यह लेख अनुच्छेद 31क का यथारूप संकलन है। आप इसका हिन्दी और इंग्लिश दोनों अनुवाद पढ़ सकते हैं। आप इसे अच्छी तरह से समझ सके इसीलिए इसकी व्याख्या भी नीचे दी गई है आप उसे जरूर पढ़ें। इसकी व्याख्या इंग्लिश में भी उपलब्ध है, इसके लिए आप नीचे दिए गए लिंक का प्रयोग करें;

अपील - Bell आइकॉन पर क्लिक करके हमारे नोटिफ़िकेशन सर्विस को Allow कर दें ताकि आपको हरेक नए लेख की सूचना आसानी से प्राप्त हो जाए। साथ ही हमारे सोशल मीडिया हैंडल से जुड़ जाएँ और नवीनतम विचार-विमर्श का हिस्सा बनें;
अनुच्छेद 31क
📌 Join YouTube📌 Join FB Group
📌 Join Telegram📌 Like FB Page
📖 Read in English📥 PDF

📜 अनुच्छेद 31क (Article 31A)

1[कुछ विधियों की व्यावृत्ति]
2[31क. संपदाओं आदि के अर्जन के लिए उपबंध करने वाली विधियों की व्यावृत्ति – 3[(1) अनुच्छेद 13 में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, –
(क) किसी संपदा के या उसमें किन्ही अधिकारों के राज्य द्वारा अर्जन के लिए या किन्ही ऐसे अधिकारों के निर्वापन या उनमें परिवर्तन के लिए, या
(ख) किसी संपत्ति का प्रबंध लोकहित में, या उस संपत्ति का उचित प्रबंध सुनिश्चित करने के उद्देश्य से परिसीमित अवधि के लिए राज्य द्वारा ले लिए जाने के लिए, या
(ग) दो या अधिक निगमों को लोकहित में या उन निगमों में से किसी का उचित प्रबंध सुनिश्चित करने के उद्देश्य से समामेलित करने के लिए, या
(घ) निगमों के प्रबंध अभिकर्ताओं, सचिवों और कोषाध्यक्षों, प्रबंध निदेशकों, निदेशकों या प्रबंधकों के किन्ही अधिकारों या उनके शेयरधारकों के मत देने के किन्ही अधिकारों के निर्वापन या उनमें परिवर्तन के लिए, या
(ङ) किसी खनिज या खनिज तेल की खोज करने या उसे प्राप्त करने के प्रयोजन के लिए किसी करार, पट्टे या अनुज्ञप्ति के आधार पर प्रोद्भूत होने वाले किन्ही अधिकारों के निर्वापन या उनमें परिवर्तन के लिए या किसी ऐसे करार, पट्टे या अनुज्ञप्ति को समय से पहले समाप्त करने या रद्द करने के लिए,
उपबंध करने वाली विधि इस आधार पर शून्य नहीं समझी जाएगी कि वह 4[अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19] द्वारा प्रदत अधिकारों में से किसी से असंगत है या उसे छीनती है या न्यून करती है:

परंतु जहां ऐसी विधि किसी राज्य के विधान-मण्डल द्वारा बनाई गई विधि है वहां इस अनुच्छेद के उपबंध उस विधि को तब तक लागू नहीं होंगे जब तक ऐसी विधि को, जो राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखी गई है, उसकी अनुमति प्राप्त नहीं हो गई है:]
5[परंतु यह और कि जहां किसी विधि में किसी संपदा के राज्य अर्जन के लिए कोई उपबंध किया गया है और जहां उसमें समाविष्ट कोई भूमि किसी व्यक्ति की अपनी जोत में है वहां राज्य के लिए ऐसी भूमि के ऐसे भाग को, जो किसी तत्समय प्रवृत विधि के अधीन उसको लागू अधिकतम सीमा के भीतर है, या उस पर निर्मित या उससे अनुलग्न किसी भवन या संरचना को अर्जित करना उस दशा के सिवाय विधिपूर्ण नहीं होगा जिस दशा में ऐसी भूमि, भवन या संरचना के अर्जन से संबंधित विधि उस दर से प्रतिकर के संदाय के लिए उपबंध करती है जो उसके बाज़ार-मूल्य से कम नहीं होगी।]
(2) इस अनुच्छेद में,
6[(क) “संपदा” पद का किसी स्थानीय क्षेत्र के संबंध में वही अर्थ है जो उस पद का या उसके समतुल्य स्थानीय पद का उस क्षेत्र में प्रवृत भू-धृतियों से संबंधित विद्यमान विधि में है और इसके अंतर्गत-
(i) कोई जागीर, इनाम या मुआफ़ी अथवा वैसा ही अन्य अनुदान और 7[तमिलनाडु] और केरल राज्यों में कोई जन्मम अधिकार भी होगा;
(ii) रैयतबाड़ी बंदोबस्त के अधीन धृत कोई भूमि भी होगी;
(iii) कृषि के प्रयोजनों के लिए या उसके सहायक प्रयोजनों के लिए धृत या पट्टे पर दी गई कोई भूमि भी होगी, जिसके अंतर्गत बंजर भूमि, वन भूमि, चरागाह या भूमि के कृषकों, कृषि श्रमिकों और ग्रामीण कारीगरों के अधिभोग में भवनों और अन्य संरचनाओं के स्थल हैं;]
(ख) “अधिकार” पद के अंतर्गत, किसी संपदा के संबंध में, किसी स्वत्वधारी, उप-स्वत्वधारी, अवर स्वत्वधारी, भू-धृतिधारक, 8[रैयत, अवर रैयत] या अन्य मध्यवर्ती में निहित कोई अधिकार और भू-राजस्व के संबंध में कोई अधिकार या विशेषाधिकार होंगे।]
—————-
1. संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 3 द्वारा (3-1-1977 से) अतःस्थापित।
2. संविधान (पहला संशोधन) अधिनियम, 1951 की धारा 4 द्वारा (भूतलक्षी प्रभाव से) अतःस्थापित।
3. संविधान (चौथा संशोधन) अधिनियम, 1955 की धारा 3 द्वारा (भूतलक्षी प्रभाव से) खडं (1) के स्थान पर प्रतिस्थापित।
4. संविधान (चवालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1978 की धारा 7 द्वारा (20-6-1979 से) “अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19 या अनुच्छेद 31” के स्थान पर प्रतिस्थापित।
5. संविधान (सत्रहवां संशोधन) अधिनियम, 1964 की धारा 2 द्वारा (20-6-1964 से) अतःस्थापित।
6. संविधान (सत्रहवां संशोधन) अधिनियम, 1964 की धारा 2 द्वारा भूतलक्षी प्रभाव से उपखडं (क) के स्थान पर प्रतिस्थापित।
7. मद्रास राज्य (नाम परिवर्तन) अधिनियम, 1968 (1968 का 53) की धारा 4 द्वारा (14-1-1969 से) “मद्रास” के स्थान पर प्रतिस्थापित।
8. संविधान (चौथा संशोधन) अधिनियम, 1955 की धारा 3 द्वारा (भूतलक्षी प्रभाव से) अतःस्थापित।
———अनुच्छेद 31क————
1[Saving of Certain Laws]
2[31A. Saving of laws providing for acquisition of estates, etc.3[(1) Notwithstanding anything contained in article 13, no law providing for—
(a) the acquisition by the State of any estate or of any rights therein or the extinguishment or modification of any such rights, or

(b) the taking over of the management of any property by the State for a limited period either in the public interest or in order to secure the proper management of the property, or

(c) the amalgamation of two or more corporations either in the public interest or in order to secure the proper management of any of the corporations, or

(d) the extinguishment or modification of any rights of managing agents, secretaries and treasurers, managing directors, directors or managers of corporations, or of any voting rights of shareholders thereof, or

