Center-State Financial Relations in hindi । केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध

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इस लेख में हम केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध (Center-State Financial Relations) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने का प्रयास करेंगे।
Center-State Financial Relations

केंद्र-राज्य संबंध (Center-state relationship)

🔷 जैसा कि हम जानते है कि भारत का संविधान अपने आप में संघीय व्यवस्था वाला है। और संघीय व्यवस्था शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत पर आधारित होता है। जिसका मतलब है कि संविधान द्वारा प्रदत सारी की सारी शक्तियाँ जैसे कि विधायी, कार्यपालक और वित्तीय शक्तियाँ केंद्र और राज्यों के मध्य विभाजित है। केंद्र-राज्य का संबंध इसी पर आधारित होता है।

केंद्र-राज्य संबंध का वर्गीकरण

अध्ययन की दृष्टि से देखें तो केंद्र और राज्य के सम्बन्धों को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता हैं;

1. विधायी संबंध (Legislative relationship) 
2. प्रशासनिक संबंध (Administrative relations)
3. वित्तीय संबंध (Financial relations)

केंद्र और राज्य के मध्य विधायी संबन्धों↗️ एवं केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंध↗️ को हमने पिछले लेखों में कवर किया है। अगर आपने उस लेख को नहीं पढ़ा है तो पहले उस लेख को पढ़ लें ताकि चीज़ें एकदम स्पष्ट रहें। इस लेख में हम केंद्र और राज्य के मध्य वित्तीय संबंधों (Center-State Financial Relations) की चर्चा करेंगे। 

केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध (Center-State Financial Relations)

जाहिर है वित्तीय संबंध के नाम से ही स्पष्ट है कि ये किसी तरह से पैसों से संबन्धित है। मूल रूप से वित्तीय संबंध केंद्र और राज्य के मध्य करों (taxes) के बंटवारे से संबन्धित है।

जैसा कि हम जानते हैं 1 जुलाई 2017 से पहले तो करों (Taxes) की कुछ और व्यवस्था थी पर जीएसटी लागू होने के बाद कर व्यवस्था में एक व्यापक सुधार आया है। इसका प्रभाव केंद्र और राज्य के मध्य वित्तीय सम्बन्धों पर भी पड़ा है।

अगर आपको जीएसटी की समझ नहीं है तो आप यहाँ क्लिक↗️ करके उसे समझ सकते हैं, इससे आप केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध (Center-State Financial Relations) को अच्छे से समझ पाएंगे।

संविधान के भाग 12 में अनुच्छेद 264 से 293 तक केंद्र और राज्य वित्तीय सम्बन्धों की चर्चा की गयी है। हालांकि इस भाग में अनुच्छेद 300क तक शामिल है जो कि संपत्ति, अधिकार, दायित्व एवं वाद आदि से संबंधित है। हम सारे महत्वपूर्ण अनुच्छेद जो इस भाग से संबन्धित है या नहीं भी है; उसकी चर्चा करेंगे।

अनुच्छेद 265 – विधि के प्राधिकार के बिना टैक्सों का अधिरोपन न किया जाना

कोई भी टैक्स विधि के प्राधिकार से ही लागू किया जा सकता है, अन्यथा नहीं। इसका मतलब ये है कि बिना कोई विधि बनाए सरकार हम पर कोई भी टैक्स नहीं लगा सकती है।

कर विषयों की सूची (List of tax subjects)

केंद्र-राज्य विधायी संबंध में हमने देखा कि अनुच्छेद 246 के तहत विधायी विषयों की तीन सूचियों की बात कही गई है, संघ सूची (Union list), समवर्ती सूची (Concurrent list) और राज्य सूची (State list)। संघ सूची की चर्चा अनुच्छेद 246(1) में, समवर्ती सूची की चर्चा अनुच्छेद 246(2) में और राज्य सूची की चर्चा अनुच्छेद 246(3) में की गई है।

