जीएसटी क्या है?

इस लेख में हम जीएसटी के बेसिक्स (Basics of GST) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे, एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने का प्रयास करेंगे,

तो अच्छी तरह से समझने के लिए लेख को अंत तक जरूर पढ़ें साथ ही इस टॉपिक से संबन्धित अन्य लेखों को भी पढ़ें।

समझने की दृष्टि से इस पूरे टॉपिक को तीन भागों में बाँट दिया गया है, अभी आप इसके पहले भाग को पढ़ रहे है।

जीएसटी

जीएसटी की पृष्ठभूमि

टैक्स देने का चलन कोई नया नहीं है, जो एक समय अपने कबीले के सरदार को उपहार देने का चलन था धीरे-धीरे वो सरदार इतना ताकतवर हो गया कि लोगों के लिए टैक्स देना उसने बाध्यकारी बना दिया। तब से लेकर आजतक लगभग 2500 वर्षों के इतिहास के दौरान टैक्स व्यवस्था न जाने कितनी बार सुधार प्रक्रिया से गुजरा।

आधुनिक राष्ट्रों की टैक्स व्यवस्था उसी विकास प्रक्रिया का एक उत्कृष्ट रूप है। पर बदलते वक्त के साथ अच्छी व्यवस्था भी अप्रासंगिक हो जाता है, जैसे कि हमारी पुरानी टैक्स व्यवस्था; और तब हमें फिर से उस व्यवस्था में सुधार की जरूरत महसूस होती है। आज टैक्स देने की व्यवस्था को राष्ट्र हित और विकास के लिए के वहाँ के नागरिकों का राष्ट्र के प्रति एक कर्तव्य समझा जाता है। ऐसे में एक अच्छे नागरिक और एक टैक्सपेयर होने के नाते हमें हमारे देश के टैक्स सिस्टम की आधारभूत समझ तो होनी ही चाहिए।

▶ 1 जुलाई 2017 से जीएसटी (GST) लागू होने के बाद देश में एकीकृत टैक्स सिस्टम (Integrated tax system) आ गया है। इसका हमारे अर्थव्यवस्था पर और हम पर प्रभाव तो पड़ा ही है, साथ ही साथ इससे केंद्र और राज्य के मध्य वित्तीय संबंध भी प्रभावित हुआ है। या यूं कहें कि पहले से थोड़ा बेहतर हो गया है। वो कैसे?

इसके लिए जीएसटी के बेसिक्स को जानना बहुत जरूरी है और जीएसटी जानने से पहले कर व्यवस्था (Tax system) को जानना जरूरी है। आइये पहले उसे जानते हैं।

Tax system (कर प्रणाली)

मुख्य रूप से कर (Tax) दो प्रकार के होते हैं- प्रत्यक्ष कर (Direct tax) और अप्रत्यक्ष कर (Indirect tax)

प्रत्यक्ष कर (Direct tax)

प्रत्यक्ष कर (Direct tax), यानी कि ऐसा कर, जो जिसपे लगाया जाता है उसी से वसूला भी जाता है। जैसे कि आयकर (Income tax), कॉर्पोरेट कर (corporate tax), संपत्ति कर (property tax), उपहार कर (Gift tax) इत्यादि।

इस प्रकार के कर (Tax) को सीधे (Directly) अमुक लोगों या फिर संस्था से ले लिया जाता है। सरकार ने स्लैब बना दिया है कि कितना कमाने पर कितना टैक्स देना पड़ेगा। जो जिस स्लैब में आता है उसी हिसाब से टैक्स भरता है, इस तरह से वो टैक्स सीधे सरकार के पास चला जाता है। इसमें कोई झंझट नहीं होता है। क्योंकि इसमें सब कुछ स्पष्ट होता है, प्रक्रिया आसान होती है।

चूंकि इसमें अलग-अलग आय वर्ग के लोगों के लिए अलग-अलग टैक्स होता है इसीलिए इसे प्रगामी टैक्स सिस्टम (Progressive tax system) भी कहा जाता हैं।

अप्रत्यक्ष कर (Indirect tax)

अप्रत्यक्ष कर (Indirect tax) यानी कि ऐसा कर, जो लगाया किसी और पर जाता है और वसूला किसी और से जाता है।

