इस लेख में हम ‘आरक्षण का संवैधानिक आधार (Constitutional Basis of Reservation)‘ पर चर्चा करेंगे एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने का प्रयास करेंगे।

🔹 समझने की दृष्टि से इस पूरे लेख को चार मुख्य भागों में बाँट दिया गया है। यह इसका दूसरा भाग है। इसे पढ़ने से पहले इसके पहले भाग को अवश्य पढ़ लें, वहाँ हमने भारत में आरक्षण के आधारभूत तत्व[1/4] को समझा था।

आगे आने वाले लेख में हम क्रमश: और आरक्षण का विकास क्रम[3/4] और रोस्टर सिस्टम : आरक्षण के पीछे का गणित[4/4] को समझेंगे, तो बेहतर समझ के लिए संबन्धित सभी लेखों का अध्ययन करें।

चूंकि संपूर्ण आरक्षण प्रणाली मौलिक अधिकारों (विशेषकर समानता के अधिकार) के इर्द-गिर्द घूमती है, हमारा सुझाव है कि बेहतर समझ के लिए आप कम से कम मौलिक अधिकारों पर एक नज़र डालें।

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Constitutional Basis of Reservation - आरक्षण का संवैधानिक आधार
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भारत में आरक्षण का संवैधानिक आधार (Constitutional basis of reservation in India):

जब देश आजाद हुआ तब भारत ऐसी स्थिति में नहीं था कि एकदम से सबको समान (equal) मान लिया जाए और सबकुछ ऐसे ही चलने दिया जाए। सैंकड़ों वर्षों की गुलामी और अथाह संसाधनों को गवाने के बाद भारत एक निर्धन, लाचार और कई सामाजिक विकृतियों से ग्रसित था।

ऐसे में उस समय के नीति-नियंताओं के पास कई महत्वपूर्ण कामों में से एक काम ये भी था कि किसी भी तरह से सबको एक धरातल पर लाया जाए।

क्योंकि जिन आदर्शों और लक्ष्यों को लेकर भारत ने आजादी की लड़ाई लड़ी, समानता (equality) और न्याय (justice) उसका मूल तत्व था। संविधान में प्रमुखता से इसे स्थान दिया गया है।

समानता के लिए जरूरी था कि समाज के उन व्यक्तियों, समुदायों एवं वर्ग विशेषों के साथ न्याय हो जो कि गुलाम भारत में कभी भी गरीबी, शोषण, गंदगी, गुमनामी और बदहाली से निकल नहीं पाया। और न्याय के लिए जरूरी था कि इन लोगों के पक्ष में कुछ विशेष किया जाए।

संविधान निर्माता इस बात से अंजान नहीं थे। इसीलिए संविधान में ही इस बात का जिक्र कर दिया, ताकि ऐसे लोगों के पक्ष में सरकार कुछ विशेष कदम उठा सके।

हमने पिछले लेख में समझा कि किस तरह अनुच्छेद 14 एवं खास कर के अनुच्छेद 15 एवं 16 के तहत समाज के पिछड़े वर्ग के पक्ष में कुछ करने या आरक्षण की व्यवस्था की गई।

समाज के अल्पसंख्यक वर्गों को अनुच्छेद 29 एवं 30 के तहत विशेष सुविधाएं दी गई ताकि वे मूल्यों एवं मान्यताओं के साथ अपनी संस्कृति को बचाए रखते हुए समाज के मुख्य धारा में शामिल हो सके।

समय के साथ-साथ जैसे-जैसे महसूस की गई, वैसे-वैसे आरक्षण के दायरे को बढ़ाया गया, जैसे कि पंचायतों एवं नगरपालिकाओं में आरक्षण की व्यवस्था करना, ओबीसी जैसे एक श्रेणी को संवैधानिक आधार देना इत्यादि।

आरक्षण का संवैधानिक आधार सहज़ और स्पष्ट रहे इसके लिए हम इसे चार भागों में बांट लेते हैं –