इन तीनों सूचियों के तहत जितने भी विषय है उसके लिए सातवीं अनुसूची बनायी गई है। जिसमें फिलहाल संघ सूची के तहत 97 विषय, राज्य सूची के तहत 66 विषय और समवर्ती सूची के तहत 47 विषय है।

🔷 इन्ही विषयों में वे विषय भी शामिल है जिसपर केंद्र और राज्य कर (TAX) लगा सकते हैं।

▪️ संघ सूची की बात करें तो इसके लिए आप संघ सूची के विषय संख्या 82, 83, 84, 85, 86, 87, 88, 89, 90, 91, 92A, 91B, 96 और 97 देख सकते हैं।
▪️ राज्य सूची की बात करें तो इसके लिए आप राज्य सूची के विषय संख्या 46, 51, 53, 54, 55, 56, 60, 61 और 62 देख सकते हैं।
▪️ इसी तरह समवर्ती सूची की बात करें तो इसके लिए आप समवर्ती सूची के विषय संख्या 43, 44 और 47 देख सकते हैं।

🔷 संघ सूची के उपरोक्त निर्दिष्ट विषयों पर केंद्र को टैक्स लगाने का अधिकार है, राज्य सूची के उपरोक्त निर्दिष्ट विषयों पर राज्य को और समवर्ती सूची के उपरोक्त निर्दिष्ट विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों को।

जो इन तीनों सूचियों में नहीं लिखा हुआ था उस पर केंद्र को टैक्स लगाने का अधिकार है जैसे कि जब सेवा कर (service tax) का कान्सैप्ट लाया गया था तो इसपर केंद्र को ही टैक्स लगाने का अधिकार मिला था। क्योंकि ये किसी भी सूची में नहीं लिखा हुआ था।

अब जैसा कि हम जानते हैं जीएसटी (GST) आने के बाद चीज़ें एकदम से बदल गयी है। कई केन्द्रीय और राज्य के अप्रत्यक्ष कर को खत्म करके उसे जीएसटी में मर्ज कर दिया गया। इसीलिए आइये देखते हैं अब क्या स्थिति है। जीएसटी के आने से क्या सब बदलाव आया है:

नोट – यहाँ ऊपर कर विषयों की सूची के तहत जो बताया गया है उसे याद रखें, ये आगे कॉन्सेप्ट समझने में मदद करेगा।

निधियाँ – अनुच्छेद 266 और 267
अनुच्छेद 266 और 267 निधियों (Funds) के बारे में है। अनुच्छेद 266 के तहत जहां संचित निधि एवं लोक लेखा की बात की गई है वहीं अनुच्छेद 267 के तहत आकस्मिक निधि की बात की गई है। इसपर अलग से लेख उपलब्ध है आप उसे यहाँ क्लिक↗️ करके पढ़ सकते हैं। यहाँ पर इतना समझ लीजिये कि –
संचित निधि (Consolidated Fund), वो निधि है जिसे राजकोष या खजाना भी कहा जाता है। सभी मुख्य स्रोतों से प्राप्त आय को इस निधि में रखा जाता है। बजट में पारित धन की निकासी इसी से की जाती है। इसके अलावा सरकारी अधिकारियों आदि के वेतन-भत्ते इसी से दी जाती है।

लोक लेखा (Public Accounts) की बात करें तो ये वो कोष होता है जहां पर उन धनराशियों को रखा जाता है जो सरकार की आय का प्रमुख स्रोत नहीं है। ये सरकार के पास एक धरोहर एवं जमानत के रूप में रखा गया होता है। जैसे कि कर्मचारी भविष्य निधि (Employee provident fund) – ये पब्लिक का पैसा होता है जो सरकार के पास लोक लेखा में जमा होता है, समय आने पर उसे लौटना पड़ता है।

