Constitution amendment process (संविधान संशोधन प्रक्रिया)

इस लेख में हम भारत में संविधान संशोधन प्रक्रिया पर चर्चा करेंगे।
In this article we are going to discuss about Constitution amendment process in india.

Constitution amendment process

भारत में संविधान संशोधन प्रक्रिया
(Constitution amendment process in India)

💦 भारतीय संविधान अपने आप में खास इसलिए भी है क्योंकि इसमें संशोधन करना न ही कठोर है और न लचीला।

दूसरे शब्दों में कहें तो कानून या प्रावधानों की प्रकृति के आधार पर संशोधन प्रक्रिया कभी कठोर तो कभी लचीला होता है।

फिर भी ये अमेरिकी व्यवस्था की तरह इतना भी कठोर नहीं है कि 200 सालों में सिर्फ 27 संशोधन ही हो और ब्रिटेन व्यवस्था की तरह इतना भी लचीला नहीं है कि जब मन चाहे संशोधन कर दो।

🔷 भारतीय संविधान संशोधन प्रक्रिया कितना कठोर या फिर कितना लचीला है ये आप इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि –

लगभग 73 वर्षों में, जब मैं ये लेख लिख रहा हूँ 104 संविधान संशोधन हो चुकी है। इसीलिए इसे मिश्रित संशोधन प्रक्रिया भी कहा जाता है।

🔷 संविधान के भाग 20 के अनुच्छेद 368 संसद को ये शक्ति देता है कि वो संविधान के किसी उपबंध का परिवर्धन (Additions), परिवर्तन (Change) या निरसन (Cancellation) कर सकता है।

पर 1973 में सुप्रीम कोर्ट ने एक शर्त इसमें जोड़ दी कि संसद ‘संविधान के मूल संरचना‘ को कभी संशोधित नहीं कर सकता।

एक बिलकुल ही नया कानून बनाने और बने हुए कानून को संशोधित करने में अंतर होता है। हालांकि होता दोनों एक ही जगह, संसद में ही है।

ये लेख चूंकि संविधान संशोधन प्रक्रिया (Constitution amendment process) के बारे में है तो हम उसी पर चर्चा करेंगे। नया कानून बनाने पर क्या सब होता है, उसे किसी अगले लेख में समझेंगे।

Constitution Amendment Process 

🔷 अनुच्छेद 368 में ही संविधान संशोधन प्रक्रिया (Constitution amendment process) का उल्लेख किया गया है।

🔳1. संविधान संशोधन का काम सिर्फ संसद में होगा न कि किसी राज्य विधानमंडल में।

🔳2. अमुक संशोधन विधेयक को किसी मंत्री या फिर किसी गैर-सरकारी सदस्य द्वारा भी संसद पटल पर रखी जा सकती है। इसमें राष्ट्रपति की मंजूरी की कोई आवश्यकता नहीं होती।

🔳3. प्रत्येक सदन में विधेयक को अलग-अलग पारित करवाना जरूरी होता है। क्योंकि दोनों सदनों के संयुक्त बैठक जैसी कोई व्यवस्था इसमें नहीं होती है।

🔳4. दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पास हो जाने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास सहमति के लिए भेजा जाता है।

(हालांकि कभी-कभी राज्यों के विधानमंडल के पास भी भेजा जाता है, वो कब भेजा जाता है उसकी चर्चा आगे करेंगे)

🔳5. राष्ट्रपति को अपनी सहमति देनी ही पड़ती है, वे न तो विधेयक को अपने पास रख सकते है और न ही संसद के पास पुनर्विचार के लिए भेज सकते है।

🔳6. राष्ट्रपति की सहमति के बाद वे संशोधन विधेयक एक अधिनियम बन जाता है। अन्य दूसरे अधिनियम की तरह ये भी संविधान का एक हिस्सा बन जाता है।

संविधान संशोधन के प्रकार
(Types of Constitution amendment process)

अनुच्छेद 368 के अनुसार 2 प्रकार से संशोधन की व्यवस्था की गयी है।

🔳 1. संसद के विशेष बहुमत द्वारा (By a special majority of parliament)