(1) लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं में SC एवं ST का आरक्षण (Reservation of SC and ST in Lok Sabha and State Assemblies)
(2) पंचायतों एवं नगरपालिकाओं में SC, ST एवं महिलाओं का आरक्षण (Reservation for SC, ST and women in Panchayats and Municipalities)
(3) विभिन्न शिक्षण संस्थानों में प्रवेश में आरक्षण
(Reservation in admission in various educational institutions) एवं,
(4) पद के संबंध में या नियुक्ति में आरक्षण
(Reservation in respect of post or appointment)।

यहाँ ये याद रखें कि एससी एवं एसटी के संदर्भ में, लोकसभा एवं राज्य विधान मण्डल में इसकी आरक्षण की बात करें तो इसके लिए अलग से संवैधानिक व्यवस्था अनुच्छेद 330 एवं अनुच्छेद 332 में मिलती है। इसीलिए नियुक्ति, पद या प्रवेश में जो आरक्षण मिलता है उसके इसका कोई खास संबंध नहीं है।

| लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं में SC एवं ST का आरक्षण (Reservation of SC and ST in Lok Sabha and State Assemblies)

अनुच्छेद 330 लोकसभा में और अनुच्छेद 332 राज्य विधानसभाओं में एससी एवं एसटी के लिए आरक्षण से संबन्धित है।

यह दोनों अनुच्छेद मोटे तौर पर कहता है कि – लोकसभा या राज्य विधानसभाओं के संदर्भ में, किसी राज्य में या संघ राज्य क्षेत्र में एससी एवं एसटी के लिए आरक्षित सीटों की संख्या का अनुपात, लोकसभा में या राज्य विधानसभाओं में उस राज्य को आवंटित स्थानों की कुल संख्या से यथासंभव वही होगा जो उसकी जनसंख्या का अनुपात उस राज्य के कुल जनसंख्या में है। [नीचे दिये गए उदाहरण से इसे समझें]

Q. किस राज्य में एससी एवं एसटी की कितनी सीटें आरक्षित होगी; यह कैसे निर्धारित किया जाता है?

इसे समझने के लिए बिहार का उदाहरण लेते हैं, जहां लोकसभा की 40 सीटें है। बिहार की कुल जनसंख्या का लगभग 15 प्रतिशत लोग एससी वर्ग में आते हैं तो इसका मतलब ये हुआ कि 40 सीटों में से 15 प्रतिशत भाग पर एससी सीटों का आरक्षण होगा; यानी कि 6 सीटों पर, और ये वहाँ होगा जहां पर उसकी आबादी है।

वहीं बिहार की कुल जनसंख्या का लगभग 1 प्रतिशत लोग एसटी वर्ग में आते हैं इसीलिए बिहार में एसटी वर्ग को लोकसभा में कोई आरक्षण नहीं मिलता है। कम से कम 1 सीट पाने के लिए कम से कम 2.5 से 3 प्रतिशत की एसटी आबादी होनी चाहिए। 

अनुच्छेद 332 विधानसभा में एससी एवं एसटी वर्ग के आरक्षण के बारे में बताता है और इसका भी प्रावधान वही है जो लोकसभा के मामले में था।

उदाहरण के लिए, बिहार को देखें तो वहाँ विधानसभा में 243 सीटें है और जैसा कि हमने ऊपर बात की एससी वर्ग की जनसंख्या बिहार की कुल जनसंख्या में लगभग 15% है और 1 प्रतिशत से कुछ अधिक एसटी कि जनसंख्या है। इसीलिए बिहार विधानसभा में SC के लिए 243 सीटों में से 38 सीटें आरक्षित है जबकि 2 सीटें ST के लिए आरक्षित है। 

कुल मिलाकर बात करें तो, 2001 के जनगणना के अनुसार पूरे देश की जनसंख्या में एससी का प्रतिशत लगभग 16 है और एसटी का प्रतिशत लगभग 8 है, तो इसी हिसाब से मोटे तौर पर कुल लोकसभा के कुल 543 सीटों में से 131 सीटें एससी एवं एसटी के लिए आरक्षित है। 

2008 में परिसीमन आयोग द्वारा जारी आदेश के अनुसार, 412 सीटें सामान्य, 84 सीटें अनुसूचित जाति और 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं।

[विधानसभा के मामले में भी हमने यहाँ बिहार का उदाहरण लिया है अगर आप किसी और राज्य का उदाहरण लेंगे तो हो सकता है किसी में एसटी सीटों का आरक्षण सबसे अधिक हो और किसी में एससी का।]

