प्रस्तावना : अर्थ, महत्व, जरूरत, उद्देश्य । Preamble explained

इस लेख में हम प्रस्तावना (preamble) की समीक्षा करेंगे और उस की मदद से संविधान को समझने की कोशिश करेंगे।
प्रस्तावना

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प्रस्तावना क्या है?
(What is the preamble?)

प्रस्तावना (preamble) का मतलब होता है परिचय या इंटरोंडक्शन। यानी कि ये संविधान की परिचय अथवा भूमिका हैं।

इसमें संविधान का सार होता है। पूरे संविधान में है क्या? उसी का ही एक सूक्ष्मतम रूप है- प्रस्तावना । अगर आसान भाषा में कहें तो अगर पूरा संविधान एक सिनेमा है तो प्रस्तावना उसका ट्रैलर है।

प्रस्तावना की जरूरत क्यूँ पड़ी? 

प्रस्तावना इसीलिए जरूरी है ताकि कोई भी व्यक्ति पूरे संविधान को पढे बिना समझ सकें कि हमारे पूरे संविधान का दर्शन क्या है? इसका उद्देश्य क्या है? हम कैसे राज्य की स्थापना करना चाहते है? किन आधारों और किन मूल्यों पर हम भारत को स्थापित करना चाहते हैं? आदि । 

🌈प्रस्तवाना के मूल तत्व 

इसके एक-एक शब्द को बड़े सलीके से वाक्यों में गढ़ा गया है। इसका सारा सार इसके शब्दों में ही छुपा है। एक बार इसके मुख्य शब्दों में छिपे गूढ़ अर्थ को समझ गए तो इसका मतलब संविधान के दर्शन को समझ गए। संविधान में क्या है उसको समझ गए, संविधान के बेसिक्स को समझ गए। इससे पहले की इसे समझे एक बार प्रस्तावना को अच्छे से पढ़ लीजिये।

प्रस्तावना
हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के लिए और इसके समस्त नागरिकों को
सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक न्याय,
विचार, अभिव्यक्ति, धर्म, विश्वास व उपासना की स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर समता प्राप्त कराने के लिए तथा व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता तथा अखंडता सुनिश्चित करने वाला बंधुत्व बढ़ाने के लिए
दृढ़ संकल्पित होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख दिनांक 26 नवम्बर 1949 को एतत द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

पूरे संविधान को समझने के लिए इसे चार भागों में बाँट लेते हैं।

1. संविधान के अधिकार का स्रोत
2. भारत की प्रकृति 
3. संविधान के उद्देश्य
4. प्रस्तावना का महत्व

1.संविधान के अधिकार का स्रोत
(Source of right of constitution) 

प्रस्तवाना कहती है कि संविधान भारत के लोगों से शक्ति अधिग्रहित करता है। प्रस्तावना के पहले कुछ शब्द है – हम भारत के लोग (we the people of india) 

ये कुछ शब्द भारत में रहने वाले लोगों के महता के बारे में बताता है। इसका मतलब है संविधान को बनाया ही गया है भारत के लोगों के लिए,

तथा इसके आगे में जो हम शब्द का इस्तेमाल किया गया है वो भारतीय लोगों के एकजुटता को दर्शाता है तथा ये दर्शाता है कि संविधान के शक्ति का स्रोत भारत की जनता है।

प्रस्तावना के अंतिम लाइन (इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं) से ये और भी सत्यापित हो जाता है कि हमने इस संविधान को खुद अपने लिए बनाया है,

हमने खुद अपने आप को नियमों में बांधा है, हमने खुद इसे आत्मिक स्तर पर स्वीकारा है तथा इसके अनुरूप ही अपने जीवन मूल्यों को विकसित करने का प्रण लिया है।  

2.भारत की प्रकृति
(Nature of india) 

भारत किस प्रकार का देश है या फिर ये किस प्रकार का देश बनने की ईच्छा रखता है यह संविधान में लिखी इस वाक्य से पूरी तरह से स्पष्ट हो जाता है –

कि भारत एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक व गणतांत्रिक राजव्यवस्था वाला देश है। 