आकस्मिक निधि (Contingency Fund) की बात करें तो ये आकस्मिक परिस्थितियों के लिए होता है। जिसमें कि 500 करोड़ जमा होता है। कार्यपालिका जब चाहे इसका इस्तेमाल कर सकता है वो भी संसद से बिना पुछे।
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केंद्र और राज्यों को बीच राजस्वों का वितरण

कुल मिलाकर यहाँ से केंद्र और राज्य के वित्तीय सम्बन्धों की चर्चा शुरू होती है। आइये इसे समझते हैं।

अनुच्छेद 268 – केंद्र द्वारा उद्गृहित एवं राज्यों द्वारा संगृहीत एवं विनियोजित किए जाने वाले शुल्क

केंद्र सरकार इसे शुरू तो करती है लेकिन इस अनुच्छेद के अंतर्गत आनेवाले कर (Tax) पूरी तरह से राज्य के खाते में जाता है। केंद्र का इस पर कोई अधिकार नहीं होता है।

दूसरे शब्दों में कहें तो निम्नलिखित तरीकों से किसी राज्यक्षेत्र में केंद्र द्वारा जमा धनराशियों को भारत के संचित निधि में नहीं डाला जाता है,

🔷 विनिमय पत्रों (Letters of exchange), चेकों, वादा नोटों (Promise Notes), नीतियों, बीमा तथा शेयरों के अंतरण (Transfer of shares) पर लगने वाला स्टाम्प शुल्क (stamp duty)।
🔷 इसके साथ ही औषधीय एवं प्रसाधन की वस्तुएं, जैसे कि एल्कोहल एवं नारकोटिक्स; इस पर लगने वाले उत्पाद शुल्क (Excise duty)।

स्टाम्प ड्यूटि को तो जीएसटी के दायरे में लाने की बात भी चलती है। पर पीने योग्य एल्कोहल यानी कि शराब को तो जीएसटी के दायरे से स्थायी तौर पर बाहर रखा गया है। यानी कि हमेशा-हमेशा के लिए। ऐसा क्यूँ?

क्योंकि ये राज्य की कमाई के मुख्य स्रोतों में से एक है। वो कैसे है? आइये इसे समझ लेते हैं।

जैसे ही फैक्ट्री से शराब बनकर निकलता है, सबसे पहले तो उस पर उत्पाद शुल्क (Excise duty) लगाया जाता है। जो कि आमतौर पर 25 परसेंट से ज्यादा ही होता है।

उसके बाद जब मार्केट में बिकने के लिए जाता है तो उस पर VAT ( Value Added Tax) लगाया जाता है। जो कि 70 से 80 परसेंट तक लगा दिया जाता है। और यहाँ पर कैस्केडिंग इफैक्ट भी देखने को मिलता है। इससे होता ये है कि 30 रूपये में बनने वाली शराब की कीमत कभी-कभी 200 रूपये तक हो जाती है।

इससे राज्य को कितना फायदा होता होगा, आप खुद ही सोचिए। ऐसे में शराब को जीएसटी के दायरे में क्यूँ लाया जाएगा।

क्योंकि अगर इसपर जीएसटी लागू कर दिया जाता तो ज्यादा से ज्यादा 28 परसेंट टैक्स इसपर लगाया जा सकता था। क्योंकि अभी फिलहाल जीएसटी की मैक्सिमम लिमिट यही है।

पेट्रोल और डीजल के मामले में भी यही खेल चलता है, इसीलिए वो भी जीएसटी के दायरे से बाहर है।

❎अनुच्छेद 268 ‘क’सेवा कर(Service tax)

88वां संविधान संशोधन 2003 द्वारा सेवा कर (Service tax) को लागू किया गया। जैसे कि अभी आप इस आर्टिकल को पढ़ रहें हैं। ये एक प्रकार का सेवा है जो मैं आपको प्रोवाइड कर रहा हूँ।

पहले इस टैक्स का संग्रहण तो राज्य करता था, पर ये बंटता केंद्र और राज्य दोनों में था। पर चूंकि अब जीएसटी व्यवस्था लागू है और उसका तो नाम ही है वस्तु एवं सेवा कर (goods and services Tax)। मतलब ये कि अनुच्छेद 268 ‘क’ 101वें संविधान संशोधन अधिनियम 2016 के तहत खत्म हो गया है क्योंकि अब ये जीएसटी का हिस्सा है।

अनुच्छेद 269संघ द्वारा उद्गृहित एवं संगृहीत किन्तु राज्यों को सौंपे जाने वाले कर

ये अनुच्छेद, अंतर्राज्यीय व्यापार और वाणिज्य में क्रय-विक्रय से संबन्धित कर के बारे में है। लेकिन चूंकि 2017 से जीएसटी लागू है इसीलिए इस प्रावधान में कुछ संशोधन किया गया है। एक नया अनुच्छेद 269क भी बनाया गया है जिसे कि IGST के नाम से भी जाना जाता है।

तो यहाँ याद रखने वाली बात यही है कि अनुच्छेद 269 के तहत जो भी व्यवस्था है वो अनुच्छेद 269क में जो भी लिखा हुआ है उसके अलावे है, जो कि कुछ ऐसा है-

अंतर-राज्यीय व्यापार या वाणिज्य में वस्तुओं के क्रय-विक्रय और परेषण (Consignment) पर कर, भारत सरकार द्वारा उद्गृहित और संगृहीत किए जाएँगे किन्तु इन करों से हुई ये प्राप्तियाँ भारत की संचित निधि का भाग नहीं बनेंगे और संसद द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार संबंधित राज्य को सौंप दिया जाएगा।

नोट – वस्तुओं के क्रय-विक्रय पर कर से यहाँ मतलब समाचार पत्रों को छोड़कर ऐसे कर कर है जो अंतर्राज्यीय व्यापार या वाणिज्य के दौरान वस्तुओं के क्रय-विक्रय के दौरान होता है।

इसी प्रकार ”वस्तुओं के पारेषण पर कर” से यहाँ मतलब परेषण (Consignment) करने वाले व्यक्ति या किसी अन्य व्यक्ति को जिसे वो अमुक वस्तु परेषित (Consigned) किया गया है; पर लगने वाले कर से है जो कि अंतर्राज्यीय व्यापार या वाणिज्य के दौरान होता है।

अनुच्छेद 269क – अंतरराज्यिक व्यापार या वाणिज्या के अनुक्रम में माल और सेवा कर का उद्ग्रहण और संग्रहण

दरअसल जब एक राज्य से दूसरे राज्य में व्यापार होता है तो राज्य के लिए कर इकट्ठा करना बड़ा मुश्किल हो जाता है। वो कैसे?

वो ऐसे कि एक राज्य सिर्फ अपने राज्य सीमा के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों से ही कर उसूल सकते हैं। पर व्यापार तो दूसरे राज्यों से भी होता था। जैसे कि एक राज्य से एक व्यापारी दूसरे राज्य के एक व्यापारी को समान बेचते हैं, सामान पाने वाला व्यापारी तो उस समान को अपने राज्य में बेचेगा और टैक्स का पैसा भी उसी राज्य में रह जाएगा।

अब पहले वाला राज्य (जहां से सामान भेजा गया था), उस दूसरे राज्य में तो टैक्स वसूलने जाएगा नहीं, क्योंकि वो उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। ऐसे स्थिति में अनुच्छेद 269 के तहत केंद्र सरकार वहाँ से टैक्स वसूलती है और जिस राज्य को ये मिलना चाहिए उस राज्य को दे देते हैं। इसे कहते है केन्द्रीय बिक्री कर (सेंट्रल सेल्स टैक्स)।

पर चूंकि अब जीएसटी व्यवस्था है। इसीलिए अनुच्छेद 269क बनाया गया। जिसमें सेवा कर (service tax) भी जोड़ दिया है और ये कुछ इस प्रकार है-