▶ जैसे कि मान लीजिये कि आप 10 रूपये का चिप्स का एक पैकेट खरीदते है तो आप को उस पर अलग से कोई टैक्स नहीं देना पड़ता है। क्योंकि टैक्स आप पे लगाया ही नहीं गया है।

टैक्स तो चिप्स बनाने वाली उस कंपनी पर लगाया गया है, और टैक्स वहीं चुकाता भी है। पर वो अपने घर से तो चुकाएगा नहीं, इसीलिए जितना कर वो चुकाता है वो सब उस चिप्स पर जोड़ देता है। और अंततः वो हमें ही चुकाना पड़ता है। तो हुआ न लगाया तो उस पर गया था लेकिन चुकाना हमें पड़ता हैं इसीलिए तो इसे अप्रत्यक्ष कर (Indirect tax) कहते हैं।

इसके कुछ उदाहरण है – केन्द्रीय उत्पाद कर (Central excise tax) , VAT (Value Added Tax), सीमा शुल्क (Custom duty), सेवा कर (service tax) इत्यादि।

समस्या इसी अप्रत्यक्ष टैक्स व्यवस्था में था (कैसे था इसे आगे समझते हैं) और इसी समस्या को सुलझाने के लिए उसमें सुधार की जरूरत थी जो कि जीएसटी के रूप में किया गया।

जीएसटी क्या है? (What is GST?)

जीएसटी एक व्यापक अप्रत्यक्ष कर प्रणाली है।

ये व्यापक (Comprehensive) इसीलिए है क्योंकि पूरे देश में लागू होता है और कई टैक्स के बदले बस एक टैक्स लगता है, और अप्रत्यक्ष कर प्रणाली (Indirect tax system) इसीलिए है क्योंकि ये प्रत्यक्ष कर प्रणाली (Direct tax system) पर नहीं लगता है। क्यों नहीं लगता है? इसे आगे समझते हैं।

🔹 पूरी जीएसटी प्रणाली, मूल्य वर्धित कर जिसे कि हम VAT या फिर (Value Added Tax) के नाम से जानते हैं; उसी सिद्धांत पर काम करता है। या यूं कह लें कि जीएसटी, VAT का ही अपग्रेडेड वर्जन है। इसीलिए जीएसटी समझने के लिए, VAT समझना जरूरी है और VAT समझने के लिए जरूरी है ये समझना कि हमारे अप्रत्यक्ष कर प्रणाली (Indirect tax system) में गड़बड़ी कहाँ थी जो VAT लाया गया था।

जीएसटी से पहले का सिस्टम (Pre-GST System)

VAT पूरे देश में लागू होने से पहले हमारा देश सिंगल पॉइंट टैक्स सिस्टम (Single point tax system) पर काम करता था। यानी कि हर एक पॉइंट पर अलग-अलग टैक्स देना पड़ता था।

इसकी खामी ये थी कि इसमें क्रमपाती प्रभाव या कैस्केडिंग इफैक्ट बहुत ज्यादा था। कैस्केडिंग इफैक्ट यानी कि टैक्सपेयर को, टैक्स पर टैक्स देना पड़ता था। वो कैसे? इसे उदाहरण से समझते हैं।

🔹 मान लीजिये कि आप एक स्वेटर बनाने वाली कंपनी चलाते हैं। कच्चे माल (रॉ मटिरियल) के रूप में आपको ऊन की जरूरत पड़ती है।

आप 100 रूपये का ऊन आयात करते हैं, मान लीजिये 10 प्रतिशत अभी आयात कर (import tax) है इसीलिए आपको 110 रूपये पेमेंट करना पड़ता है।

अब आपने उससे एक स्वेटर बना लिया। स्वेटर बनाने में आपको 40 रूपये खर्चा करना पड़ा। मतलब कि अब वो उत्पाद 150 रूपये का हो गया। (110+40),

इससे पहले कि वो मार्केट में बिकने के लिए जाएगा उस पर आपको केन्द्रीय उत्पाद कर (Central excise tax) देना पड़ेगा। मान लेते हैं, अगर वो भी 10 प्रतिशत है तो आपको 15 रूपये और केंद्र सरकार को देना होगा। (क्योंकि 150 का 10 प्रतिशत 15 होता है।)

