बॉन्ड मार्केट : अर्थ, प्रकार एवं विशेषताएँ। Bond market in hindi

शेयर की तरह बॉन्ड भी पूंजी उगाहने का एक तरीका है। इसकी खरीद-बिक्री वाले मार्केट को बॉन्ड मार्केट कहा जाता है।

इस लेख में हम बॉन्ड मार्केट (Bond market) के बारे में सरल और सहज चर्चा करेंगे एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझेंगे।

नोट – अगर आप शेयर मार्केट के बेसिक्स को ज़ीरो लेवल से समझना चाहते हैं तो आपको पार्ट 1 से शुरुआत करनी चाहिए।

बॉन्ड मार्केट

| बॉन्ड मार्केट की पृष्ठभूमि

प्रतिभूतियों (securities) को तीन भागों में बांटा जा सकता है – (1) इक्विटि प्रतिभूतियां (Equity securities), (2) डेट प्रतिभूतियां (Debt securities) और (2) डेरिवेटिव्स प्रतिभूतियां (Derivatives securities)। इसे आप नीचे दिये गए चार्ट में देख सकते हैं;

शेयर मार्केट

इक्विटि प्रतिभूति (Equity security) और डेरिवेटिव्स प्रतिभूति (Derivatives securities) पर अलग से लेख मौजूद है। इस लेख में हम डेट प्रतिभूतियों (Debt securities) में से एक बॉन्ड (Bond) और थोड़ा बहुत डिबेंचर (Debentures) के बारे में चर्चा करेंगे।

इस चार्ट के माध्यम से इतना तो समझ सकते हैं कि बॉन्ड एक डेट प्रतिभूति (Debt security) है यानी कि ये ऋण या उधारी आदि से संबन्धित है। बॉन्ड मार्केट में इसी ऋण का कारोबार होता है। बिलकुल वैसे ही जैसे शेयर बाज़ार में शेयर का कारोबार होता है।

किसी भी कंपनी या संस्थान के पास मुख्यतः दो तरीके होते हैं मार्केट से पैसा उगाही करने के लिए। एक तो शेयर या बॉन्ड जारी करके जरूरत मुताबिक पैसे का बंदोबस्त किया जा सकता है और नहीं तो बैंक से लोन (loan) लेकर।

यहाँ बैंक लोन के बारे में थोड़ा सा जान लेते हैं – बैंक का इंटरेस्ट रेट अक्सर काफी ज्यादा होता है और इससे जुड़े सारे नियम-कानून बैंक वाले ही तय करते हैं। लोन लेने के साथ ही EMI शुरू हो जाता है और सबसे बड़ी बात ये कि इसकी ट्रेडिंग नहीं की जा सकती है जैसे कि शेयर की ट्रेडिंग होती है। इतना इसीलिए बताया क्योंकि यही सब वो कारण है जो बॉन्ड को प्रासंगिक (Relevant)बनाता है। बॉन्ड में यही सब झंझट नहीं होता है।

[वैसे अगर आप विस्तार से बैंक लोन और बॉन्ड के मध्य अंतर को समझना चाहते हैं तो दिये गए लिंक से समझ सकते हैं। 👉 बैंक लोन और बॉन्ड में अंतर]

आइये अब बॉन्ड (Bond) को थोड़ा विस्तार से इंडिया के परिपेक्ष्य में समझते हैं। हालांकि पूरी दुनिया के लिए बॉन्ड का मूल कॉन्सेप्ट वही है बस उसमें नीतिगत या संस्थागत बदलाव आ सकते हैं।

| बॉन्ड क्या है? (what is Bond)

बैंक लोन की तरह बॉन्ड भी एक प्रकार का लोन ही है लेकिन यहाँ पर ये लोन बैंक न देकर जनता देता है इसीलिए इस बाज़ार को इसे ऋण बाज़ार या क्रेडिट बाज़ार भी कहा जाता है।

दूसरे तरीके से समझे तो बॉन्ड एक वित्तीय उपकरण (Financial instruments) है जो किसी कंपनी या सरकार द्वारा बाज़ार से पैसा इकट्ठा करने के लिए जारी किया जाता है। जिस प्रकार से कोई कंपनी शेयर जारी करता है उसी प्रकार से बॉन्ड भी जारी कर सकता है ये भी उसी प्रकार से स्टॉक एक्स्चेंज से संबन्धित होता है जैसे कि शेयर।

| बॉन्ड की विशेषताएँ क्या है?