अंतर्राज्यिक व्यापार या वाणिज्य के दौरान वस्तुओं और सेवाओं पर वस्तु एवं सेवा कर यानि कि जीएसटी भारत सरकार द्वारा उद्गृहित और संगृहीत किया जाएगा तथा संसद द्वारा इसे उस विधि से संघ और राज्यों के बीच बांटा जाएगा जो कि जीएसटी काउंसिल द्वारा सिफ़ारिश की जाएंगी।

नोट – अनुच्छेद 269 और अनुच्छेद 269क में अंतर ये है कि (1) अनुच्छेद 269 वस्तुओं के बारे में है जबकि अनुच्छेद 269क वस्तुओं और सेवाओं दोनों करों के बारे में है। (2) अनुच्छेद 269 के तहत केंद्रशासित प्रदेशों से प्राप्त हुए धनराशि को छोड़कर सारे धनराशि उन राज्यों को सौंप दिये जाते है जिन राज्यों से वो कर उद्गृहित (Originated) हुआ है। जबकि अनुच्छेद 269क के तहत भारत सरकार द्वारा उद्गृहित और संगृहीत कर केंद्र और राज्य दोनों के बीच बंटता है। ये व्यवस्था अब IGST के नाम से जाना जाता है।

अनुच्छेद 270 – उद्गृहित कर तथा उनका केंद्र एवं राज्यों के बीच बंटवारे की व्यवस्था।

अनुच्छेद 268, अनुच्छेद 269 और अनुच्छेद 269क के तहत के तहत जो कर वसूले जाते है उसको छोड़कर संघ सूची में निर्दिष्ट सभी कर और शुल्क एवं अनुच्छेद 271 में निर्दिष्ट करों और शुल्कों पर अधिभार (Surcharge) और संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन विनिर्दिष्ट प्रयोजनों (Specified purposes) के लिए उद्ग्रहीत (Levied) कोई उपकर (Cess) भारत सरकार द्वारा उद्ग्रहीत और संगृहीत किए जाएंगे तथा वे वित आयोग (Finance Commission) की सिफ़ारिशों पर बांटी जाएंगी।

नोट- अनुच्छेद 271 की चर्चा आगे की गई है।

यहाँ पर कुछ बातें ध्यान देने योग्य है, इसे ठीक से समझिए क्योंकि ये जरूरी है-

(1) अनुच्छेद 268, अनुच्छेद 269 और अनुच्छेद 269क को इसीलिए छोड़ दिया गया है क्योंकि उस अधिनियम में ही लिखा हुआ है कि करों का बंटवारा कैसे होगा और कौन करेगा।

(2) संघ सूची के जो कर लगाने योग्य विषय है (जिसकी चर्चा ऊपर की गई है) जिसको संघ द्वारा संगृहीत किया जा रहा है; वो भी संघ और राज्यों के बीच वित्त आयोग के अनुसार ही बांटे जाएंगे।

(3) समवर्ती सूची के कर लगाने योग्य विषय और अनुच्छेद 269क के अधीन संघ द्वारा उद्ग्रहीत और संगृहीत ऐसा कर, जिसका उपयोग संघ द्वारा, संघ सूची के विषयों पर उद्ग्रहीत कर का पेमेंट करने के लिए किया गया है, और अनुच्छेद 269क के अधीन संघ को मिले भाग में से भी संघ और राज्यों के बीच वित्त आयोग के सिफ़ारिश पर बांटे जाएंगे।

वित्त आयोग (Finance Commission)

वित्त आयोग (जिसकी चर्चा ऊपर हुई है), अनुच्छेद 280 के तहत एक अर्ध-न्यायिक निकाय (Quasi-judicial body) है। जिसका गठन हर पाँच वर्ष में राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है। आयोग निम्नलिखित काम करता है और अपनी सिफ़ारिश राष्ट्रपति को सौंपता है।

