विश्वास और भरोसा में मुख्य अंतर क्या हैं ?

विश्वास और भरोसा दोनों अक्सर इस्तेमाल में आने वाला शब्द है और आमतौर पर इसका इस्तेमाल एक-दूसरे के पर्याय कर रूप में किया जाता है, हालांकि दोनों में सूक्ष्म अंतर मौजूद है।

इस लेख में हम विश्वास और भरोसा पर सरल एवं संक्षिप्त चर्चा करेंगे एवं इसके मध्य के अंतरों को जानने का प्रयास करेंगे, तो लेख को अंत तक जरूर पढ़ें;

विश्वास और भरोसा में अंतर

| विश्वास और भरोसा

विश्वास और भरोसा का मतलब ढूँढने की कोशिश करें तो आमतौर पर इन दोनों का अर्थ एक सा ही दिखायी पड़ता है। पर अगर इस्तेमाल की दृष्टि से देखें तो दोनों में काफी अंतर है।

आप अगर इंग्लिश में देखें तो दोनों शब्दों के लिए Belief या Trust का इस्तेमाल किया जाता है। पर अगर इसके कुछ और समानार्थी शब्दों पर नज़र डालने की कोशिश करें तो दोनों में अंतर थोड़ा-थोड़ा स्पष्ट होने लगता है।

आप अगर विश्वास के लिए इंग्लिश शब्दों को देखें तो Belief, Faith, Assurance जैसे शब्द आपको मिलेंगे। वहीं आप भरोसा के लिए देखें तो Reliance, Hope, Support जैसे शब्द आपको मिलेंगे।

अगर आप अब दोनों को देखें तो क्या अब आपको इन दोनों के अर्थ में कुछ अंतर दिखायी पड़ रहा है। पड़ रहा होगा। अगर और अगर नहीं दिखायी पड़ रहा है तो कोई बात नहीं आप आगे पढ़िये, आपको समझ में आ जाएगा।

| विश्वास मतलब क्या?

🔷 जब किसी चीज़ के प्रति हमारी यह निश्चित धारणा बन जाती है कि यह सही है तथा इसका अस्तित्व विद्यमान है, तो इसे विश्वास कहा जाता है।

कई बार हम केवल अनुमान के आधार पर भी किसी चीज़ के प्रति एक निश्चित और दृढ़ धारणा बना लेते हैं तो उसे भी विश्वास कहा जाता है, जैसे कि – मेरा यह पक्का विश्वास है कि आज वह नहा कर नहीं आएगा, मुझे खुद पर पूरा विश्वास है कि मैं ये कर लूँगा। अब जैसा कि आप देख सकते हैं ये पूरी तरह से एक अनुमान पर आधारित है।

विश्वास को प्रेम से जोड़कर देखा जाता है और विश्वास को प्रेम की पहली सीढ़ी माना जाता है। कई विद्वानों का भी मानना है कि बिना विश्वास के प्रेम संभव नहीं है।

🔷 दृढ़-आस्था, निश्चय और श्रद्धापूर्वक किसी बात को मान लेना विश्वास है। ऐसा इसीलिए क्योंकि विश्वास में विचार की दृढ़ता की प्रधानता होती है। तभी तो कोई अपने कर्म पर विश्वास करता है, तो कोई अपने भाग्य पर। इसका अरबी पर्याय एतबार और यकीन है।

🔷 विश्वास दिलाना किसी के मन में कोई धारणा पक्की करना है। वहीं विश्वासघात किसी को विश्वास दिला कर धोखा देना है। विश्वास किए जाने योग्य व्यक्ति को विश्वासपात्र कहा जाता है यानि जो विश्वसनीय या विश्वासी हो। 

| भरोसा मतलब क्या?

🔷 किसी पर भार रख कर उस पर अबलम्बित रहना या आश्रित रहना भरोसा है। यह मन की ऐसी स्थिति है, जिसमें जरूरत पड़ने पर किसी व्यक्ति विशेष द्वारा सहायता किए जाने की आशा और विश्वास हो।

अब आप समझ पा रहे होंगे कि Reliance, Hope, Support में एक प्रकार से आश्रित होने का ही तो भाव है। उदाहरण के लिए जैसे – मैंने अपनी लड़की की शादी आप ही भरोसे ठानी है।, आप के भरोसे मैं कब तक यहाँ रहूँगा? आप ही बताइये।

🔷 भरोसा किए जाने वाले व्यक्ति के लिए समर्थ होना तो जरूरी है ही, उसे अपने वादे पर दृढ़ रहनेवाला भी होना चाहिए। जैसे – उनके भरोसे ही मैंने यह समारोह आयोजित किया है।

| विश्वास और भरोसा में कुल मिलाकर अंतर

कुल मिलाकर देखें तो भरोसा और विश्वास में फर्क यह है कि भरोसा करने वाला व्यक्ति जिस पर भरोसा करता है, वह उससे समय पर काम आने या सहायता पाने की उम्मीद करता है।

मतलब ये कि कुछ पाने की उम्मीद करता है, जबकि विश्वास करनेवाला व्यक्ति जिस पर विश्वास करता है वह उससे समान्यतः कुछ पाने की आशा नहीं रखता।

जहां विश्वास में आस्था, समर्पण और संतोष का भाव होता है, वहीं भरोसा में आसरे और सहारे का भाव होता है; जैसे राम को हनुमान की वीरता पर विश्वास था और उनकी भक्ति पर भरोसा।

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