इसका एक-एक शब्द काफी गूढ़ अर्थ लिए हुए है। इस पूरे वाक्य को समझने के लिए जरूरी है कि हम इसके शब्दार्थ के साथ-साथ इसके भावार्थ को भी समझे। आइये एक-एक करके समझते हैं। 

संप्रभुता (Sovereignty) 

संप्रभु शब्द का आशय है – अपने मन का मालिक होना, अपना निर्णय स्वयं लेना यानी स्वयं को संचालित करने के लिए किसी अन्य पर निर्भर न रहना ।

देश के संबंध में इसका मतलब है कि, भारत न तो किसी अन्य देश पर निर्भर है और न ही किसी अन्य देश का डोमिनियन है, यानी कि भारत किसी देश के अधिकार क्षेत्र के अंदर नहीं है और न ही कोई और देश भारत का प्रशासन चलाता है।

इसके ऊपर और कोई शक्ति नहीं है और यह अपने आंतरिक अथवा बाहरी मामलों का निः तारण करने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र है। 

समाजवादी (Socialist) 

यहाँ पर एक बात याद रखने योग्य है कि मूल प्रस्तावना में समाजवादी (Socialist) शब्द नहीं था। इसे वर्ष 1976 के 42वें संविधान संशोधन के द्वारा जोड़ा गया। 

समाजवाद का मूल अर्थ यही है कि व्यक्ति से ज्यादा समाज को महत्व देना, मतलब ये कि एक समाज के रूप में सभी व्यक्ति समान है, और अगर ऐसा नहीं है तो राज्य की मदद से समानता स्थापित करने का प्रयास किया जाएगा।

यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि भारतीय समाजवाद,  लोकतांत्रिक समाजवाद है न कि साम्यवादी समाजवाद, दोनों में कुछ मूलभूत अंतर है।

लोकतांत्रिक समाजवाद (Democratic socialism) मिश्रित अर्थव्यवस्था को मानता है। मतलब ये कि जहां सार्वजनिक और निजी क्षेत्र साथ-साथ काम करते हैं।

वहीं साम्यवादी समाजवाद (Communist socialism) जिसे राज्यश्रित समाजवाद भी कहा जाता है, इसमें  उत्पादन और वितरण के सभी साधनों पर राज्य का अधिकार होता है।

मतलब ये कि देश के सारी की सारी सम्पत्तियों पर राज्य का स्वामित्व होगा। सीधे-सीधे कहूँ तो अगर ये व्यवस्था रहता तो आज भारत में अंबानी और टाटा जैसे लोग नहीं होते। 

धर्मनिरपेक्ष (Secular) 

धर्मनिरपेक्ष शब्द को भी 42वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा जोड़ा गया। इसका सीधा-सीधा मतलब होता है कि राज्य का कोई धर्म नहीं होगा, अर्थात राज्य के लिए सभी धर्म समान है तथा सभी को समान संरक्षण प्राप्त है।

धर्म के मामलों में लगभग सारी की सारी शक्तियां लोगों के हाथ में है, मतलब ये कि लोगों को अपने धर्म का चुनाव, प्रचार-प्रसार आदि की स्वतंत्रता है। इसीलिए तो धार्मिक स्वतंत्रता (Religious freedom) को मूल अधिकार की श्रेणी में रखा गया है।

यहाँ धर्मनिरपेक्ष की जगह कई बार पंथनिरपेक्ष शब्द का भी इस्तेमाल किया जाता है। ऐसा इसीलिए क्योंकि हमारा मानना है कि हमारा धर्म कोई पूजा-पद्धति नहीं है बल्कि जरूरी जीवन मूल्य है।

जो कि पूरी तरह से पूजा-पद्धति से ऊपर है। इसीलिए हम धर्म से विमुख हो ही नहीं सकते, उससे निरपेक्ष हो ही नहीं सकते। इसिलिए इसकी जगह पर पंथनिरपेक्ष को इस्तेमाल करते हैं क्योंकि पंथ पूजा-पद्धति को दर्शाता है और समानता स्थापित करने के लिए राज्य को पंथ से निरपेक्ष होना जरूरी है।

लोकतांत्रिक (Democratic) 

संविधान की प्रस्तावना में एक लोकतांत्रिक राजव्यवस्था कि परिकल्पना की गयी है। यह व्यवस्था प्रचलित संप्रभुता के सिद्धांत (Principles of sovereignty) पर आधारित है अर्थात सर्वोच्च शक्ति जनता के हाथ में हो । 

अब जैसा कि हम जानते है, लोकतंत्र दो प्रकार का होता है – प्रत्यक्ष (direct) व अप्रत्यक्ष (indirect).