इस प्रकार उस स्वेटर कि कीमत 165 रूपये हो गयी। अब आप खुद सामान तो बेचेंगे नहीं, वो तो रिटेलर बेचेगा। मान लीजिये रिटेलर 35 रुपया प्रॉफ़िट लेके उसे मकेट में बेचेगा। तो अब उस स्वेटर की कीमत 200 रूपये हो गयी।

अब जिस राज्य में ये स्वेटर बिकेगा वो राज्य इस पर बिक्री कर (sales tax) लगा देगा। अगर वो भी 10 प्रतिशत हो तो प्रॉडक्ट की अंतिम कीमत 220 रूपये हो जाती है। अब आप देखिये तो हर एक पॉइंट पर टैक्स देना पर रहा है। इसलिए इसे सिंगल पॉइंट टैक्स सिस्टम कहते हैं।

इसकी खामी ये है कि इसमें टैक्स पर टैक्स देना पड़ रहा है। आप देखिये जब सबसे पहले उस पर 10 प्रतिशत टैक्स देना पड़ा था तो उसकी कीमत 110 रूपये हो गयी थी।

आगे जब इसकी कीमत 150 रुपए हो गयी तो पहले वाला 10 रूपये का टैक्स तो इसमें जुड़ा हुआ था न। फिर जब आगे उस पर 10 प्रतिशत टैक्स लगा तो उस 10 रूपये पर भी तो टैक्स देना पड़ा। जो कि खुद एक टैक्स था और पहले ही टैक्स के रूप में दे दिया गया था। इसी प्रकार जब आगे उस प्रॉडक्ट की कीमत 200 रूपये हो गयी तो उसमे 15 रूपये तो टैक्स का था।

फिर जब आगे उसपर 10 प्रतिशत टैक्स लगा तो उस 15 रूपये पर तो टैक्स देना ही पड़ा साथ ही साथ पहले वाले 10 रूपये पर जो टैक्स लगा था उसपर भी फिर से टैक्स देना पड़ा। समझ रहे हैं न। इसी तरह फिर से आगे जब इस पर टैक्स लगेगा तो पिछले वाले टैक्स पर भी टैक्स देना पड़ेगा।

तो हुआ न टैक्स पर टैक्स। इसी को क्रमपाती प्रभाव (कैस्केडिंग इफैक्ट) कहते हैं। इस तरह टैक्स पर टैक्स लगने से वस्तु की अंतिम कीमत बहुत ज्यादा हो जाती थी। इसी को खत्म करने के लिए इस पूरे सिस्टम को VAT सिस्टम से रिप्लेस कर दिया गया। VAT में ये कैस्केडिंग इफैक्ट खत्म हो जाता है। कैसे हो जाता है? आइये इसे फिर से उसी उदाहरण से समझते हैं।

VAT System (मूल्य वर्धित कर प्रणाली)

शुरू में 10 प्रतिशत टैक्स देने के बाद उस रॉ मटिरियल की कीमत 110 रूपये हो गयी थी। अब उसमें और 40 रुपया खर्च करके जब आपने एक स्वेटर बनाया तो उसकी कीमत 150 हो गयी। अब आपको सेंट्रल एक्साइज़ (Central excise) पे करना है।

अगर पुराने वाले सिस्टम से देखें तो आपको 15 रूपये पे करना पड़ता। पर VAT होने के कारण अब जो 10 प्रतिशत टैक्स लगेगा वो 150 रूपये पर न लगकर 140 पर ही लगेगा। क्योंकि 10 रूपये टैक्स के तो आप पहले ही पे कर चुके हैं तो उसपर आपको फिर से टैक्स नहीं देना है। इसीलिए अब देखें तो 140 का 10 प्रतिशत 14 होता है। अब उसकी कीमत 154 रूपये हो गयी। जो कि याद कीजिये तो पहले 165 रूपये हो गयी थी।

अब ये जो 14 रूपये आपको एक्सट्रा देना पड़ा है इसे ही उत्पादन कर देयता (output tax liability) कहा जाता है।

जो 10 रूपये आप पहले ही पे कर चुके हैं उसे ‘इनपुट टैक्स क्रेडिट‘ कहा जाता है। तो कुल मिलाकर यहाँ जो आपको VAT देना है। वो होगा मात्र 4 रूपये। वो क्यूँ ?

