दल-बदल कानून UPSC। anti defection law in hindi

एक समय में, नेताओं द्वारा दल-बदल की घटनाएँ एक समस्या बन गई इसीलिए दल-बदल कानून लाया गया ताकि ऐसी गतिविधियों को रोका जा सके।

जाहिर है, बढ़िया ऑफर की तलाश में तो सभी रहता है चाहे वो नेता ही क्यों न हो। और दल बदलना नेताओं के लिए एक बढ़िया ऑफर की तरह ही तो है

जहां उसे अपने हित और सुविधानुसार चीज़ें मिलने की संभावना ज्यादा रहती है लेकिन अगर दल बदलना एक समस्या बन जाए तो समाधान तो खोजना ही पड़ेगा।

इस लेख में हम दल-बदल कानून (anti defection law) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे एवं इसके विभिन्न पहलुओं को समझने की कोशिश करेंगे।

दल-बदल कानून

दल-बदल कानून की पृष्ठभूमि

1967 के बाद काँग्रेस के कई राज्यों में चुनाव हारने और कई दलों के प्रादुर्भाव ने एक नई प्रकार की अस्थिरता को जन्म दिया। जब जन-प्रतिनिधि अपनी सुविधा और हित के हिसाब से एक दल से दूसरे दल में जाने लगे। जिधर से अच्छा ऑफर मिलता उधर ही खिसक लेते। 1960 के दशक में ये प्रवृति बहुत ही ज्यादा देखने को मिली।

हद तो तब हो गया जब 1967 में हरियाणा के एक विधायक ने एक ही दिन में 3 बार अपने दल बदल लिए। इसीलिए उस समय ये एक बड़ी चिंता के रूप में सामने आयी। 1970 के दशक में उमा शंकर दीक्षित और शांतिभूषण की अगुवाई में इस समस्या का निदान तलाशने की कोशिश की गई लेकिन असफलता ही हाथ लगी। फिर 1985 में राजीव गांधी की सरकार ने 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, द्वारा सांसदों तथा विधायकों द्वारा एक राजनीतिक दल से दूसरे दल में दल-परिवर्तन के आधार पर निरर्हता (Disqualification) के बारे में प्रावधान किया गया है।

इसके लिए संविधान के चार अनुच्छेदों (अनुच्छेद 101, 102 और अनुच्छेद 190, 191) में परिवर्तन किया गया है तथा संविधान में एक नयी अनुसूची ”दसवीं अनुसूची” जोड़ी गई है। इस अधिनियम को सामान्यतया ‘दल-बदल कानून (anti defection law)’ कहा जाता है। खासकर के अनुच्छेद 102(2) और 191(2) दसवीं अनुसूची से सम्बद्ध है जिसमें सांसदों एवं विधायकों को दल बदल के आधार पर अयोग्य घोषित करने का प्रावधान है। आइये उन प्रावधानों को समझते हैं।

दल-बदल कानून के प्रावधान

दसवीं अनुसूची (Tenth schedule) में दल-परिवर्तन के आधार पर सांसदों तथा विधायकों की अयोग्यता से संबंधित प्रावधानों का वर्णन निम्नानुसार हैः

दल-बदल के आधार पर अयोग्यता

राजनीतिक दलों के सदस्य : संसद अथवा किसी राज्य विधानमंडल का कोई निर्वाचित सदस्य, जो किसी राजनीतिक दल द्वारा खड़े किए गए उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित हुआ है, दल परिवर्तन के आधार पर अयोग्य होगा – (1) यदि वह स्वेच्छा से उस राजनैतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है, या (2) यदि वह उस सदन में मतदान के दौरान अपने राजनीतिक दल के निर्देशों के विपरीत मत देता है या फिर मत देता ही नहीं है, और इसके लिए वह राजनीतिक दल से पंद्रह दिनों के भीतर क्षमादान भी न पाता हो।

कुल मिलाकर इसका मतलब ये है कि कोई सदस्य जो किसी दल के टिकट पर चुना गया हो, उसे उस दल का सदस्य बने रहना चाहिए तथा दल के निर्देशों का पालन करना चाहिए। नहीं तो उसकी सदस्यता जा सकती है।