◾ जब पहली बार कोई कंपनी शेयर जारी करता है और लोग सीधे उस कंपनी से उस शेयर को खरीदते है तो उसे प्राथमिक बाज़ार कहते हैं। इसी प्रकार से जब कोई कंपनी या सरकार बॉन्ड जारी करता है और लोग उसे सीधे उसी से खरीदते है तो उसे भी प्राथमिक बाज़ार कहा जाता है।

◾ जब लोग आपस में ही शेयरों की खरीद-बिक्री करने लगते हैं तो उसे द्वितीयक बाज़ार कहते हैं उसी प्रकार से जब बॉन्ड को भी लोग आपस में ही खरीद बिक्री करने लगे है तो उसे द्वितीयक बाज़ार कहते हैं।

◾ बॉन्ड का मूल्य भी उसी तरह से घटता-बढ़ता रहता है जिस तरह से शेयर का। क्योंकि अंतत: ये भी कंपनियों या सरकारों के परफ़ोर्मेंस तथा मांग और पूर्ति पर निर्भर करता है। बस दोनों में एक मुख्य अंतर ये है कि जब आप किसी कंपनी का शेयर खरीदते है तो आप उस कंपनी में हिस्सेदारी खरीदते है वहीं अगर बॉन्ड खरीदते है तो आपको उस कंपनी में हिस्सेदारी नहीं मिलती है। तो फिर सवाल आता है कि क्या मिलता है?

◼ आप खुद ही सोचिए अगर आप किसी को पैसे देंगे तो आपको क्या चाहिए होगा – जाहिर है आपको इंटरेस्ट (interest) चाहिए होगा। यही बात तो यहाँ भी लागू होता है। क्योंकि जब कोई कंपनी या सरकार बॉन्ड जारी करती है तो आप उसे खरीदते है यानी कि आप कंपनी या सरकार को लोन दे रहे हैं। इसीलिए कंपनी या सरकार आपको इंटरेस्ट देती है। लेकिन ये इंटरेस्ट एकदम फ़िक्स्ड होता है जो कि आपको एक निश्चित अवधि में मिलता है। आइये इसे उदाहरण से समझते हैं।

| बॉन्ड मार्केट का उदाहरण

मान लीजिए कि आपने किसी कंपनी या सरकार से 10,000 रुपए का एक बॉन्ड 5 साल की अवधि के लिए खरीदा है और कंपनी ने आपको उसपर 10 प्रतिशत ब्याज देने का वादा किया है तो हर महीने के अंत में आपको 1000 रुपए मिल जाएगा (क्योंकि 10000 का 10 प्रतिशत 1000 होता है) इसे कूपन कहा जाता है। जब आपकी 5 साल की अवधि पूरी हो जाएगी तो आपको वो 10,000 रुपया लौटा दिया जाएगा। इसी तरह से बॉन्ड मार्केट (Bond market) काम करता है।

◾ अगर मार्केट में बॉन्ड की कीमत बढ़ जाती है तो आप उसे बेच भी सकते हैं। बिलकुल शेयर की तरह।

लेकिन यहाँ पर एक बात याद रखिए कि अगर आपने 10,000 रुपए का बॉन्ड लिया है और कुछ समय बाद उस बॉन्ड की कीमत 20,000 रुपए हो जाती है और अगर आप उसे बेचते नहीं है तो ये मत सोचिएगा कि आपको अब 20000 रुपए का 10 परसेंट यानी कि 2000 रुपए हर महीने मिलने लग जाएगा।

बॉन्ड का मार्केट रेट कितना भी क्यों न बढ़ जाये आपको मिलेगा 1000 रुपए ही क्योंकि ये पहले से ही फ़िक्स्ड है और ये इसकी एक खासियत है कि लोग इसमें पैसा लगाते हैं। क्योंकि मान लीजिये कि अगर उस 10,000 रुपए वाले बॉन्ड का मार्केट रेट गिरकर 5000 रुपए हो जाता है तब भी आपको 1000 रुपए पहले की तरह मिलता रहेगा। इसीलिए तो बॉन्ड को सुरक्षित निवेश माना जाता है क्योंकि इसी की जगह पर अगर शेयर होता और उसका मार्केट वैल्यू गिर जाता तो आपको लॉस से कोई नहीं बचा पाता।

| बॉन्ड कितने प्रकार के होते हैं?

आमतौर पर बॉन्ड को दो प्रकारों में बांटा जाता है एक सरकारी बॉन्ड (Government bond) और दूसरा कॉर्पोरेट बॉन्ड (Corporate bond)

| सरकारी बॉन्ड (Government bond)

वे बॉन्ड है जो किसी न किसी प्रकार के सरकार द्वारा जारी किया जाता है। जैसे कि –

केंद्र सरकार द्वारा जारी किया गया बॉन्ड (Central Government bonds) – इसे केंद्र सरकार द्वारा आमतौर पर राजकोषीय घाटे (Fiscal deficit) को बैलेन्स करने के लिए जारी किया जाता है। इसे केंद्र सरकार के लिए RBI जारी करता है। ये काफी सुरक्षित माना जाता है क्योंकि केंद्र सरकार द्वारा जो जारी किया जाता है।

राज्य सरकार द्वारा जारी किया गया बॉन्ड (State Government bonds) – इसे राज्य सरकार द्वारा आमतौर पर राजकोषीय घाटे को बैलेस करने के लिए जारी किया जाता है। ये सारे बॉन्ड स्टॉक एक्स्चेंज (Stock exchange) में लिस्टेड होता है।

नगर निगम और स्थानीय प्राधिकरण द्वारा जारी बॉन्ड (Municipal and Local authority bonds) – इसे नगरपालिका या इसी के जैसे स्थानीय शासन द्वारा जारी किया जाता है। इसे आमतौर पर कुछ खास लक्ष्यों को पूरा करने के लिए जारी किया जाता है जैसे कि रोड, वॉटर सप्लाय इत्यादि।

सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा जारी बॉन्ड (Public Sector bonds) – इसे भी एक प्रकार का सरकारी बॉन्ड ही है क्योंकि इसे सरकारी कंपनियों द्वारा जारी किया जाता है जैसे कि NTPC और BHEL इत्यादि। इन कंपनियों का सबसे बड़ा शेयर होल्डर आमतौर पर सरकार ही होता है।

कर मुक्त बॉन्ड (Tax free bond) – ये भी सरकारी उपक्रमों द्वारा जारी किया जाता है जैसे कि National Highways Authority of India (NHAI), Indian Railways Finance Corporation, HUDCO, आदि। इसमें दूसरे बॉन्डों से अंतर बस इतना है कि इसमें जो इंटरेस्ट (interest) मिलता है उस पर टैक्स नहीं लगता है।

| कॉर्पोरेट बॉन्ड (Corporate bond)

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है ये गैर-सरकारी कंपनियों द्वारा जारी किया जाता है। शेयर के जैसे इसमें कंपनियों में हिस्सेदारी तो नहीं मिलती है लेकिन इसमें एक निश्चित ब्याज जरूर मिलता है। कॉर्पोरेट बॉन्ड आमतौर पर दो प्रकार के होते हैं।

1. Convertible bonds – इस बॉन्ड की खासियत ये है कि आप इसे चाहे तो शेयर में भी कन्वर्ट कर सकते हैं। 2.Non-Convertible bonds इस बॉन्ड को आप कन्वर्ट नहीं कर सकते है।

ये जो बॉन्ड होते हैं ये आमतौर पर सरकार द्वारा ही जारी किया जाता है। आप खुद ही सोचिए कि कंपनीयां शेयर जारी कर सकता है क्योंकि वो अपने कंपनी में हिस्सेदारी बेच सकता है लेकिन सरकार ये कैसे करेगा? सरकार अपना शेयर कैसे बेचेगा क्योंकि ऐसा तो हो नहीं सकता है कि सरकार शेयर जारी करें और हिस्सेदारी के तौर पर कोई मंत्रिपद किसी को दे दे। इसीलिए आप गौर कीजियेगा कि बॉन्ड ज्यादा सरकार जारी करता है जबकि शेयर ज्यादा कंपनी।

👉 इसी से मिलता जुलता एक कान्सैप्ट है डिबेंचर (Debentures)। ये बॉन्ड के रूप में बिलकुल शेयर वाली फील देता है। बॉन्ड और डिबेंचर को विस्तार से जानने के लिए दिए गए लिंक को क्लिक करें

| डेट फंड की मूल विशेषताएं (Basic features of debt fund)

नियमित भुगतान (Regular payouts) डेट फंड (Debt fund) में निवेश करने पर आमतौर पर आपको नियमित ब्याज भुगतान मिलता है। कई लोग तो इसे आय की नियमितता (Regularity of income) के लिए ही पसंद करते हैं।

कम जोखिम (Low risk) डेट फंड में जोखिम कम होता हैं, ब्याज की रकम तय होती है तथा निवेश किया गया मूलधन एक निश्चित समय पर वापस कर दिया जाता है।

कम वापसी (Low return)अब अगर कम जोखिम है तो जाहिर है रिटर्न भी कम ही मिलेगा है। कुल मिलाकर ये उन लोगों के लिए आदर्श हैं जो उच्च रिटर्न पर सुरक्षा को अधिक महत्व देते हैं।

⚫ उम्मीद है बॉन्ड मार्केट (Bond market) आपको समझ में आया होगा, शेयर मार्केट से जुड़े कुछ अन्य लेख नीचे दिये जा रहे हैं जैसे कि डेरिवेटिव्स, बीमा, म्यूचुअल फ़ंड आदि। उसे भी जरूर समझें।

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| शेयर मार्केट सिरीज़

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Article Based on,
अर्थव्यवस्था – रमेश सिंह
ncert textbook,
Bond fund – Wikipedia
Debt Funds
Bond market – Wikipedia
youtube lectures Etc.

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