इस लेख में हम ए के गोपालन मामला 1950 और मेनका गांधी मामला 1978 पर सरल और सहज चर्चा करेंगे एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझेंगे।

ये पूरा मामला स्वतंत्रता का अधिकार (Right to freedom) से जुड़ा हुआ है इसीलिए इस लेख की बेहतर समझ के लिए पहले उसे अवश्य पढ़ लें।

ए के गोपालन मामला

ए के गोपालन मामला 1950

ए के गोपालन या AKG, एक भारतीय कम्युनिस्ट राजनीतिज्ञ थे। वह 1952 में पहली लोकसभा के लिए चुने गए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के 16 सदस्यों में से एक थे। वह माकपा CPI (M) के संस्थापक सदस्यों में से एक थे।

1939 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश वर्चस्व के खिलाफ सक्रियता में वृद्धि को प्रेरित करने के लिए गोपालन को गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन 1942 में वह जेल से भाग गया और 1945 में युद्ध के अंत तक सक्रिय रहे। युद्ध की समाप्ति के तुरंत बाद उसे फिर से गिरफ्तार कर लिया गया और 15 अगस्त 1947 को भारत के स्वतंत्र होने के बाद भी वह सलाखों के पीछे था।

लेकिन हद तो तब हो गया जब केंद्र सरकार ने निवारक निरोध अधिनियम 1950 (Preventive Detention Act 1950) बनाया और मद्रास सरकार ने एक आदेश के तहत उनकी गिरफ्तारी को इस नए बनाए एक्ट के तहत ला दिया। इससे वे क्रुद्ध होकर, न्याय के लिए उच्चतम न्यायालय पहुंचे।

निरोध (detention)
मुख्य रूप से निरोध (detention) दो तरह की होती है –
(1) दंडात्मक निरोध (Punitive detention) – इसका आशय, अपराध के बाद किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करके स्वतंत्रता से वंचित कर देने से है।
(2) निवारक निरोध (Preventive detention) – इसका आशय, भविष्य में कोई व्यक्ति अपराध न कर बैठे इसीलिए उसे पहले ही गिरफ्तार करके उसकी स्वतंत्रता छीन लेने से है। यहाँ यहीं चर्चा के केंद्र में हैं।

ए के गोपालन का पक्ष

अनुच्छेद 21 कहता है कि – किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया‘ के अनुसार ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं।

दरअसल इसका मतलब ये है कि कानून बनाने की सही प्रक्रिया को अपनाकर अगर कोई कानून बनाया गया है तो उसके तहत किसी व्यक्ति को प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से वंचित किया जा सकता है। यानी कि कानून सही है या नहीं उससे कोई मतलब नहीं है बस कानून बनाने की प्रक्रिया सही होनी चाहिए।

लेकिन अनुच्छेद 13 के अनुसार अगर कोई विधि मूल अधिकार का हनन करती है तो उसे उतनी मात्रा में ख़ारिज़ किया जा सकता है जितनी मात्रा में मूल अधिकार का हनन करता है, यानी कि अनुच्छेद 13 विधि की सम्यक प्रक्रिया (Due process of Law) की बात करता है जिसके तहत कानून में अगर कुछ गड़बड़ी है तो उसे ख़ारिज़ किया जा सकता है।

ये सभी मूल अधिकारों पर लागू होता है लेकिन अनुच्छेद 21 में विशिष्ट रूप से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया की बात कही गई है।

तो गोपालन का सवाल यही था कि क्या ऐसा हो सकता है कि सभी मौलिक अधिकार विधि की सम्यक प्रक्रिया पर चले जबकि सिर्फ अनुच्छेद 21 विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया पर?

दूसरी बात, अगर विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया पर चले तो निवारक निरोध अधिनियम 1950 के द्वारा छीनी गई व्यक्तिगत स्वतंत्रता जायज था लेकिन अनुच्छेद 19(1)(d) जो कि देशभर में अबाध संचरण की बात करता है उसके तहत तो गोपालन को आजाद किया जा सकता था क्योंकि वो तो विधि के सम्यक प्रक्रिया के तहत आता है और इस आधार पर निवारक निरोध अधिनियम 1950 को तो खारिज किया जा सकता था?