🔳 2. संसद के विशेष बहुमत के साथ-साथ आधे राज्य विधानमंडल की संस्तुति (Recommendation of half the state legislature along with special majority of parliament)

संशोधन का एक और प्रकार भी होता है जिसे ‘संसद के साधारण बहुमत द्वारा संशोधन‘ कहा जाता है। पर ये अनुच्छेद 368 के तहत नहीं आता है।

अगर आपको याद हो ‘भारतीय संघ एवं उसके क्षेत्र‘ नामक लेख में हमने पढ़ा था कि-

संविधान के कुछ उपबंधों को साधारण बहुमत से भी संशोधित किया जा सकता है। जैसे कि – नए राज्यों का भारतीय संघ में प्रवेश या गठन, जिसकी चर्चा अनुच्छेद 2 में है।

नए राज्यों का निर्माण और उसके क्षेत्र, सीमाओं या संबन्धित राज्याओं के नामों का परिवर्तन, जिसकी चर्चा अनुच्छेद 3 में है।

इसके अलावा, दूसरी अनुसूची, पाँचवी अनुसूची, छठी अनुसूची इत्यादि को भी संसद के साधारण बहुमत द्वारा संशोधन किया जा सकता है।

संसद के विशेष बहुमत द्वारा
(By a special majority of parliament) 

संविधान के ज़्यादातर उपबंधों का संशोधन संसद के विशेष बहुमत द्वारा किया जाता है।
विशेष बहुमत का मतलब होता है –

🔳 प्रत्येक सदन के कुल सदस्यों का बहुमत और उस दिन सदन में उपस्थित और मतदान में भाग लेने वाले का दो तिहाई बहुमत।

आइये इसे उदाहरण से समझते हैं – जैसे कि लोकसभा की बात करें तो वहाँ कुल 545 सदस्य होते है। अब इसका साधारण बहुमत निकालें तो ये 273 होता है। यानी कि इतना तो चाहिए ही।

अब मान लेते हैं कि जिस दिन वोटिंग होनी है उस दिन सिर्फ 420 सदस्य ही सदन में उपस्थित है और वे सभी मतदान में भाग लेंगे तो,

उन सब का दो तिहाई बहुमत होना चाहिए। यानी कि 280 सदस्यों की सहमति। यही होता है विशेष बहुमत।

🔷 मूल अधिकार, राज्य की नीति के निदेशक तत्व, इस तरह के संशोधन व्यवस्था में शामिल है।

इसके अलावा वे सभी उपबंध जो ‘साधारण बहुमत द्वारा’ और ‘विशेष बहुमत + आधे राज्यों से संस्तुति द्वारा’ श्रेणियों से सम्बद्ध नहीं है।

संसद के विशेष बहुमत एवं राज्यों की स्वीकृति द्वारा
(By a special majority of parliament and the acceptance of states)
 

🔷 भारत के संघीय ढांचे से संबन्धित जो भी संशोधन होता है उसके लिए संसद के विशेष बहुमत के साथ-साथ कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों की भी मंजूरी जरूरी होता है।

पर यहाँ याद रहे कि राज्य विधानमंडल में साधारण बहुमत से ही काम चल जाता है। संघीय ढांचे से संबन्धित कौन-कौन से मामले आते हैं, आइये उसे देखते हैं।

🔷 राष्ट्रपति का निर्वाचन एवं इसकी प्रक्रिया । 🔷 केंद्र एवं राज्य कार्यकारिणी की शक्तियों का विस्तार । 

🔷 उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय से संबन्धित मामले🔷 केंद्र एवं राज्य के बीच विधायी शक्तियों का विभाजन 

🔷 सातवीं अनुसूची से संबन्धित कोई विषय 🔷 संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व

🔷 संविधान का संशोधन करने की संसद की शक्ति और इसके लिए प्रक्रिया, इत्यादि-इत्यादि

ऊपर तीन प्रकार के बहुमत की चर्चा की गयी है पर इसके अलावे भी बहुमत की प्रक्रिया होती है। उसे आपको जरूर समझना चाहिए।

-| यहाँ क्लिक करके उसे समझें |-
बहुमत के प्रकार

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