संविधान की मूल संरचना और केशवानन्द भारती केस ॥

Basic Structure of the Constitution and Kesavananda Bharati Case 1973

इस लेख में हम संविधान की मूल संरचना (Basic Structure of the Constitution) को दिलचस्प अंदाज में समझेंगे।

संविधान की मूल संरचना

संविधान की मूल संरचना
(Basic Structure of the Constitution) 

संविधान की मूल संरचना नामक इस लेख को शुरू करने से पहले आपको बता दूँ कि अगर आपको मूल अधिकारों की समझ, विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया और विधि की सम्यक प्रक्रिया की समझ नहीं है,

इसके अलावा राज्य के नीति निदेशक तत्व की समझ और संविधान संशोधन की प्रक्रिया यानी कि अनुच्छेद 368 की समझ आपको नहीं है तो फिर इसे समझने में आपको थोड़ी कठिनाई आ सकती है।

मैं आपसे यहीं कहूँगा कि पहले आप उसे ठीक से समझ ले फिर इस लेख का आनंद लें।

संविधान की मूल संरचना की पृष्ठभूमि
(Background of Basic Structure of the Constitution)
 

संविधान की मूल संरचना को जानने से पहले ये जानना बहुत ही जरूरी है कि जो बातें संविधान में भी नहीं लिखा हुआ है वो आखिर आज इतना महत्वपूर्ण क्यों हो गया।

आखिर ये अस्तित्व में कैसे आया? तो आइये पहले इसके बेसिक्स को समझते हैं।

🔷 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होते ही उसमें कुछ लूपहोल नजर आने लगा। खासकर के मूल अधिकार और राज्य के नीति निदेशक तत्व के बीच कुछ अंतर्विरोध (contradiction) नजर आने लगा।

ये कोई छोटा-मोटा अंतर्विरोध नहीं था, जिससे कि नजर फेर लिया जाता। आइये इसे उदाहरण से समझते हैं –

अनुच्छेद 19 (1)(f) और अनुच्छेद 31 संपत्ति का अधिकार देता था, वहीं अनुच्छेद 39 सभी प्रकार के असमानता को खत्म करके सभी को बराबर के स्तर पर लाने की बात करता है।

उस समय जमींदारी प्रथा अपने चरम पर था, एक-एक जमींदारों के पास सैकड़ों-हजारों बीघा जमीने हुआ करती थी।

अब असमानता खत्म करने के लिए जरूरी था कि जमींदारी प्रथा को खत्म कर दिया जाये और उनकी कुछ ज़मीनों को आम आदमी को दे दिया जाये या फिर,

उस जमीन पर ऐसे फैक्ट्रीयां, उद्योग-धंधे आदि लगाया जाये ताकि समाज के निचले तबके के लोगों को ऊपर लाया जा सकें।

राज्य के नीति निदेशक तत्व के अनुच्छेद 39 के हिसाब से तो ऐसा करना बिलकुल सही था, क्योंकि वह असमानता खत्म करने की ही तो बात करता है।

पर अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 31 जो कि संपत्ति का अधिकार देता है, इसके अनुसार संपत्ति एक मूल अधिकार था और इसे छीना नहीं जा सकता था। वो क्यूँ?

क्योंकि अनुच्छेद 13 के अनुसार आप ऐसा कर ही नहीं सकते। क्योंकि ये अनुच्छेद मूल अधिकारों को खत्म होने से रोकता है।

जबकि दूसरी तरफ अनुच्छेद 368 संविधान में संशोधन का अधिकार भी देता है। अनुच्छेद 368 के अनुसार आप संविधान के किसी भी भाग का संशोधन कर सकते है।

अब खुद ही सोचिए कि एक कानून तो आपको वहीं चीज़ करने की इजाज़त देता है वहीं दूसरी ओर एक कानून आपको वहीं चीज़ करने से भी रोकता है। तो है न कितना बड़ा अंतर्विरोध।

इसी तरह एक और मामला है अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 जो कि समानता की बात करता है। ठीक है।

वहीं राज्य के नीति निदेशक तत्व के अनुच्छेद 46, अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग के लोगों को समाज के मुख्य धारा में लाने के लिए उसके सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक हितों को प्रोत्साहन देने की बात करता है।