[यहाँ पर ये याद रखिए,

सीटों की गणना के लिए 2001 की जनगणना का इस्तेमाल किया जाता है। और जब तक 2026 के बाद पहली जनगणना नहीं हो जाती है तब तक यही जनगणना आरक्षण का आधार रहेगा। 

2008 में परिसीमन आयोग (delimitation commission) द्वारा जारी आदेश के अनुसार, लोकसभा के 543 सीटों में से 84 सीटें एससी वर्ग के लिए आरक्षित है, 47 सीटें एसटी वर्ग के लिए आरक्षित है और 412 सीटें सामान्य वर्ग के लिए।

इसका ये मतलब नहीं है एससी एवं एसटी वर्ग के लोग इसके अलावा अन्य सीटों पर चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। हाँ, जहां ये सीटें आरक्षित है और अन्य वर्गों के प्रत्यासी इन सीटों पर चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। सामान्य लोग सिर्फ 412 सीटों पर चुनाव लड़ सकते हैं।

महिलाओं के लिए लोकसभा एवं विधानसभा में आरक्षण की व्यवस्था नहीं है। हालांकि स्थानीय स्व-शासनों (local self-governments) जैसे कि पंचायत एवं नगर पालिका चुनाव में महिलाओं को 1/3 प्रतिशत आरक्षण मिलता है। इसका क्या माज़रा है आइये समझते हैं] 

| पंचायतों एवं नगरपालिकाओं में SC, ST एवं महिलाओं का आरक्षण (Reservation for SC, ST and women in Panchayats and Municipalities)

संविधान का भाग 9 पंचायत से संबन्धित है और भाग 9 ‘A’ नगरपालिका से संबंधित है। पंचायत में आरक्षण अनुच्छेद 243 ‘D’ के तहत मिलता है और नगरपालिका में आरक्षण अनुच्छेद 243 ‘T’ के तहत मिलता है। दोनों अनुच्छेद मोटे तौर पर क्रमशः पंचायत एवं नगरपालिका के संदर्भ में एक ही बात कहता है और वो ये है कि,

”प्रत्येक पंचायत और नगरपालिका में, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए स्थानों का आरक्षण होगा। और इन आरक्षित सीटों का अनुपात, उस अमुक पंचायत या नगरपालिका के कुल सीटों से यथासंभव उतना ही होगा जितना कि एससी एवं एसटी का अनुपात उस पंचायत या नगरपालिका की जनसंख्या में है। और उन आरक्षित सीटों में से भी एक तिहाई सीटों पर एससी एवं एसटी वर्ग के महिलाओं का आरक्षण होगा।”

[उदाहरण के लिए, अगर किसी पंचायत या नगरपालिका में 12 सीटों पर चुनाव लड़ा जाना है और उस अमुक क्षेत्र में 50 प्रतिशत एससी एवं एसटी वर्ग है तो 6 सीटें एससी एवं एसटी के लिए आरक्षित रहेगी। और इन 6 सीटों में से 2 सीटें एससी या एसटी के महिलाओं द्वारा भरा जाएगा।]

दूसरी बात ये है कि प्रत्येक पंचायत या नगरपालिका के कुल सीटों का एक तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित है। और इसमें एससी एवं एसटी वर्ग के महिलाओं द्वारा भरी जाने वाली सीटें भी शामिल है।

[ऊपर दिए गए उदाहरण के अनुसार, कुल 12 सीटों में से 4 सीटें महिलाओं द्वारा भरी जाएंगी, क्योंकि 1/3 सीटों पर महिलाएं होनी चाहिए।

पर जैसा कि हमने ऊपर देखा 2 सीटें पहले ही एससी और एसटी वर्ग के महिलाओं द्वारा भरी जा चुकी है इसीलिए अब जो बाकी के 2 सीटें महिलाओं द्वारा भरी जाएंगी वो सामान्य वर्ग के महिलाओं द्वारा सामान्य सीटों पर भरी जाएंगी।

हालांकि अगर विधानसभा चाहे तो बाकी के 2 सीटों को OBC महिलाओं के लिए आरक्षित कर सकती है।]