क्यूंकी VAT का मतलब ही होता है वैल्यू एडेड टैक्स या मूल्य वर्धित कर। मतलब ये कि आपने उस रॉ मटिरियल में जितना वैल्यू एड या फिर जितना आपने उसका मूल्य बढ़ाया है,

उसी पर आपको टैक्स देना पड़ेगा न कि पूरे वस्तु की कीमत पर। अब यहाँ देखें तो आपने 110 रूपये का रॉ मटिरियल खरीदा था, जिसमें से 10 रूपये टैक्स का था।

आपने उसमें जोड़ा कितना तो 40 रूपये। तो अब आपको इस 40 पर ही टैक्स पे करना है न कि 150 पर। इसीलिए 40 का 10 परसेंट 4 रूपये होता है। और आपको मात्र 4 रूपये सरकार को देने हैं। यहीं VAT है। इसे निकालने का सीधा सा फॉर्मूला है,

VAT = Output tax liability – इनपुट टैक्स क्रेडिट

🔹 इस फॉर्मूला के हिसाब से भी देखें तो output tax liability 14 रूपये था जबकि इनपुट टैक्स क्रेडिट जो कि पहले ही पे कर दिया गया है। वो 10 रूपये था।

इसीलिए जब आप VAT निकालेंगे तो निकलेगा 14 – 10 = 4 रूपये। ये 4 रूपये आपको बस एक्साइज़ टैक्स के रूप में पे करना है जबकि टोटल कीमत देखें तो 154 रूपये हो गया।

🔹 मान लीजिये कि 36 रुपया रिटेलर इसमें से फायदा लेगा तो इसकी कीमत 190 रूपये हो गया। और हमने अब तक कुल 14 रूपये टैक्स चुकाए हैं। 10 रूपये पहले चरण में और 4 रूपये दूसरे चरण में।

अब तीसरे चरण की बात करते हैं। 190 रूपया जो कीमत हुआ है चूंकि 14 रूपये उसमें पहले ही जुड़ चुका हैं। इसलिए अब जो इसपे टैक्स लगेगा वो सिर्फ 176 रुपये पर ही लगेगा।

अब यहाँ भी 10 प्रतिशत टैक्स लगेगा। इसीलिए इसकी अंतिम कीमत हो गयी 176+17.6 = 193.6 रुपया।

यहाँ 17.6 रूपये जो हैं वो output tax liability है। वहीं अब तक जो टैक्स चुका चूकें हैं, जो कि 14 रुपया है वो है इनपुट टैक्स क्रेडिट, इसीलिए VAT = output tax liability – इनपुट टैक्स क्रेडिट; 17.6 – 14 = 3.6 रूपये। यानी कि यहाँ पर आपको कुल 3.6 रूपये ही चुकाने पड़ेंगे।

🔹 वैसे भी अगर आप देखेंगे तो दूसरे चरण में उनकी कीमत थी 154 रूपये और उसमें जो वैल्यू एड किया गया था। वो था 36 रूपये। और वैल्यू एडेड टैक्स का मतलब ही होता है। वैल्यू जो उसमें जोड़ा गया है उस पर लगने वाला कर। यहाँ वो 36 रूपये है और 36 का 10 प्रतिशत निकाले तो वो होता है 3.6 रूपये। इसी को कहते हैं VAT सिस्टम।

💠 अब दोनों में आपको फर्क पता चल गया होगा। सिंगल पॉइंट टैक्स सिस्टम वाले केस में देखें तो वहाँ तीन चरण के बाद जो अंतिम उत्पाद की कीमत थी वो थी 220 रूपये,

जबकि उसमें भी तीनों स्तर पर 10 प्रतिशत टैक्स ही लगाया गया था। वहीं VAT वाले केस में देखें तो यहाँ भी तीनों स्तर पर 10 प्रतिशत कर ही लगाया गया है।

