Basics of GST in hindi ॥ जीएसटी की आधारभूत समझ

Basics of GST Part 1

इस लेख में हम जीएसटी के बेसिक्स (Basics of GST) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे। ये लेख तीन पार्ट में विभक्त है। बेहतर समझ के लिए तीनों को पढ़ें।

Basics of GST

Background of Basics of GST
जीएसटी की पृष्ठभूमि

देश के नागरिक और एक टैक्सपेयर होने के नाते हमें हमारे देश के टैक्स सिस्टम की आधारभूत समझ तो होनी ही चाहिए।

▶ 1 जुलाई 2017 से जीएसटी लागू होने के बाद देश में एकीकृत टैक्स सिस्टम (Integrated tax system) आ गया है। इसका हमारे अर्थव्यवस्था पर और हम पर प्रभाव तो पड़ा ही है,

साथ ही साथ इससे केंद्र और राज्य के मध्य वित्तीय संबंध भी इससे प्रभावित हुआ है। या यूं कहें कि पहले से थोड़ा बेहतर हो गया है। वो कैसे?

इसके लिए जीएसटी के बेसिक्स को जानना बहुत जरूरी है। तो आइये समझते हैं। आप बस धीरे-धीरे समझते हुए पढ़िये।

Tax system (कर प्रणाली)

जीएसटी जानने से पहले कर व्यवस्था (Tax system) को जानना जरूरी है। आइये पहले उसे जानते हैं।

कर (Tax) दो प्रकार के होते हैं। प्रत्यक्ष कर (Direct tax) और अप्रत्यक्ष कर (Indirect tax)

प्रत्यक्ष कर (Direct tax)

प्रत्यक्ष कर (Direct tax) यानी कि ऐसा कर, जो जिसपे लगाया जाता है उसी से वसूला भी जाता है। जैसे कि आयकर (Income tax), कॉर्पोरेट कर (corporate tax), संपत्ति कर (property tax), उपहार कर (Gift tax) इत्यादि।

इस प्रकार के कर को सीधे अमुक लोगों या फिर संस्था से ले लिया जाता है। सरकार ने स्लैब बना दिया है कि कितना कमाने पर कितना टैक्स देना पड़ेगा।

अगर आप उस स्लैब में आते हैं और टैक्स भरते हैं तो सीधे सरकार के पास चला जाता है। इसमें कोई झंझट नहीं होता है। क्योंकि इसमें सब कुछ स्पष्ट होता है, प्रक्रिया आसान होती है।

चूंकि इसमें अलग-अलग आयवर्ग के लोगों के लिए अलग-अलग टैक्स होता है इसीलिए इसे प्रगामी टैक्स सिस्टम (Progressive tax system) भी कहा जाता हैं।

अप्रत्यक्ष कर (Indirect tax)

अप्रत्यक्ष कर (Indirect tax) यानी कि ऐसा कर, जो लगाया किसी और पर जाता है और वसूला किसी और से जाता है।

▶ जैसे कि मान लीजिये कि आप 10 रूपये के चिप्स का एक पैकेट खरीदते है तो आप को उस पर अलग से कोई भी टैक्स नहीं देना पड़ता है। क्योंकि टैक्स आप पे लगाया ही नहीं गया है।

टैक्स तो चिप्स बनाने वाली उस कंपनी पर लगाया गया है, और टैक्स वहीं चुकाता भी है। पर वो अपने घर से तो चुकाएगा नहीं,

इसीलिए जितना कर वो चुकाता है वो सब उस चिप्स पर जोड़ देता है। और अंततः वो हमें ही चुकाना पड़ता है।

तो हुआ न लगाया तो उस पर गया था लेकिन चुकाना हमें पड़ता हैं इसीलिए तो इसे अप्रत्यक्ष कर (Indirect tax) कहते हैं।

इसके कुछ उदाहरण है – केन्द्रीय उत्पाद कर (Central excise tax) , VAT (Value Added Tax), सीमा शुल्क (Custom duty), सेवा कर (service tax) इत्यादि।

इसमें बहुत ज्यादा झंझट था। इसी झंझट को सुलझाने के लिए जीएसटी लाया गया है। क्या झंझट था, उसे आगे समझते हैं।

GST क्या है?
(What is GST?)

