यह लेख अनुच्छेद 31ख का यथारूप संकलन है। आप इसका हिन्दी और इंग्लिश दोनों अनुवाद पढ़ सकते हैं। आप इसे अच्छी तरह से समझ सके इसीलिए इसकी व्याख्या भी नीचे दी गई है आप उसे जरूर पढ़ें। इसकी व्याख्या इंग्लिश में भी उपलब्ध है, इसके लिए आप नीचे दिए गए लिंक का प्रयोग करें;

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अनुच्छेद 31ख
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📜 अनुच्छेद 31ख (Article 31B)

1[कुछ विधियों की व्यावृत्ति]
2[31ख. कुछ अधिनियमों और विनियमों का विधिमान्यकरण – अनुच्छेद 31क में अंतर्विष्ट उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, नवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट अधिनियमों और विनियमों में से और उनके उपबंधों में से कोई इस आधार पर शून्य या कभी शून्य हुआ नहीं समझा जाएगा कि वह अधिनियम, विनियम या उपबंध इस भाग के किन्ही उपबंधों द्वारा प्रदत अधिकारों में से किसी असंगत है या उसे छीनता है या न्यून करता है और किसी न्यायालय या अधिकरण के किसी प्रतिकूल निर्णय, डिक्री या आदेश के होते हुए भी, उक्त अधिनियमों और विनियमों में से प्रत्येक, उसे निरसित या संशोधित करने की किसी सक्षम विधान-मंडल की शक्ति के अधीन रहते हुए, प्रवृत बना रहेगा।]
—————-
1. संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 3 द्वारा (3-1-1977 से) अतःस्थापित।
2. संविधान (पहला संशोधन) अधिनियम, 1951 की धारा 5 द्वारा (18-6-1951 से) अतःस्थापित।
———अनुच्छेद 31क————
1[Saving of Certain Laws]
2[31B. Validation of certain Acts and Regulations. — Without prejudice to the generality of the provisions contained in article 31A, none of the Acts and Regulations specified in the Ninth Schedule nor any of the provisions thereof shall be deemed to be void, or ever to have become void, on the ground that such Act, Regulation or provision is inconsistent with, or takes away or abridges any of the rights conferred by, any provisions of this Part, and notwithstanding any judgment, decree or order of any court or Tribunal to the
contrary, each of the said Acts and Regulations shall, subject to the power of any competent Legislature to repeal or amend it, continue in force.]
——————
1. Ins. by the Constitution (Forty-second Amendment) Act, 1976, s. 3 (w.e.f. 3-1-1977).
2. Ins. by the Constitution (First Amendment) Act, 1951, s. 5 (w.e.f. 18-6-1951).
——-अनुच्छेद 31क——–

🔍 व्याख्या (Explanation)

कुछ विधियों की व्यावृत्ति (Saving of Certain Laws)‘ के तहत कुल तीन खंड हैं; (जिसे कि आप नीचे चार्ट में देख सकते हैं) इस लेख में हम इसी का दूसरा खंड यानी कि अनुच्छेद 30ख को समझने वाले हैं;

हालांकि इसके तहत एक चौथा खंड (31घ) भी था जो कि राष्ट्र विरोधी क्रियाकलाप के संबंध में था पर उसे 43वां संविधान संशोधन अधिनियम 1977 द्वारा खत्म कर दिया गया।

इन प्रावधानों को संविधान में संशोधन करके जोड़ा गया है। यानी कि ये सारे प्रावधान मूल संविधान का हिस्सा नहीं रहा है। इसे जोड़ने का मुख्य कारण जमींदारी प्रथा को खत्म करना और कृषि सुधार या भूमि सुधार की दिशा में आगे बढ़ना था।

अनुच्छेद 31↗️
अनुच्छेद 30क – संपदाओं आदि के अर्जन के लिए उपबंध करने वाली विधियों की व्यावृत्ति

अनुच्छेद 30ख – कुछ अधिनियमों और विनियमों का विधिमान्यकरण (Validation of certain Acts and Regulations)

अनुच्छेद 30ग – कुछ निदेशक तत्वों को प्रभावी करने वाली विधियों की व्यावृत्ति

| अनुच्छेद 31ख – कुछ अधिनियमों और विनियमों का विधिमान्यकरण

अनुच्छेद 31ख को पहला संविधान संशोधन अधिनियम 1951 द्वारा लाया गया था। इसका उद्देश्य संसद के कानून पर न्यायालय के हस्तक्षेप को रोकना था।

न्यायालय द्वारा इसमें हस्तक्षेप करने का खतरा इसीलिए था क्योंकि संपत्ति का अधिकार एक मूल अधिकार हुआ करता था। और अनुच्छेद 13 इस बात की बिलकुल इजाजत नहीं देता कि मूल अधिकारों का हनन करने वाली कोई विधि अस्तित्व में आए।

क्योंकि अगर ऐसा होता है तो किसी भी व्यक्ति के पास अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार है और सुप्रीम कोर्ट का कर्तव्य है कि वो किसी भी हालत में मूल अधिकारों की रक्षा करें;

पहला संविधान संशोधन 1951: 1950 में भारतीय संविधान लागू किया गया था, और अगले ही वर्ष, एक संशोधन पेश किया गया। यह महत्वपूर्ण इसीलिए है क्योंकि अभी तक पहला आम चुनाव भी नहीं हुआ था।

इस संशोधन के द्वारा संविधान में तीन मूलभूत परिवर्तन किए गए, जिसे कि आप नीचे देख सकते हैं;

1. भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को प्रतिबंधित करना ‘सार्वजनिक व्यवस्था’, ‘विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, और ‘अपराध के लिए उकसाना’ शब्दों को शामिल करके कुछ प्रतिबंध जोड़ा गया।

2. पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधानों को पेश किया गया – अनुच्छेद 15 में खंड 4 जोड़ा गया क्योंकि देश को पिछड़े वर्गों या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान बनाने की आवश्यकता महसूस हुई।

अधिक जानकारी के लिए पढ़ें भारत में आरक्षण [1/4]

3. भूमि सुधार (land reform) अनुच्छेद 31A और अनुच्छेद 31B को जोड़ा गया जिसने भूमि सुधारों को संवैधानिक जांच से छूट दी। इनके अलावा, नौवीं अनुसूची को शामिल किया गया था जिसमें मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ किसी भी चुनौती से सुरक्षित कानून शामिल थे।

प्रथम संशोधन अधिनियम, 1951 की धारा 5 ने भारतीय संविधान में अनुच्छेद 31ख को जोड़ा, जिसके तहत संसद द्वारा मूल अधिकारों का हनन करने वाली क़ानूनों को न्यायिक समीक्षा से दूर रखने का प्रयास हुआ।

अधिक जानकारी के लिए पढ़ेंनौवीं अनुसूची की न्यायिक समीक्षा

वर्तमान में, यह अनुच्छेद, अनुच्छेद 31क और 31ग के साथ एक अलग समूह के तहत समूहीकृत है। जिसका शीर्षक है ‘कुछ कानूनों की व्यावृत्ति (Saving of Certain Laws)’। यह शीर्षक संविधान (बयालीसवें) संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से पेश किया गया था।

तो यहाँ तक हमने ये समझ लिया कि अनुच्छेद 31ख संविधान में कैसे आया। आइये अब समझते हैं कि इस व्यवस्था को लाए जाने की जरूरत क्या थी;

अनुच्छेद 31ख को जोड़ने की आवश्यकता

इस संशोधन के पीछे का उद्देश्य अदालतों के हस्तक्षेप के बिना ज़मींदारी के अधिग्रहण या स्थायी बंदोबस्त के उन्मूलन को मान्य करना था।

इसके अलावा राज्य के नीति निदेशक तत्व को लागू करने के कारण मौलिक अधिकारों का हो रहे हनन को विधिमान्यता देना था।

⚫ दरअसल संविधान लागू होने के बाद कृषि सुधार एवं पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने की आवश्यकता महसूस हुई और जब कुछ क़ानूनों की मदद से ऐसा किया गया तो मूल अधिकार रोड़ा बनकर सामने आया।

ऐसा इसीलिए हुआ क्योंकि मूल अधिकार में अनुच्छेद 13 के तहत यह व्यवस्था है कि मूल अधिकारों को कम करने या खत्म करने वाली किसी भी विधि को उस मात्रा तक खत्म होना होगा जिस मात्रा तक वो मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है।

इसके अलावा अनुच्छेद 32 के तहत किसी भी व्यक्ति को सीधे उच्चतम न्यायालय जाने का अधिकार है और उच्चतम न्यायालय का यह कर्तव्य है कि मूल अधिकारों की रक्षा करें।

इसीलिए जब जमींदारों से ज़मीनें ली जाने लगी और शैक्षणिक संस्थाओं में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की जाने लगी तब इससे प्रभावित लोग हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जाने लगे और न्यायालय ने मूल अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों को रोक दिया या खत्म कर दिया।

और इसीलिएआवश्यकता महसूस हुई, एक ऐसे कानून की जिससे कि सुप्रीम कोर्ट को न्यायिक समीक्षा से रोकी जा सके। अनुच्छेद 31ख इसीलिए बनाया गया था।

⚫ अनुच्छेद 31ख के तहत नौवीं अनुसूची बनाया गया और यह व्यवस्था कर दिया गया कि इस अनुसूची में डाले गए किसी विधि को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।

इसके बैक्ग्राउण्ड को विस्तार से समझने के लिए नीचे दिए गए दोनों लेखों को पढ़ें;

◾ नौवीं अनुसूची की न्यायिक समीक्षा

◾ मूल अधिकारों एवं निदेशक तत्वों में टकराव

हालांकि याद रखिए कि उस समय अनुच्छेद 31 को खत्म नहीं किया गया था बस अनुच्छेद 31क और 31ख को जोड़ा गया था। और 25वें संविधान संशोधन अधिनियम 1971द्वारा अनुच्छेद 31ग जोड़ा गया।

साल 1978 में 44वें संविधान संशोधन की मदद से अनुच्छेद 31 को खत्म कर दिया गया। और इस तरह से अब अनुच्छेद 31क, 31ख और 31ग बचा है। और इस लेख में आइये हम अनुच्छेद 31ख को समझते हैं; (अनुच्छेद 31क और 31ग पर अलग से लेख मौजूद है)

अनुच्छेद-31(क) – भारतीय संविधान
अनुच्छेद-31(ग) – भारतीय संविधान
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अनुच्छेद 31ख का उद्देश्य :

जैसा कि हमने ऊपर भी समझा अनुच्छेद 31ख को एक सावधानी के रूप में अन्तःस्थापित किया गया है। ताकि संसद द्वारा या राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए उन विधियों को न्यायालय की समीक्षा से बचाया जा सके जो कि किसी न किसी मात्रा में मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है।

यानी कि इसे आसान भाषा में कहें तो इसमें जो भी अधिनियम या प्रावधान डाले जाएँगे उसकी समीक्षा न्यायालय में नहीं हो सकती। उस समय 1951 में इसमें 13 विषय डाले गए। जो आज की तारीख में बढ़कर 284 हो चुका है।

⚫ इस प्रकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 31ख ने यह सुनिश्चित किया कि नौवीं अनुसूची के किसी भी कानून को अदालतों में चुनौती नहीं दी जा सकती है और सरकार कृषि कानूनों और आरक्षण संबंधी मामलों में सुधार करके सामाजिक कार्यक्रम को तर्कसंगत बना सकती है। 

यहाँ यह याद रखिए कि सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न मामलों के तहत यह स्पष्ट कर दिया कि अब नौवीं अनुसूची की भी समीक्षा हो सकती है, क्यों हो सकती है इसके लिए आप दिए गए लेख को पढ़ें; समग्रता से समझने के लिए आरक्षण को भी समझें;

◾ नौवीं अनुसूची की न्यायिक समीक्षा

◾ भारत में आरक्षण [1/4]

अनुच्छेद 31ख से संबंधित तथ्य

⚫ 1973 के केशवानन्द भारती मामले में यह स्पष्ट हो गया कि संसद चाहे तो मूल अधिकारों को संशोधित कर सकती है लेकिन वो किसी भी स्थिति में संविधान के मूल ढांचे तो बदल नहीं सकती है। इसीलिए संसद मूल ढांचे को नुकसान पहुंचाने वाली विधि बनाकर नौवीं अनुसूची में नहीं डाल सकती है।

⚫ नौवीं अनुसूची में संशोधन किया जा सकता है और संसद जब चाहे उसमें नए विषय डाल सकती है। इसे आप इस बात से समझ सकते हैं कि साल 1951 में इसमें केवल 13 विषय शामिल किया गया था लेकिन अब यह बढ़कर 284 तक पहुँच गया है।

तो कुल मिलाकर यही है अनुच्छेद 31ख, उम्मीद है आपको समझ में आया होगा। दूसरे अनुच्छेदों को समझने के लिए नीचे दिए गए लिंक का इस्तेमाल कर सकते हैं।

अनुच्छेद-31(ख) – भारतीय संविधान
अनुच्छेद-31(ग) – भारतीय संविधान
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  1. अनुच्छेद 31ख क्या है?

    31ख. कुछ अधिनियमों और विनियमों का विधिमान्यकरण – अनुच्छेद 31क में अंतर्विष्ट उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, नवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट अधिनियमों और विनियमों में से और उनके उपबंधों में से कोई इस आधार पर शून्य या कभी शून्य हुआ नहीं समझा जाएगा कि वह अधिनियम, विनियम या उपबंध इस भाग के किन्ही उपबंधों द्वारा प्रदत अधिकारों में से किसी असंगत है या उसे छीनता है या न्यून करता है और किसी न्यायालय या अधिकरण के किसी प्रतिकूल निर्णय, डिक्री या आदेश के होते हुए भी, उक्त अधिनियमों और विनियमों में से प्रत्येक, उसे निरसित या संशोधित करने की किसी सक्षम विधान-मंडल की शक्ति के अधीन रहते हुए, प्रवृत बना रहेगा।
    विस्तार से समझने के लिए लेख पढ़ें;

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Constitution
Basics of Parliament
Fundamental Rights
Judiciary in India
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अस्वीकरण - यहाँ प्रस्तुत अनुच्छेद और उसकी व्याख्या, मूल संविधान (नवीनतम संस्करण), संविधान पर डी डी बसु की व्याख्या (मुख्य रूप से) और संविधान के विभिन्न ज्ञाताओं (जिनके लेख समाचार पत्रों, पत्रिकाओं एवं इंटरनेट पर ऑडियो-विजुअल्स के रूप में उपलब्ध है) पर आधारित है। हमने बस इसे रोचक और आसानी से समझने योग्य बनाने का प्रयास किया है।