पर यहाँ अंतिम उत्पाद की कीमत मात्र 193.6 रूपये ही है। मतलब कि लगभग 26 रूपये का अंतर। और ये अंतर क्यों आया क्योंकि टैक्स पर टैक्स लगने वाली सिस्टम खत्म हो गयी। यानी कि कैस्केडिग इफैक्ट खत्म हो गया।

ये जो 26 रूपये की कमी आई है। उसका फायदा भी जनता को ही मिलेगा। अब आप समझ गए होंगे कि VAT क्यों लाया गया था।

💠 अब आपके मन में ये सवाल आ सकता है कि जब वैट इतना अच्छा था, इसमें कैस्केडिंग इफैक्ट खत्म हो गया था। वस्तु की कीमते कम हो गयी थी। तो फिर इसे जीएसटी में क्यों बदला गया। तो इसका जवाब ये है कि VAT लगने के बाद भी कुछ खामियाँ थी टैक्स सिस्टम में, जिसे VAT भी ठीक नहीं कर सकता था। अगर कोई सिस्टम इसे ठीक कर सकता था तो वो था जीएसटी।

VAT के बावजूद टैक्स व्यवस्था की समस्याएं

2005 में VAT आने के बाद कुछ समस्याएँ तो खत्म हुई लेकिन कुछ समस्याएँ भी खड़ी हो गई। ऐसा क्यूँ हुआ आइये समझते हैं;

कैस्केडिंग इफैक्ट का खत्म न होना

VAT आ जाने से भी पूरी तरह से कैस्केडिंग इफैक्ट खत्म नहीं हुआ। वो कैसे? वो ऐसे कि केंद्र और राज्य के बीच में जो टैक्स व्यवस्था था उसमें कैस्केडिंग था।

इसे ऐसे समझिये कि किसी ने कहीं से रॉ मटिरियल इम्पोर्ट किया तो उस पे केंद्र सरकार ने आयात कर (इम्पोर्ट ड्यूटि) लगाया। वो सामान किसी फैक्ट्री में गया वहाँ से जब बन कर निकला तो केंद्र सरकार ने उस पर उत्पाद कर (एक्साइज़ ड्यूटि) लगाया।

तो अभी जो दो स्तर पर केंद्र सरकार द्वारा टैक्स लगाया गया है। उसमें तो VAT अच्छे से काम करता था। इसमें कोई कैस्केडिंग नहीं था क्योंकि घूम फिर कर पैसा केंद्र के पास ही रहता था। और इनपुट क्रेडिट आसानी से मैनेज कर लिया जाता था।

यहीं बात राज्य पर भी लागू होता था। बहुत सी चीज़ें राज्य के अंदर ही उत्पादित और खपत हो जाती थी। उस पर राज्य सरकार भी अपना कर लगाती थी। इसमें भी कैस्केडिंग नहीं था।

पर समस्या तब आती थी जब केंद्र सरकार ने किसी वस्तु पर एक्साइज़ ड्यूटि लगाया और वहीं सामान राज्य में गया तो राज्य ने उस पर VAT लगाया।ऐसी स्थिति में कैस्केडिंग इफैक्ट होता था। क्योंकि इनपुट टैक्स क्रेडिट को मैनेज करना मुश्किल हो जाता था या हो नहीं पाता था। ऐसा क्यों?

क्योंकि अलग-अलग राज्यों की VAT की दरें अलग-अलग होती थी। इससे फर्क ये पड़ता था कि एक ही वस्तु का दाम अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग होता था। चूंकि ये राज्यों के हाथ में था इसीलिए केंद्र के लिए यहाँ ज्यादा कुछ करने की गुंजाइश नहीं थी।

सर्विस टैक्स की एंट्री

पहले तो सिर्फ वस्तु (Goods) पर टैक्स लगता था पर 88वां संविधान संशोधन 2003 द्वारा सेवा कर (सर्विस टैक्स) नामक एक व्यवस्था लाया गया।

लेकिन इसके लाने के बाद ही समस्याएँ आनी शुरू हो गयी। हुआ ये कि चूंकि वस्तु पर टैक्स की दर अलग थी वही सेवा पर टैक्स की दर अलग थी। और सबसे बड़ी बात ये थी क्या वस्तु है और क्या सेवा ये पूरी तरह से स्पष्ट नहीं था। इसका फायदा कुछ लोग जमकर उठाते थे। जिसका टैक्स रेट कम होता था वे उसी में घुस जाते थे।