▶ जीएसटी एक व्यापक (Comprehensive) अप्रत्यक्ष कर प्रणाली (Indirect tax system) है।

ये व्यापक (Comprehensive) इसीलिए है क्योंकि पूरे देश में लागू होता है और कई टैक्स के बदले बस एक टैक्स लगता है,

और अप्रत्यक्ष कर प्रणाली (Indirect tax system) इसीलिए है क्योंकि ये प्रत्यक्ष कर प्रणाली (Direct tax system) पर नहीं लगता है। क्यों नहीं लगता है? इसे आगे समझते हैं।

🔹🔹 पूरी जीएसटी प्रणाली, मूल्य वर्धित कर जिसे कि हम VAT या फिर (Value Added Tax) के नाम से जानते हैं; उसी सिद्धांत पर काम करता है।

या यूं कह लें कि जीएसटी, VAT का ही अपग्रेडेड वर्जन है। इसीलिए जीएसटी को VAT का बड़ा भाई भी कहा जाता हैं। ऐसा क्यूँ कहा जाता है?

इसके लिए VAT समझना जरूरी है, क्योंकि बिना VAT समझे जीएसटी नहीं समझा जा सकता।

और VAT समझने के लिए जरूरी है कि ये समझना कि हमारे अप्रत्यक्ष कर प्रणाली (Indirect tax system) में गड़बड़ी कहाँ थी जो VAT लाया गया।

जीएसटी से पहले का सिस्टम
(Pre-GST System)

1996 से पहले हमारा देश सिंगल पॉइंट टैक्स सिस्टम (Single point tax system) पर काम करता था। यानी कि हर एक पॉइंट पर अलग-अलग टैक्स देना पड़ता था।

इसकी खामी ये थी कि इसमें क्रमपाती प्रभाव या कैस्केडिंग इफैक्ट बहुत ज्यादा था। कैस्केडिंग इफैक्ट यानी कि टैक्सपेयर को, टैक्स पर टैक्स देना पड़ता था। वो कैसे? इसे उदाहरण से समझते हैं।

🔹🔹 मान लीजिये कि आप एक स्वेटर बनाने वाली कंपनी चलाते हैं। कच्चे माल (रॉ मटिरियल) के रूप में आपको ऊन की जरूरत पड़ती है।

आप 100 रूपये का ऊन आयात करते हैं, मान लीजिये 10 प्रतिशत आयात कर (import tax) है इसीलिए आपको 110 रूपये पे करना पड़ता है।

अब आपने उससे एक स्वेटर बना लिया। और स्वेटर बनाने में आपको 40 रूपये खर्चा करना पड़ा। मतलब कि अब वो उत्पाद 150 रूपये का हो गया। (110+40)

पर इससे पहले कि वो मार्केट में बिकने के लिए जाएगा। उस पर आपको केन्द्रीय उत्पाद कर (Central excise tax) देना पड़ेगा।

मान लेते हैं, अगर वो भी 10 प्रतिशत है तो आपको 15 रूपये और केंद्र सरकार को देना होगा। (क्योंकि 150 का 10 प्रतिशत 15 होता है।)

इस प्रकार उस स्वेटर कि कीमत 165 रूपये हो गयी। अब आप खुद सामान तो बेचेंगे नहीं, वो तो रिटेलर बेचेगा। तो मान लीजिये रिटेलर 35 रुपया प्रॉफ़िट लेके उसे मकेट में बेचेगा।

तो अब उस स्वेटर की कीमत 200 रूपये हो गयी। पर रुकिए अब जिस राज्य में ये स्वेटर बिकेगा वो राज्य इस पर बिक्री कर (sales tax) लगा देगा।

अगर वो भी 10 प्रतिशत हो तो प्रॉडक्ट की अंतिम कीमत 220 रूपये हो जाती है। अब आप देखिये तो हर एक पॉइंट पर टैक्स देना पर रहा है।

इसलिए इसे सिंगल पॉइंट टैक्स सिस्टम कहते हैं। इसकी खामी ये है कि इसमें टैक्स पर टैक्स देना पड़ रहा है।

आप देखिये जब सबसे पहले उस पर 10 प्रतिशत टैक्स देना पड़ा था तो उसकी कीमत 110 रूपये हो गयी थी।

आगे जब इसकी कीमत 150 रुपए हो गयी तो पहले वाला 10 रूपये का टैक्स तो इसमें जुड़ा हुआ था न। फिर जब आगे उस पर 10 प्रतिशत टैक्स लगा तो उस 10 रूपये पर भी तो टैक्स देना पड़ा। जो कि खुद एक टैक्स था।

Basics of GST and Single point tax

और पहले ही टैक्स के रूप में दे दिया गया था। इसी प्रकार जब आगे उस प्रॉडक्ट की कीमत 200 रूपये हो गयी तो उसमे 15 रूपये तो टैक्स का था।

पर फिर जब आगे उसपर 10 प्रतिशत टैक्स लगा तो उस 15 रूपये पर तो टैक्स देना ही पड़ा साथ ही साथ पहले वाले 10 रूपये पर जो टैक्स लगा था उसपर भी फिर से टैक्स देना पड़ा। समझ रहे हैं न।

इसी तरह फिर से आगे जब इस पर टैक्स लगेगा तो पिछले वाले टैक्स पर भी टैक्स देना पड़ेगा।

तो हुआ न टैक्स पर टैक्स। इसी को कैस्केडिंग इफैक्ट कहते हैं। इस तरह टैक्स पर टैक्स लगने से वस्तु की अंतिम कीमत बहुत ज्यादा हो जाती थी। कैसे होती है, आगे देखते हैं।

इसी को खत्म करने के लिए इस पूरे सिस्टम को VAT सिस्टम से रिप्लेस कर दिया गया।

VAT में ये कैस्केडिंग इफैक्ट खत्म हो जाता है। कैसे हो जाता है? आइये इसे फिर से उसी उदाहरण से समझते हैं।

VAT System (मूल्य वर्धित कर प्रणाली)

शुरू में 10 प्रतिशत टैक्स देने के बाद उस रॉ मटिरियल की कीमत 110 रूपये हो गयी थी। अब उसमें और 40 रुपया खर्च करके जब आपने एक स्वेटर बनाया तो उसकी कीमत 150 हो गयी।

अब आपको सेंट्रल एक्साइज़ पे करना है। अगर पुराने वाले सिस्टम से देखें तो आपको 15 रूपये पे करना पड़ता।

पर VAT होने के कारण अब जो 10 प्रतिशत टैक्स लगेगा वो 150 रूपये पर न लगकर 140 पर ही लगेगा। क्योंकि 10 रूपये टैक्स के तो आप पहले ही पे कर चुके हैं तो उसपर आपको फिर से टैक्स नहीं देना है।

इसीलिए अब देखें तो 140 का 10 प्रतिशत 14 होता है। अब उसकी कीमत 154 रूपये हो गयी। जो कि याद कीजिये तो पहले 165 रूपये हो गयी थी।

अब ये जो 14 रूपये आपको एक्सट्रा देना पड़ा है इसे ही उत्पादन कर देयता (output tax liability) कहा जाता है।

जो 10 रूपये आपने पहले ही पे कर चुके हैं उसे ‘इनपुट टैक्स क्रेडिट‘ कहा जाता है। तो कुल मिलाकर यहाँ जो आपको VAT देना है। वो होगा मात्र 4 रूपये। वो क्यूँ ?

क्यूंकी VAT का मतलब ही होता है वैल्यू एडेड टैक्स या मूल्य वर्धित कर । मतलब ये कि आपने उस रॉ मटिरियल में जितना वैल्यू एड या फिर जितना आपने उसका मूल्य बढ़ाया है,

उसी पर आपको टैक्स देना पड़ेगा न कि पूरे वस्तु की कीमत पर। अब यहाँ देखें तो आपने 110 रूपये का रॉ मटिरियल खरीदा था, जिसमें से 10 रूपये टैक्स का था।

आपने उसमें जोड़ा कितना तो 40 रूपये। तो अब आपको इस 40 पर ही टैक्स पे करना है न कि 150 पर। इसीलिए 40 का 10 परसेंट 4 रूपये होता है।

और आपको मात्र 4 रूपये सरकार को देने हैं। यहीं VAT है। इसे निकालने का सीधा सा फॉर्मूला है।

