91st Constitution Amendment Act 2003 in hindi

91वां संविधान संशोधन अधिनियम 2003 (91st Constitution Amendment Act 2003), दल-बदल कानून से संबंधित हैं।

इस लेख में हम 91वां संविधान संशोधन अधिनियम 2003 पर सरल और सहज चर्चा करेंगे एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझेंगे,

तो दल-बदल कानून को अच्छी तरह से समझने के लिए इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें;

91st Constitution Amendment Act 2003

Background of the 91st Constitution Amendment Act 2003

साठ और सत्तर के दशक में नेताओं द्वारा दल बदल की घटनाएँ इतनी तेजी से बढ़ने लगी कि जल्द ही ये विषय एक चिंता के रूप में परिणत हो गया। जिसको जब मन होता अपनी मर्जी और हित के अनुसार अपना दल बदल लेते थे।

इसी पर अंकुश लगाने के लिए 1985 में 52वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा दसवीं अनुसूची (Tenth schedule) संविधान में जोड़ा गया जिसका उद्देश्य भारतीय संसदीय लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करना तथा असैद्धांतिक और अनैतिक दल-परिवर्तन पर रोक लगाना था। इसी को दल बदल कानून (anti defection law)↗️ कहा गया, इस पर एक अलग से लेख है आप इस लेख को समझने से पहले उसे जरूर समझ लें।

इस दल बदल कानून से जितनी अपेक्षाएँ थी वो पूरा न सो सका क्योंकि जिसको दल बदलना होता था वो कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेता था। दूसरी बात कि दल बदल कानून में एक प्रावधान था कि यदि एक-तिहाई सदस्य किसी दल से निकलकर दूसरे दल में मिल जाता है तो उसे दल बदल नहीं माना जाएगा।

और सिर्फ इस प्रावधान का बहुत फायदा उठाया जाने लगा, क्योंकि जो दल बदल पहले व्यक्तिगत होता था अब वो बल्क में होने लगा। और एक बार फिर से ये विषय चिंता का कारण बनने लगा, ढेरों आलोचनाएँ होने लगी। इसी को ध्यान में रखकर और दल बदल को थोड़ा और सख्त बनाने के उद्देश्य 91वां संविधान संशोधन अधिनियम 2003 द्वारा इस कानून में कुछ संशोधन किया गया। इसमें हुए संशोधन को जानने से पहले आइये पहले ये जानते है कि इसकी जरूरत क्यों पड़ी।

91वां संविधान संशोधन अधिनियम 2003 लाने का कारण

91वें संशोधन अधिनियम (2003) को अधिनियमित करने के निम्नलिखित कारण हैं:

◾जैसा कि अभी हमने ऊपर बताया कि इस कानून के प्रावधान दलबदल रोकने में प्रभावी सिद्ध नही हुई। उल्टे दसवीं सूची की भी इस आधार पर आलोचना की गई हे कि ये व्यक्तिगत दल-बदल का तो निषेध करती है पर यह बड़े पैमाने पर दल-बदल को प्रोत्साहित करती है इसीलिए दसवीं अनुसूची में दल बदलने के विरुद्ध कानून को सख्त बनाने की माँग होने लगी।

◾दिनेश गोस्वामी समिति (जो कि एक चुनाव सुधार समिति थी) ने 1990 की अपनी रिपोर्ट में इसमें सुधार की बात कही। इसके अलावा भारत के विधि आयोग ने अपनी 170वीं रिपोर्ट में तथा चुनाव कानूनों में सुधार (1999) एवं संविधान की कार्यप्रणाली की समीक्षा के लिए गठित राष्ट्रीय आयोग (NCRWC) ने अपनी 2002 की रिपोर्ट में दसवीं अनुसूची के उस प्रावधान को हटाने की अनुशंसा की हैं जिसमें दल-बदल के मामलों में अयोग्यता से छूट मिलती है।

◾इसके अलावा NCRWC ने यह भी कहा कि दलबदलू को मंत्री पद अथवा अन्य सार्वजनिक या लाभकारी राजनीतिक पद से हटाकर उसे दंडित किया जाना चाहिए। और उसे तब तक पद से हटाये रखा जाना चाहिए जब तक वर्तमान विधायिका का कार्यकाल पूरा न हो जाये या नई चुनाव के पश्चात नई विधायिका का गठन न हो जाए।

◾संविधान की कार्यप्रणाली को समीक्षा के लिए गठित आयोग (NCRWC) ने यह मत भी व्यक्त किया है कि केन्द्र में तथा राज्यों में बड़ी मंत्रिपरिषदों को गठन किया जाता रहा है। यानी कि जितना मर्जी उतने लोगों को मंत्री बना दिया जा रहा है। तो इसके लिए एक निश्चित संख्या होनी चाहिए और वो केन्द्र अथवा राज्य सरकारों में सदन की कुल सदस्य संख्या के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए।

91वें संशोधन अधिनियम 2003 का प्रावधान (Provision of 91st Amendment Act 2003)

91वां संविधान संशोधन अधिनियम 2003 द्वारा मंत्रिमंडल का आकार छोटा रखने, अयोग्य लोगों को नागरिक पद धारण करने से रोकने एवं दल-परिवर्तन विरोधी कानून को सशक्त बनाने के लिये निम्न उपबंध किये गये हैं:

अनुच्छेद 75 में संशोधन (Amendment of article 75)

अनुच्छेद 75 के तहत ये व्यवस्था किया गया कि प्रधानमंत्री सहित सम्पूर्ण मंत्रिपरिषद का आकार, लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा।

दूसरी बात कि संसद के किसी भी सदन का किसी भी राजनीतिक दल का ऐसा सदस्य, जो दल परिवर्तन के आधार पर अयोग्य ठहराया गया है, वह किसी मंत्री पद को धारण करने के भी अयोग्य होगा।

अनुच्छेद 164 में संशोधन (Amendment of article 164)

अनुच्छेद 164 के तहत ये व्यवस्था किया गया कि – मुख्यमंत्री सहित सम्पूर्ण मंत्रिपरिषद का आकार, राज्य विधानमंडल की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा। लेकिन मुख्यमंत्री सहित सम्पूर्ण मंत्रिपरिषद की कुल संख्या 2 से कम नहीं होनी चाहिये।

दूसरी बात कि – राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन का किसी भी राजनीतिक दल का ऐसा सदस्य, जो दल परिवर्तन के के आधार पर अयोग्य ठहराया गया है, वह किसी भी लाभ के राजनीतिक पद को धारण करने के भी अयोग्य होगा।

पारिश्रमिक-संबंधी राजनीतिक पद की नियुक्ति के लिए अयोग्यता (Disqualification for appointment to remunerative political post)

अनुच्छेद 361(ख) के तहत इसे जोड़ा गया है इसमें कहा गया है कि – संसद या राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन का किसी भी राजनीतिक दल का ऐसा सदस्य, जो दल परिवर्तन के आधार पर अयोग्य ठहराया गया है, वह किसी भी लाभ के राजनीतिक पद को धारण करने के भी अयोग्य होगा।

यहां लाभ के राजनीतिक पद का अभिप्राय है-(अ) केंद्र सरकार या राज्य सरकार के अधीन ऐसा कोई कार्यालय, जिसके लिये वेतन एवं अन्य लाभ संबंधित सरकार द्वारा लोक राजस्व से दिये जाते हों या (ब) किसी निकाय के अधीन कोई कार्यालय, चाहे वह निगमित (Incorporated) हो या नहीं, जिसका स्वामित्व पूणत: या अंशत: केंद्र सरकार या राज्य सरकार के पास हो तथा जिसके लिये वेतन एवं अन्य लाभ इस निकाय द्वारा दिये जाते हों

दसवीं अनुसूची में संशोधन (Amendment in Tenth Schedule)

दसवीं अनुसूची के उपबंध (दल परिवर्तन विरोधी कानून) विभाजन की उस दशा में लागू नहीं होंगे, जब किसी दल के एक-तिहाई सदस्य उस दल से अलग होकर दूसरे दल धड़े में शामिल हो जाता हो। यानी कि अब अगर एक तिहाई सदस्य भी अलग हो तो उसे संरक्षण का छूट नहीं मिलेगा बल्कि उसे भी अयोग्य माना जाएगा।

दूसरे शब्दों में, जब कोई विधानमंडल दल किसी दूसरे दल में विलय का निर्णय करता है और ऐसा निर्णय उसके दो तिहाई सदस्यों द्वारा समर्थित किया जाता है, तो उसे दल-बदल नहीं कहा जाएगा।

तो ये था 91वां संविधान संशोधन अधिनियम 2003मूल पीडीएफ़↗️ (91st Constitution Amendment Act 2003), उम्मीद है आप समझ गए होंगे, बेहतर समझ के लिए चुनाव से संबन्धित अन्य लेखों को भी अवश्य पढ़ें। लिंक नीचे दिया जा रहा है।

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