इसे इस तरह से समझिये कि अभी आप ये लेख पढ़ रहें हैं। तो ये तो एक सेवा है जो मेरे द्वारा दिया जा रहा है। पर अगर मैं कहूँ कि ये एक वस्तु है तो आपके पास क्या सबूत है कि आप सिद्ध कर देंगे कि ये एक वस्तु नहीं है। यही समस्या आती था सरकार के पास। सरकार को बार-बार अपनी लिस्ट को अपडेट करना पड़ता था कि क्या सेवा है और क्या वस्तु।

फिर दोनों टैक्स (वस्तु और सेवा) अलग-अलग लगायी जाती थी। इसीलिए इसे एक साथ मैनेज करने में काफी दिक्कते थी। इसका कोई स्थायी हल तो खोजना ही था।

ट्रांसपोर्ट संबंधी दिक्कतें

एक और बड़ी समस्या समान लदे ट्रकों के आवाजाही को लेकर थी। राज्य सरकार अलग-अलग प्रकार की बहुत ज्यादा टैक्स लगाती थी। जैसे कि अगर कोई ट्रक किसी राज्य के सीमा में प्रवेश कर रही है तो उसे सीमा शुल्क (Entry Tax) देना पड़ता था। वहीं, अगर वो ट्रक उस राज्य के किसी नगरपालिका के क्षेत्र से गुजर रही है तो चुंगी (Octroi) देना पड़ता था।

अब सोचिए कि किसी ट्रक को समान लेकर दिल्ली से मिज़ोरम जाना है तो उसका क्या हश्र होता होगा। तभी तो कई-कई दिन तक ट्रक किसी राज्य के सीमा पर खड़े रहते थे और समान सही समय पर नहीं पहुँच पाता था। ये एक बहुत बड़ी समस्या थी।

एक देश अलग-अलग टैक्स

देश तो एक था पर उसमें टैक्स व्यवस्था अलग-अलग थी, टैक्स की दरें अलग-अलग थी इससे होता ये था कि एक वस्तु की कीमत किसी राज्य में कुछ है और किसी राज्य में कुछ और। लोगों को भी माथापच्ची होती थी क्योंकि अक्सर वे कुछ पैसे बचाने के चक्कर में किसी और राज्य से खरीददारी करते थे।

इसके अलावा करदाताओं को भी काफी परेशानी झेलनी पड़ती थी, ढेर सारे रिटर्न, भुगतान आदि करने पड़ते थे। इसीलिए सब को ध्यान में रखकर और एक देश एक कर व्यवस्था को स्थापित करने के उद्देश्य से जीएसटी व्यवस्था लाया गया।

जीएसटी लागू होने से हुआ क्या?

जैसे कि नाम से ही स्पष्ट है कि ये वस्तु एवं सेवा कर (goods and services Tax) है। यानी कि ये एक साथ वस्तु और सेवा दोनों पर लगता है।

अभी हमने ऊपर चर्चा किया था कि सेवा और वस्तु में कितना झंझट होता था। इससे वो समस्या सुलझ गया। अब वो वस्तु रहें या सेवा चूंकि दोनों का टैक्स दर एक ही है इसीलिए अब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कौन क्या है?

दूसरी बात कि इसके आने से बहुत सारे टैक्स खत्म हो गये और उसकी जगह पर सिर्फ एक टैक्स आ गया GST। इससे कौन-कौन सा टैक्स खत्म हुआ आइये जान लेते हैं।

नोट – याद रहें कि चूंकि प्रत्यक्ष कर (डायरेक्ट टैक्स) से इसका कोई लेना देना नहीं है। इसीलिए ये पूरी तरह से अप्रत्यक्ष कर (इनडायरेक्ट टैक्स) पर ही लागू होता है।