VAT = Output tax liability – इनपुट टैक्स क्रेडिट

Basics of GST and VAT Formula

🔹 इस फॉर्मूला के हिसाब से भी देखें तो output tax liability 14 रूपये था जबकि इनपुट टैक्स क्रेडिट जो कि पहले ही पे कर दिया गया है। वो 10 रूपये था।

इसीलिए जब आप VAT निकालेंगे तो निकलेगा 14 – 10 = 4 रूपये। ये 4 रूपये आपको बस एक्साइज़ टैक्स के रूप में पे करना है जबकि टोटल कीमत देखें तो 154 रूपये हो गया।

🔹🔹 मान लीजिये कि 36 रुपया रिटेलर इसमें से फायदा लेगा तो इसकी कीमत 190 रूपये हो गया। और हमने अब तक कुल 14 रूपये टैक्स चुकाए हैं। 10 रूपये पहले चरण में और 4 रूपये दूसरे चरण में।

अब तीसरे चरण की बात करते हैं। 190 रूपया जो कीमत हुआ है चूंकि 14 रूपये उसमें पहले ही जुड़ चुका हैं। इसलिए अब जो इसपे टैक्स लगेगा वो सिर्फ 176 रुपये पर ही लगेगा।

अब यहाँ भी 10 प्रतिशत टैक्स लगेगा। इसीलिए इसकी अंतिम कीमत हो गयी 176+17.6 = 193.6 रुपया।

अब यहाँ 17.6 रूपये जो हैं वो output tax liability है। वहीं अब तक जो टैक्स चुका चूकें हैं, जो कि 14 रुपया है वो है इनपुट टैक्स क्रेडिट,

इसीलिए VAT = output tax liability – इनपुट टैक्स क्रेडिट; 17.6 – 14 = 3.6 रूपये। यानी कि यहाँ पर आपको कुल 3.6 रूपये ही चुकाने पड़ेंगे।

🔹 वैसे भी अगर आप देखेंगे तो दूसरे चरण में उनकी कीमत थी 154 रूपये और उसमें जो वैल्यू एड किया गया था। वो था 36 रूपये। और वैल्यू एडेड टैक्स का मतलब ही होता है। वैल्यू जो उसमें जोड़ा गया है उस पर लगने वाला कर।

यहाँ वो 36 रूपये है और 36 का 10 प्रतिशत निकाले तो वो होता है 3.6 रूपये। इसी को कहते हैं VAT सिस्टम।

💠 अब दोनों में आपको फर्क पता चल गया होगा। सिंगल पॉइंट टैक्स सिस्टम वाले केस में देखें तो वहाँ तीन चरण के बाद जो अंतिम उत्पाद की कीमत थी वो थी 220 रूपये,

जबकि उसमें भी तीनों स्तर पर 10 प्रतिशत टैक्स ही लगाया गया था। वहीं VAT वाले केस में देखें तो यहाँ भी तीनों स्तर पर 10 प्रतिशत कर ही लगाया गया है।

पर यहाँ अंतिम उत्पाद की कीमत मात्र 193.6 रूपये ही है। मतलब कि लगभग 26 रूपये का अंतर। और ये अंतर क्यों आया क्योंकि टैक्स पर टैक्स लगने वाली सिस्टम खत्म हो गयी।

यानी कि कैस्केडिग इफैक्ट खत्म हो गया। और ये जो 26 रूपये की कमी आई है। उसका फायदा भी जनता को ही मिलेगा। अब आप समझ गए होंगे कि VAT क्यों लाया गया था।

💠अगर आप VAT समझ गए हैं तो जीएसटी समझना फिर आसान है क्योंकि VAT का ही बड़ा भाई है जीएसटी।

अब आपके मन में ये सवाल आ सकता है कि जब वैट इतना अच्छा था, इसमें कैस्केडिंग इफैक्ट खत्म हो गया था। वस्तु की कीमते कम हो गयी थी।

तो फिर इसे जीएसटी में क्यों बदला गया। तो इसका जवाब ये है कि VAT लगने के बाद भी कुछ खामियाँ थी टैक्स सिस्टम में, जिसे VAT भी ठीक नहीं कर सकता था।

अगर कोई सिस्टम इसे ठीक कर सकता था तो वो था जीएसटी।

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