(e) the extinguishment or modification of any rights accruing by virtue of any agreement, lease or licence for the purpose of searching for, or winning, any mineral or mineral oil, or the premature termination or cancellation of any such agreement, lease or licence,

shall be deemed to be void on the ground that it is inconsistent with, or takes away or abridges any of the rights conferred by 4[article 14 or article 19]:

Provided that where such law is a law made by the Legislature of a State, the provisions of this article shall not apply thereto unless such law, having been reserved for the consideration of the President, has received his assent:]

5[Provided further that where any law makes any provision for the acquisition by the State of any estate and where any land comprised therein is held by a person under his personal cultivation, it shall not be lawful for the State to acquire any portion of such land as is within the ceiling limit applicable to him under any law for the time being in force or any building or structure standing thereon or appurtenant thereto, unless the law relating to the acquisition of such land, building or structure, provides for payment of compensation at a rate which shall not be less than the market value thereof.]

(2) In this article,—
6[(a) the expression “estate” shall, in relation to any local area, have the same meaning as that expression or its local equivalent has in the existing law relating to land tenures in force in that area and shall also include—
(i) any jagir, inam or muafi or other similar grant and in the States of 7[Tamil Nadu] and Kerala, any janmam right;
(ii) any land held under ryotwari settlement;
(iii) any land held or let for purposes of agriculture or for purposes ancillary thereto, including waste land, forest land, land for pasture or sites of buildings and other structures occupied by cultivators of land, agricultural labourers and village artisans;]
(b) the expression “rights”, in relation to an estate, shall include any rights vesting in a proprietor, sub-proprietor, under-proprietor, tenureholder, 8[raiyat, under-raiyat] or other intermediary and any rights or privileges in respect of land revenue.]
——————
1. Ins. by the Constitution (Forty-second Amendment) Act, 1976, s. 3 (w.e.f. 3-1-1977).
2. Ins. by the Constitution (First Amendment) Act, 1951, s. 4, (with retrospective effect).
3. Subs. by the Constitution (Fourth Amendment) Act, 1955, s. 3, for cl. (1) (with retrospective effect).
4. Subs. by the Constitution (Forty-fourth Amendment) Act, 1978, s. 7, for “article 14, article 19 or article 31” (w.e.f. 20-6-1979).
5. Ins. by the Constitution (Seventeenth Amendment) Act, 1964, s. 2(i) (w.e.f. 20-6-1964).
6. Subs. by s.2(ii), ibid., for sub-clause (a) (with retrospective effect).
7. Subs. by the Madras State (Alteration of Name) Act, 1968 (53 of 1968), s. 4, for “Madras” (w.e.f. 14-1-1969).
8. Ins. by the Constitution (Fourth Amendment) Act, 1955, s. 3 (with retrospective effect).
——-अनुच्छेद 31क——–

🔍 व्याख्या (Explanation)

कुछ विधियों की व्यावृत्ति (Saving of Certain Laws)‘ के तहत कुल तीन खंड हैं; (जिसे कि आप नीचे चार्ट में देख सकते हैं) इस लेख में हम इसी का पहला खंड यानी कि अनुच्छेद 30क को समझने वाले हैं;

हालांकि इसके तहत एक चौथा खंड (31घ) भी था जो कि राष्ट्र विरोधी क्रियाकलाप के संबंध में था पर उसे 43वां संविधान संशोधन अधिनियम 1977 द्वारा खत्म कर दिया गया।

इन प्रावधानों को संविधान में संशोधन करके जोड़ा गया है। यानी कि ये सारे प्रावधान मूल संविधान का हिस्सा नहीं रहा है। इसे जोड़ने का मुख्य कारण जमींदारी प्रथा को खत्म करना और कृषि सुधार या भूमि सुधार की दिशा में आगे बढ़ना था।

अनुच्छेद 31↗️
अनुच्छेद 30क – संपदाओं आदि के अर्जन के लिए उपबंध करने वाली विधियों की व्यावृत्ति (Saving of laws providing for acquisition of estates, etc.)

अनुच्छेद 30ख – कुछ अधिनियमों और विनियमों का विधिमान्यकरण

अनुच्छेद 30ग – कुछ निदेशक तत्वों को प्रभावी करने वाली विधियों की व्यावृत्ति

| अनुच्छेद 31क – संपदाओं आदि के अर्जन के लिए उपबंध करने वाली विधियों की व्यावृत्ति

अनुच्छेद 31क को पहला संविधान संशोधन अधिनियम 1951 द्वारा लाया गया था। इसका उद्देश्य जमींदारी के अर्जन (acquisition) को विधिमान्यता (validity) देना था। ताकि जब भी राज्य द्वारा जमींदारों की ज़मीनें छीनी जाए तो न्यायालय उसमें हस्तक्षेप न करे।

न्यायालय द्वारा इसमें हस्तक्षेप करने का खतरा इसीलिए था क्योंकि संपत्ति का अधिकार एक मूल अधिकार हुआ करता था। और अनुच्छेद 13 इस बात की बिलकुल इजाजत नहीं देता कि मूल अधिकारों का हनन करने वाली कोई विधि अस्तित्व में आए।

क्योंकि अगर ऐसा होता है तो किसी भी व्यक्ति के पास अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार है और सुप्रीम कोर्ट का कर्तव्य है कि वो किसी भी हालत में मूल अधिकारों की रक्षा करें;

| पहला संविधान संशोधन 1951

1950 में भारतीय संविधान लागू किया गया था, और अगले ही वर्ष, एक संशोधन पेश किया गया। यह महत्वपूर्ण इसीलिए है क्योंकि अभी तक पहला आम चुनाव भी नहीं हुआ था।

इस संशोधन के द्वारा संविधान में तीन मूलभूत परिवर्तन किए गए, जिसे कि आप नीचे देख सकते हैं;

1. भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को प्रतिबंधित करना – ‘सार्वजनिक व्यवस्था’, ‘विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, और ‘अपराध के लिए उकसाना’ शब्दों को शामिल करके कुछ प्रतिबंध जोड़ा गया।

2. पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधानों को पेश किया गया – अनुच्छेद 15 में खंड 4 जोड़ा गया क्योंकि देश को पिछड़े वर्गों या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान बनाने की आवश्यकता महसूस हुई।

अधिक जानकारी के लिए पढ़ें – ◾ भारत में आरक्षण [1/4]

3. भूमि सुधार (land reform) अनुच्छेद 31A और अनुच्छेद 31B को जोड़ा गया जिसने भूमि सुधारों को संवैधानिक जांच से छूट दी। इनके अलावा, नौवीं अनुसूची को शामिल किया गया था जिसमें मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ किसी भी चुनौती से सुरक्षित कानून शामिल थे।

अधिक जानकारी के लिए पढ़ें – ◾ नौवीं अनुसूची की न्यायिक समीक्षा

प्रथम संशोधन अधिनियम, 1951 की धारा 4 ने भारतीय संविधान में अनुच्छेद 31क को जोड़ा, जिसमें सम्पदा आदि के अधिग्रहण के लिए कानूनों की व्यावृत्ति का प्रावधान किया गया।

वर्तमान में, यह अनुच्छेद, अनुच्छेद 31ख और 31ग के साथ एक अलग समूह के तहत समूहीकृत है। जिसका शीर्षक है ‘कुछ कानूनों की व्यावृत्ति (Saving of Certain Laws)’। यह शीर्षक संविधान (बयालीसवें) संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से पेश किया गया था।

तो यहाँ तक हमने ये समझ लिया कि अनुच्छेद 31क संविधान में कैसे आया। आइये अब समझते हैं कि इस व्यवस्था को लाए जाने की जरूरत क्या थी;

| अनुच्छेद 31क को जोड़ने की आवश्यकता

इस संशोधन के पीछे का उद्देश्य अदालतों के हस्तक्षेप के बिना ज़मींदारी के अधिग्रहण या स्थायी बंदोबस्त (permanent settlement) के उन्मूलन को मान्य करना था।

दरअसल संविधान को अपनाने के बाद, कृषि सुधार की दिशा में राज्य सरकारों द्वारा कई कदम उठाए गए। उनमें से एक कानून, बिहार भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की थी।

इस अधिनियम ने राज्य सरकार को कुछ जमींदारों की संपत्ति का अधिग्रहण करने का अधिकार दिया। लेकिन, इस अधिनियम को सर कामेश्वर सिंह बनाम बिहार प्रांत (1951) के मामले में पटना उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई, और न्यायालय ने इसे असंवैधानिक घोषित किया क्योंकि इसने संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन किया था।

◾ दूसरा मामला चंपकम दोराइराजन बनाम मद्रास सरकार का मामला 1951 है।

दरअसल जब चंपकम दोराइराजन नामक लड़की को मद्रास के एक मेडिकल कॉलेज में सिर्फ इसीलिए एड्मिशन नहीं मिला क्योंकि वहाँ सरकार के एक ऑर्डर से सीटों को समाज के अलग-अलग सेक्शन के लिए आरक्षित कर दिया गया था। तो उसने मद्रास उच्च न्यायालय में अपने मूल अधिकारों के हनन को लेकर एक याचिका दायर की।

मामला सुप्रीम कोर्ट गया और सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समुदाय के आधार पर दिया गया आरक्षण मूल अधिकारों का हनन करता है इसीलिए राज्य एड्मिशन के मामले में जाति या धर्म के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था नहीं कर सकता है, क्योंकि इससे अनुच्छेद 16(2) और अनुच्छेद 29(2) का हनन होता है।

इसे विस्तार से समझें – भारत में आरक्षण [1/4]

उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जो कि एक समाजवादी विचारधारा के नेता थे, समझ गए कि अगर समाज के वंचित तबके को मुख्य धारा में लाना है तो संविधान में संशोधन करना ही पड़ेगा।

क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया तो सुप्रीम कोर्ट हर बार टांग अड़ाएगा और समाज के वंचित हमेशा वंचित ही रह जाएँगे। इस तरह से पहला संविधान संशोधन अस्तित्व में आया।

और इस तरह से भूमि सुधार से जुड़े मुद्दों को समाप्त करने के लिए, अनुच्छेद 31क को पेश किया गया। इस प्रावधान ने सरकार को किसी भी संपत्ति का अधिग्रहण करने का अधिकार दिया और किसी को भी भारतीय संविधान के भाग III के तहत निहित अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर इसे चुनौती देने से प्रतिबंधित कर दिया।

⚫ हालांकि याद रखिए कि उस समय अनुच्छेद 31 को खत्म नहीं किया गया था बस अनुच्छेद 31क और 31ख को जोड़ा गया था। 25वें संविधान संशोधन अधिनियम 1971द्वारा अनुच्छेद 31ग जोड़ा गया।

साल 1978 में 44वें संविधान संशोधन की मदद से अनुच्छेद 31 को खत्म कर दिया गया। और इस तरह से अब अनुच्छेद 31क, 31ख और 31ग बचा है। और इस लेख में आइये हम अनुच्छेद 31क को खंडवार समझते हैं; (अनुच्छेद 31ख और 31ग पर अलग से लेख मौजूद है)

अनुच्छेद-31(ख) – भारतीय संविधान
अनुच्छेद-31(ग) – भारतीय संविधान
—————————

उपखंड (क) : किसी संपदा के या उसमें किन्ही अधिकारों के राज्य द्वारा अर्जन के लिए उपबंध करने वाली विधि

यह उपबंध मुख्य रूप से दो दशाओं में लागू होता है – राज्य द्वारा संपदा का अर्जन, या (2) अर्जन किए बिना संपदा के अधिकारों का समाप्तीकरण या उपांतरण (modification)।

यह उस समय लागू नहीं होगा जब किसी धारक के अधिकार न तो अर्जित किए जाते हैं, न समाप्त किए जाते हैं और न उपांतरित किए जाते हैं।

किसी संपदा के अधिकारों का अर्जन, समाप्तीकरण या उपांतरण के बीच अंतर;

अर्जन में हितग्राही (Beneficiary) राज्य होता है किन्तु अन्य मामलों में नहीं। जैसे कि अगर लोक प्रयोजन (public purpose) के लिए राज्य किसी जागीरदार की संपत्ति ले लेता है तो यह अनुच्छेद 31क के तहत अर्जन (acquisition) होगा।

अगर किसी पट्टेदार से जमीन लेने पर उसके अधिकार उस संपत्ति पर समाप्त हो जाते हों, तो ऐसी स्थिति में अगर यह पट्टा किसी प्राइवेट व्यक्ति से लिया गया है तो यह समाप्तीकरण या निर्वापन होगा। वहीं अगर यह पट्टा राज्य के ही अधीन है तो यह अर्जन होगा।

◾ उपांतरण शब्द का अर्थ निर्वापन भी हो सकता है और नहीं भी, जैसे कि कोई विधि जो सीमित अवधि के लिए स्वामी के अधिकार को निलंबित करती है तो इसे उपांतरण (modification) कहा जाएगा।

कुल मिलाकर अनुच्छेद 31क(1)(क) लाने के पीछे मुख्य उद्देश्य उन जमींदारों और बिचौलियों की भूमि का अर्जन करना था जो केवल लगान प्राप्त करते थे और अनुच्छेद 19(1)(च) और 31(2) के तहत संवैधानिक संरक्षण प्राप्त कर बच जाते थे।

उपखंड (ख) : संपत्ति का प्रबंध ग्रहण करने से संबंधित है;

यह उपखंड राज्य को सीमित अवधि के लिए स्थावर (immovable) या जंगम (moveable) किसी भी संपत्ति का प्रबंध ग्रहण करने की शक्ति देता है। और यह सिर्फ औद्योगिक उपक्रमों तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसका विस्तार सभी प्रकार की संपत्ति पर है।

इसके तहत कुछ शर्तें भी है; जैसे कि संपत्ति सीमित अवधि के लिए ली गई हो अनिश्चित अवधि के लिए नहीं, संपत्ति लोकहित में या उचित प्रबंध सुनिश्चित करने के उद्देश्य से ली गई हो, और संपत्ति राज्य द्वारा ली गई हो, इत्यादि।

उपखंड (ग) : निगमों का समामेलन (incorporation) से संबंधित है;

इस उपखंड का उद्देश्य लोकहित को ध्यान में रखकर एक ही क्षेत्र में काम करने वाले प्रतिस्पर्धी उद्यमियों के बीच हानिकर प्रतियोगिता समाप्त करना है।

उपखंड (घ) : निदेशकों या अंशधारकों (shareholders) के अधिकारों का निर्वापन (extinction) या उपांतरण (modification) आदि के बारे में है;

किसी कंपनी में शेयर धारकों को जो वोटिंग का अधिकार मिलता है वो उसे संपत्ति से मिलता है या फिर यह संपत्ति से उत्पन्न होने वाला एक व्यक्तिगत अधिकार है। यह प्रश्न चिरंजीत मामले में उठाया गया।

अगर संपत्ति से यह अधिकार मिलता है तो उस समय संपत्ति का अधिकार एक मौलिक अधिकार था ऐसे में राज्य द्वारा संपत्ति अर्जन से मौलिक अधिकारों का हनन होता।