केंद्र सरकार का टैक्स; जो खत्म हुआ

(1) केन्द्रीय उत्पाद कर (सेंट्रल एक्साइज़ ड्यूटि) – याद रखिए कि ये पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। हाँ जहां पर जीएसटी लागू है वहाँ पर ये पूरी तरह से खत्म हो चुका है। जिस पे जीएसटी नहीं लागू है उस पर अभी भी सेंट्रल एक्साइज़ काम करता है। जैसे कि – पेट्रोल, डीज़ल आदि।

नोट – केंद्र सरकार पहले सेंट्रल एक्साइज़ ड्यूटि लगाती थी। पर 1986 में VAT प्रिंसिपल पर इसे चलाने के कारण, इसका नाम MODVAT (Modified Value Added Tax) दिया गया। पुनः वर्ष 2000 में इस नाम को बदलकर CENVAT यानी कि Central VAT कर दिया गया था।

(2) अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (Additional Excise Duties) खत्म हो गया।

(3) सर्विस टैक्स जो कि केंद्र सरकार लगाता था वो पूरी तरह से खत्म हो गया और ये जीएसटी में ही मर्ज हो गया।

(4) प्रतितुलन शुल्क (Countervailing duty) या फिर (Additional Custom Duty) ये भी केंद्र सरकार द्वारा आयातित वस्तुओं पर लगाया जाता था। ये भी खत्म हो गया।

(5) विशेष अतिरिक्त सीमा शुल्क (Special Additional Custom Duty) खत्म हो गया।

(6) केन्द्रीय बिक्री कर (सेंट्रल सेल्स टैक्स) खत्म हो गया। इसी के जगह पर IGST आया। कैसे आया इसे समझ लेते हैं;

केन्द्रीय बिक्री कर (Central sales tax)

जब केंद्र और राज्य व्यापार करते थे तो उसमें कोई समस्या नहीं आती थी पर जब एक राज्य के व्यापारी दूसरे राज्य के व्यापारी से व्यापार करते थे तो समस्या आती थी। 2005 से पहले इस तरह के व्यापार में बिक्री कर (sales tax) लगाया जाता था और ये राज्यों द्वारा लगाया जाता था।

जब 2005 में केंद्र सरकार के कहने पर सभी राज्यों ने अपने-अपने बिक्री कर (सेल्स टैक्स) को खत्म करके VAT लागू कर दिया तो फिर एक समस्या आ गयी।

समस्या ये था कि इस व्यवस्था के अनुसार एक राज्य, दूसरे राज्य से टैक्स कलेक्शन करने के लिए उसके राज्य नहीं जा सकता था। क्योंकि वे उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता था। जबकि पहले जब सेल्स टैक्स (Sales tax) लगाया जाता था तो राज्यों के द्वारा पहले ही टैक्स वसूल लिया जाता था। पर VAT आने के बाद इसमें इस प्रकार की समस्याएँ आ गयी।

🔷 इसी को ध्यान में रखकर केन्द्रीय बिक्री कर (सेंट्रल सेल्स टैक्स) लाया गया। इसका मकसद ये था कि जिस राज्य से जिस राज्य को समान बेचा जाएगा उस पर जितना VAT लगेगा, केंद्र, जिस राज्य में वो समान बिका वहाँ से वो कर इकट्ठा कर के उस राज्य को दे देगी जिस राज्य का हिस्सा वो था। यहीं था सेंट्रल सेल्स टैक्स जो कि अनुच्छेद 269 में लिखा है।

लेकिन जीएसटी लागू होने से कुछ चीजों को छोड़कर (जैसे कि बिजली) सेंट्रल सेल्स टैक्स खत्म हो गया। इसीलिए इसके जगह पर अनुच्छेद 269क के तहत IGST लाया गया। इससे जो भी वसूली की जाती है उसे केंद्र और राज्य के मध्य बाँट दिया जाता है।

(ज्यादा जानकारी के लिए – केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध पढ़ें)

राज्य सरकार का टैक्स; जो खत्म हुआ

🔷 राज्य से VAT खत्म हो गया। लेकिन याद रखिए कि VAT सिर्फ वहीं खत्म हुआ है जहां पर जीएसटी लागू है। जहां पर जीएसटी लागू नहीं है वहाँ पर VAT खत्म नहीं हुआ है, जैसे कि शराब, अफीम इत्यादि।

