यह लेख अनुच्छेद 22 का यथारूप संकलन है। आप इसका हिन्दी और इंग्लिश दोनों अनुवाद पढ़ सकते हैं। आप इसे अच्छी तरह से समझ सके इसीलिए इसकी व्याख्या भी नीचे दी गई है आप उसे जरूर पढ़ें। इसकी व्याख्या इंग्लिश में भी उपलब्ध है, इसके लिए आप नीचे दिए गए लिंक का प्रयोग करें;

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अनुच्छेद 22
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📜 अनुच्छेद 22 (Article 22)

22. कुछ दशाओं में गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण – (1) किसी व्यक्ति को जो गिरफ्तार किया गया है, ऐसी गिरफ्तारी के कारणों से यथाशीघ्र अवगत कराए बिना अभिरक्षा में निरुद्ध नहीं रखा जाएगा या अपनी रुचि के विधि व्यवसायी से परामर्श करने और प्रतिरक्षा कराने के अधिकार से वंचित नहीं रखा जाएगा।

(2) प्रत्येक व्यक्ति को, जो गिरफ्तार किया गया है और अभिरक्षा में निरुद्ध रखा गया है, गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट के न्यायालय तक यात्रा के लिए आवश्यक समय को छोड़कर ऐसी गिरफ्तारी से चौबीस घंटे की अवधि में निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा और ऐसे किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के प्राधिकार के बिना उक्त अवधि से अधिक अवधि के लिए अभिरक्षा में निरुद्ध नहीं रखा जाएगा।

(3) खंड (1) और खंड (2) की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को लागू नहीं होगी जो –

(क) तत्समय शत्रु अन्यदेशीय है ; या

(ख) निवारक निरोध का उपबंध करने वाली किसी विधि के अधीन गिरफ्तार या निरुद्ध किया गया है।

*(4) निवारक निरोध का उपबंध करने वाली कोई विधि किसी व्यक्ति का तीन मास से अधिक अवधि के लिए तब तक निरुद्ध किया जाना प्राधिकृत नहीं करेगी जब तक कि-

(क) ऐसे व्यक्तियों से, जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हैं या न्यायाधीश रहे हैं या न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित हैं, मिलकर बने सलाहकार बोर्ड ने तीन मास की उक्त अवधि की समाप्ति से पहले यह प्रतिवेदन नहीं दिया है कि उसकी राय में ऐसे निरोध के लिए पर्याप्त कारण हैं:

परंतु इस उपखंड की कोई बात किसी व्यक्ति का उस अधिकतम अवधि से अधिक अवधि के लिए निरुद्ध किया जाना प्राधिकृत नहीं करेगी जो खंड (7) के उपखंड (ख) के अधीन संसद्‌ द्वारा बनाई गई विधि द्वारा विहित की गई है ; या

(ख) ऐसे व्यक्ति को खंड (7) के उपखंड (क) और उपखंड (ख) के अधीन संसद्‌ द्वारा बनाई गई विधि के उपबंधों के अनुसार निरुद्ध नहीं किया जाता है।

(5) निवारक निरोध का उपबंध करने वाली किसी विधि के अधीन किए गए आदेश के अनुसरण में जब किसी व्यक्ति को निरुद्ध किया जाता है तब आदेश करने वाला प्राधिकारी यथाशक्य शीघ्र उस व्यक्ति को यह संसूचित करेगा कि वह आदेश किन आधारों पर किया गया है और उस आदेश के विरुद्ध अभ्यावेदन करने के लिए उसे शीघ्रातिशीघ्र अवसर देगा।

(6) खंड (5) की किसी बात से ऐसा आदेश, जो उस खंड में निर्दिष्ट है, करने वाले प्राधिकारी के लिए ऐसे तथ्यों को प्रकट करना आवश्यक नहीं होगा जिन्हें प्रकट करना ऐसा प्राधिकारी लोकहित के विरुद्ध समझता है।