इसी से बचने से लिए इस उपखंड को लाया गया और यह व्यवस्था कर दी गई कि यदि किसी विधि द्वारा शेयर धारकों के मत देने के अधिकार प्रभावित होते हैं तो इसे अनुच्छेद 19(1)(च) या 31 का उल्लंघन नहीं होगा।

उपखंड (ङ) : खनन पट्टों (mining leases) के अधीन अधिकारों का निर्वापन (extinction) या उपांतरण (modification) से संबंधित है;

अगर किसी विधि के द्वारा, किसी खनिज या खनिज तेल की खोज करने या उसे प्राप्त करने के प्रयोजन के लिए किसी करार, पट्टे (lease) या अनुज्ञप्ति (license) के आधार पर अगर किन्ही अधिकारों को समाप्त किया जाता है या उनमें परिवर्तन किया जाता है तो उस विधि को इस आधार पर शून्य नहीं समझी जाएगी कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत अधिकारों में से किसी से असंगत है:

याद रखने योग्य बातें;

◾ यदि ऐसी विधि किसी राज्य के विधान-मण्डल द्वारा बनाई जाती है वहां इस अनुच्छेद के उपबंध उस विधि को तब तक लागू नहीं होंगे जब तक ऐसी विधि को, जो राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखी गई है, उसकी अनुमति प्राप्त नहीं हो गई है:

◾ 17वें संविधान संशोधन अधिनियम 1964 द्वारा कुछ महत्वपूर्ण संशोधन किए गए एक तो दूसरा परंतुक (Proviso) जोड़ा गया और अनुच्छेद 31क के खंड 2(क)(ii) को भी जोड़ा गया।

◾ अनुच्छेद 31क के खंड 2(क)(ii) के द्वारा रैयतवाड़ी को अनुच्छेद 31क(1)(क) के अधीन लाया गया। आपको याद होगा कि अनुच्छेद 31क(1)(क) लाने के पीछे मुख्य उद्देश्य उन जमींदारों और बिचौलियों की भूमि का अर्जन करना था जो केवल लगान प्राप्त करते थे और अनुच्छेद 19(1)(च) और 31(2) के तहत संवैधानिक संरक्षण प्राप्त कर लेते थे।

लेकिन चूंकि पूरे देश में जमींदारी व्यवस्था थी नहीं, देश के कई भागों (खासकर के मद्रास प्रेसीडेंसी) में रैयतवाड़ी व्यवस्था चल रही थी। जिसके तहत किसान ही जमीन का मालिक हुआ करता था।

लेकिन चूंकि सभी किसानों के पास अपनी ज़मीनें नहीं थी ऐसे में उसे भी जमीन दिए जाने की जरूरत तो थी। इसीलिए ऐसी भूमि को भी अनुच्छेद 31क(1)(क) के अधीन ला दिया गया। लेकिन चूंकि ये लोग जमींदार या बिचौलिये नहीं थे बल्कि किसान ही थे इसीलिए उससे ली गई भूमि के लिए बाज़ार मूल्य देने की व्यवस्था की गई।

कुल मिलाकर कहने का अर्थ ये है कि यदि कोई व्यक्ति अधिकतम सीमा के भीतर भूमि को इस समय जोत रहा है और वह उसके जीवनयापन का स्रोत है तो उसे अनुच्छेद 31क के अधीन आने वाली किसी विधि के द्वारा उसकी भूमि से तब तक वंचित नहीं किया जा सकता जब तक कि उसे बाज़ार भाव से क्षतिपूर्ति न दे दिया जाए।

और इसे ही दूसरे परंतुक के तहत संविधान का हिस्सा बनाया गया जिसे कि आप संशोधन न. 5 में देख सकते है।

अनुच्छेद 31क (2)(क) : सम्पदा का अर्थ

सम्पदा (wealth) शब्द में मूल संकल्पना यह है कि सम्पदा धारण करने वाला व्यक्ति भूमि का स्वत्वधारी हो और उसका राज्य से सीधा संबंध हो। और आमतौर पर राज्य को भू-राजस्व देता हो।

कुल मिलाकर इस अनुच्छेद के अर्थ में कोई सम्पदा है या नहीं, इसे जानने के लिए हमें उस क्षेत्र में लागू भू-धृति (land tenure) संबंधी विधि को देखना होगा। हो सकता है कि स्थानीय स्तर पर संपदा के लिए कोई और शब्द इस्तेमाल में आता हो।

अनुच्छेद 31क (2)(क)(i): जागीर के तहत उन व्यक्तियों को दिए गए सभी अनुदान आते हैं जो कि कृषक नहीं थे।

अनुच्छेद 31क (2)(क)(ii): इसके तहत रैयतवाड़ी की बात की गई है जिसे कि हमने ऊपर समझ लिया है।

अनुच्छेद 31क (2)(क)(iii): ‘बंजर भूमि या वन भूमि’ इस खंड के अधीन संपदा की परिभाषा के तहत तभी आएंगी जब वे कृषि से अनुषंगी (subsidiary) प्रयोजनों (purposes) के लिए धारित है या भाटक (rent) पर दिए गए है।

अनुच्छेद 31क (2)(ख): किसी संपदा के संबंध में “अधिकार” पद के अंतर्गत, किसी स्वत्वधारी (proprietor), उप-स्वत्वधारी (sub-proprietor), अवर स्वत्वधारी (under-proprietor), भू-धृतिधारक (tenure holder), रैयत, अवर रैयत या अन्य मध्यवर्ती में निहित कोई अधिकार और भू-राजस्व के संबंध में कोई अधिकार या विशेषाधिकार होंगे।

तो कुल मिलाकर यही है अनुच्छेद 31क, उम्मीद है आपको समझ में आया होगा। दूसरे अनुच्छेदों को समझने के लिए नीचे दिए गए लिंक का इस्तेमाल कर सकते हैं। समग्रता से समझने के लिए अनुच्छेद 31, 31क, 31ख और 31ग तीनों को पढ़ें और समझे;

अनुच्छेद-31(ख) – भारतीय संविधान
अनुच्छेद-31(ग) – भारतीय संविधान
—————————
  1. अनुच्छेद 31क क्या है?

    31क. संपदाओं आदि के अर्जन के लिए उपबंध करने वाली विधियों की व्यावृत्ति – (1) अनुच्छेद 13 में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी जमींदारों या बिचौलियों से भूमि अर्जन करने वाली विधि इस आधार पर शून्य नहीं समझी जाएगी कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत अधिकारों में से किसी से असंगत है या उसे छीनती है या न्यून करती है:
    विस्तार से समझने के लिए लेख पढ़ें;

| Related Article

Hindi ArticlesEnglish Articles
अनुच्छेद 25
अनुच्छेद 26
अनुच्छेद 27
अनुच्छेद 28
अनुच्छेद 29
Article 25
Article 26
Article 27
Article 28
Article 29
—————————
Constitution
Basics of Parliament
Fundamental Rights
Judiciary in India
Executive in India
Constitution
Basics of Parliament
Fundamental Rights
Judiciary in India
Executive in India
—————————–
अस्वीकरण - यहाँ प्रस्तुत अनुच्छेद और उसकी व्याख्या, मूल संविधान (नवीनतम संस्करण), संविधान पर डी डी बसु की व्याख्या (मुख्य रूप से) और संविधान के विभिन्न ज्ञाताओं (जिनके लेख समाचार पत्रों, पत्रिकाओं एवं इंटरनेट पर ऑडियो-विजुअल्स के रूप में उपलब्ध है) पर आधारित है। हमने बस इसे रोचक और आसानी से समझने योग्य बनाने का प्रयास किया है।

Extra References-
https://blog.ipleaders.in/first-amendment-of-indian-constitution/
https://en.wikipedia.org/wiki/First_Amendment_of_the_Constitution_of_India