नोट – 2005 से पहले राज्यों में बिक्री कर यानी कि सेल्स टैक्स ही चलता था। 2005 में उसी सेल्स टैक्स को हटाकर VAT लाया गया था।

🔷 सीमा शुल्क (Entry Tax) एंट्री टैक्स पूरी तरह से खत्म हो गया। अब किसी भी ट्रक को किसी राज्य की सीमा पर रुकना नहीं पड़ता है। वे बेरोकटोक अपने गंतव्य तक जा सकते हैं।

🔷 चुंगी (Octroi) पूरी तरह से खत्म हो गया है। अब कोई नगरपालिका बांस से रास्ते घेरकर चुंगी नहीं ले सकता।

🔷 विज्ञापन टैक्स खत्म हो गया।
🔷 लक्ज़री टैक्स (Luxury Tax) खत्म हो गया।

🔷 एंटरटैनमेंट टैक्स (Entertainment and Amusement Tax) , लॉटरी टैक्स, गंबलिंग टैक्स खत्म हो गया है।

इतनी मात्रा में अप्रत्यक्ष टैक्स खत्म हो गया या यूं कहें कि जीएसटी में मर्ज हो गया और पूरे देश के लिए एक टैक्स व्यवस्था लागू हो गया इसीलिए इसे व्यापक अप्रत्यक्ष कर प्रणाली (Comprehensive indirect tax system) कहते हैं।

जीएसटी से जुड़े अन्य तथ्य

बहुस्तरीय कर व्यवस्था के रूप में जीएसटी

जीएसटी का सबसे बड़ा फायदा तो ये है कि इससे कैस्केडिंग इफैक्ट पूरी तरह से खत्म हो गया और दूसरी बात ये कि जहां पहले रॉ मटिरियल पर VAT लगता था, प्रॉडक्शन पर सेंट्रल एक्साइज़ सर्विस पर सर्विस टैक्स, होलसेलर पर VAT, रिटेलर पर VAT एवं उपभोक्ता पर VAT लगता था। इस सब के गजह पर सिर्फ एक ही टैक्स जीएसटी आ गया इसीलिए इसे बहुस्तरीय टैक्स (Multistage Tax) भी कहते हैं।

गंतव्य आधारित एकल कर व्यवस्था के रूप में जीएसटी

जीएसटी निर्माता और उपभोक्ता से वस्तु और सेवाओं की आपूर्ति पर एक गंतव्य आधारित एकल कर व्यवस्था (Destination based single tax regime) है।

नीति निर्माता इस मामले में दुविधा में थे कि जीएसटी कहाँ लगाया जाये उत्पादन (production) पर लगाया जाये, सप्लाइ (Supply) लगाया जाये या फिर उपभोक्ता (Consumer) पर। अंततः ये डिसाइड किया गया कि किसी भी प्रॉडक्ट का चेन (Chain) जहां पर खत्म होगा। वहीं पर टैक्स लगाया जाएगा।

यानी कि कोई समान भले ही किसी और राज्य में बनी हो पर जिस राज्य में वो समान उपभोक्ता के पास पहुंचेगा उसी राज्य में टैक्स लगाया जाएगा और इसका इनपुट क्रेडिट उस राज्य को लौटा दिया जाएगा जिस राज्य से बनकर वो समान आया है। इसीलिए इसे गंतव्य आधारित कर (Destination based tax) भी कहते हैं।

कुल मिलाकर ये रहा जीएसटी, उम्मीद है आपको जीएसटी क्या है, ये समझ में आ गया होगा। आगे हम इसी से संबंधित दो अन्य महत्वपूर्ण टॉपिक ”जीएसटी की खासियत और खामियाँ क्या है एवं जीएसटी काम कैसे करता है?” पर सरल एवं सहज चर्चा करेंगे। जीएसटी की पूरी समझ के लिए उसे भी जरूर पढ़ें;

🔷🔷🔷

Article Based On,
भारतीय अर्थव्यवस्था – रमेश सिंह↗️
योजना: व्यापार सुगमता पर जीएसटी का प्रभाव↗️
योजना : एक देश एक कर↗️
Youtube lectures↗️ आदि।

डाउनलोड जीएसटी

पसंद आया तो शेयर कीजिये

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *