इस लेख में हम केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंध (Center-State Administrative Relations) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझेंगे,

तो अच्छी तरह से समझने के लिए इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें, साथ ही इससे संबन्धित अन्य लेखों को भी पढ़ें।

एक संघीय व्यवस्था वाले देश में केंद्र एवं राज्य के मध्य कई प्रकार के संबंध हो सकते हैं, प्रशासनिक संबंध उन्ही में से एक है।

केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंध

केंद्र-राज्य संबंध (Center-state relationship)

? जैसा कि हम जानते है कि भारत का संविधान अपने आप में संघीय व्यवस्था वाला है। और संघीय व्यवस्था शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत पर आधारित होता है। जिसका मतलब है कि संविधान द्वारा प्रदत सारी की सारी शक्तियाँ जैसे कि विधायी, कार्यपालक और वित्तीय शक्तियाँ केंद्र और राज्यों के मध्य विभाजित है। केंद्र-राज्य का संबंध इसी पर आधारित होता है।

केंद्र-राज्य संबंध का वर्गीकरण

अध्ययन की दृष्टि से देखें तो केंद्र और राज्य के सम्बन्धों को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता हैं;

1. विधायी संबंध (Legislative relationship) 
2. प्रशासनिक संबंध (Administrative relations)
3. वित्तीय संबंध (Financial relations)

हमने पहले वाले लेख में केंद्र और राज्य के मध्य विधायी संबन्धों↗️ को समझा। अगर आपने उस लेख को नहीं पढ़ा है तो पहले उस लेख को पढ़ लें ताकि चीज़ें एकदम स्पष्ट रहें। इस लेख में हम केंद्र और राज्य के मध्य प्रशासनिक संबंधों (Center-State Administrative Relations) की चर्चा करेंगे। 

प्रशासनिक संबंध (Administrative relations) 

संविधान के भाग 11 में अनुच्छेद 256 से 263 तक केंद्र व राज्य के बीच प्रशासनिक सम्बन्धों की व्याख्या की गयी है। आप नीचे के तस्वीर में केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंध से संबन्धित अनुच्छेदों को देख सकते हैं। हालांकि इसके अलावे भी संविधान या संविधान के बाहर ऐसे उपबंध है जो कि केंद्र एवं राज्य के मध्य प्रशासनिक संबन्धों का निर्धारण करते हैं, हम उसकी भी चर्चा करेंगे।

केंद्र राज्य संबंध

कार्यकारी शक्तियों का बंटवारा (Sharing of executive powers)

हमने केंद्र-राज्य के विधायी संबंध में जाना था कि किस प्रकार से तीन सूचियाँ बनाकर केंद्र और राज्य के विधायी विषयों को अलग-अलग कर दिया गया है।

अब जैसे संघ सूची के विषयों पर केंद्र विधान बना सकता है तो उस विधान को क्रियान्वित करने के लिए केंद्र उस विधान पर प्रशासन भी तो कर सकता है। इस आधार पर देखें तो हम पहले से जानते हैं कि केंद्र के पास विधान बनाने के लिए राज्य की अपेक्षा बहुत ही ज्यादा विषय है, तो जाहिर है केंद्र की कार्यपालक या प्रशासनिक शक्तियाँ भी राज्य से ज्यादा होंगी। और है भी। केंद्र की प्रशासनिक शक्तियाँ सम्पूर्ण भारत में फैली हैं, जबकि राज्य की कार्यपालक शक्ति बस उसकी सीमा के अंदर तक।

दूसरी बात ये कि समवर्ती सूची सूची के विषयों पर दोनों कानून बना सकता है तो दोनों उस आधार पर प्रशासन भी कर सकता है। हालांकि संसद चाहे तो कार्यकारी शक्तियों को राज्य को भी निदेशित कर सकता है।

केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंध का वर्गीकरण

समझने में आसानी हो इसके लिए हम केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंध को चार भागों में बाँट लेते हैं।

1. राज्य के प्रशासन पर केंद्र का नियंत्रण
2. केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंधों के सहयोगात्मक पहलू
3. केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंधों के संविधानेत्तर युक्तियाँ
4. केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंधों के अन्य उपबंध

1. राज्य के प्रशासन पर केंद्र का नियंत्रण

अनुच्छेद 256 राज्यों की और संघ की बाध्यता से संबन्धित है जिसमें मुख्य रूप से दो बातें कही गई है

(1) संसद द्वारा निर्मित किसी भी कानून का राज्य अवमानना नहीं करेगा। यानी कि संसद द्वारा निर्मित कानून को मानने के लिए राज्य बाध्य है। और,

(2) दूसरी बात ये कि राज्य, केंद्र की कार्यपालक शक्तियों को कभी बाधित नहीं करेगा और उसके संबंध में कोई पूर्वाग्रह (Prejudice) नहीं रखेगा।

इस प्रकार से देखें तो ये दो प्रतिबंध है जो राज्य पर लागू होता है। राज्य का ये दायित्व है कि इसका पालन वो करें। वहीं दूसरी तरफ केंद्र का भी ये दायित्व है कि वो इसका पालन राज्य से करवाएँ ।

अगर राज्य, केंद्र द्वारा बनाए गए क़ानूनों की अवमानना करता है या फिर उसे लागू करने से मना करता है, तो अनुच्छेद 365 के तहत ये पर्याप्त कारण होगा कि केंद्र वहाँ अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगा सकता है और सारी शक्तियाँ अपने हाथों में ले सकता है। (यहाँ से पढ़ें – राज्य आपातकाल)

आपातकाल के दौरान केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंध

1. राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 352 से केंद्र को ये अधिकार मिल जाता है कि वह किसी भी विषय पर राज्य या राज्यों को निर्देशित कर सकता है। इस प्रकार की स्थिति में राज्य पूर्णतया केंद्र के नियंत्रणाधीन हो जाते हैं। हालांकि उन्हे निलंबित (suspended) नहीं किया जाता। 

2. राष्ट्रपति शासन के दौरान जिसका की उल्लेख अनुच्छेद 356 में किया गया है; राज्य की समस्त कार्यकारी शक्तियाँ राष्ट्रपति के पास आ जाती है। राष्ट्रपति के पास आने का मतलब हुआ केंद्र के पास आ गया, क्योंकि राष्ट्रपति तो केंद्र के सलाहनुसार ही काम करता है।

अनुच्छेद 355 के अंतर्गत केंद्र का ये कर्तव्य बनता है कि,
1. बाह्य आक्रमण एवं आंतरिक अशांति से प्रत्येक राज्य की संरक्षा करे और 

2. यह सुनिश्चित करना कि प्रत्येक राज्य की सरकार संविधान की व्यवस्थाओं के अनुरूप कार्य कर रही है या नहीं। 

3. वित्तीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 360 से केंद्र को ये अधिकार मिल जाता है कि वित्तीय परिसम्पत्तियों के अधिग्रहण हेतु राज्यों को निर्देशित कर सकता है। तथा राष्ट्रपति चाहे तो, राज्य में कार्यरत सभी सरकारी कर्मचारियों एंव उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन में कटौती करने का आदेश दे सकता है। 

एकीकृत न्याय व्यवस्था (Unified justice system)

वैसे तो भारत में दोहरी राजनीतिक व्यवस्था अपनायी गयी है लेकिन न्यायिक प्रशासन के मामले में द्वैध नीति नहीं है। दूसरे शब्दों में कहें तो एकीकृत न्याय व्यवस्था की स्थापना की गयी है।

इसमें उच्चतम न्यायालय सर्वोच्च स्तर पर एवं उच्च न्यायालय इसके नीचे आते है तथा जिला एवं सत्र न्यायालय इस उच्च न्यायालय के नीचे आते हैं।

यह एकल व्यवस्था ही केंद्र एवं राज्य दोनों के विधानों का अनुपालन सुनिश्चित करती है। हालांकि यह व्यवस्था पारस्परिक टकराव एवं भ्रांति को समाप्त करने हेतु अपनायी गयी है लेकिन कुल मिलाकर शक्तियों का संकेंद्रण केंद्र में ही होता है।

राज्यों को केंद्र के निर्देश (Center instructions to states)

अनुच्छेद 257, कुछ दशाओं में राज्यों पर संघ का नियंत्रण स्थापित करता है। इसके तहत केंद्र, राज्य को निम्नलिखित मामलों पर अपनी कार्यकारी शक्तीयों के प्रयोग के लिए निर्देश दे सकता है:-

1. संचार के साधनों को बनाए रखें व उनका रख-रखाव करें,
2. राज्य में रेलवे संपत्ति की रक्षा करें, 
3. प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर राज्य से संबन्धित भाषायी अल्पसंख्यक समूह के बच्चों के लिए मातृभाषा सीखने की व्यवस्था करें,
4. राज्य में अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के लिए विशेष योजनाएँ बनाए और उनका क्रियान्वयन करें। 

हालांकि संचार साधनों या रेल के संरक्षण के लिए केंद्र द्वारा दिये गए किसी निदेश के पालन में अगर अतिरिक्त खर्चा आता है तो भारत सरकार उस अतिरिक्त राशि का वहाँ राज्य को केरेगा।

2. केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंधों के सहयोगात्मक पहलू

ऐसे कई क्षेत्र हैं जहां केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंधों (Center-state administrative relations) में परस्पर सहयोग देखने को मिलता है, जैसे कि;

अखिल भारतीय सेवाएँ (All India Services)

ये सार्वजनिक केन्द्रीय सेवाएं हैं। इसके अधिकारी केंद्र और राज्यों के अंतर्गत उच्च पदों पर अपनी सेवाएं प्रदान करते हैं। परंतु इनकी नियुक्ति और प्रशिक्षण केंद्र द्वारा किया जाता है। 

वर्तमान में तीन अखिल भारतीय सेवाएं है – (1) आईएएस (2) आईपीएस (3) आईएफ़एस

इन अधिकारियों पर पूर्ण नियंत्रण तो केंद्र का ही रहता है, लेकिन जब तक ये अधिकारी किसी राज्य कैडर के अंतर्गत काम करते हैं; तात्कालिक नियंत्रण राज्य सरकार के पास होता है।

इस प्रकार देखें तो केंद्र और राज्य दोनों इन अधिकारियों को संयुक्त रूप से नियंत्रित करते हैं। लेकिन चूंकि इन पर अंतिम नियंत्रण केंद्र का होता है, इसलिए ऐसा कहा जाता है कि अखिल भारतीय सेवाएं राज्य के स्वायत्ता (Autonomy) का उल्लंघन करती है; पर निम्न आधारों पर इसका समर्थन भी किया जाता है-

1. केंद्र एवं राज्य में उच्च स्तरीय प्रशासन के रख-रखाव के लिए,
2. पूरे देश मे प्रशासनिक एकीकरण की व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए,
3. केंद्र-राज्य के सामूहिक हितों के संबंध में सहयोग एवं संयुक्त कार्यों में। 

राज्य लोक सेवा आयोग (State Public Service Commission)

वैसे संविधान ने राज्यों को ये अधिकार दिया है कि वे स्वयं का लोक सेवाओं का गठन करें। राज्यों के पास अपना लोक सेवा आयोग है भी।

किसी भी राज्य में राज्य लोक सेवा के अधिकारी और संघ लोक सेवा के अधिकारी एक साथ परस्पर सहयोग के भावना से कार्य करते हैं।

लोक सेवा आयोग के संदर्भ में केंद्र-राज्य संबंध निम्नलिखित है;

(1) राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों नियुक्ति करते तो राज्यपाल ही है लेकिन उन्हे हटाने का काम राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।

(2) संसद चाहे तो दो राज्यों को मिलाकर संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग का गठन कर सकती है पर ऐसा संबन्धित राज्यों के विधानमंडल के अनुरोध पर किया जा सकता है। इसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है। (यहाँ से पढ़ें – राज्य लोक सेवा आयोग एवं संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग)

(3) राज्यपाल के अनुरोध पर एवं राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) राज्य की आवश्यकतानुसार कार्य कर सकता है। (विशेष जानकारी के लिए इसे पढ़ें – UPSC)

राष्ट्रपति और राज्यपाल के स्तर पर कार्यकारी कार्य

जैसा कि हम जानते है कि भारत संघीय राज्य है और यहाँ का संविधान इस बात का इजाजत बिलकुल भी नहीं देता है कि केंद्र अपनी विधायी शक्तियाँ राज्य को दें और वहीं, इकलौता राज्य भी चाहे तो केंद्र को उसके लिए कानून बनाने के लिए नहीं कह सकती। ऐसी स्थिति में टकराव की स्थिति उत्पन्न न हो इसके लिए राष्ट्रपति और राज्यपाल की भूमिका यहाँ बढ़ जाती है। 

अनुच्छेद 258 के तहत राष्ट्रपति, राज्य सरकार की सहमति पर केंद्र के किसी कार्यकारी कार्य को उसे सौंप सकता है।

लेकिन किसी खास परिस्थिति में केंद्र, राज्यों की बिना सहमति के भी ऐसा कर सकती है। ऐसे काम संसद द्वारा किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, केंद्र, संघीय सूची के विषय पर संसद द्वारा बनाया गया कानून जैसे कि ‘शक्तियों का आवंटन एवं करारोपन का अधिकार‘ राज्य को उसकी सहमति के बिना दे सकता है।जबकि यहीं कार्य राज्य नहीं कर सकता।

इसी तरह अनुच्छेद 258क के तहत एक राज्य का राज्यपाल, केंद्र की सहमति पर उसके कार्य को राज्य में कराता है। आपसी समझौते का यह मामला कभी सशर्त तो कभी बिना शर्त के चलता रहता है।  

▶ राज्यों के राज्यपालों को राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है। उसका कार्यकाल राष्ट्रपति की दया पर निर्भर करता है।

राज्य का संवैधानिक अध्यक्ष होने के अतिरिक्त राज्यपाल केंद्र के एजेंट के रूप में कार्य करता है। वह राज्य के प्रशासनिक मामलों की रिपोर्ट समय-समय पर केंद्र को देता है। इस तरह कह सकते हैं कि राज्यपाल केंद्र और राज्य के बीच एक पुल का काम करती है।