अब फिर से एक अंतर्विरोध है – एक तरफ अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 समानता की बात करता है तो वहीं दूसरी तरफ अनुच्छेद 46 विशेष प्रकार की सुविधा या आरक्षण की बात करता है।

अब फिर से यहाँ भी एक समस्या आती है अगर समानता की रक्षा करेंगे तो निचले तबके के लोग कभी भी मुख्य धारा में नहीं आ पाएंगे और अगर आरक्षण देंगे तो फिर समानता नहीं बचेगा।

शायद अब आपको समझ में आ रहा होगा कि मूल अधिकारों में जो इतने अपवाद है, आखिर वे आये कहाँ से है।

ऐसे ढेरों उदाहरण संविधान में ढूँढे जा सकते हैं। उम्मीद है इस दो उदाहरण से आप संविधान के अंदर के अंतर्विरोधों को समझ पा रहे होंगे। अब आगे की बात करते हैं।

चंपकम दोराइराजन बनाम मद्रास सरकार का मामला – 1951

ऊपर जो पढ़ें हैं उससे संबन्धित एक दिलचस्प मामला है चंपकम दोराइराजन vs मद्रास सरकार का मामला (1951)

दरअसल मद्रास सरकार को लगा कि जब तक समाज के कुछ विशेष वर्ग को आरक्षण नहीं दिया जाएगा,

तब तक वो समाज के मुख्य धारा में शामिल नहीं हो पाएगा इसीलिए मद्रास सरकार ने उन कुछ वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था कर दी।

चंपकम दोराइराजन नामक एक व्यक्ति ने इसे हाइ कोर्ट में इस आधार पर चुनौती दी कि ये अनुच्छेद 15, 16 का हनन है, जो कि सही भी था।

मामला सुप्रीम कोर्ट गया और सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अनुच्छेद 14, 15 और 16 के हिसाब से आरक्षण नहीं दी जा सकती। भले ही राज्य के नीति निदेशक तत्व ऐसा करने को क्यों न कहता हो। वो क्यूँ?

क्योंकि राज्य के नीति निदेशक तत्व को अगर लागू नहीं भी किया जाएगा तो ठीक है, वैसे भी उसे लागू करना अनिवार्य नहीं है। लेकिन मूल अधिकार को बचाना सुप्रीम कोर्ट का एक अतिआवश्यक दायित्व है।

🔷 जाहिर है राज्य का नीति निदेशक तत्व बाध्यकारी नहीं है, लेकिन मूल अधिकार तो है। और सुप्रीम कोर्ट ने मूल अधिकार को ही प्राथमिकता दी।

पर जब सब कुछ मूल अधिकार ही है तो फिर राज्य के नीति निदेशक तत्व की फिर जरूरत ही क्या है?

उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जो कि एक समाजवादी विचारधारा के नेता थे, समझ गए कि अगर समाज के वंचित तबके को मुख्य धारा में लाना है तो संविधान में संशोधन करके उसके कुछ प्रावधानों को हटाना ही पड़ेगा।

क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया तो सुप्रीम कोर्ट हर बार टांग अड़ाएगा और समाज के वंचित हमेशा वंचित ही रह जाएँगे।

पहला संविधान संशोधन
(First Amendment to the Constitution)

इस प्रकार 1951 में पंडित नेहरू ने संविधान का पहला संशोधन किया। संशोधन कुछ इस प्रकार था।

🔷 जमींदारी प्रथा को खत्म कर दी गयी और भूमि अधिग्रहण (land acquisition) को आसान बना दिया।

🔷 अनुच्छेद 31 में ही ये लिखवा दिया गया कि भूमि सुधार (Land Reforms) से संबन्धित जितने भी कानून बनेंगे, उस सब पर अनुच्छेद 31 के प्रावधान काम नहीं करेगा।

नोट– भूमि सुधार कानून के अंतर्गत जमींदारी प्रथा उन्मूलन, भूमि अधिग्रहण आदि आते हैं।

🔷 अनुच्छेद 15 में भी संशोधन करके ये लिखवा दिया कि अगर किसी वर्ग को आरक्षण दिया जाता है तो उसे मूल अधिकारों के हनन के नाम पर सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज नहीं किया जा सकेगा।

🔷 और सबसे खास और दिलचस्प बात ये कि एक नौवी अनुसूची बनाया गया और इस सब को उसमें डाल दिया।

नौवीं अनुसूची बहुत ही दिलचस्प अनुसूची है इस पर बाद में बात करेंगे अभी बस इतना जान लीजिये कि जिस किसी भी कानून को नौवीं अनुसूची में डाला जाता है।

उस कानून की समीक्षा सुप्रीम कोर्ट नहीं कर सकता है। मतलब कि उस कानून के ऊपर सुप्रीम कोर्ट में कोई भी बात नहीं होगी।

इतना संशोधन करने के बाद अब हुआ ये कि एक तो जमींदारों की जमींदारी गयी, उसका बहुत सारा जमीन सरकार द्वारा अधिग्रहित कर लिया गया।

और वे लोग कोर्ट भी नहीं जा सकते क्योकि पहला संविधान संशोधन में ये साफ-साफ लिख दिया गया है कि इसको चुनौती नहीं दी जा सकती।

अब आप ही सोचिए कि ऐसे में क्या हो सकता था? क्या ये आसानी से मान ली जाती। बुलकुल नहीं।

शंकरी प्रसाद बनाम भारतीय संघ का मामला -1951

शंकरी प्रसाद नामक एक व्यक्ति ने इसका एक लूपहोल ढूंढ लिया और सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार के खिलाफ याचिका दायर कि की पहला संविधान संशोधन ही गलत है।

क्योंकि सरकार ने अनुच्छेद 368 का प्रयोग करके मूल अधिकारों में संशोधन किया है और मूल अधिकारों को कम कर दिया है,

जबकि अनुच्छेद 13 के हिसाब से ऐसा नहीं किया जा सकता क्योकि अनुच्छेद 13 में साफ-साफ लिखा है कि किसी भी स्थिति में मूल अधिकारों को कम या खत्म नहीं किया जा सकता है। बात तो सही भी था,

पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में शंकरी प्रसाद के आर्ग्युमेंट को खारिज करते हुए कहा कि अनुच्छेद 13 और अनुच्छेद 368 दोनों अलग-अलग चीज़ें है और दोनों को एक दूसरे से रिलेट करना ठीक नहीं है।

निर्णय भारत सरकार के पक्ष में गया। इस तरह पहली संविधान संशोधन से जमींदारी उन्मूलन का एक रास्ता खुल चुका था।

धीरे-धीरे सभी राज्यों ने अपने-अपने राज्य में अपने-अपने हिसाब से भूमि सुधार कानून बनाया और इस प्रक्रिया को जारी रखा।

1964 तक बहुत से राज्यों ने जमींदारी प्रथा को खत्म कर दिया। कुछ राज्यों में इसमें कुछ कानूनी दिक्कतें जरूर आयी, जैसे कि राजस्थान पर 1964 में 17 वां संविधान संशोधन करके उसे भी ठीक कर दिया गया।

हुआ ये था कि वहाँ के एक जमींदार सज्जन सिंह का जमीन का अधिग्रहण किया गया तो वो हो गए नाराज और पहुँच गये कोर्ट। आइये इसके बारे में जान लेते हैं।

सज्जन सिंह बनाम राजस्थान सरकार का मामला 1965

सज्जन सिंह ने भी उसी मसले को उठाया जो शंकरी प्रसाद ने उठाया था यानी कि अनुच्छेद 13 के आधार पर कोई भी हमसे हमारा मूल अधिकार छीन नहीं सकता।

(एक बात यहाँ याद रखिए कि संपत्ति का अधिकार अभी भी मूल अधिकारों का हिस्सा था बस उसके शक्तियों को कम कर दिया गया था। 1978 में मोरार जी देशाई की सरकार ने इसे मूल अधिकार से हटा दिया और इसे एक सामान्य कानून बना दिया।)

सुप्रीम कोर्ट ने सज्जन सिंह के मामले में भी वही फैसला सुनाया जो शंकरी प्रसाद के मामले में सुनाया गया था यानी कि अनुच्छेद 13 का कोई संबंध अनुच्छेद 368 से नहीं है।

इसके ठीक 2 साल बाद चीज़ें बिल्कुल पलट गयी। और जो हुआ उससे मामला थोड़ा बिगड़ गया।

गोलकनाथ बनाम पंजाब सरकार मामला 1967

1967 में गोलकनाथ मामले में इस पूरे प्रक्रम में एक ट्विस्ट आया। गोलकनाथ भी उसी मुद्दे को उठाया जो अब तक शंकरी प्रसाद और सज्जन सिंह उठा रहे थे। और साथ ही इसमें उन्होने 17वें संविधान को भी गलत ठहराया ।

