नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक का मुख्य कार्य सार्वजनिक धन का सही इस्तेमाल हो रहा है या नहीं; उसका ऑडिट करना है।

इस लेख में हम भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (Comptroller and Auditor General of India) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे; तो कैग (CAG) की बेहतर समझ के लिए, लेख को अंत तक जरूर पढ़ें, ढेरों महत्वपूर्ण जानकारी आपको यहाँ से मिलेंगी।

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नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक
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भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG)

लोकतंत्र में जिन लोगों के पास शक्तियां और जिम्मेदारियां होती है उन्हे अपने कार्यों के प्रति जवाबदेह तो होने ही चाहिए। भारतीय संविधान इसको सुनिश्चित करने के लिए कई संस्थाओं को अधिदेशित करता है जैसे कि न्यायपालिका (Judiciary), सतर्कता आयोग (Vigilance Commission) आदि।

इसी क्रम में एक सर्वोच्च लेखा परीक्षा संस्था (Supreme Audit Institution) SAI की भी स्थापना की गई है जिसे कि हम आमतौर पर CAG के नाम से जानते हैं। सविधान का अनुच्छेद 148 – 151 भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की विशेष भूमिका निर्धारित करती है।

भारत के संविधान के अनुच्छेद 148 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के स्वतंत्र पद की व्यवस्था की गई है, जिसे संक्षेप में ”महालेखा परीक्षक (Auditor General)” कहा जाता है। यह भारतीय लेखा परीक्षण और लेखा विभाग का मुख्य होता है।

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक राष्ट्रपति को तीन लेखा परीक्षा रिपोर्ट प्रस्तुत करता है:

(1) विनियोग लेखाओं पर लेखा परीक्षा रिपोर्ट (Audit report on appropriation accounts),
(2) वित्त लेखाओं पर लेखा परीक्षा रिपोर्ट (Audit Report on Finance Account) और
(3) सरकारी उपक्रमों पर लेखा परीक्षा रिपोर्ट (Audit Report on Government Undertakings)।

राष्ट्रपति इन रिपोर्टों को संसद के दोनों सदनों के सभापटल पर रखता है इसके उपरांत लोक लेखा समिति इनकी जांच करती है और इसके निष्कर्षो से संसद को अवगत काराती है।

Ordinance

“नियंत्रक महालेखा परीक्षक भारतीय संविधान के तहत सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी होगा। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में भारत सरकार के रक्षकों (उच्चतम न्यायालय, निर्वाचन आयोग एवं संघ लोक सेवा आयोग) में से एक होगा। “

— डॉ. बी आर अंबेडकर

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के उद्देश्य

उच्च गुणवत्ता की लेखा परीक्षा और लेखांकन के माध्यम से जवाबदेही, पारदर्शिता और सुशासन को बढ़ावा देना और अपने हितधारकों, विधानमंडल, कार्यपालिका और जनता को स्वतंत्र आश्वासन प्रदान करना कि सार्वजनिक धन (Public funds) का उपयोग कुशलतापूर्वक और इच्छित उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है।

नियुक्ति एवं कार्यकाल (Appointment and tenure)

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। कार्यभार संभालने से पहले यह राष्ट्रपति के सम्मुख निम्नलिखित शपथ या प्रतिज्ञान लेता है:

1. भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखेगा।
2. भारत की एकता एवं अखंडता को अक्षुण्ण रखेगा।
3. सम्यक प्रकार से और श्रद्धापूर्वक तथा अपनी पूरी योग्यता, ज्ञान और विवेक से अपने पद के कर्तव्यों का भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना पालन करूंगा।
4. संविधान और विधियों की मर्यादा बनाए रखूँगा।

इसका कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष (जो भी पहले हो) की आयु तक होता है। इससे पहले वह राष्ट्रपति के नाम किसी भी समय अपना त्यागपत्र भेज सकता है। राष्ट्रपति द्वारा इसे उसी तरह हटाया जा सकता है, जैसे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है। दूसरे शब्दों में, संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत के साथ उसके दुर्व्यवहार या अयोग्यता पर प्रस्ताव पास कर उसे हटाया जा सकता है।

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की स्वतंत्रता

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की स्वतंत्रता एवं सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए संविधान में निम्नलिखित व्यवस्था की गई है:

1. भले ही इसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है लेकिन ये राष्ट्रपति के प्रसाद्पर्यंत काम नहीं करते हैं यानी कि राष्ट्रपति इसे अपने मन से नहीं हटा सकता है। बल्कि संविधान में उल्लिखित कार्यवाही के जरिये ही हटाया जा सकता है।

2. यह अपना पद छोड़ने के बाद किसी अन्य पद, चाहे वह भारत सरकार का हो या राज्य सरकार का, ग्रहण नहीं कर सकता। ऐसा इसीलिए किया गया है ताकि भविष्य में होने वाले लाभ की चिंताओं से मुक्त होकर वे अपना काम कर सकें।