जल संबंधी विवाद

अनुच्छेद 262 – अंतर्राज्यीय नदियों या नदी-दूनों के जल संबंधी विवादों का न्यायनिर्णयन

संसद, किसी अंतर्राज्यीय नदी या नदी घाटी के पानी के प्रयोग, वितरण और नियंत्रण के संबंध में किसी विवाद या शिकायत पर न्याय निर्णयन दे सकती है। 

इस तरह के मामलों में संसद के पास ये शक्ति होती है कि वे विधि द्वारा ऐसा उपबंध कर सकता है कि उच्चतम न्यायालय या कोई अन्य न्यायालय इस तरह के मामलों में अपनी अधिकारिता का प्रयोग न करें।

[इस संबंध में विशेष जानकारी के लिए राज्य और राज्य के बीच के संबंध को पढ़ें]

राज्यों के बीच समन्वय (Coordination between states)

अनुच्छेद 263 के तहत राष्ट्रपति, केंद्र व राज्य के बीच सामूहिक महत्व के विषयों की जांच व बहस के लिए अंतर्राज्यीय परिषद का गठन कर सकता है। राज्यों के बीच अगर विवाद उत्पन्न हो गए हों तो उनकी जांच करने और उन पर सलाह देने के लिए भी ऐसी परिषद का गठन किया जा सकता है।

3. केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंधों के संविधानेत्तर युक्तियाँ

उपरोक्त वर्णित संवैधानिक युक्तियों के अतिरिक्त केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंधों (center-state administrative relations) को और पुष्ट करने हेतु कई अन्य संविधानेत्तर युक्तियाँ भी है।

इनमें बड़ी संख्या में परामर्शदात्री निकाय (Consulting body) एवं केंद्र के स्तर पर आयोजित सम्मेलन आदि शामिल है, जैसे कि –

गैर-संवैधानिक परमर्शदात्री निकाय (Non-constitutional consultative body)

गैर-संवैधानिक परमर्शदात्री निकायों में शामिल है – नीति आयोग, राष्ट्रीय विकास परिषद, राष्ट्रीय एकता परिषद, केन्द्रीय स्वास्थ्य परिषद, केन्द्रीय स्थानीय शासन एवं शहरी विकास परिषद, क्षेत्रीय परिषदें, उत्तर पूर्व परिषद, केन्द्रीय भारतीय चिकित्सा परिषद, परिवहन विकास परिषद, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग इत्यादि। 

संविधानेत्तर सम्मेलन (Extra-constitutional convention)

केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंधों (center-state administrative relations) के विकास हेतु या तो वार्षिक या आवश्यकतानुसार विभिन्न विषयों पर विचार विमर्श किया जाता है।

ये विषय इस प्रकार है – राज्यपालों का सम्मेलन (जिसकी अध्यक्षता राष्ट्रपति करता है), मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन (जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करता है), मुख्य सचिवों का सम्मेलन (जिसकी अध्यक्षता कैबिनेट सचिव करता है), पुलिस महानिदेशकों का सम्मेलन, मुख्य न्यायाधीशों का सम्मेलन, कुलपतियों का सम्मेलन, गृह मंत्रियों का सम्मेलन, विधि मंत्रियों का सम्मेलन इत्यादि।

4. केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंधों के अन्य उपबंध

अनुच्छेद 261 – सार्वजनिक कार्य, अभिलेख और न्यायिक कार्यवाहियाँ

भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र, संघ के और प्रत्येक राज्य के सार्वजनिक कार्यों, अभिलेखों और न्यायिक कार्यवाहियों को पूरा विश्वास और पूरी मान्यता दी जाएगी।

▶ इसके अलावा भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग में सिविल न्यायालयों द्वारा दिये गए अंतिम निर्णयों या आदेशों का उस राज्यक्षेत्र के भीतर कहीं भी विधि के अनुसार निष्पादन किया जा सकेगा।

अनुच्छेद 260 – भारत के बाहर के राज्यक्षेत्रों के संबंध में संघ की अधिकारिता

भारत सरकार किसी ऐसे राज्यक्षेत्र की सरकार से, जो भारत के राज्यक्षेत्र का भाग नहीं है, करार करके ऐसे राज्यक्षेत्र की सरकार में निहित कार्यपालक, विधायी या न्यायिक कृत्यों का भार अपने ऊपर ले सकेगी, किन्तु प्रत्येक ऐसा करार विदेशी अधिकारिता के प्रयोग से संबन्धित तत्समय प्रवृत किसी विधि के अधीन होगा और उससे शासित होगा।

कुल मिलाकर यही है केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंध (Center-State Administrative Relations), उम्मीद है समझ में आया होगा। इसके अगले भाग का लिंक दिया जा रहा है उसे भी अवश्य पढ़ें।

केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध
Center-State Financial Relations

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