इस बार सुप्रीम कोर्ट का फैसला चौकाने वाला था। 11 जजों की बेंच ने 6:5 के बहुमत से फैसला सुनाया और पहले के सारे फैसलों को पलट दिया।

🔷 सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 13, अनुच्छेद 368 से मुक्त नहीं है। और संसद अनुच्छेद 368 का उपयोग करके मूल अधिकारों में कटौती नहीं कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने आगे ये कहा कि अब तक जो भी कानून इस संबंध में बन चुके है, जिस किसी का भी जमीन छीना जा चुका है उसको तो वापस नहीं किया जा सकता लेकिन अब से ये कानून अवैध हैं और इसका इस्तेमाल अब और नहीं किया जा सकता।

यहाँ से इस मामले ने थोड़ा तूल पकड़ा और जो हमारा शीर्षक है, उसका ज़िम्मेवार एक तरह से यही घटना है।

इंदिरा गांधी सरकार और संविधान की मूल संरचना पर प्रगति

आपको याद दिला दूँ कि 11 जनवरी 1966 को लाल बहादुर शास्त्री के देहांत के पश्चात 24 जनवरी 1966 को इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनती हैं।

मतलब ये कि जब गोलकनाथ का फैसला आया था तब इंदिरा गांधी की सरकार थी। उनको ये सब अच्छा नहीं लगा कि उनके पिताजी ने इतना सब कुछ किया और सुप्रीम कोर्ट ने बस एक निर्णय से इस सब को खत्म कर दिया।

1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया जाता है। पर 1970 में सरकार वो केस भी हार जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण कानून को खारिज कर दिया। इंदिरा गांधी के लिए ये सब बर्दास्त के बाहर था।

इसीलिए 1971 में जब वे चुनाव जीतकर पूर्ण बहुमत के साथ सरकार में आयी तो सबसे पहले उन्होने संविधान में 24वां संशोधन करके गोलकनाथ मामले को पलट दिया।

वो ऐसे कि – उन्होने अनुच्छेद 13 में संशोधन करके उसमें एक लाइन जोड़ दी कि इसका कोई संबंध अनुच्छेद 368 से नहीं है। क्योंकि यही तो मसला था।

इसी प्रकार अनुच्छेद 368 में संशोधन करके ये लिखवा दिया कि इसका कोई संबंध अनुच्छेद 13 से नहीं है। इस तरह से उन्होने एक ही झटके में गोलकनाथ मामले को निपटा दिया।

इसके बाद उन्होने 25वां संविधान संशोधन किया और बैंक राष्ट्रीयकरण के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया।

इस बार उन्होने अनुच्छेद 31 (C) में लिखवा दिया कि सरकार यदि कोई कानून राज्य के नीति निदेशक तत्व के अनुच्छेद 39 (B) और (C) को ध्यान में रखकर बनाती है तो,

उसे अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 31 के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती। इस प्रकार उन्होने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया।

इसके बाद उन्होने 26वां, 27वां और 28वां संविधान संशोधन भी किया। पर चूंकि वो इतना जरूरी नहीं है। इसीलिए उसकी चर्चा यहाँ नहीं करेंगे।

29वां संविधान संशोधन महत्वपूर्ण है। क्योंकि आज का टॉपिक इसी से जुड़ा है।

केशवानन्द भारती बनाम केरल सरकार मामला 1973

29वें संविधान संशोधन की मदद से केरल भूमि सुधार अधिनियम (Kerala Land Reforms Act) बनाया गया।

इस कानून का भी मकसद वही था, जो अब तक के बनाए गए क़ानूनों का था यानी कि जमींदारी प्रथा को खत्म करना, सार्वजनिक कामों के लिए भूमि का अधिग्रहण करना आदि।

हुआ ये कि इसी भूमि सुधार कानून के तहत केशवानन्द भारती नामक एक आध्यात्मिक गुरु के मठ की संपत्ति के मैनेजमेंट के हक़ को उससे छीन लिया।

ये बात उन्हे पसंद नहीं आई और उन्होने सुप्रीम कोर्ट में ये याचिका दायर कि की 29वां संविधान संशोधन गलत है।