(7) संसद्‌ विधि द्वारा विहेत कर सकेगी कि –

1(क) किन परिस्थितियों के अधीन और किस वर्ग या वर्गों के मामलों में किसी व्यक्ति को निवारक निरोध का उपबंध करने वाली किसी विधि के अधीन तीन मास से अधिक अवधि के लिए खंड (4) के उपखंड (क) के उपबंधों के अनुसार सलाहकार बोर्ड की राय प्राप्त किए बिना निरुद्ध किया जा सकेगा ;

2(ख) किसी वर्ग या वर्गों के मामलों में कितनी अधिकतम अवधि के लिए किसी व्यक्ति को निवारक निरोध का उपबंध करने वाली किसी विधि के अधीन निरुद्ध किया जा सकेगा ; और

3(ग) 4[खंड (4) के उपखंड (क)] के अधीन की जाने वाली जांच में सलाहकार बोर्ड द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया क्या होगी।
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* संविधान (चवालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1978 की धारा 3 द्वारा (अधिसूचना की तारीख से, जो कि अधिसूचित नहीं हुई हैं) खंड (4) के स्थान पर निम्नलिखित प्रतिस्थापित किया जाएगा, —

‘(4) निवारक निरोध का उपबंध करने वाली कोई विधि किसी व्यक्ति का दो मास से अधिक की अवधि के लिए निरुद्ध किया जाना प्राधिकृत नहीं करेगी जब तक कि समुचित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति की सिफारिश के अनुसार गठित सलाहकार बोर्ड ने उक्त दो मास की अवधि की समाप्ति से पहले यह प्रतिवेदन नहीं दिया है कि उसकी राय में ऐसे निरोध के ल्लिए पर्यास कारण हैं

परंतु सलाहकार बोर्ड एक अध्यक्ष और कम से कम दो अन्य सदस्यों से मिलकर बलेगा और अध्यक्ष समुचित उच्च न्यायात्रय का सेवारत न्यायाधीश होगा और अन्य सदस्य किसी उच्च न्यायात्रय के सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश होंगे:

परंतु यह और कि इस खंड की कोई बात किसी व्यक्ति का उस अधिकतम अवधि के लिए निरुद्ध किया जाना प्राधिकृत नहीं करेगी जो खंड (7) के उपखंड (क) के अधीन संसद्‌ द्वारा बनाई गई विधि द्वारा विहित की जाए।

स्पष्टीकरण – इस खंड में, “समुचित उच्च न्यायालय” से अभिष्रेत है —

(1) भारत सरकार या उस सरकार के अधीनस्थ किसी अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा किए गए निरोध आदेश के अनुसरण में निरुद्ध व्यक्ति की दशा में, दिल्‍ली संघ राज्यक्षेत्र के लिए उच्च न्यायालय ;

(2) (संघ राज्यक्षेत्र से भिन्न) किसी राज्य सरकार द्वारा किए गए निरोध आदेश के अनुसरण में निरुद्ध व्यक्ति की दशा में , उस राज्य के लिए उच्च न्यायालय ; और

(3) किसी संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक या ऐसे प्रशासक के अधीनस्थ किसी अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा किए गए निरोध आदेश के अनुसरण में निरुद्ध व्यक्ति की दशा में वह उच्च न्यायालय जो संसद्‌ द्वारा इस निमित्त बनाई गई विधि द्वारा या उसके अधीन विनिर्दिष्ट किया जाए।’
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1. संविधान (चवालीसवां संशोधन) अधिनयम, 1978 की धारा 3 द्वारा (अधिसूचना की तारीख से, जो कि अधिसूचित नहीं हुई है) उपखंड (क) का लोप किया जाएगा।
2. संविधान (चवालीसवां संशोधन) अधिनयम, 1978 की धारा 3 द्वारा (अधिसूचना की तारीख से, जो कि अधिसूचित नहीं हुई है) उपखंड (ख) को उपखंड (क) के रूप में पुनःसंख्यांकित किया जाएगा।
3. संविधान (चवालीसवां संशोधन) अधिनयम, 1978 की धारा 3 द्वारा (अधिसूचना की तारीख से, जो कि अधिसूचित नहीं हुई है) उपखंड (ग) को उपखंड (ख) के रूप में पुनःसंख्यांकित किया जाएगा।
4. संविधान (चवालीसवां संशोधन) अधिनयम, 1978 की धारा 3 द्वारा (अधिसूचना की तारीख से, जो कि अधिसूचित नहीं हुई है) बड़ी कोष्ठक में के शब्दों के स्थान पर “खंड (4)” शब्द, कोष्ठक और अंक रखे जाएंगे।
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22. Protection against arrest and detention in certain cases. — (1) No person who is arrested shall be detained in custody without being informed, as soon as may be, of the grounds for such arrest nor shall he be denied the right to consult, and to be defended by, a legal practitioner of his choice.

(2) Every person who is arrested and detained in custody shall be produced before the nearest magistrate within a period of twenty-four hours of such arrest excluding the time necessary for the journey from the place of arrest to the court of the magistrate and no such person shall be detained in custody beyond the said period without the authority of a magistrate.

(3) Nothing in clauses (1) and (2) shall apply —

(a) to any person who for the time being is an enemy alien; or

(b) to any person who is arrested or detained under any law providing for preventive detention.

*(4) No law providing for preventive detention shall authorise the detention of a person for a longer period than three months unless —

(a) an Advisory Board consisting of persons who are, or have been, or are qualified to be appointed as, Judges of a High Court has reported before the expiration of the said period of three months that there is in its opinion sufficient cause for such detention:

Provided that nothing in this sub-clause shall authorise the detention of any person beyond the maximum period prescribed by any law made by Parliament under sub-clause (b) of clause (7); or

(b) such person is detained in accordance with the provisions of any law made by Parliament under sub-clauses (a) and (b) of clause (7).

(5) When any person is detained in pursuance of an order made under any law providing for preventive detention, the authority making the order shall, as soon as may be, communicate to such person the grounds on which the order has been made and shall afford him the earliest opportunity of making a representation against the order.

(6) Nothing in clause (5) shall require the authority making any such order as is referred to in that clause to disclose facts which such authority considers to be against the public interest to disclose.

(7) Parliament may by law prescribe —

1(a) the circumstances under which, and the class or classes of cases in which, a person may be detained for a period longer than three months under any law providing for preventive detention without obtaining the opinion of an Advisory Board in accordance with the provisions of sub-clause (a) of clause (4);

2(b) the maximum period for which any person may in any class or classes of cases be detained under any law providing for preventive detention; and

3(c) the procedure to be followed by an Advisory Board in an inquiry under 4sub-clause (a) of clause (4).
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* (4) shall stand substituted by the Constitution (Forty-fourth Amendment) Act, 1978, s. 3 (date yet to be notified) as—

“(4) No law providing for preventive detention shall authorise the detention of a person for a longer period than two months unless an Advisory Board constituted in accordance with the recommendations of the Chief Justice of the appropriate High Court has reported before the expiration of the said period of two months that there is in its opinion sufficient cause for such detention:

Provided that an Advisory Board shall consist of a Chairman and not less than two other
members, and the Chairman shall be a serving Judge of the appropriate High Court and the other members shall be serving or retired Judges of any High Court :

Provided further that nothing in this clause shall authorise the detention of any person beyond the maximum period prescribed by any law made by Parliament under sub clause (a) of clause (7).

Explanation —In this clause, “appropriate High Court” means, —

(j) in the case of the detention of a person in pursuance of an order of detention made by the Government of India or an officer or authority subordinate to that Government, the High Court for the Union territory of Dehli,

(ii) in the case of the detention of a person in pursuance of an order of detention made by the Government of any State (other than a Union territory), the High Court for that State; and

(ii) in the case of the detention of a person in pursuance of an order of detention made by the administrator of a Union territory or an officer or authority subordinate to such administrator, such High Court as may be specified by or under any law made by Parliament in this behalf:
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1. Sub-clause (a) shall stand omitted by the Constitution (Forty-fourth Amendment) Act,
1978, s. 3(b)(i) (date to be notified).
2. Sub-clause (b) shall stand re-lettered as sub-clause (a) by s. 3(b)(ii), ibid. (date to be
notified).
3. Sub-clause (c) shall stand re-lettered as sub-clause (b) by s. 3(b)(iii), ibid. (date to be
notified).
4. Sub-clause (a) of clause (4) shall stand substituted as “clause (4)” by s. 3(b)(iii), ibid.
(date to be notified).
—————

🔍 व्याख्या (Explanation)

स्वतंत्रता यानी कि किसी व्यक्ति पर बाहरी प्रतिबंधों का अभाव। दूसरे शब्दों में कहें तो अपने जीवन और नियति का नियंत्रण स्वयं करना तथा अपनी इच्छाओं और गतिविधियों को आजादी से व्यक्त करने का अवसर बने रहना, स्वतंत्रता है।

भारत की बात करें तो स्वतंत्रता यहाँ एक मौलिक अधिकार है। दरअसल भारतीय संविधान का भाग 3 मौलिक अधिकारों के बारे में है। इसी के अनुच्छेद 19 से लेकर अनुच्छेद 22 तक “स्वतंत्रता का अधिकार” की चर्चा की गई है। (जैसा कि आप चार्ट में देख सकते हैं) हम यहाँ अनुच्छेद 22 को समझने वाले हैं;

स्वतंत्रता का अधिकार
⚫ अनुच्छेद 19 – छह अधिकारों की सुरक्षा; (1) अभिव्यक्ति (2) सम्मेलन (3) संघ (4) संचरण (5) निवास (6) व्यापार
⚫ अनुच्छेद 20 – अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण
⚫ अनुच्छेद 21 – प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता
⚫ अनुच्छेद 21क – प्रारम्भिक शिक्षा का अधिकार
अनुच्छेद 22 – गिरफ़्तारी एवं निरोध से संरक्षण

| अनुच्छेद 22 – गिरफ़्तारी एवं निरोध से संरक्षण

अनुच्छेद 22 को दो भागों में बांटा जा सकता है, 

पहला भाग [अनुच्छेद 22 (1 से 2 तक)] उस व्यक्ति से संबन्धित है जिसे साधारण कानून के तहत गिरफ्तार किया गया है या जिसके बारे में पता हो कि इसने अपराध किया है। 

दूसरा भाग [अनुच्छेद 22 (3 से 7 तक)] निवारक निरोध (preventive detention) के मामलों से संबन्धित है।

आइये इसे विस्तार से समझते हैं; पर इससे पहले ये समझ लेते हैं कि निरोध (detention) का मतलब क्या होता है;

निरोध (detention)
निरोध यानी कि स्वतंत्रता से वंचित कर देना। मुख्य रूप से निरोध (detention) दो तरह की होती है – 

(1) दंडात्मक निरोध (Punitive detention) – इसका आशय, अपराध के बाद किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करके स्वतंत्रता से वंचित कर देने से है। 

(2) निवारक निरोध (Preventive detention) – इसका आशय, भविष्य में कोई व्यक्ति अपराध न कर बैठे इसीलिए उसे पहले ही गिरफ्तार करके उसकी स्वतंत्रता छीन लेने से है।

पहला भाग :

अनुच्छेद 22 का खंड 1 और 2 उस प्रक्रिया या अधिकार को बताता है जो कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय अनुसरण में लाया जाएगा। यहाँ मुख्य रूप से तीन बातें हैं –

(क) गिरफ़्तारी के आधार की सूचना पाने का अधिकार,

  • यह अधिकार इसलिए मिलता है ताकि गिरफ्तार व्यक्ति समुचित न्यायालय में जमानत के लिए आवेदन कर सके या ख़ुद को बचाए जाने के तरीकों के बारे में सोच करें।

(ख) अपनी इच्छानुसार विधि व्यवसायी (legal practitioner) से परामर्श करने और प्रतिरक्षा कराने का अधिकार,

(ग) दंडाधिकारी (Magistrate) के सम्मुख 24 घंटे के अंदर पेश होने का अधिकार (यात्रा के समय को छोड़कर),

  • यह अधिकार इसलिए मिलता है ताकि गिरफ्तार होते ही अपनी इच्छानुसार विधिक सलाहकार से परामर्श ले सकें।
  • इसके तहत उस व्यक्ति को अपने अधिवक्ता से बातचीत करने का अधिकार मिलता है और मजेदार बात यह है कि इस तरह की बातचीत पुलिस नहीं सुन सकती है।
  • अगर किसी व्यक्ति के पास वकील हायर करने की हैसियत नहीं है तो राज्य उसके लिए वकील उपलब्ध करवाएगा।
    • हालांकि यहाँ याद रखिए कि पहले ऐसी व्यवस्था नहीं थी। 42वें संविधान संशोधन 1976 द्वारा अनुच्छेद 39क को संविधान में स्थापित किया गया और राज्य को यह निर्देश दिया गया कि वह अपने खर्चे से निःशुल्क विधिक सहायता उपलब्ध करवाए।
    • 1979 के हुसैन आरा बनाम गृह सचिव मामले में उच्चतम न्यायालय ने भी कहा कि अगर कोई अभियुक्त ख़ुद अपने खर्चे से वकील करने में सक्षम नहीं है तो राज्य उसे अपने खर्चे से वकील उपलब्ध करवाए।
    • और इस तरह से 1987 में राष्ट्रीय विधिक सेवाएँ प्राधिकरण अधिनियम लाया गया और इसके तहत निःशुल्क विधिक सहायता उपलब्ध करवाया गया।
    • विस्तार से समझने के लिए नालसा (NALSA) पढ़ें।

यदि इस प्रावधान का पालन नहीं किया जाता है और 24 घंटे बीत चुके हैं तो गिरफ्तार व्यक्ति इस बात का हकदार होगा कि उसे तुरंत मुक्त कर दिया जाए। इसे कहा जाता है – मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना 24 घंटे से अधिक के लिए निरुद्ध न किए जाने का अधिकार।

◾ अगर इसका पालन नहीं किया जाता है और किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया जाता है तो फिर बंदी-प्रत्यक्षीकरण याचिका द्वारा उस व्यक्ति को मुक्त किए जाने का अधिकार उत्पन्न हो जाता है।

इसी से संबंधित एक फ़ेमस मामला है बंदी प्रत्यक्षीकरण मामला 1976 (Habeas corpus case 1976); जो कि निवारक निरोध के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मामला है। इसे आपको समझना चाहिए;

◾ यहाँ याद रखिए कि अनुच्छेद 22 का खंड 1 और 2, ऐसी गिरफ़्तारी के विरुद्ध संरक्षण देता है जिस गिरफ़्तारी का आधार आपराधिक कृत्य हो या किसी व्यक्ति द्वारा राज्यहित में की गई कोई प्रतिकूल गतिविधि हो।

◾ इसके तहत वो गिरफ़्तारी नहीं आती है जो कि किसी न्यायालय द्वारा निकाले गए वारंट के अधीन की गई है। क्योंकि ऐसी गिरफ़्तारी से पहले गिरफ्तार होने वाले व्यक्ति को गिरफ़्तारी के आधार बता दिए जाते हैं।

दूसरा भाग :

यह निवारक निरोध (Preventive detention) के मामलों से संबन्धित है। जिसके तहत निम्नलिखित तीन सुरक्षा शामिल है –

(1) अनुच्छेद 22 के चौथे खंड के अनुसार, व्यक्ति की हिरासत या निरोध तीन माह से ज्यादा नहीं बढ़ाई जा सकती, जब तक कि सलाहकार बोर्ड (Advisory board) इसे बढ़ाने को न कहे।

सलाहकार बोर्ड में वे व्यक्ति शामिल होते हैं जो या तो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश है या न्यायाधीश रहे हैं या न्यायाधीश नियुक्त किए जाने के योग्य है।

(2) अनुच्छेद 22 के पांचवें खंड के अनुसार, निरोध (Detention) किन आधारों पर किया गया है इसका जवाब संबन्धित व्यक्ति को दिया जाना चाहिए। हालांकि खंड 6 के तहत सार्वजनिक हितों के विरुद्ध इसे बताया जाना आवश्यक नहीं होता है।

(3) खंड 5 के तहत, निरोध वाले व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह निरोध के आदेश के विरुद्ध अपना प्रतिवेदन या अभ्यावेदन (representation) करे।

◾ यह सरकार का कर्तव्य होता है कि निरुद्ध के अभ्यावेदन पर अविलंब विचार करे। इसके अलावा अगर सलाहकार बोर्ड ने अपने प्रतिवेदन में यह कहा कि निरोध के लिए पर्याप्त आधार है तो भी सरकार उस राजी से आबद्ध नहीं होगी और यदि सरकार चाहे तो अभ्यावेदन पर विचार करके निरोध आदेश की पुष्टि करने से इंकार करके निरुद्ध को मुक्त कर सकता है।

अनुच्छेद 22 (7), संसद को निवारक निरोध का उपबंध करने वाली किसी विधि, जांच में सलाहकार बोर्ड द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया आदि को बताने के लिए अधिकृत करता है।

याद रखने योग्य बातें,

निवारक निरोध वाले मामले में न तो कोई आरोप लगाया जाता है, और न कोई अपराध साबित किया जाता है। ये बस पूर्वानुमान पर आधारित होता है।

◾ सबसे पहले 1950 में निवारक निरोध अधिनियम (Preventive Detention Act 1950) बनाया गया था। अगर आपने अनुच्छेद 21 पढ़ा हो तो आपको याद होगा कि ए के गोपालन मामले का संबंध इसी अधिनियम से था। हालांकि इसे 1969 में इसे समांप्त कर दिया गया।

ज्यादा जानकारी के लिए पढ़ें –  ए के गोपालन मामला 1950

◾ 1971 में जब इन्दिरा गांधी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापस आई तो उन्होने 1971 में आंतरिक सुरक्षा अधिनियम बनाया जो कि MISA के नाम से फ़ेमस हुआ।

और 1974 में विदेशी मुद्रा संरक्षण और तस्करी निवारण अधिनियम, 1974 बनाया। जो कि COFEPOSA (Conservation of Foreign Exchange and Prevention of Smuggling Act) के नाम से जाना गया।

और 39वें संविधान संशोधन द्वारा इन दोनों को नौवीं अनुसूची में डाल दिया गया था। हालांकि आपातकाल खत्म होने के बाद जब जनता पार्टी की सरकार आई तो 1978 में उन्होने MISA को खत्म कर दिया लेकिन COFEPOSA को बने रहने दिया गया।

◾ इसके बाद जब 1980 में इन्दिरा गांधी की सरकार फिर से सत्ता में लौटी तो उन्होने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 (National Security Act 1980) बनाया। जिसे कि रासुका के नाम से भी जाना जाता है।

इसके अलावा हम इसमें UAPA 1967 को भी शामिल कर सकते हैं। हालांकि ये बना तो 1967 में ही था लेकिन इसे 2008 के मुंबई हमलों के बाद और कठोर किया गया।

तो कुल मिलाकर यही है अनुच्छेद 22, उम्मीद है आपको समझ में आया होगा। दूसरे अनुच्छेदों को समझने के लिए नीचे दिए गए लिंक का इस्तेमाल कर सकते हैं।

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Hindi ArticlesEnglish Articles
अनुच्छेद 19
अनुच्छेद 20
अनुच्छेद 21
अनुच्छेद 21A
Article 19
Article 20
Article 21
Article 21A
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Constitution
Basics of Parliament
Fundamental Rights
Judiciary in India
Executive in India
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Basics of Parliament
Fundamental Rights
Judiciary in India
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अस्वीकरण - यहाँ प्रस्तुत अनुच्छेद और उसकी व्याख्या, मूल संविधान (नवीनतम संस्करण), संविधान पर डी डी बसु की व्याख्या (मुख्य रूप से) और संविधान के विभिन्न ज्ञाताओं (जिनके लेख समाचार पत्रों, पत्रिकाओं एवं इंटरनेट पर ऑडियो-विजुअल्स के रूप में उपलब्ध है) पर आधारित है। हमने बस इसे रोचक और आसानी से समझने योग्य बनाने का प्रयास किया है।