▶ 1. केंद्र एवं राज्यों के बीच कराधन व्यवस्था (Taxation system) का निर्धारण और ऐसी प्राप्तियों का केंद्र और राज्यों के बीच हिस्सेदारी का निर्धारण। 

▶ 2. ऐसे सिद्धांतों का निर्धारण करना, जिसके तहत राज्य, केंद्र से आर्थिक अनुदान लेकर कार्य कर सकता है।

वित्त आयोग, केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध को मजबूत करने का काम करती है। अब चूंकि जीएसटी व्यवस्था है जिसके अंतर्गत आमतौर आमतौर पर तीन प्रकार की कर व्यवस्था की गयी है। एसजीएसटी, IGST और सीजीएसटी;

एसजीएसटी का पूरा पैसा तो राज्यों को मिलता है पर IGST और सीजीएसटी का पैसा केंद्र और राज्य में बंटता है। और ये कितना बंटेगा ये वित्त आयोग डिसाइड करता है।

15वें वित्त आयोग द्वारा राज्यों के हिस्से के रूप में 41 प्रतिशत की सिफ़ारिश की गई है। वित्त आयोग पर अलग से एक विश्लेषणात्मक लेख उपलब्ध है, अच्छी समझ के लिए उसे जरूर पढ़ें।

अनुच्छेद 271 – कुछ शुल्कों और करों पर संघ के प्रयोजनों के लिए अधिभार

अनुच्छेद 269 और 270 में किसी बात के होते हुए भी, संसद, उन अनुच्छेदों में निर्दिष्ट शुल्कों या करों में से किसी में किसी भी समय संघ के प्रयोजनों के लिए अधिभार (Surcharge) द्वारा वृद्धि कर सकेगी और इस वृद्धि से जो धनराशि प्राप्त होगी वो भारत की संचित निधि में जमा होंगी। (लेकिन अनुच्छेद 246क के तहत लगे जीएसटी को छोड़कर)

यहाँ ये याद रखना जरूरी है कि 101वें संविधान संशोधन अधिनियम 2016 के तहत जीएसटी के कुछ विशेष प्रावधान के लिए अनुच्छेद 246क नामक एक नया अनुच्छेद बनाया गया था। इसके तहत की गई व्यवस्थाएं ऐसी है-

▪️ अनुच्छेद 246 और अनुच्छेद 254 में किसी बात के होते हुए भी, संसद को, संघ द्वारा या राज्य द्वारा लगाए गए जीएसटी के संबंध में विधियाँ बनाने की शक्ति होगी।

▪️ जहां माल का या सेवाओं का अथवा दोनों का सप्लाय अंतर्राज्यिक व्यापार या वाणिज्य के अनुक्रम में होता है वहाँ संसद को, माल और सेवा कर के संबंध में विधियाँ बनाने की अनन्य (Unique) शक्ति प्राप्त है। हालांकि राज्य विधानमंडल भी विधियाँ बना सकती है, लेकिन अंतर्राज्यिक व्यापार और वाणिज्य वाली स्थिति में एवं संसद के अधीन रहकर।

सेस और सरचार्ज में अंतर

सेस और सरचार्ज में अंतर बस इतना होता है कि सेस जब लगाया जाता है तो जिस काम के लिए लगाया जाता है उसी काम में इसे खर्च करना पड़ता है। जैसे कि मान लीजिये कि बच्चों के स्कूल में मिड डे मिल के लिए अगर सरकार सेस लगती है तो जब पैसा आ जाएगा तो उसे उसी में खर्च करना पड़ेगा।

वहीं सरचार्ज के लिए ऐसी बाध्यता नहीं नहीं। उस पैसे को जहां मन हो वहाँ खर्च कर सकते हैं।

