यह लेख अनुच्छेद 16 का यथारूप संकलन है। आप इसका हिन्दी और इंग्लिश दोनों अनुवाद पढ़ सकते हैं। आप इसे अच्छी तरह से समझ सके इसीलिए इसकी व्याख्या भी नीचे दी गई है आप उसे जरूर पढ़ें। इसकी व्याख्या इंग्लिश में भी उपलब्ध है, इसके लिए आप नीचे दिए गए लिंक का प्रयोग करें;

अपील - Bell आइकॉन पर क्लिक करके हमारे नोटिफ़िकेशन सर्विस को Allow कर दें ताकि आपको हरेक नए लेख की सूचना आसानी से प्राप्त हो जाए। साथ ही हमारे सोशल मीडिया हैंडल से जुड़ जाएँ और नवीनतम विचार-विमर्श का हिस्सा बनें;
अनुच्छेद 16
📌 Join YouTube📌 Join FB Group
📌 Join Telegram📌 Like FB Page
📖 Read in English📥 PDF

📜 अनुच्छेद 16 (Article 16)

16. लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता — (1) राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी।

(2) राज्य के अधीन किसी नियोजन या पद के संबंध में केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, उद्भव, जन्मस्थान, निवास या इनमें से किसी के आधार पर न तो कोई नागरिक अपात्र होगा और न उससे विभेद किया जाएगा|

(3) इस अनुच्छेद की कोई बात संसद्‌ को कोई ऐसी विधि बनाने से निवारित नहीं करेगी जो 1[किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र की सरकार के या उसमें के किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अधीन वाले किसी वर्ग या वर्गों के पद पर नियोजन या नियुक्ति के संबंध में ऐसे नियोजन या नियुक्ति से पहले उस राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के भीतर निवास विषयक कोई अपेक्षा विहित करती है।]

(4) इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी ।

2[(4क) इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय मैं राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, राज्य के अधीन सेवाओं में 3[किसी वर्ग या वर्गों के पदों पर, पारिणामिक ज्येष्ठता सहित, प्रोन्नति के मामलों में] आरक्षण के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।]

4[(4ख) इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को किसी वर्ष में किन्हीं न भरी गई ऐसी रिक्तियों को, जो खंड (4) या खंड (4क) के अधीन किए गए आरक्षण के लिए किसी उपबंध के अनुसार उस वर्ष में भरी जाने के लिए आरक्षित हैं, किसी उत्तरवर्ती वर्ष या वर्षों में भरे जाने के लिए पृथक्‌ वर्ग की रिक्तियों के रूप में विचार करने से निवारित नहीं करेगी और ऐसे वर्ग की रिक्तियों पर उस वर्ष की रिक्तियों के साथ जिसमें वे भरी जा रही हैं, उस वर्ष की रिक्तियों की कुल संख्या के संबंध में पचास प्रतिशत आरक्षण की अधिकतम सीमा का अवधारण करने के लिए विचार नहीं किया जाएगा।]

(5) इस अनुच्छेद की कोई बात किसी ऐसी विधि के प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी जो यह उपबंध करती है कि किसी धार्मिक या सांप्रदायिक संस्था के कार्यकलाप से संबंधित कोई पदधारी या उसके शासी निकाय का कोई सदस्य किसी विशिष्ट धर्म का मानने वाला या विशिष्ट संप्रदाय का ही हो।

5[(6) इस अनुच्छेद की कोई बात, राज्य को विद्यमान आरक्षण के अतिरिक्त तथा प्रत्येक प्रवर्ग में पदों के अधिकतम दस प्रतिशत से अध्यधीन, खंड (4) में उल्लिखित वर्गों से भिन्न नागरिकों के आर्थिक रूप से दुर्बल किन्ही वर्गों के पक्ष में नियुक्तियों और पदों के आरक्षण के लिए कोई भी उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी।]
———————————
1. संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 का धारा 29 और अनुसूची द्वारा “पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट किसी राज्य के या उसके क्षेत्र में किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अधीन उस राज्य के भीतर निवास विषयक कोई अपेक्षाविहित करती हो” के स्थान पर (1-11-1956 से) प्रतिस्थापित।
2. संविधान (सतहत्तरवां संशोधन) अधिनियम, 1995 का धारा 2 द्वारा (17-6-1995 से) अंतःस्थापित।
3. संविधान (पचासीवां संशोधन) अधिनियम, 2001 का धारा 2 द्वारा भूततक्षी प्रभाव से (17-6-1995 से) कतिपय शब्दो के स्थान पर प्रातिस्थापित ।
4. संविधान (इक्यासीवां संशोधन) अधिनियम, 2000 का धारा 2 द्वारा (9-6-2000 से) अंतःस्थापित।
5. संविधान (एक सौ तीनवां संशोधन) अधिनियम, 2019 की धारा 3 द्वारा (14-1-2019 से) अन्तःस्थापित।
———————
16. Equality of opportunity in matters of public employment — (1) There shall be equality of opportunity for all citizens in matters relating to employment or appointment to any office under the State.

