ईर्ष्या और द्वेष में अंतर क्या है?

मोटे तौर पर ईर्ष्या और द्वेष एक मनोभाव है। किसी को देखकर ईर्ष्या या जलन होना हम सब कभी न कभी महसूस करते ही हैं पर कभी-कभी बात बिगड़ जाती है और हम अपने प्रतिद्वंदी से नफरत करने लग जाते हैं उसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करने लग जाते हैं। इस तरह ईर्ष्या द्वेष में बदलने लग जाती है।

इस लेख में हम ईर्ष्या और द्वेष के मध्य के सूक्ष्म अंतरों पर सरल एवं सहज चर्चा करेंगे एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने का प्रयास करेंगे, तो लेख को अंत तक जरूर पढ़ें;

ईर्ष्या और द्वेष

| ईर्ष्या और द्वेष

उसने अपने पुराने बॉयफ्रेंड को एक लड़की के साथ देखी और वह खो गई अपनी दुनिया में, कि कभी वो हुआ करती थी उसके साथ। बस कुछ ही दिन पहले की तो बात है, एक नए लड़के के उसकी मुलाक़ात हुई और फिर सब कुछ बदल गया, वो उसके साथ चली गई अपने पहले बॉयफ्रेंड को छोड़कर। पर आज अपने पुराने बॉयफ्रेंड को खुद से भी ज्यादा खूबसूरत लड़की के साथ देखना उसके लिए असहनीय था। वो खुद से ज्यादा उसके बारे में सोचने लगी, ये तो ईर्ष्या की बस एक शुरुआत भर थी। उसने अपनी सारी ऊर्जा को इस मनोवृति को पालने में लगा दी, धीरे-धीरे वो उससे घृणा करने लगी, धीरे-धीरे वे उस जोड़े से द्वेष करने लगी। वो दिन भी आया जब उसने अपने पुराने बॉयफ्रेंड को दुराचरण में फंसा देने की धमकी दे डाली……..!

| ईर्ष्या क्या है?

ईर्ष्या का अर्थ होता है – किसी की सफलता को देखकर अधीर होना, दूसरे की उन्नति देख कर बेचैन होना या डाह करना। यदि किसी में, किसी को सुखी-सम्पन्न देख कर या किसी के पास कोई कीमती या आकर्षक वस्तु देख कर उसे उस सुख-चैन या उक्त वस्तु से वंचित कर उसका स्वयं हकदार बन जाने की इच्छा हो तो वह भी ईर्ष्या कहलाती है। इस तरह के जलने या डाह करने वाले व्यक्ति को ईर्ष्यालु कहा जाता है।

वैसे ईर्ष्या का प्रयोग कभी-कभी अच्छे भाव का प्रदर्शन करने में भी होता है; जैसे- आपकी नृत्य कला पर किसे ईर्ष्या नहीं होगी। आपको सफलता को देखकर मुझे जलन हो रही है इत्यादि।

ईर्ष्या आत्मविश्वास की कमी और असुरक्षा की भावना को दर्शाता है और ये खुद अपने ही मार्ग में बाधक बनने जैसा है। ईर्ष्या वैसे तो एक सामान्य सा मनोभाव है लेकिन इसकी अति होना गंभीर परिणाम पैदा करता है। इसीलिए त्याग, उदारता, निष्पक्षता आदि जैसे विचारों को प्राथमिकता देने की बात कही जाती है।

| द्वेष क्या है?

द्वेष का अर्थ किसी को अपना प्रतिद्वंदी समझ कर उससे घृणा या नफ़रत करना, नापसंद करना, पराया समझना आदि है। इसमें किसी को हानि पहुंचाने का भाव होता है जबकि ईर्ष्या में ऐसा नहीं होता है।

इसमें शत्रुता या वैर के भाव की प्रधानता होती है इसीलिए विरोध, वैमनस्य, शत्रुता आदि के कारण किसी का बनता हुआ काम बिगाड़ देना भी द्वेष है। द्वेष करने वाला द्वेषी कहलाता है। द्वेषी व्यक्ति के मन में घृणा, चिढ़, वैर, आदि का भाव जागृत हो जाता है। 

द्वेष में ‘वी’ उपसर्ग लगने से विद्वेष बना है, जो इसके और भी उग्र और तीव्र रूप को दर्शाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह दुश्मनी की सीमा तक किया जाने वाला द्वेष है।

| ईर्ष्या और द्वेष में कुल मिलाकर अंतर

कुल मिलाकर देखें तो ये दोनों शब्द एक दूसरे का पर्याय प्रतीत होता है। आमतौर पर इसका इस्तेमाल भी एक-दूसरे के पर्याय के तौर पर ही किया जाता है पर सूक्ष्म स्तर पर देखें तो ऐसा नहीं है जैसा कि हमने ऊपर भी समझा है, ईर्ष्या करने वाला व्यक्ति जिससे ईर्ष्या करता है, उसे किसी प्रकार से उसके सुख से वंचित कर स्वयं उसका उपयोग करने की लालसा रखता है, जबकि द्वेष करने वाला व्यक्ति शत्रुतावश उसे नुकसान पहुंचाने की भी लालसा रखता है।

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