Center-State Financial Relations in hindi । केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध

इस लेख में हम केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध (Center-State Financial Relations) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे।

Center-State Financial Relations

केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध : पृष्ठभूमि
(Center-State Financial Relations : Background)

💠 जाहिर है वित्तीय संबंध के नाम से ही स्पष्ट है कि ये किसी तरह से पैसों से संबन्धित है। जी हाँ वित्तीय संबंध केंद्र और राज्य के मध्य करों (taxes) के बंटवारे से संबन्धित है।

जैसा कि हम जानते हैं 1 जुलाई 2017 से पहले तो करों (Taxes) की कुछ और व्यवस्था थी पर जीएसटी लागू होने के बाद कर व्यवस्था में एक व्यापक सुधार आया है। इसका प्रभाव केंद्र और राज्य के मध्य वित्तीय सम्बन्धों पर भी पड़ा है।

अगर आपको जीएसटी की समझ नहीं है तो आप ↗️यहाँ क्लिक करके उसे समझ लें, तब आप इस लेख को सही मायने में समझ पाएंगे। क्योंकि ये लेख टैक्स व्यवस्था के इर्द-गिर्द ही घूमेगा।

इस लेख में अनुच्छेदों (Articles) का रोल काफी अहम रहने वाला है। इसीलिए जिस अनुच्छेदों की यहाँ चर्चा की जा रही है। उसे जरूर याद रखें।

केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध
(Center-State Financial Relations)

संविधान के भाग 12 में अनुच्छेद 264 से 293 तक केंद्र और राज्य वित्तीय सम्बन्धों की चर्चा की गयी है।

अनुच्छेद 265 में लिखा है कि कोई भी टैक्स विधि के प्राधिकार से ही लागू किया जा सकता है। इसका मतलब ये है कि बिना कोई विधि बनाए सरकार हम पर कोई भी टैक्स नहीं लगा सकती है।

जिस प्रकार विधायी विषयों का बंटवारा तीन सूचियाँ बनाकर की गयी थी। उसी प्रकार टैक्स के बँटवारे के लिए भी तीन सूचियाँ बनायी गयी थी।

🔷 संघ सूची में 15 क्षेत्रों को रखा गया था। जिसपर केंद्र टैक्स लगा सकती थी।

🔷 राज्य सूची में 20 क्षेत्रों रखा गया था जिसपर राज्य टैक्स लगा सकती थी।

🔷 समवर्ती सूची में 3 क्षेत्रों को रखा गया था। जिसपर केंद्र और राज्य दोनों टैक्स लगा सकती थी।

और जो इन तीनों सूचियों में नहीं लिखा हुआ था। उस पर केंद्र को टैक्स लगाने का अधिकार था।

जैसे कि जब सेवा कर (service tax) का कान्सैप्ट लाया गया था। तो इसपर केंद्र को ही टैक्स लगाने का अधिकार मिला था। क्योंकि ये किसी भी सूची में नहीं लिखा हुआ था। पर ये सब अतीत की बात थी।

अब जैसा कि हम जानते हैं जीएसटी आने के बाद चीज़ें एकदम से बदल गयी है। कई केन्द्रीय और राज्य के अप्रत्यक्ष कर को खत्म करके उसे जीएसटी में मर्ज कर दिया गया।

इसीलिए आइये देखते हैं अब क्या स्थिति है। जीएसटी के आने से क्या सब बदलाव आया है।

अनुच्छेद 268 (Article 268)

केंद्र द्वारा उद्गृहित एवं राज्यों द्वारा संगृहीत एवं विनियोजित कर
Tax levied by the Center and collected and appropriated by the States

इस अनुच्छेद के अंतर्गत आनेवाले कर (Tax) पूरी तरह से राज्य के खाते में जाता है। केंद्र का इस पर कोई अधिकार नहीं होता है। इसमें आनेवाले कर (Tax) कुछ इस प्रकार हैं।

🔷 विनिमय पत्रों (Letters of exchange), चेकों, वादा नोटों (Promise Notes), नीतियों, बीमा तथा शेयरों के अंतरण (Transfer of shares) पर लगने वाला स्टाम्प शुल्क (stamp duty)।

🔷 इसके साथ ही औषधीय एवं प्रसाधन की वस्तुएं, जैसे कि एल्कोहल एवं नारकोटिक्स; इस पर लगने वाले उत्पाद शुल्क (Excise duty)।

स्टाम्प ड्यूटि को तो जीएसटी के दायरे में लाने की बात भी चलती है। पर पीने योग्य एल्कोहल यानी कि शराब को तो जीएसटी के दायरे से स्थायी तौर पर बाहर रखा गया है। यानी कि हमेशा-हमेशा के लिए। ऐसा क्यूँ?

