्बना कहें या ज़िंदगी की खूबसूरती जो भी हो ……..पर हम ऐसे ही हैं। यहाँ सब कुछ है……………………………..।

यहाँ भ्रष्टाचार है तो यहाँ ईमानदारी भी है। यहाँ पापी है तो यहाँ संत भी है। यहाँ नास्तिक है तो यहाँ आस्तिक भी है। यहाँ मूर्ख है तो यहाँ विद्वान भी है। यहाँ दुश्मन है तो यहाँ दोस्त भी है। यहाँ युद्ध है तो यहाँ शांति भी है। यहाँ झूठ है तो यहाँ सच भी है। यहाँ अंधेरा है तो यहाँ उजाला भी है। यहाँ निराशा है तो यहाँ आशा भी है। यहाँ हैवानियत है तो यहाँ इंसानियत भी है।

और हम इंसानियत की खातिर एक साथ रहते भी है बस नियमों में बंध कर जीना हमारी फितरत नहीं है

जाते-जाते इस छोटी सी विडियो क्लिप को जरूर देखिये शायद ये आपको सोचने पर मजबूर कर दें। शायद आप इस पर सोचें भी और थोड़ी देर के लिए बदल भी जाएँ क्या पता?

You must not lose faith in humanity. Humanity is an ocean; if a few drops of the ocean are dirty, the ocean does not become dirty.

Mahatma Gandhi

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