तो कुल मिलाकर यहाँ तक हमने समझ लिया कि लोकसभा, विधानसभा, पंचायत एवं नगरपालिका में किसको-किसको आरक्षण मिलता है और किसको नहीं।

आइये अब मुख्य धारा के आरक्षण का संवैधानिक आधार समझते हैं। यानी कि कॉलेज एवं यूनिवर्सिटी आदि में प्रवेश में आरक्षण, और किसी पद के संबंध में या नियुक्ति में आरक्षण।

| विभिन्न शिक्षण संस्थानों में प्रवेश में आरक्षण (Reservation in admission in various educational institutions):

अनुच्छेद 30 यह व्यवस्था करता है कि सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षा संस्थानों की स्थापना और उस पर प्रशासन का अधिकार होगा। यहाँ अल्पसंख्यक का मतलब है मुस्लिम, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी एवं ईसाई।

यह अनुच्छेद पूरी तरह से अल्पसंख्यकों को समर्पित है इसीलिए इन संस्थानों में 100 परसेंट आरक्षण इन्ही लोगों का है। 

इसके अलावा अनुच्छेद 46 के तहत एससी एवं एसटी एवं दुर्बल वर्गों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की अभिवृद्धि की बात कही गई है। 

इसके तहत राज्य का ये कर्तव्य है कि राज्य जनता के दुर्बल वर्गों विशेष रूप से एससी और एसटी के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करेगा और सामाजिक न्याय एवं सभी प्रकार के शोषण से उसकी रक्षा करेगा। 

इसके तहत आरक्षण की व्यवस्था की जा सकती है लेकिन समस्या ये है कि ये राज्य के नीति निदेशक तत्व (DPSP) है, मौलिक अधिकार नहीं; इसीलिए अधिकार के रूप में इसकी मांग नहीं की जा सकती है। पर यह अनुच्छेद संविधान में एक संशोधन का कारण जरूर बना जिसके तहत प्रवेश में आरक्षण संबंधी प्रावधान स्पष्ट कर दिया गया। 

दरअसल ये बात है चंपकम दोराईराजन मामले 1951 की। उस समय मद्रास सरकार ने समुदाय के आधार पर कॉलेज में आरक्षण की व्यवस्था की थी। इसके खिलाफ चंपकम ने अपील की और दलील दी कि आरक्षण 15(1) एवं अनुच्छेद 29(2) के तहत ऐसा नहीं किया जा सकता है। 

जो कि सही भी था खासकर के अनुच्छेद 29 (2) तो पूरी तरह से इसके खिलाफ़ था क्योंकि ये कहता है कि राज्य द्वारा संचालित या राज्य निधि से संचालित किसी भी शिक्षण संस्थानों में किसी भी नागरिक को धर्म, नस्ल, जाति एवं भाषा या इनमें से किसी के आधार पर प्रवेश से नहीं रोका जा सकता है।

मद्रास सरकार ने दलील देते हुए कहा कि हम अनुच्छेद 46 को आधार बनाकर आरक्षण दे रहे है। यहाँ पर मद्रास सरकार भी सही था क्योंकि अनुच्छेद 46 इसे सपोर्ट करता है। लेकिन चूंकि अनुच्छेद 46 राज्य का नीति निदेशक तत्व है,

उच्चतम न्यायालय की सात जजों की बेंच ने मूल अधिकारों को डीपीएसपी पर सर्वोपरि माना। और इस आदेश को पलट दिया, जिसमें योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि जाति के आधार पर सीटें आवंटित की गई थीं।

और इसी को खारिज करने के लिए भारत सरकार ने पहला संविधान संशोधन किया।

जिसके तहत अनुच्छेद 15(4) जोड़ा गया और ये व्यवस्था कर दी गई कि इस अनुच्छेद की या अनुच्छेद 29 (2) की कोई भी बात पिछड़े हुए नागरिकों के किन्ही वर्गों के लिए, या एसटी एवं एससी के लिए विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी। 

इस तरह से शिक्षण संस्थानों में प्रवेश में आरक्षण का रास्ता, पिछड़े वर्ग, एससी वर्ग या एसटी वर्ग के लिए साफ हो गया। 