(2) No citizen shall, on grounds only of religion, race, caste, sex, descent, place of birth, residence or any of them, be ineligible for, or discriminated against in respect of, any employment or office under the State.

(3) Nothing in this article shall prevent Parliament from making any law prescribing, in regard to a class or classes of employment or appointment to an office 1[under the Government of, or any local or other authority within, a State or Union territory, any requirement as to residence within that State or Union territory] prior to such employment or appointment.]

(4) Nothing in this article shall prevent the State from making any provision for the reservation of appointments or posts in favour of any backward class of citizens which, in the opinion of the State, is not adequately represented in the services under the State.

2[(4A) Nothing in this article shall prevent the State from making any provision for reservation 3[in matters of promotion, with consequential seniority, to any class] or classes of posts in the services under the State in favour of the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes which, in the opinion of the State, are not adequately represented in the services under the State.]

4[(4B) Nothing in this article shall prevent the State from considering any unfilled vacancies of a year which are reserved for being filled up in that year in accordance with any provision for reservation made under clause (4) or Clause (4A) as a separate class of vacancies to be filled up in any succeeding year or years and such class of vacancies shall not be considered together with the vacancies of the year in which they are being filled up for determining the ceiling of fifty per cent. reservation on total number of vacancies of that year.]

(5) Nothing in this article shall affect the operation of any law which provides that the incumbent of an office in connection with the affairs of any religious or denominational institution or any member of the governing body thereof shall be a person professing a particular religion or belonging to a particular denomination.

5[(6) Nothing in this article shall prevent the State from making any provision for the reservation of appointments or posts in favour of any economically weaker sections of citizens other than the classes mentioned in clause (4), in addition to the existing reservation and subject to a maximum of ten per cent. of the posts in each category. ]
— — — — — — — — — — — — —
1. Subs. by the Constitution (Seventh Amendment) Act, 1956, s. 29 and Sch., for “under any State specified in the First Schedule or any local or other authority within its territory, any requirement as to residence within that State” (w.e.f. 1-11-1956)
2. Ins. by the Constitution (Seventy-seventh Amendment) Act, 1995, s. 2 (w.e.f. 17-6-1995).
3. Subs. by the Constitution (Bighty-fifth Amendment) Act, 2001, s. 2, for certain words
(retrospectively) (w.e.f. 17-6-1995).
4. Ins. by the Constitution (Eighty-first Amendment) Act, 2000, s. 2 (w.e.f. 9-6-2000).
—————


🔍 व्याख्या (Explanation)

संविधान के भाग 3 के अनुच्छेद 14 से लेकर 18 तक समता का अधिकार (Right to Equality) वर्णित किया गया है। जिसे कि आम नीचे चार्ट में देख सकते हैं। इसी का तीसरा अनुच्छेद है अनुच्छेद 16, जो कि “अनुच्छेद 16 – लोक नियोजन में अवसर की समता” की बात करता है।

समता का अधिकार
अनुच्छेद 14 – विधि के समक्ष समता एवं विधियों का समान संरक्षण
अनुच्छेद 15 – धर्म, मूलवंश, लिंग एवं जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध
अनुच्छेद 16 – लोक नियोजन में अवसर की समता
अनुच्छेद 17 – अस्पृश्यता का अंत
अनुच्छेद 18 – उपाधियों का अंत

समता का आशय समानता से होता है, एक लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना के लिए समानता एक मूलभूत तत्व है क्योंकि ये हमें सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक वंचितता (deprivation) से रोकता है।

हमने अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 15 के तहत क्रमशः समझा कि किस तरह से “विधि के समक्ष समता और विधियों का समान संरक्षण” सिद्धांत की मदद से और “धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध” करके समानता स्थापित करने की कोशिश की गई है।

उसी की अगली कड़ी है अनुच्छेद 16, यह अनुच्छेद सिर्फ भारतीय नागरिकों के लिए है,आइए इसके एक-एक प्रावधान को समझते हैं;

| अनुच्छेद 16 – लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता

(1) राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबन्धित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी।

यानी कि अनुच्छेद 16(1) सभी नागरिकों को राज्य के अधीन नौकरी करने का अधिकार देता है। यह केवल संगठित लोक सेवाओं और संविदा (Contract) के आधार पर धारित बाह्य पदों तक ही सीमित नहीं है बल्कि गाँवों के उन रूढ़िगत पदों पर भी लागू होता है जिसकी नियुक्ति राज्य करता है।

तो कुल मिलाकर अनुच्छेद 16(1) के अंतर्गत मूलरूप से दो अधिकार सम्मिलित हैं (1) सरकार के अधीन किसी पद के लिए आवेदन करने का अधिकार और (2) जिस पद के लिए आवेदन किया गया है उस पद के लिए गुणों के आधार पर विचार किए जाने का अधिकार।

| याद रखने योग्य बातें –

(1) चूंकि यह अनुच्छेद अनुच्छेद 14 और 15 का ही विस्तार है इसीलिए यहाँ भी युक्तियुक्त वर्गीकरण (reasonable classification) का सिद्धांत काम करता है।

यानी कि सरकार सेवा या पद की आवश्यकता को ध्यान में रखकर ये तय कर सकता है किस अनुपात में प्रत्यक्ष भर्ती करनी है या प्रोन्नति (Promotion) के माध्यम से भर्ती करनी है।

हालांकि सरकार को ये ध्यान में रखना होता है कि कहीं ये विभेदकारी (discriminatory) न हो जाए। जैसे कि मान लीजिये कि किसी कर्मचारी की सेवा को बिना किसी उपयुक्त कारण के समाप्त कर दिया जाए तो ये विभेदकारी माना जाएगा।

लेकिन अगर कोई कर्मचारी अपने पद पर रहते हुए किसी विध्वंशकारी (subversive) कार्य में लगा हो और तब सरकार द्वारा उसकी छंटनी कर दी जाए तो इसे विभेदकारी नहीं माना जाएगा।

(2) दूसरी बात ये कि सरकार नियुक्त होने वाले व्यक्ति के लिए ऐसी पूर्व शर्ते रख सकता है जो सरकारी कर्मचारियों में दक्षता या समुचित अनुशासन रखने के लिए सहायक हो।

यहाँ यह याद रखिए कि प्रोन्नति (Promotion) और सेवा की समाप्ति को भी नियोजन या नियुक्ति के अंतर्गत ही रखा जाता है।

(2) राज्य के अधीन किसी नियोजन या पद के संबंध में केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान, निवास या इनमें से किसी के आधार पर न तो कोई नागरिक अपात्र होगा और न उससे विभेद किया जाएगा।

यहाँ पर आप देख सकते हैं कि ‘केवल’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है यानी कि धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान और निवास के आधार पर आपसे सरकारी नौकरियों में कोई विभेद नहीं किया जाएगा लेकिन इसके अलावे अन्य आधारों पर किया जा सकता है, जैसे कि आपकी योग्यता, दिव्याङ्गता, उम्र इत्यादि के आधार पर।

(3) संसद अगर चाहे तो किसी विशेष रोजगार के लिए निवास की शर्त आरोपित कर सकती है।

यह जो प्रावधान है यह अनुच्छेद 16 के पहले और दूसरे प्रावधान का अपवाद है। इसे आप इस तरह से समझ सकते हैं कि एक विकसित राज्य के लोग अविकसित राज्य में जाकर नौकरियाँ ले रहा है, इससे अविकसित राज्यों के विकास में काफी बाधाएं आ सकती है।

इसी को ध्यान में रखकर अनुच्छेद 16 के तीसरे प्रावधान के तहत यह व्यवस्था की गई है कि जहां पर नौकरियाँ उत्पन्न हुई है वहाँ के लोकल लोगों को इसमें प्राथमिकता दी जाए।

लेकिन यहाँ पर याद रखिए कि इसका ये मतलब नहीं है कि अगर किसी गाँव में नौकरियाँ निकली है तो सिर्फ गाँव के लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी। बल्कि उस राज्य के लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी। यानी कि इस प्रावधान का लाभ लेने के लिए राज्य को एक यूनिट माना जाता है न कि गाँव, प्रखण्ड या जिले को।

(4) इस अनुच्छेद में किसी बात के होते हुए भी, राज्य पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों में आरक्षण की व्यवस्था कर सकता है।

यह प्रावधान बहुत ही महत्वपूर्ण है, ऐसा इसीलिए क्योंकि नौकरियों में पिछड़े वर्गों को जो आरक्षण मिलता है वो इसी के तहत दी जाती है। यानी कि यह प्रावधान, अनुच्छेद 16 के पहले और दूसरे प्रावधान के अपवाद हैं।

हालांकि यहाँ यह याद रखिए कि अनुच्छेद 16 के खंड 1 और 2 के कुछ प्रावधान ऐसे हैं जो कि आरक्षित लोगों पर समान रूप से लागू होता है जैसे कि पेंशन, वेतनवृद्धि, नियोजन की शर्तें इत्यादि। कहने का अर्थ है कि वेतन, वेतनवृद्धि (increment), उपदान (Gratuity), पेंशन आदि में कोई आरक्षण काम नहीं करता है।

यहाँ पर एक बात और याद रखने वाली है कि दो संशोधनों के माध्यम से अनुच्छेद 16 (4) में कुछ अन्य प्रावधान भी जोड़े गए है जैसे कि 77वें संविधान संशोधन 1995 की मदद से एससी एवं एसटी वर्ग के लोगों के लिए प्रोन्नति में पारिणामिक ज्येष्ठता को जोड़ा गया है।

और 81वां संविधान संशोधन अधिनियम 2000 की मदद से बैकलॉग रिक्तियों को आगे आने वाले वर्षों में भरे जाने की व्यवस्था की गई है। ये सब क्या है इसे आप अच्छे से समझ जाएँगे जब आप आरक्षण समझेंगे।

(5) विधि के तहत किसी संस्था या इसके कार्यकारी परिषद के सदस्य किसी विशिष्ट धर्म को मानने वाला हो सकता है।

मान लीजिए कि किसी मंदिर ट्रस्ट का संचालन मौलवी कर रहा हो तो स्थिति कैसी होगी। इसका ये मतलब नहीं है कि ऐसा नहीं हो सकता है लेकिन अगर संसद ने कोई विधि बना दी कि उस धर्म को मानने वाले लोग ही उसके सर्वोच्च अधिकारी होंगे तो ऐसा हो सकता है।

(6) आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के व्यक्तियों को 10 प्रतिशत आरक्षण

इसे साल 2019 में 103वें संविधान संशोधन की मदद से संविधान में जोड़ा गया है। और इसके तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के व्यक्तियों को 10 प्रतिशत अतिरिक्त आरक्षण का लाभ दिया गया है। इसके पीछे का क्या गणित है इसे हम आरक्षण वाले लेख में समझेंगे।

अभी हमने यहाँ जो भी बातें की है उसे अच्छे से समझने के लिए हमें आरक्षण को समझना होगा। आरक्षण पर चार खंडों में लेख उपलब्ध है। आरक्षण से संबन्धित अपने सभी डाउट को क्लियर करने के लिए आप क्रम से सभी लेखों को समझें;

भारत में आरक्षण [Reservation in India] [1/4]

आरक्षण का संवैधानिक आधार एवं इसके विभिन्न पहलू [2/4]

आरक्षण का विकास क्रम (Evolution of Reservation) [3/4]

रोस्टर (Roster) – आरक्षण के पीछे का गणित [4/4]

🎮 Play Online Games

| Related Article

Hindi ArticlesEnglish Articles
अनुच्छेद 14
अनुच्छेद 15
अनुच्छेद 17
अनुच्छेद 18
Article 14
Article 15
Article 17
Article 18
—————
Constitution
Basics of Parliament
Fundamental Rights
Judiciary in India
Executive in India
Constitution
Basics of Parliament
Fundamental Rights
Judiciary in India
Executive in India
—————————–
अस्वीकरण - यहाँ प्रस्तुत अनुच्छेद और उसकी व्याख्या, मूल संविधान (नवीनतम संस्करण), संविधान पर डी डी बसु की व्याख्या (मुख्य रूप से) और संविधान के विभिन्न ज्ञाताओं (जिनके लेख समाचार पत्रों, पत्रिकाओं एवं इंटरनेट पर ऑडियो-विजुअल्स के रूप में उपलब्ध है) पर आधारित है। हमने बस इसे रोचक और आसानी से समझने योग्य बनाने का प्रयास किया है।