3. वेतन एवं अन्य सेवा शर्तों का निर्धारण संसद द्वारा निर्धारित किया जाता है। हालांकि नियुक्ति के पश्चात संसद उसकी सेवा शर्तों में अलाभकारी परिवर्तन नहीं कर सकता है। CAG का वेतन उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर होता है।

4. भारतीय लेखा परीक्षक, लेखा विभाग के कार्यालय में काम करने वाले लोगो की सेवा शर्तें और नियंत्रक महालेखा परीक्षक की प्रशासनिक शक्तियाँ ऐसी होगी जो नियंत्रक महालेखा परीक्षक से परामर्श करने के पश्चात राष्ट्रपति द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा विहित की जाएँ।

6. नियंत्रक महालेखा परीक्षक के कार्यालय के प्रशासनिक व्यय, वेतन भत्ते और पेंशन भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) पर भारित होंगे। अत: इन पर संसद में मतदान नहीं हो सकता।

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की कर्तव्य और शक्तियाँ

अनुच्छेद 149 के तहत संसद के पास यह अधिकार है कि वह किसी प्राधिकरण या संस्था के महालेखा परीक्षक संबंधी मामले CAG को दे, इसके लिए संसद ने महालेखा परीक्षक (कर्तव्य, शक्तियाँ एवं सेवा शर्तें) अधिनियम 1971 बनाया।

तो कुल मिलाकर संसद एवं संविधान द्वारा स्थापित नियंत्रण एवं महालेखा परीक्षक (Comptroller and Auditor General of India) के कार्य एवं कर्तव्य निम्नलिखित हैं:

1. यह भारत की संचित निधि, प्रत्येक राज्य की संचित निधि और प्रत्येक संघ शासित प्रदेश, जहां विधानसभा हो, में सभी व्यय संबंधी लेखाओं की लेखा परीक्षा करता है।

3. यह केंद्र सरकार और अन्य सरकारों के किसी विभाग द्वारा सभी ट्रेडिंग, विनिर्माण लाभ और हानि लेखाओं, तुलन पत्रों (Balance sheets) और अन्य अनुषंगी लेखाओं (Subsidiary accounts) की लेखा परीक्षा करता है।

2. यह भारत के लोक लेखा सहित प्रत्येक राज्य की ↗️आकस्मिकता निधि (Contingency fund) और प्रत्येक राज्य के लोक लेखा से सभी व्यय की लेखा परीक्षा करता है।

4. यह निम्नांकित संस्थाओं के प्राप्तियों और व्ययों का भी लेखा परीक्षण करता है:

(1) भारतीय रेल, रक्षा, डाक और दूरसंचार सहित सभी संघ और राज्य सरकार विभाग जिन्हे केंद्र या राज्य सरकारों से अनुदान मिलता है:
(2) संघ और राज्य सरकार द्वारा नियंत्रित लगभग 1500 सार्वजनिक वाणिज्यक उद्यम (Commercial enterprise), जैसे सरकारी कंपनियां और निगम।  एवं,
(3) संघ और राज्य सरकार द्वारा नियंत्रित और स्वामित्व वाले लगभग 400 गैर वाणिज्यिक स्वायत्त निकाय (Non-commercial autonomous bodies) और प्राधिकरण।

5. यह राष्ट्रपति या राज्यपाल के निवेदन पर किसी अन्य प्राधिकारण के लेखाओं की भी लेखा परीक्षा करता है। जैसे कि स्थानीय निकायों की लेखा परीक्षा। इसके साथ ही यह राष्ट्रपति को इस संबंधी में सलाह भी देता है कि केंद्र और राज्यों के लेखा किस प्रारूप में रखे जाने चाहिए।

6. अनुच्छेद 151 के तहत, यह केंद्र सरकार के लेखों से संबन्धित रिपोर्ट राष्ट्रपति को देता है, जो उसे संसद के पटल पर रखते है। इसी प्रकार यह राज्य सरकार के लेखों से संबन्धित रिपोर्ट राज्यपाल को देता है, जो उसे विधानमंडल के पटल पर रखते हैं।

7. यह अनुच्छेद 279 के तहत, किसी कर या शुल्क की शुद्ध आगमों का निर्धारण और प्रमाणन करता है इस संबंध में उसका प्रमाण पत्र अंतिम होता है। यहाँ पर शुद्ध आगमों का अर्थ है – कर या शुल्क की प्राप्तियाँ, जिसमें संग्रहण की लागत सम्मिलित न हो।

8. यह संसद की लोक लेखा समिति (Public accounts committee) के गाइड और मित्र के रूप में कार्य करता है।

9. यह राज्य सरकारों के लेखाओं का संकलन और अनुरक्षण (Compilation and maintenance) करता है। पहले भारत सरकार का भी करता था लेकिन 1976 में इसे केन्द्रीय सरकार के लेखाओं के संकलन और अनुरक्षण कार्य से मुक्त कर दिया गया।

Role of Comptroller and Auditor General of India

कैग (Comptroller and Auditor General of India) को यह निर्धारण करना होता है कि विधिक रूप में जिस प्रयोजन हेतु धन आवंटित किया गया था, वह उसी प्रयोजन या सेवा हेतु प्रयुक्त किया गया है।