हालांकि अनुच्छेद 15(4) में एक पेंच यह है कि यहां यह तो लिखा हुआ है कि राज्य, Socially and Educationally Backward Class को और SC एवं ST वर्ग के लिए विशेष उपबंध (Special Provision) कर सकती है। लेकिन ये कहीं नहीं लिखा हुआ है कि कॉलेज आदि जैसे शिक्षण संस्थानों में प्रवेश (Admission) में आरक्षण दिया जाएगा। और इसीलिए यह एक विवाद का मुद्दा भी बना जिसे कि Ajay Kumar v. State of Bihar मामले में सुलझाया गया।

Ajay Kumar vs The State Of Bihar And Ors on 1 May, 2019
अजय कुमार बनाम बिहार राज्य मामले में स्नातकोत्तर चिकित्सा पाठ्यक्रमों में अनुच्छेद 15(4) के तहत आरक्षण प्रदान करने की अनुमति के संबंध में मुद्दा उठाया गया था। अपीलकर्ता का तर्क यह था कि अनुच्छेद 15(4) न तो शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की बात करता है और न ही इसकी अनुमति देता है। इस अपील को अदालत ने खारिज कर दिया और कहा कि विशेष उपबंध (Special Provision) में आरक्षण का प्रावधान भी शामिल हैं।
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याद रखें;

अनुच्छेद 15(4) में सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े हुए लोगों के लिए “जाति (Caste)” शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है बल्कि “वर्ग (Class)” शब्द का इस्तेमाल किया गया है। इसे समझना इसीलिए जरूरी है क्योंकि यह मामला भी कई बार न्यायालय के समक्ष आया है। उदाहरण के लिए नीचे दिये गए कुछ मामलों को देख सकते हैं;

बालाजी बनाम मैसूर राज्य (1963) मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘पिछड़ा’ माने जाने के लिए सामाजिक और शैक्षिक दोनों रूप से पिछड़ा होना जरूरी है। और दूसरी बात कि अनुच्छेद 15 का खंड (4) जाति (Caste) की नहीं बल्कि वर्ग (Class) की बात करता है।
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ए पेरियाकरुप्पन बनाम तमिलनाडु राज्य (1971) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जाति के आधार पर सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को वर्गीकृत करना अनुच्छेद 15(4) का उल्लंघन है।
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आंध्र प्रदेश राज्य बनाम यूएसवी बलराम (1972) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जाति इस बात का निर्धारण करने वाला कारक नहीं होनी चाहिए कि कोई व्यक्ति पिछड़े वर्ग का है या नहीं। पिछड़े वर्ग को परिभाषित करने में सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए।
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Article 15(5) के तहत दी जाने वाली आरक्षण:

🔹 अनुच्छेद 15 के खंड (5) को 93वां संविधान संशोधन अधिनियम 2005 के माध्यम से अनुच्छेद 15 में जोड़ा गया है। अनुच्छेद 15(4) का ही यह विस्तार है जिसमें कुछ चीज़ें नई जोड़ी गई है और स्पष्टता लाने का प्रयास किया गया है।

अनुच्छेद 15(5) में कहा गया है कि अनुच्छेद 15 या अनुच्छेद 19(1)(G) में कुछ भी लिखा होने के बावजूद भी सरकार चाहे तो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े नागरिकों के साथ-साथ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए विशेष कानूनी प्रावधान कर सकता है। वो भी तब जब यह विशेष प्रावधान शिक्षण संस्थानों में प्रवेश से संबन्धित हो।

तो आप यहां पर देख सकते हैं कि यहां पर स्पष्ट रूप से शिक्षण संस्थानों में प्रवेश (Admission) को लिख दिया गया है। इतना ही नहीं इस अनुच्छेद के दायरे में सरकारी शिक्षण संस्थान तो आता ही है साथ ही प्राइवेट शिक्षण संस्थान भी आता है भले ही वो सरकारी सहायता प्राप्त हो या न हो।

हालांकि यहां यह याद रखिए कि इसके तहत अनुच्छेद 30 के खंड (1) के तहत आने वाली शिक्षण संस्थान शामिल नहीं है। [यहां पर आपके मन में सवाल आ सकता है कि अनुच्छेद 30(1) के तहत किस तरह का शिक्षण संस्थान आता है?]