सेस और सरचार्ज दोनों ही टैक्स के ऊपर टैक्स होते हैं लेकिन सेस जहां सभी करदाताओं पर लागू होता है वहीं सरचार्ज एक सीमा से अधिक आमदनी वाले करदाताओं पर ही लागू होता है।

हमने ऊपर ही पढ़ा कि अनुच्छेद 270 के तहत राज्य को भी इसमें हिस्सा मिलता है, जैसा वित्त आयोग सिफ़ारिश करें। 2021-22 बजट में व्यवस्था किया गया है कि सेस का राज्यों को क्षतिपूर्ति देने में इस्तेमाल किया जाएगा।

केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध और सहायतार्थ अनुदान (Center-State Financial Relations and Subsidy Grants)

जैसे कि कभी-कभी राज्यों को कुछ विशेष कामों के लिए पैसों की आवश्यकता होती है। और केंद्र उस राज्य की सहायता के लिए उसको कुछ अनुदान देते हैं।

ये अनुदान दो प्रकार के होते हैं, पहला विधिक अनुदान (Legal grant) एवं दूसरा विवेकाधीन अनुदान (Discretionary grant)

विधिक अनुदान (Legal grant)

अनुच्छेद 275 ये कहता है कि जब भी किसी राज्य को अनुदान की आवश्यकता हो केंद्र उसे अनुदान उपलब्ध कराये।

जैसे कि मान लीजिये कि किसी राज्य में जनजातियों के उत्थान एवं कल्याण के लिए अगर राज्य को कुछ अनुदान की आवश्यकता है तो केंद्र उसे देगा। लेकिन केंद्र अपने मन से नहीं देगा बल्कि वित्त आयोग के अनुशंसा पर देगा।

हालांकि प्रत्येक राज्य के लिए ऐसा करना केंद्र के लिए आवश्यक नहीं होता है। इसके अलावा अलग-अलग राज्यों कि लिए सहायता राशि भी अलग-अलग निर्धारित की जा सकती है। और सबसे महत्वपूर्ण बात कि ये भारत की संचित निधि पर भारित होती है।

विवेकाधीन अनुदान (Discretionary grant)

ये अनुदान भी कुछ-कुछ वैसा ही है पर इसमें कुछ अंतर है। अंतर ये है कि केंद्र इसे देने के लिए बाध्य नहीं है। केंद्र को अगर मन करे तो दे भी सकता है नहीं तो नहीं भी। इसलिए तो इसे विवेकाधीन कहा जाता है।

इसकी चर्चा अनुच्छेद 282 के तहत की गई है जिसके तहत संघ एवं राज्य दोनों को इस बात का अधिकार प्राप्त है कि किसी लोक प्रयोजन के लिए वे अनुदान आवंटित कर सकें। इसी के तहत केंद्र भी राज्यों को अनुदान देता है।

केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध और ऋण संबंधी प्रावधान (Center-State Financial Relations and Credit Provisions)

संविधान केंद्र एवं राज्यों के कर्ज लेने संबंधी निम्नलिखित प्रावधानों की व्यवस्था करता है;

🔷 अनुच्छेद 292 के तहत, केंद्र अगर चाहे तो भारत या भारत के बाहर से संचित निधि की गारंटी पर ऋण ले सकता है। लेकिन संसद द्वारा निर्धारित सीमा के ऊपर ऋण नहीं लिया जा सकता।

🔷 इसी प्रकार अगर कोई राज्य भारत में कहीं से ऋण लेता है तो वो अनुच्छेद 293(1) के तहत ले सकता है लेकिन राज्य विधानमंडल द्वारा निर्धारित सीमा के ऊपर ऋण नहीं लिया जा सकता।

🔷 अनुच्छेद 292(2) के तहत, केंद्र सरकार भी राज्यों को ऋण दे सकती है या फिर अगर राज्य कहीं और से ऋण लेती है तो उसका केंद्र गारंटर बन सकती है।