क्योंकि ये राज्य की कमाई के मुख्य स्रोतों में से एक है। वो कैसे है?
आइये इसे समझ लेते हैं।

जैसे ही फैक्ट्री से शराब बनकर निकलता है, सबसे पहले तो उस पर उत्पाद शुल्क (Excise duty) लगाया जाता है। जो कि आमतौर पर 25 परसेंट से ज्यादा ही होता है।

उसके बाद जब मार्केट में बिकने के लिए जाता है तो उस पर VAT ( Value Added Tax) लगाया जाता है। जो कि 70 से 80 परसेंट तक लगा दिया जाता है।

और यहाँ पर कैस्केडिंग इफैक्ट भी देखने को मिलता है। इससे होता ये है कि 30 रूपये में बनने वाली शराब की कीमत कभी-कभी 200 रूपये तक हो जाती है।

इससे राज्य को कितना फायदा होता होगा, आप खुद ही सोचिए। ऐसे में शराब को जीएसटी के दायरे में क्यूँ लाया जाएगा।

क्योंकि अगर इसपर जीएसटी लागू कर दिया जाता तो ज्यादा से ज्यादा 28 परसेंट टैक्स इसपर लगाया जा सकता था। क्योंकि अभी फिलहाल जीएसटी की मैक्सिमम लिमिट यही है।

पेट्रोल और डीजल के मामले में भी यही खेल चलता है, इसीलिए वो भी जीएसटी के दायरे से बाहर है।

❎अनुच्छेद 268 ‘क’

सेवा कर(Service tax)

88वां संविधान संशोधन 2003 द्वारा सेवा कर (Service tax) को लागू किया गया। जैसे कि अभी आप इस आर्टिकल को पढ़ रहें हैं।

ये एक प्रकार का सेवा है जो मैं आपको प्रोवाइड कर रहा हूँ। पहले इस टैक्स का संग्रहण तो राज्य करता था, पर ये बंटता केंद्र और राज्य दोनों में था।

पर चूंकि अब जीएसटी व्यवस्था लागू है और उसका तो नाम ही है वस्तु एवं सेवा कर (goods and services Tax)।

मतलब ये कि अनुच्छेद 268 ‘क’ अब खत्म हो गया है क्योंकि अब ये जीएसटी का हिस्सा है।

अनुच्छेद 269(Article 269)

संघ द्वारा उद्गृहित एवं संगृहीत किन्तु राज्यों को सौंपे जाने वाले कर
Taxes levied and collected by the Union but handed over to the States

ये अनुच्छेद, अंतर्राज्यीय व्यापार और वाणिज्य में क्रय-विक्रय से संबन्धित कर की बारे में था।

इसमें होता ये था कि जब एक राज्य से दूसरे राज्य में व्यापार होता था तो राज्य के लिए कर इकट्ठा करना बड़ा मुश्किल हो जाता था। वो कैसे?

वो ऐसे कि एक राज्य सिर्फ अपने राज्य सीमा के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों से ही कर उसूल सकते थे। पर व्यापार तो दूसरे राज्यों से भी होता था।

जैसे कि एक राज्य से एक व्यापारी दूसरे राज्य के एक व्यापारी को समान बेचते हैं अब वो व्यापारी तो उस समान को अपने राज्य में बेचेंगे और टैक्स का पैसा भी उसी राज्य में रह जाएगा।

अब पहले वाला राज्य, उस दूसरे राज्य में तो टैक्स वसूलने जाएगा नहीं, क्योंकि वो उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

ऐसे स्थिति में अनुच्छेद 269 के तहत केंद्र सरकार वहाँ से टैक्स वसूलती थी और जिस राज्य को ये मिलना चाहिए उस राज्य को दे देते हैं।

इसे ही कहते थे केन्द्रीय बिक्री कर (सेंट्रल सेल्स टैक्स)। पर चूंकि अब जीएसटी व्यवस्था है। इसीलिए अनुच्छेद 269 को खत्म करके अनुच्छेद 269 ‘क’ के तहत IGST की व्यवस्था की गयी।

अब भी ये काम केंद्र ही करती है और टैक्स के पैसे जिस राज्य को मिलना चाहिए उस राज्य को दे देती है। पर अब इसे IGST कहते हैं।

अनुच्छेद 270 (Article 270)

संघ द्वारा उद्गृहित एवं संगृहीत किए जाने वाले कर तथा केंद्र एवं राज्यों के बीच बंटने वाले कर बंटवारे की उक्त व्यवस्था।

अनुच्छेद 268, अनुच्छेद 268 ‘क’ और अनुच्छेद 269 के तहत के तहत जो कर वसूले जाते थे वो किस अनुपात में राज्य और केंद्र में बंटेगा ये वित आयोग (Finance Commission) डिसाइड करता था।

एक divisible pool यानी कि बांटने योग्य धन; व्यवस्था के अनुसार ये धन केंद्र और राज्य में बाँट दिया जाता था।

अभी भी वित्त आयोग यही काम करता है पर जीएसटी के अनुसार। अब हो सकता है कि आपके मन में आए कि ये वित आयोग क्या है?