भारतीय संविधान में अप्रत्यक्ष और संसदीय लोकतंत्र (parliamentary democracy) की व्यवस्था है, जिसमें कार्यकारिणी (Executive) अपनी सभी नीतियों और कार्यों के लिए विधायिका के प्रति जवाबदेह है। 

गणतंत्र (The republic) 

एक लोकतांत्रिक राजव्यवस्था को दो वर्गों में बांटा जा सकता है –  राजशाही (Monarchy) और गणतंत्र (republic)। राजशाही व्यवस्था में राज्य का प्रमुख उत्तराधिकारी व्यवस्था (Successor system) के माध्यम से पद पर आसीन होता है; जैसा कि ब्रिटेन में 

वहीं गणतंत्र व्यवस्था में राज्य का प्रमुख हमेशा प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से एक निश्चित समय के लिए चुनकर आता है, जैसे अमेरिका और भारत । भारत का संवैधानिक राष्ट्र प्रमुख यानी कि राष्ट्रपति चुनकर आता है। इसीलि हम एक गणतंत्र है और इसीलिए हम गणतंत्र दिवस को इतनी प्राथमिकता देते हैं।

तो ये तो रहा भारत की प्रकृति कि – भारत किस प्रकार का राज्य है या फिर किस प्रकार के राज्य होने का दावा करता है। 

अब बात करेंगे कि भारत के संविधान का उद्देश्य क्या है? 

3.संविधान के उद्देश्य
(Objectives of the constitution)

प्रस्तावना के अनुसार न्याय, स्वतंत्रता, समताबंधुत्व संविधान के उद्देश्य हैं। आइये इन उद्देश्यों को एक-एक करके देखते हैं।

न्याय (The justice)

न्याय लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक मूल अवधारणा है। इसी को सुनिश्चित करने हेतु प्रस्तावना में तीन रूपों में न्याय की बात कही गयी है  – सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक। 

सामाजिक न्याय का अर्थ है एक भेदभाव रहित समाज की स्थापना दूसरे शब्दों में कहें तो, हर व्यक्ति के साथ जाति, रंग, धर्म, लिंग के आधार पर बिना भेदभाव किए समान व्यवहार। 

आर्थिक न्याय का अर्थ है – आर्थिक कारणों के आधार पर किसी भी व्यक्ति से किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा। तथा सम्पदा, आय व संपत्ति जनित असमानता को दूर करने का प्रयास किया जाएगा।

राजनीतिक न्याय का अर्थ है – हर व्यक्ति को समान राजनीतिक अधिकार प्राप्त होंगे, चाहे वो किसी सार्वजनिक दफ्तरों में प्रवेश की बात हो या फिर राष्ट्रपति बनने की  

स्वतंत्रता (Freedom)

स्वतंत्रता का मतलब  है – लोगों की गतिविधियों पर किसी भी प्रकार का कोई रोक-ठोक का न होना। 

प्रस्तावना हर व्यक्ति के लिए मौलिक अधिकारों के जरिये पाँच प्रकार के स्वतंत्रता की बात करता है- 🌈 विचार, 🌈 अभिव्यक्ति, 🌈 विश्वास, 🌈 धर्म और उपासना । 

मतलब ये कि हर व्यक्ति को सोचने और सपने देखने की आजादी है। अपने सोच को अभिव्यक्ति करने की यानी कि लोगों के सामने अपने विचार को रखने की भी आजादी है।

अपने इच्छानुसार किसी भी चीज़ पर विश्वास कर सकने की आजादी हैं। किसी भी धर्म को अपना सकने की आजादी हैं और अपनी इच्छानुसार पूजा-पद्धति को अपना सकने की आजादी है। 

इन सभी की चर्चा आगे विस्तार से ↗️मूल अधिकार वाले लेख में किया गया है। आप चाहे तो उसे अभी पढ़ सकते हैं।