और साथ ही गोलकनाथ मामले को भी इसमें जोड़ दिया और उन्होने 24वां और 25वां संविधान संशोधन को भी गलत ठहराया।

🔷 सुप्रीम कोर्ट की 13 जजों की बेंच ने 24 अप्रैल 1973 को 7:6 के बहुमत से एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि –

🔷 1. 24वां, 25वां और 29वां संविधान संशोधन पूरी तरह से सही है।
🔷 2. संसद, संविधान के किसी भी हिस्से को संशोधित कर सकती है। चाहे वो मूल अधिकार ही क्यों न हो।

लेकिन संसद को ये हमेशा याद रखना होगा कि संविधान संशोधन की शक्ति, संविधान को फिर से लिखने की शक्ति नहीं है।

और तब सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसी व्यवस्था दी जो भविष्य बदलने वाला था। वो व्यवस्था था ‘संविधान की मूल संरचना

सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ कहा कि संसद अनुच्छेद 368 की मदद से संविधान में हर प्रकार का संशोधन कर सकता है पर संसद संविधान के मूल ढांचे में कोई परिवर्तन नहीं कर सकता।

यानी कि सुप्रीम कोर्ट हर कानून की समीक्षा करेगा और अगर वो कानून संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ होता है तो उसे रद्द कर दिया जाएगा।

अब सब के मन में यही सवाल था कि संविधान का मूल ढांचा आखिर है क्या?

सुप्रीम कोर्ट ने इसका जवाब देते हुए कहा कि ये कोई एक चीज़ है नहीं जिसका अभी घोषणा कर दूँ पर सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर इसे बताता रहेगा।

इस तरह से संविधान की मूल संरचना अस्तित्व में आया। इसने सुप्रीम कोर्ट को बेशुमार शक्तियाँ दी।

अब हर कानून बनाने से पहले संसद को एक बार ये सोचना पड़ता है कि कहीं संविधान के मूल संरचना को ठेस तो नहीं पहुंचा है।

संविधान की मूल संरचना के तत्व 

1973 के बाद से अब तक सुप्रीम कोर्ट ने बहुत सारे मूल ढांचे के तत्व को सामने रखा है। आइये समझने के लिए उसमें से कुछ को देखते हैं।

जैसे कि – 🔷 संविधान की सर्वोच्चता। यानी कि संसद अगर कोई ऐसा कानून बनाती है जो संविधान की सर्वोच्चता को खत्म करती हो तो सुप्रीम कोर्ट उस कानून को रद्द कर सकती है।

इसी प्रकार कुछ अन्य भी है – 🔷 भारतीय राजनीति की सार्वभौम, लोकतान्त्रिक तथा गणराज्यात्मक प्रकृति,

🔷 कानून का शासन,  🔷सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक समीक्षा का अधिकार, 🔷 संविधान का संघीय स्वरूप,🔷 समत्व का सिद्धान्त (Principle of equality),

🔷 स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव, 🔷 न्यायपालिका की स्वतंत्रता, 🔷 वैयक्तिक गरिमा और स्वतंत्रता,

🔷 अनुच्छेद 32, 136, 141 और 142 के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट को प्राप्त शक्तियाँ, और 🔷 अनुच्छेद 226 और 227 के अंतर्गत उच्च न्यायालय को प्राप्त शक्तियाँ। इत्यादि-इत्यादि।

अब अगर आपने विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया और विधि की सम्यक प्रक्रिया को पढ़ रखी है तो आप समझ रहे होंगे कि,

विधि की सम्यक प्रक्रिया के अंतर्गत शायद जितनी शक्ति सुप्रीम कोर्ट को नहीं मिलती उतनी अब अकेले ‘संविधान की मूल संरचना‘ के अंतर्गत ‘क़ानूनों की समीक्षा‘ करने की शक्ति से प्राप्त हो गयी है।

जनता को इससे फायदा ये है कि सुप्रीम कोर्ट की ये शक्ति सरकार को कभी भी तानाशाह नहीं बनने देंगी, परिणामस्वरूप लोकतंत्र और जनता का हित हमेशा सुरक्षित रहेगा।

उम्मीद है आपको ‘संविधान की मूल संरचना’ लेख दिलचस्प लगा होगा।

…🔷🔷🔷…

Articles⬇️

directive principles of state policy
story of the formation of indian states

कमेंट करें और फॉलो करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *