शिक्षा और विद्या में अंतर क्या है?

शिक्षा और विद्या में अंतर बिलकुल वैसे ही है जैसे एक नियोक्ता एक अभ्यर्थी से पूछता है कि कितने पढ़ें हो? तो जवाब आता है, ग्रेजुएशन तक। क्या कर सकते हो? तो जवाब आता है, कुछ भी नहीं…….। यानी कि शिक्षित तो है लेकिन कोई कौशल या तजुर्बा नहीं।

तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें, इस लेख में शिक्षा और विद्या पर सरल और सहज चर्चा की गई है और इसके विभिन्न पहलुओं को सामने रखने की कोशिश की गई है।

शिक्षा और विद्या

| शिक्षा और विद्या

इन्सानों की एक खास बात ये है कि वो जिज्ञासु होता है, चीजों को जानना और समझना चाहता है। वो न केवल अपने बाह्य भौतिक परिवेश को जानना चाहता है बल्कि अपने आंतरिक परिवेश को भी जानना चाहता है। और इसके लिए वे उन गुणों या कौशलों को आत्मसात करता है जिसकी मदद से वो चीजों को जान या समझ सकता है। संभवतः इन्सानों की यही जानने की प्रवृति ने शिक्षा या विद्या जैसी अवधारणा को जन्म दिया होगा ताकि इंसान एक अनुशासनात्मक तरीके से चीजों को जान सकें, खुद को समझ सकें।

| शिक्षा क्या है?

◾ शिक्षा की उत्पत्ति ‘शिक्ष’ धातु से हुई है। जिसका अर्थ सीखना और सीखाना है। सीखते हम तभी है जब हम उस चीज़ का अध्ययन और अभ्यास करते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो यह ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया है; जैसे- वह इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त करने के लिए जर्मनी गया है, वह मोटरसाइकल चलाना सीख रहा है इत्यादि।

◾ अन्य शब्दों में कहें तो शिक्षा का अर्थ होता है, सीखने या सिखाने की क्रिया द्वारा व्यवहार में परिवर्तन लाना। अब व्यवहार में परिवर्तन सकारात्मक भी हो सकता है और नकारात्मक भी। जैसे कि कोई अगर अपने व्यवहार में कुछ इस कदर परिवर्तन करें कि, आतंकवादी बन जाये तो आप उसे क्या कहेंगे। संभवतः आप यही कहेंगे कि उसे गलत शिक्षा मिली है या गलत तालीम मिली है।

◾ शिक्षा को अरबी में तालीम और अँग्रेजी में Education कहते है। Education शब्द लैटिन शब्द Educatum से बना है जिसका मतलब होता है शिक्षण की कला। इसीलिए वर्तमान में Education का मतलब व्यक्ति के अन्दर छिपी हुई समस्त शक्तियों को सामाजिक वातावरण में विकसित करने की कला है।

◾ किसी भी प्रकार की कला, भाषा, विज्ञान, वाणिज्य, अभियांत्रिकी, चिकित्सा, वास्तु, चित्र, संगीत, नृत्य, नाटक, प्रबंधन आदि का ज्ञान प्राप्त करना शिक्षा है।  इसका उद्देश्य मनुष्य का सर्वांगीण विकास है यानी कि नैतिक, बौद्धिक, शारीरिक और चारित्रिक विकास आदि ताकि हम योग्य, सभ्य, कर्मठ, स्वावलंबी (independent) और समर्थ बन सकें। 

◾ किसी चीज़ से नसीहत प्राप्त होना भी शिक्षा है; जैसे कि – इस घटना से मुझे यह शिक्षा मिली कि हमेशा कुछ न कुछ घटना घटती ही रहती है, इस कहानी से मुझे शिक्षा मिली कि कुछ कहानियाँ बहुत ही बोरिंग होती है इत्यादि।

◾ किसी को सबक सिखाना भी शिक्षा का ही एक रूप है। जैसे कि- उसे ऐसी शिक्षा दो या ऐसी सबक सिखाओ कि नाना न मरे कि फिर वो ऐसा काम करे, जब तक मैं उसे सबक नहीं सीखा देता, चैन से नहीं बैठूँगा इत्यादि।

कुल मिलाकर जो है, उसे पूर्ण रूप में देख पाने की क्षमता का विकास शिक्षा है। [विस्तार से पढ़ें – शिक्षा : प्रकार, विशेषताएँ, खामियाँ इत्यादि]

| विद्या क्या है?

◾ विद्या की उत्पत्ति ‘विद’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ जानना, समझना, सीखना, अनुभव करना, विवेचना या व्याख्या करना आदि है।दूसरे शब्दों में कहें तो अध्ययन, शिक्षा और अनुभव से प्राप्त व्यवस्थित ज्ञान और तजुर्बा, विद्या है, जैसे कि जादू, कोई विशेष कला एवं गुण आदि।

◾ एक तरह से कहें तो विद्या, शिक्षा का परिणाम है। मतलब कि हम अध्ययन करते है, अभ्यास करते हैं परिणामस्वरूप कुछ सीखते हैं, कुछ अनुभव होता है पर बहुत सारी चीजों को हम भूल भी जाते हैं। इस सब के बावजूद भी जो बचा रह जाता है वो विद्या है।  