इसका मतलब ये हुआ कि अगर कोई राज्य सरकार किसी भी बैंक या फिर कहीं से भी लोन लेती है और चुका नहीं पाती है, तो केंद्र सरकार को उसे चुकाना पड़ेगा। वो भी भारत के खजाने से।

🔷 इस तरह अगर राज्य के ऊपर पहले से ही बकाया ऋण हो तो राज्य अनुच्छेद 292(3) के अनुसार फिर से दूसरा ऋण केंद्र की अनुमति के बिना नहीं ले सकता।

आपातकाल के दौरान केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध (Center-State Financial Relations During Emergency)

राष्ट्रीय आपातकाल (National emergency)

जब अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रीय आपातकाल लगाया जाता है राष्ट्रपति चाहे तो वित्तीय अंतरण (Financial transfer) को कम कर सकता है या फिर रोक सकता है।

वित्तीय आपातकाल (Financial emergency)

जब अनुच्छेद 360 के तहत वित्तीय आपातकाल लगाया जाता है (जो अभी तक लगाया नहीं गया है) तो, केंद्र, राज्य की सेवा में लगे कर्मचारीयों के वेतन और भत्ते कम कर सकता है, राज्य को वित्तीय निर्देश दे सकता है, और वहाँ के विधानमंडल में अगर धन विधेयक या वित्तीय विधेयक लाया जाता है तो उसे राष्ट्रपति कि स्वीकृति के लिए रोक सकता है।

केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध से जुड़े कुछ तथ्य (Some facts related to center-state financial relations)

▪️ अनुच्छेद 285 के तहत, केंद्र की सम्पत्ति को राज्य के सभी करों से छूट मिलेगी। (यहाँ संपत्ति का मतलब भूमि, भवन, चल संपत्ति, शेयर इत्यादि उन सभी चीजों से है, जिसका कोई मूल्य होता है)

▪️ इसी प्रकार अनुच्छेद 287 के तहत, राज्य, केंद्र द्वारा उपभोग किए जाने वाली बिजली या केंद्र सरकार द्वारा विक्रय की जाने वाली बिजली या फिर रेल चलाने के लिए इस्तेमाल में लायी जाने वाली बिजली पर कोई टैक्स नहीं लगाएगी।

▪️ अनुच्छेद 289 के तहत, राज्य की परिसंपत्तियों या आय को भी केन्द्रीय करों से छूट प्राप्त है। हालांकि संसद की अनुमति से केंद्र चाहे तो कुछ चीजों पर कर लगा सकती है।

राज्यों के हितों का संरक्षण

वित्तीय मामलों पर राज्य हितों की रक्षा के लिए अनुच्छेद 274 के तहत संविधान में यह व्यवस्था की गई है कि संसद सिर्फ राष्ट्रपति की सिफ़ारिश पर निम्नलिखित विधेयकों को संसद में प्रस्तुत करें;

▪️ ऐसा कोई विधेयक जिसमें राज्यों का हित हो और वह किसी कर या शुल्क को अध्यारोपित (Imposed) करे।

▪️ ऐसा विधेयक जो राज्यों में वितरण की जाने वाली राशियों के नियम को प्रभावित करे।

▪️ ऐसा विधेयक जो राज्य के प्रयोजन हेतु किसी विशिष्ट कर या शुल्क पर अधिभार अध्यारोपित करे।

Articles of Center-State Financial Relations

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कुल मिलाकर यही है केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध (Center-State Financial Relations), उम्मीद है समझ में आया होगा। नीचे जीएसटी पर लेख दिया गया है, इस टॉपिक की अच्छी समझ के लिए उसे जरूर पढ़ें।

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Article Based On,
एम लक्ष्मीकान्त – भारत की राजव्यवस्था↗️
मूल संविधान भाग 12↗️
मूल संविधान 2020 संस्करण↗️
Taxes and Constitutional limitations आदि।

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 जीएसटी की आधारभूत समझ
Basics of GST

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