निर्दलीय सदस्य (Independent member) : संसद या राज्य विधानमंडल का कोई निर्दलीय सदस्य किसी सदन की सदस्यता के लिए अयोग्य हो जाएगा यदि वह उस चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर लेता है।

मनोनीत सदस्य (Nominated member) : संसद अथवा राज्य विधानमंडल का कोई मनोनीत सदस्य, जो अपने मनोनीत होने के समय किसी राजनीतिक दल का सदस्य नहीं है और जो अपना स्थान ग्रहण करने की तारीख से छह माह की अवधि समाप्त होने से पूर्व किसी भी राजनीतिक दल का सदस्य बना है, उस सदन की सदस्यता के अयोग्य हो जाएगा यदि वह उस सदन में अपना स्थान ग्रहण करने के छह माह बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर लेता है।

दल-बदल के अयोग्यता से छूट

दल-बदल के आधार पर उपरोक्त अयोग्यता निम्न दो मामलों में लागू नहीं होती :-

(1) जब कोई विधानमंडल दल किसी दूसरे दल में विलय का निर्णय करता है और ऐसा निर्णय उसके दो तिहाई सदस्यों द्वारा समर्थित किया जाता है, तो उसे दल-बदल नहीं कहा जाएगा।

नोट – पहले ये एक तिहाई ही था इसे 91वें संविधान संशोधन अधिनियम 2003↗️ द्वारा हटा दिया गया और दो तिहाई का प्रावधान शामिल किया गया।

(2) यदि कोई सदस्य सदन में पीठासीन अधिकारी चुने जाने पर अपने दल की सदस्यता से स्वैच्छिक रूप से बाहर चला जाता है और फिर अपने कार्यकाल के बाद दल की सदस्यता फिर से ग्रहण कर लेता है। इसे अयोग्यता नहीं माना जाता।

दल-बदल संबंधी विवादों पर निर्णय कौन लेता है?

दल-बदल से उत्पन्न अयोग्यता से संबंधित सभी प्रश्नों का निर्णय उसी सदन का अध्यक्ष करता है जिस सदन का ये मामला है। जैसे कि अगर लोकसभा के किसी सदस्य ने दल-बदल किया है तो उसे अयोग्य घोषित करने संबंधी जितने भी निर्णय होंगे वह लोकसभा अध्यक्ष द्वारा लिया जाएगा।

प्रारंभ में इस कानून के अनुसार, अध्यक्ष का निर्णय अंतिम होता था तथा इस पर किसी न्यायालय में प्रश्न नहीं उठाया जा सकता था। किंतु किहोतो होलोहन बनाम जाचिल्हू मामले (1992) में उच्चतम न्यायालय ने इस उपबंध को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित कर दिया कि यह उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर रहने की एक कोशिश है।

अपने निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सदन के अध्यक्ष द्वारा दसवीं अनुसूची के आधार पर अयोग्यता से संबंधित किसी प्रश्न पर दिया गया निर्णय न्यायिक समीक्षा (judicial review) योग्य होगी। यानी कि उसके बाद से अगर इस तरह का मामला आता है तो न्यायालय सदन के अध्यक्ष के फैसले की समीक्षा कर सकता है और फैसले में त्रुटि पाया जाने पर सुधारात्मक निर्देश दिया जा सकता है।

चूंकि सदन का अध्यक्ष किसी पार्टी से जुड़ा होता है इसीलिए इसकी संभावना बहुत ज्यादा रहती थी कि सदन का अध्यक्ष पार्टी हित में किसी अन्य दल सदस्य को अयोग्य घोषित कर दे या फिर अपने दल के किसी सदस्य को अयोग्य न ठहराए। न्यायिक समीक्षा के दायरे में आने से इसमें काफी सुधार देखा जा सकता है।

नियम बनाने की शक्ति

किसी सदन के अध्यक्ष को दसवीं अनुसूची के उपबंधों को प्रभावी करने के लिए नियम (विनियम) बनाने की शक्ति प्राप्त है। ऐसे नियम (विनियम) सदन के समक्ष रखे जाएँगे और उनका सभा द्वारा संशोधन या निरनुमोदन किया जा सकेगा।

सदन इन नियमों को स्वीकृत कर सकता है, इनमें सुधार कर सकता है अथवा इन्हें अस्वीकृत कर सकता है। इसके अलावा वह निर्देशित कर सकता है कि किसी सदस्य द्वारा ऐसे नियमों का उल्लंघन ठीक उसी प्रकार माना जाएगा जिस प्रकार सदन के विशेषाधिकारों का उल्लंघन माना जाता है।

दल बदल कानून का लाभ

(1) यह कानून विधायकों की दल-बदल की प्रवृत्ति पर रोक लगाकर राजनीतिक संस्था में उच्च स्थिरता प्रदान करता है।

(2) यह राजनीतिक दलों को दूसरे दलों में शामिल होने अथवा किसी विद्यमान दल में टूट जैसे लोकतांत्रिक तरीके से विधायिका द्वारा पुनर्समूहन (Re-grouping) की सुविधा प्रदान करता है।

(3) ये राजनीतिक स्तर पर भ्रष्टाचार को कम करता है तथा अनियमित निर्वाचनों पर अप्रगतिशील खर्च को कम करता है।

(4) इसने विद्यमान राजनीतिक दलों को एक संवैधानिक पहचान दी है। क्योंकि अब वे बिना इस डर के कि कहीं उसके सदस्य छोड़कर न चला जाये; काम कर सकते है।

संविधान की दसवीं अनुसूची का उद्देश्य भारतीय संसदीय लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करना तथा असैद्धांतिक और अनैतिक दल-परिवर्तन पर रोक लगाना है। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी↗️ ने इसे सार्वजनिक जीवन में सुधारों की ओर पहला कदम बताया था।

दल-विरोधी निरोधक कानून हमारे राजनीतिक जीवन की शुद्धता की तरफ पहला साहसिक कदम था तथा इसने देश के राजनीतिक जीवन में एक नए युग का सूत्रपात किया फिर भी इससे अपेक्षित फ़ायदा तो बिल्कुल भी नहीं मिला। इसीलिए इसकी काफी आलोचनाएँ होती है।

संविधान की दसवीं अनुसूची की आलोचनाpdf

1. यह असहमति तथा दल-परिवर्तन के बीच अंतर को नहीं बता पाया। इसने विधायिका को असहमति के अधिकार तथा सदविवेक की स्वतंत्रता में अवरोध उत्पन्न किया। अत: इसने दल के अनुशासन के नाम पर दल के स्वामित्व तथा अनुमति की कठोरता को आगे बढ़ाया

2. इसने छिटपुट दल-परिवर्तन पर रोक लगाई किंतु बड़े पैमाने पर होने वाले दल-परिवर्तन को कानूनी रूप दिया।

3. यह किसी विधायक द्वारा विधानमण्डल के बाहर किए गए उसके कार्यकलापों हेतु उसके निष्कासन की व्यवस्था नहीं करता है।

दो लोकसभा अध्यक्षों (रविराय- 1991 और शिवराज पाटील-1993 ) ने भी दल-परिवर्तन से संबंधित मामलों में न्यायनिर्णयन की अपनी उपयुक्तता पर संदेह जाहिर किया था।

नोट – दल बदल कानून (anti defection law) को थोड़ा और सख्त बनाने के उद्देश्य से 91वां संविधान संशोधन अधिनियम 2003↗️ द्वारा इस कानून में कुछ संशोधन किया गया, क्या सब संशोधन किया गया उसे जरूर समझें।

तो ये था दल बदल कानून (anti defection law) की महत्वपूर्ण बातें, बेहतर समझ के लिए चुनाव से संबन्धित अन्य महत्वपूर्ण लेखों को भी जरूर पढ़ें। लिंक नीचे दिया जा रहा है।

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