◾ विद्या को अरबी में इल्म कहा जाता है इससे एक चीज़ स्पष्ट हो जाती है कि विद्या में कौशल भी समाहित है। दूसरे शब्दों में कहें तो शिक्षा कौशल रहित भी हो सकता है लेकिन विद्या कौशल युक्त होता है। इस प्रकार कह सकते हैं कि खास कौशल युक्त शिक्षा, विद्या है।

◾ एक संस्कृत का श्लोक है – विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम् ।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम् ॥

यानी कि विद्या विनय देती है; विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म, और धर्म से सुख प्राप्त होता है। इस श्लोक के हिसाब से अगर देखें तो आप एक चीज़ गौर करेंगे कि विद्या से विनय (humility) आती है, न कि शिक्षा से। इससे आप समझ सकते हैं कि विद्या, शिक्षा से कहीं आगे की चीज़ है।

वैशेषिक दर्शन के अनुसार, दोषरहित ज्ञान विद्या है। और दोषसहित ज्ञान अविद्या है। अगर कोई व्यक्ति विद्या और अविद्या दोनों को ही सच्चे अर्थों में जान लें और उसी के अनुसार कर्म करे तो उसे मोक्ष मिल जाएगी।

मुंडकोपनिषद के अनुसार, विद्या दो प्रकार का होता है – परा विद्या और अपरा विद्या। जिस विद्या से ब्रह्मज्ञान या अलौकिक ज्ञान की प्राप्ति हो उसे परा विद्या कहा जाता है। इसी तरह से जिस विद्या से लौकिक ज्ञान या पदार्थ ज्ञान की प्राप्ति हो उसे अपरा विद्या कहा जाता है। इसी अपरा विद्या को आधुनिक काल में विज्ञान कहा जाता है।

विष्णुपुराण के अनुसार, 18 विद्याएँ है – [चार वेद, छह वेदांग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष),  मीमांसान्यायपुराण  धर्मशास्त्रआयुर्वेदधनुर्वेद, गन्धर्व और अर्थशास्त्र] । इसी में से चारों वेद और छहों वेदांग को अपरा विद्या कहा जाता है।

| शिक्षा और विद्या में कुल मिलाकर अंतर

विद्या एक बहुत ही व्यापक शब्द है जिसमें सीखने-सिखाने के साथ ही कौशल, चातुर्य, तजुर्बा आदि का भी समावेशन होता हैं जबकि शिक्षा बहुत हद तक सीखने-सिखाने आदि तक सीमित होता है।

◾ शिक्षा एक प्रकार से किताबी या यूं कहें कि सैद्धांतिक होती है, जब उसमें हमारा अनुभव जुड़ता है, जब उससे हमारी चेतना जुड़ता है, और तब कहीं जाकर के शिक्षा कोई बाहरी चीज़ न होकर के हमारा ही एक अंग बनने लग जाता है, तब वो हमारे आचरण में उतरने लग जाता है। तब जाकर हम ये कहते हैं कि शिक्षा अब विद्या में बदलने लग गया है।

◾ शिक्षित होने और विद्वान होने में फर्क होता है, शिक्षित होने के बस कुछ खास पैमाने होते हैं उस पैमाने के अनुसार शिक्षा ग्रहण लेने के बाद हम शिक्षित हो जाते हैं, लेकिन जब उसी शिक्षा का इस्तेमाल करके अपनी समझ को और विस्तार देते हैं, नई चीजों का सृजन करते हैं, स्थापित ज्ञान को और अधिक बढ़ा देते हैं, तब हम विद्वान हो जाते हैं।

◾ इस प्रकार देखें तो शिक्षा एक स्थापित मानदंड है, पर जब हम अपने विवेक, समझबूझ, अनुभव, योग्यता का इस्तेमाल करके उस स्थापित मानदंड के बैरियर को तोड़कर आगे आते हैं। तो शिक्षा के उस स्तर को विद्या कहते हैं। आप एक चीज़ गौर करेंगे कि सरस्वती को विद्या की देवी या ज्ञान की देवी माना गया है न कि शिक्षा की देवी।

यहाँ पर ये जान लेना जरूरी है कि कुछ लोग विद्या को शिक्षा का एक भाग मानते हैं जबकि ज़्यादातर लोग शिक्षा को विद्या का एक भाग मानते हैं। हमारे धर्मग्रंथों में भी शिक्षा को विद्या का एक भाग माना गया है जिसकी पुष्टि आप ऊपर दिये गए कुछ धार्मिक संदर्भों से कर सकते हैं।

| समापन टिप्पणी

कुल मिलाकर देखें तो शिक्षा और विद्या में ऐसा अंतर नहीं है कि दोनों को बिलकुल ही एक-दूसरे से पृथक कर दिया जाये क्योंकि सीखना और समझना दोनों में कॉमन है। हालांकि कुछ ऐसे टर्म है जो हम सिर्फ शिक्षा के लिए उपयोग में लाते हैं जैसे कि इस घटना से उसे सबक मिली या सीख मिली, वो एक शिक्षित बेरोजगार है आदि। इसी तरह से कुछ ऐसे टर्म है जो सिर्फ विद्या के लिए इस्तेमाल में आती है जैसे कि – विद्यां ददाति विनयं या विद्या की देवी सरस्वती इत्यादि।

विद्या में अनुभव, चातुर्य और कौशल का भी समावेशन होता है। इसे इस तरह से समझ सकते हैं कि एक आदमी रोटी बनाना सीख रहा है लेकिन सीखने के कुछ सालों के बाद अब वह आँख बंद कर के भी रोटी बना लेता है।

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