वित्त आयोग
(Finance Commission)

वित्त आयोग, अनुच्छेद 280 के तहत एक अर्ध-न्यायिक निकाय (Quasi-judicial body) है।

वित आयोग का गठन हर पाँच वर्ष में राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है। ये आयोग निम्नलिखित काम करता है और अपनी सिफ़ारिश राष्ट्रपति को सौंपता है।

▶ 1. केंद्र एवं राज्यों के बीच कराधन व्यवस्था (Taxation system) का निर्धारण और ऐसी प्राप्तियों का राज्यों के बीच हिस्सेदारी का निर्धारण। 

▶ 2. ऐसे सिद्धांतों का निर्धारण करना, जिसके तहत राज्य केंद्र से आर्थिक अनुदान लेकर कार्य कर सकता है।

▶ 3. राज्य वित आयोग की संस्तुति के आधार पर, राज्य पंचायतों और नगरपालिकाओं के स्रोतों की पूर्ति के लिए राज्य की संचित निधि को बढ़ाने के लिए किए जाने वाले उपाय। 

▶ 4. राष्ट्रपति द्वारा वित्तीय मामलों के संबंध में सौंपा गया कोई अन्य कार्य। यानी कि इसके अलावे भी अगर राष्ट्रपति द्वारा कोई काम वित्त आयोग को सौंपा गया तो वो भी………..।  

वित्त आयोग, केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध को मजबूत करने का काम करती है। और देश को एक साँध के रूप में बनाये रखने में अपना योगदान देती है। अब समझ ही गए होंगे कि वित्त आयोग क्या काम करता है।

अब चूंकि जीएसटी व्यवस्था है जिसके अंतर्गत आमतौर आमतौर पर तीन प्रकार की कर व्यवस्था की गयी है।

एसजीएसटी, IGST और सीजीएसटी; एसजीएसटी का पूरा पैसा तो राज्यों को मिलता है पर IGST और सीजीएसटी का पैसा केंद्र और राज्य में बंटता है।

और ये कितना बंटेगा ये वित्त आयोग डिसाइड करता है। अभी की बात करें तो ये कुल आय का 42 प्रतिशत है जो राज्यों में बंटता है, बाद बांकी केंद्र रखता है।

अनुच्छेद 271(Article 271)

इसके अंतर्गत पहले ये व्यवस्था था कि केंद्र को जब किसी खास काम के लिए पैसों की जरूरत हो तो इस अनुच्छेद के तहत सेस (Cess) लगा सकती थी।

सेस और सरचार्ज में अंतर बस इतना होता है कि सेस जब लगाया जाता है तो जिस काम के लिए लगाया जाता है उसी काम में इसे खर्च करना पड़ता है।

जैसे कि मान लीजिये कि बच्चों के स्कूल में मिड डे मिल के लिए अगर सरकार सेस लगती है तो जब पैसा आ जाएगा तो उसे उसी में खर्च करना पड़ेगा।

वहीं सरचार्ज के लिए ऐसी बाध्यता नहीं नहीं। उस पैसे को जहां मन हो वहाँ खर्च कर सकते हैं।

एक बात जो जाननी महत्वपूर्ण है वो ये है कि इन दोनों में से राज्य को कुछ भी नहीं मिलता था।

पर अब चूंकि जीएसटी व्यवस्था लागू है। इसमें व्यवस्था ये है कि सेस के कुछ भाग को राज्यों को क्षतिपूर्ति देने में इस्तेमाल किया जाएगा।

किसी राज्य को इसमें से कितना मिलेगा ये जीएसटी काउंसिल तय करती है। न कि वित्त आयोग।

केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध और सहायतार्थ अनुदान
(Center-State Financial Relations and Subsidy Grants)

जैसे कि कभी-कभी राज्यों को कुछ विशेष कामों के लिए पैसों की आवश्यकता होती है। और केंद्र उस राज्य की सहायता के लिए उस राज्य को कुछ अनुदान देते हैं।

ये अनुदान दो प्रकार के होते हैं। पहला विधिक अनुदान (Legal grant) एवं दूसरा विवेकाधीन अनुदान (Discretionary grant)

विधिक अनुदान (Legal grant)

अनुच्छेद 275 ये कहता है कि जब भी किसी राज्य को अनुदान की आवश्यकता हो केंद्र उसे अनुदान उपलब्ध कराये।

जैसे कि मान लीजिये कि किसी राज्य में जनजातियों के उत्थान एवं कल्याण के लिए अगर अमुक राज्य को कुछ अनुदान की आवश्यकता है तो केंद्र उसे देगा।

लेकिन केंद्र अपने मन से नहीं देगा बल्कि वित्त आयोग के अनुशंसा पर देगा।

विवेकाधीन अनुदान
(Discretionary grant)

ये अनुदान भी कुछ कुछ वैसा ही है पर इसमें कुछ अंतर है। अंतर ये है कि केंद्र इसे देने के लिए बाध्य नहीं है।

केंद्र को अगर मन करे तो दे भी सकता है नहीं तो नहीं भी। इसलिए तो इसे विवेकाधीन कहा जाता है।

केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध और ऋण संबंधी प्रावधान
(Center-State Financial Relations and Credit Provisions)

केंद्र अगर चाहे तो भारत या भारत के बाहर से भी ऋण ले सकता है। लेकिन संसद द्वारा निर्धारित सीमा के ऊपर ऋण नहीं लिया जा सकता।

🔷 इसी प्रकार अगर कोई राज्य भारत में कहीं से ऋण लेता है तो वो ले सकता है लेकिन राज्य विधानमंडल द्वारा निर्धारित सीमा के ऊपर ऋण नहीं लिया जा सकता।

🔷 केंद्र सरकार भी राज्यों को ऋण दे सकती है। या फिर अगर राज्य कहीं और से ऋण लेती है तो उसका केंद्र गारंटर बन सकती है।

इसका मतलब ये हुआ कि अगर कोई राज्य सरकार किसी भी बैंक या फिर कहीं से भी लोन लेती है और चुका नहीं पाती है,

तो केंद्र सरकार को उसे चुकाना पड़ेगा। वो भी भारत के खजाने से।

इस तरह अगर पहले से ही बकाया ऋण हो तो फिर से दूसरा ऋण केंद्र की अनुमति के बिना नहीं ले सकता।

केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध और आपातकाल
(Center-State Financial Relations and Emergency)

राष्ट्रीय आपातकाल
(National emergency)

जब अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रीय आपातकाल लगाया जाता है राष्ट्रपति चाहे तो वित्तीय अंतरण (Financial transfer) को कम कर सकता है या फिर रोक सकता है।

वित्तीय आपातकाल
(Financial emergency)

जब अनुच्छेद 360 के तहत वित्तीय आपातकाल लगाया जाता है (जो अभी तक लगाया नहीं गया है।) तो,

केंद्र, राज्यों के कर्मचारी के वेतन और भत्ते कम कर सकते हैं, राज्य को वित्तीय निर्देश दे सकते हैं, और वहाँ के विधानमंडल में अगर धन विधेयक या वित्तीय विधेयक लाया जाता है तो उसे राष्ट्रपति कि स्वीकृति के लिए रोक सकते हैं।

केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध और कुछ तथ्य
(Center-State Financial Relations and Some Facts)

✅ केंद्र की सम्पत्तियों जैसे कि भूमि, भवन, चल संपत्ति, शेयर आदि पर राज्य कर नहीं लगा सकती है।

✅ इसी प्रकार राज्य की परिसंपत्तियों या आय को भी केन्द्रीय करों से छूट प्राप्त है। हालांकि संसद की अनुमति से केंद्र चाहे तो कुछ चीजों पर कर लगा सकती है।

जैसे कि- निगमों (Corporations) एवं राज्य की स्वामित्व वाली कंपनियाँ या फिर राज्य द्वारा आयातित या निर्यातित वस्तुओं पर कर लगा सकती है।

✅ केंद्र और राज्य के मध्य जो वित्तीय संबंध है वो सुचारु रूप से चलता रहे। इसके लिए संविधान में कुछ व्यवस्था की गयी है। जैसे कि

कोई भी ऐसा विधेयक जिससे राज्य का हित जुड़ा हुआ हो। जैसे आयकर संबंधी प्रयोजन में बदलाव, राज्य को दी जाने वाली हिस्से को प्रभावित करने वाला ऐसा कोई नियम, आदि ऐसे विधेयक को संसद में प्रस्तुत करने से पहले राष्ट्रपति से अनुमति लेनी पड़ती है।

संघ-राज्य वित्तीय संबंध से जुड़े अनुच्छेद

Center-State Financial Relations -

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