समता (Equality) 

समता का अर्थ है – समाज के किसी भी वर्ग के लिए विशेषाधिकार की अनुपस्थिति और बिना किसी भेदभाव के हर व्यक्ति को समान अवसर प्रदान करने के उपबंध। प्रस्तावना में प्रतिष्ठा और अवसर की समता की बात कही गयी है। 

भारतीय संविधान की प्रस्तावना हर नागरिक को प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्रदान करती है। इस प्रतिष्ठा और अवसर की समता के तीन आयाम है – नागरिक, राजनैतिक  व आर्थिक । 

 नागरिक समता को सुनिश्चित करने के लिए मौलिक अधिकारों में निम्न प्रावधान किया गया है।

🌈 विधि के समक्ष समता – अनुच्छेद 14 
🌈 धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर मूलवंश का निषेध – अनुच्छेद 15 
🌈 लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता – अनुच्छेद 16 
🌈 अस्पृश्यता का अंत – अनुच्छेद 17 
🌈 उपाधियों का अंत – अनुच्छेद – 18 

राजनैतिक समता को सुनिश्चित करने के लिए संविधान में कुछ उपबंध किए गए है,

जैसे पहला है कि धर्म, जाति लिंग अथवा वर्ग के आधार पर किसी व्यक्ति को मतदाता सूची में शामिल होने के अयोग्य करार नहीं दिया जाएगा। अनुच्छेद –  325 
दूसरा है लोकसभा और विधानसभाओं के लिए वयस्क मतदान का प्रावधान ।
अनुच्छेद – 326 

आर्थिक समता को इस तरह से समझ सकते है से कि पुरुष और महिला का समान कार्य के लिए समान वेतन । ये सुनिश्चित करना राज्य का कर्तव्य है।

⚫ प्रस्तावना में व्यक्ति की गरिमा (Dignity of person) की बात भी कही गयी है।

व्यक्ति के गौरव या गरिमा का अर्थ है कि संविधान न केवल वास्तविक रूप में भलाई तथा लोकतांत्रिक तंत्र की मौजूदगी सुरक्षित करता है बल्कि यह भी मानता है कि हर व्यक्ति का व्यक्तित्व पवित्र है। प्रस्तावना का एक अंतिम महत्वपूर्ण शब्द है – बंधुत्व 

बंधुत्व (Fraternity) 

बंधुत्व का अर्थ है – भाईचारे की भावना। संविधान एकल नागरिकता के एक तंत्र के माध्यम से भाईचारे की भावना को प्रोत्साहित करता है।

मौलिक कर्तव्य या अनुच्छेद 51 (क) भी कहता हैं कि यह हर भारतीय नागरिक का कर्तव्य होगा कि वह धार्मिक, भाषायी, क्षेत्रीय अथवा वर्ग विविधताओं से ऊपर उठ सौहार्द और आपसी भाईचारे की भावना को प्रोत्साहित करेगा।

प्रस्तावना साफ -साफ कहती है कि बंधुत्व में दो बातों कों सुनिश्चित करना होगा। पहला, व्यक्ति का सम्मान और दूसरा, देश की एकता और अखंडता

हालांकि यहाँ पर एक बात जानना जरूरी है कि अखंडता शब्द को 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा प्रस्तवाना में जोड़ा गया। 

4.प्रस्तावना का महत्व
(The importance of the preamble)

⚫ प्रस्तावना में उस आधारभूत दर्शन और राजनीतिक, धार्मिक व नैतिक मौलिक मूल्यों का उल्लेख है जो हमारे संविधान के आधार है ।

⚫ इसमें संविधान सभा की महान और आदर्श सोच उल्लिखित है। इसके अलावा यह संविधान की नीव रखने वालों के सपनों और अभिलाषाओं का परिलक्षन करती है।

⚫ संविधान निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले संविधान सभा के अध्यक्ष सर अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर ने कहा है- संविधान की प्रस्तावना हमारे दीर्घकालिक सपनों का विचार है।

उम्मीद है कि पूरी प्रस्तावना को आप समझ गए होंगे ।

🔹🔹🔹🔹🔹

प्रस्तावना – ⏬डाउन लोड

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