कुल मिलाकर गोपालन ने दावा किया कि निवारक निरोध अधिनियम अनुच्छेद-19 (स्वतंत्रता का अधिकार), अनुच्छेद-21 (जीवन का अधिकार) और अनुच्छेद-22 (गिरफ्तारी और निरोध के विरुद्ध संरक्षण का अधिकार) के साथ असंगत था।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

इस मामले में 6 न्यायाधीशों की एक बेंच बैठी और 4-2 से फैसला सुनाया कि (1) विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया और विधि की सम्यक प्रक्रिया दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं और दोनों को एक नहीं समझा जा सकता। (2) अनुच्छेद 21 बिल्कुल सही है और उसका विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया पर चलना भी एकदम सही है। (3) अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19 दोनों अलग-अलग अनुच्छेद है और दोनों को एक साथ नहीं मिलाया जा सकता।

कुल मिलाकर अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने निवारक निरोध कानून की वैधता को बरकरार रखा और स्पष्ट कर दिया कि उक्त सभी अनुच्छेद (अनुच्छेद- 19, 21, और 22) पूर्णतः अलग विषय वस्तु से संबंधित हैं और इन्हें एक साथ नहीं पढ़ा जाना चाहिये।

कहा जाता है कि यहाँ जो उच्चतम न्यायालय से भूल हुई थी उसे उन्होने मेनका गांधी मामले के माध्यम से सुधारा। क्या है मेनका गांधी मामला, आइये देखते हैं।

मेनका गांधी मामला 1978

1976 में आपातकाल के दौरान ही 1 जून को मेनका गांधी ने अपना पासपोर्ट (पासपोर्ट अधिनियम 1967) के अनुसार बनवाया। लेकिन 2 जुलाई 1977 को क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय (नई दिल्ली) ने उन्हें अपना पासपोर्ट सरेंडर करने का आदेश दिया। दरअसल जनता पार्टी सरकार को शायद ये डर था कि ये विदेश न भाग जाये, जबकि विदेश जाना व्यक्तिगत स्वतंत्रता के तहत पहले से ही एक स्थापित तथ्य था।

कुल मिलाकर याचिकाकर्ता को सार्वजनिक हित का हवाला देते हुए विदेश मंत्रालय ने ये फैसला लिया और इस मनमाने और एकतरफा फैसले का कोई कारण भी नहीं बताया।

तो याचिकाकर्ता (मेनका गांधी) ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और दलील दी कि अनुच्छेद 21 की गारंटी के अनुसार राज्य में उसके पासपोर्ट को जब्त करने का अधिकार उसके व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal freedom) पर सीधा हमला है।

मेनका गांधी का पक्ष

▪️ क्या अनुच्छेद 21, 14 और 19 के तहत प्रावधान एक-दूसरे से जुड़े हैं या वे परस्पर अनन्य (Mutually exclusive) हैं? इनका कहना था कि अनुच्छेद 14, 19 और 21 में दिए गए प्रावधानों को एक साथ पढ़ा जाना चाहिए और परस्पर अनन्य नहीं होना चाहिए।

▪️ क्या विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया को तर्कशीलता के आधार पर परीक्षण किया जाना चाहिए जो इस मामले में 1967 के पासपोर्ट अधिनियम द्वारा निर्धारित प्रक्रिया थी?

यानी कि भारत ने शायद “विधि की सम्यक प्रक्रिया” की अमेरिकी अवधारणा को नहीं अपनाया है, फिर भी, विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया निष्पक्ष और न्यायसंगत होनी चाहिए, और मनमानी नहीं होनी चाहिए। दूसरी बात कि पासपोर्ट अधिनियम की धारा 10 (3) (सी) अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करती है क्योंकि यह इस अनुच्छेद द्वारा गारंटीकृत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करती है।

▪️ देश के बाहर यात्रा करने का अधिकार अनुच्छेद 21 का हिस्सा है या नहीं? इसे स्पष्ट किया जाना चाहिए

▪️ एक विधायी कानून द्वारा जीवन के अधिकार को छीनना क्या उचित है?

उच्चतम न्यायालय का फैसला

उच्चतम न्यायालय की 7 न्यायाधीशों की बेंच ने इस फैसले को 7-0 से सुनाया कि
(1) अनुच्छेद 21 में लिखा विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया अपनी जगह पर सही हो सकता है लेकिन उसे तर्कसंगत होना चाहिए न कि मनमाना और अतार्किक। दूसरे शब्दों में इसे कहें तो अब अनुच्छेद 21 को भी विधि की सम्यक प्रक्रिया के तहत देखा जा सकता है।
(2) ए के गोपालन मामला त्रुटि युक्त था। क्योंकि अनुच्छेद 14, 19 और 21 का आपस में विशिष्ट संबंध है और तीनों को एकसाथ रखकर देखा जा सकता है।
(3) व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सिर्फ शारीरिक बंधनों तक सीमित नहीं है बल्कि ये मानवीय सम्मान एवं इससे जुड़े अन्य पहलुओं तक भी विस्तारित है। (इसके परिणामस्वरूप कालांतर में ढ़ेरों बातें अनुच्छेद 21 में जीवन और दैहिक स्वतंत्रता के तहत जोड़ा गया जिसका कि लिस्ट आप नीचे देख सकते हैं)
(4) विदेश यात्रा करना अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मामला है।

प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता में सम्मिलित किए गए बातों की लिस्ट

Right to life and personal freedom
1. निजता का अधिकार (Right to privacy) (जिसे कि 2017 में इसमें जोड़ा गया)
2. स्वास्थ्य का अधिकार (Right to health)
3. 14 वर्ष की उम्र तक नि:शुल्क शिक्षा का अधिकार 
4. नि:शुल्क कानूनी सहायता का अधिकार 
5. सूचना का अधिकार (जिसे कि 2005 में इसमें जोड़ा गया) 
6. सोने का अधिकार (Right to sleep)
7. खाने का अधिकार (Right to eat)
8. बिजली का अधिकार (Right to electricity)
9. प्रदूषण से मुक्ति का अधिकार (Right to freedom from pollution)
10. प्रतिष्ठा का अधिकार (Right of reputation)
11. सुनवाई का अधिकार (Right of hearing)
12. सामाजिक, आर्थिक सुरक्षा का अधिकार
13. महिलाओं के साथ आदर और सम्मानपूर्वक व्यवहार करने का अधिकार
14. विदेश यात्रा करने का अधिकार
15. आपातकालीन चिकित्सा सुविधा का अधिकार।
16. देर से फांसी के विरुद्ध अधिकार
17. बंधुआ मजदूरी के विरुद्ध अधिकार
18. हिरासत में शोषण के विरुद्ध अधिकार
19. सरकारी अस्पतालों में में समय पर उचित इलाज़ का अधिकार
20. बार केटर्स के विरुद्ध अधिकार
21. सार्वजनिक फांसी के विरुद्ध अधिकार
22. सामाजिक सुरक्षा एवं परिवार के संरक्षण का अधिकार
23. अकेले कारावास में बंद होने के विरुद्ध अधिकार
24. हथकड़ी लगाने के विरुद्ध अधिकार
25. अमानवीय व्यवहार के विरुद्ध अधिकार
26. कैदी को जीवन की आवश्यकताओं का अधिकार आदि।

कुल मिलाकर यही है ए के गोपालन मामला 1950 और मेनका गांधी मामला 1978। इसी से संबंधित एक फ़ेमस मामला है बंदी प्रत्यक्षीकरण मामला 1976 (Habeas corpus case 1976); जो कि निवारक निरोध (Preventive detention) के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मामला है। उसे भी जरूर पढ़ें।

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Article Based On,
एम लक्ष्मीकान्त – भारत की राजव्यवस्था↗️
मूल संविधान भाग 3↗️
Habeus Corpus Case & Article 21↗️
Fundamental rights in India↗️
Maneka Gandhi vs Union of India (1978)↗️
A. K. Gopalan↗️ आदि।

डाउनलोड ए के गोपालन मामला

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