अपने लेखा परीक्षा का कार्य निर्बाध रूप से करने के लिए CAG को कुछ शक्तियाँ दी गई है जैसे कि –

(1) लेखापरीक्षा के अधीन किसी कार्यालय या संगठन के निरीक्षण करने की शक्ति।
(2) सभी लेन-देनों की जांच और कार्यकारी से प्रश्न करने की शक्ति।
(3) किसी भी लेखा परीक्षित (Audited Entity) से कोई भी रिकार्ड, पेपर, दस्तावेज मांगने की शक्ति।
(4) लेखा परीक्षा की सीमा और स्वरूप पर निर्णय लेने की शक्ति।

◾यह सरकारी व्यय की तर्कसंगतता, निष्ठा और मितव्ययता (Economy) की भी जांच कर सकता है और ऐसे व्यय की व्यर्थता और दिखावे पर टिप्पणी भी कर सकता है।

◾वित्तीय प्रशासन के क्षेत्र में भारत के संविधान एवं संसदीय विधि के अनुरक्षण (Maintenance) के प्रति महालेखा परीक्षक उत्तरदायी (Auditor General) होता है। महालेखा परीक्षक संसद का एजेंट होता है और उसी के माध्यम से खर्चों का लेखा परीक्षण करता है। इस तरह वह केवल संसद के प्रति जिम्मेदार होता है।

◾कैग के अपने संवैधानिक भूमिका निभाने में Indian Audit and Accounts Department (IA&AD) मदद करता है। जिसके अधिकारी आमतौर पर यूपीएससी द्वारा आयोजित लोक सेवा परीक्षा द्वारा चुन कर आते हैं।

◾सार्वजनिक निगमों की लेखा परीक्षा में कैग की भूमिका सीमित है। मोटे तौर पर सार्वजनिक निगमों के साथ इसके संबंध को निम्नलिखित तीन कोटियों के अंतर्गत देखा जा सकता है:

(1) कुछ निगमों की लेखा परीक्षा पूरी तरह एवं प्रत्यक्ष तौर पर कैग द्वारा की जाती है। उदाहरण के लिए दामोदर घाटी निगम, तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग, एयर इंडिया, इंडियन एयरलाइन्स कॉपोरेशन आदि

(2) कुछ अन्य निगमों की लेखा परीक्षा निजी पेशेवर अकेंक्षकों (Private professional auditors) के द्वारा की जाती है, जो कैग की सलाह पर केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किए जाते है। उदाहरण केंद्रीय भंडारण निगम, औद्योगिक वित्त निगम एवं अन्य।

(3) कुछ अन्य निगमों की लेखा परीक्षा पूरी तरह निजी पेशेवर अंकेक्षकों (Private professional auditors) के द्वारा की जाती है तथा इसमे कैग कि कोई भूमिका नही होती है। उदाहरण जीवन बीमा निगम, भारतीय रिजर्व बैंक, भारतीय स्टेट बैंक, भारतीय खाद्य निगम इत्यादि।

◾1968 मे भारतीय प्रशासनिक सुधार आयोग की अनुशंसाओं पर कैग कार्यालय के एक अंग के रूप मे लेखा परीक्षा बोर्ड (Audit board) की स्थापना की गई थी। जिससे की विशेषज्ञता आधारित विशेष उद्यमों, जैसे इंजीनियरिंग, लौह एवं इस्पात रसायन इत्यादि के लेखा परीक्षा के तकनीकी पक्षों का ध्यान रखा जा सके।

आलोचना (Criticism)

◾ संविधान में कैग (CAG) की परिकल्पना नियंत्रक महालेखा परीक्षक के रूप में ई गई है। लेकिन व्यवहार में कैग केवल महालेखा परीक्षक ही है क्योंकि कैग (CAG) का भारत की संचित निधि से धन की निकासी पर कोई नियंत्रण नहीं है और अनेक विभाग कैग के प्राधिकार के बिना चैक जारी कर धन की निकासी कर सकते है,

कुल मिलाकर कैग की भूमिका वहाँ से शुरू होती है जब व्यय (expenditure) हो चुका होता है। जबकि ब्रिटेन के CAG की बात करें तो उसकी स्वीकृति के बिना कार्यपालिका राजकोष से धन की निकासी नहीं कर सकता है।

◾ गुप्त सेवा व्यय (यानी कि ऐसा व्यय जिसे सार्वजनिक नहीं किया जाता जैसे कि खुफ़िया एजेंसी से संबंधित खर्च) कैग की लेखा परीक्षा भूमिका पर सीमाएं निर्धारित करता है। इस संबंध में कैग कार्यकारी एजेंसियों द्वारा किए गए व्यय के ब्योरे नहीं मांग सकता।

भारत मे कैग का कार्य वास्तव में औपनिवेशिक शासन की एक विरासत के रूप में है। संसद कैग के कार्यों को परिभाषित करने में विफल रही है जैसा कि संविधान में उससे अपेक्षा की गई थी।

PAUL H. APPLEBY

https://cag.gov.in/

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