दरअसल अनुच्छेद 30 यह व्यवस्था करता है कि सभी अल्पसंख्यक वर्गों अपनी रुचि की शिक्षा संस्थानों की स्थापना और उस पर प्रशासन कर सकता है (भले ही वो अल्पसंख्यक धार्मिक या भाषाई हो)। इसीलिए अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को यहां छोड़ दिया गया है।

दूसरी बात यहां यह भी याद रखने योग्य है कि अनुच्छेद 15 के चौथे खंड के तहत जिस तरह से अनुच्छेद 29(2) को Bypass किया गया था उसी तरह से इस खंड के तहत अनुच्छेद 19 के खंड (1) के उपखंड (g) को bypass किया गया है।

ऐसा इसीलिए क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत यह कहा गया है कि देश का प्रत्येक नागरिक अपनी पसंद का कोई भी पेशा, व्यापार, व्यवसाय या व्यवसाय अपनाने के लिए स्वतंत्र है। लेकिन अगर मान लीजिए कि सरकार यह कहें कि जिसने 12वीं में Biology से पढ़ाई की है सिर्फ वही व्यक्ति मेडिकल कॉलेज में प्रवेश ले सकता है।

ऐसे में कोई यह आपत्ति उठा सकता है कि हमारे साथ भेदभाव हो रहा है, जब अनुच्छेद 19(1)(g) में यह लिखा हुआ है कि हम कोई भी पेशा अपना सकते हैं फिर हमें यहां पर क्यों रोका जा रहा है। इसी तरह की स्थितियों से बचने के लिए इसे यहां पर बाइपास किया गया है।

Article 15(6) के तहत दी जाने वाली आरक्षण:

🔹 साल 2019 में 103वां संविधान संशोधन के माध्यम से अनुच्छेद 15(6) जोड़ा गया और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई।

इसे क्यों जोड़ा गया इसकी कहानी हम अगले भाग में समझेंगे, यहां पर इतना समझिए, अब तक हमने जो अनुच्छेद 15(4) और (5) के तहत आरक्षण के बारे में समझा वो मुख्य रूप से सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए था, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए नहीं।

इसीलिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए आरक्षण देने की मांग भी उठती रही है। 1991 में पी. वी. नरसिंहराव की सरकार ने सामान्य वर्गों के गरीब या आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को 10 % अलग से आरक्षण देने की पहल भी की। लेकिन उस समय उच्चतम न्यायालय ने इन्दिरा साहनी मामले में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की मांग को खारिज कर दिया था।

लेकिन साल 2019 में इसे NDA सरकार ने 103वां संविधान संशोधन के माध्यम से इसे संवैधानिक दर्जा दिया और इस तरह से EWS के लिए भी अलग से 10% आरक्षण का रास्ता साफ हो गया।

इसके लिए अनुच्छेद 15(6) में लिखवा दिया गया कि अनुच्छेद 15 की कोई बात और अनुच्छेद 29(2) एवं अनुच्छेद 19(1)(g) की कोई बात, EWS को शिक्षण संस्थानों में प्रवेश से रोकेगा नहीं।

यहाँ पर आप देख सकते हैं कि EWS के लिए भी SC, ST या पिछड़े वर्ग की तरह आरक्षण में समरूपता सुनिश्चित करने के लिए अनुच्छेद 29(2) और अनुच्छेद 19(1)(g) को बाइपास किया गया है। और इस तरह से EWS लिए प्रवेश में 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था कर दी गई। 

[यहाँ पर ये याद रखिए कि EWS में वही शामिल होंगे, जिसे कि सरकार द्वारा समय-समय पर पारिवारिक आय एवं अन्य आर्थिक सूचकों पर निर्धारित किया जाएगा।]

तो कुल मिलाकर ये है प्रवेश के संबंध में आरक्षण देने का संवैधानिक आधार। अब आइये अनुच्छेद 15(3) के तहत जो महिलाओं के पक्ष में विशेष प्रावधान की बात की गई है उसके बारे में कुछ बात कर लेते हैं;

महिलाओं के लिए विशेष उपबंध (Special provisions for women):

अनुच्छेद 15 (3) में ये लिखा हुआ है कि राज्य स्त्रियों एवं बालकों के लिए विशेष उपबंध कर सकता है। इसे स्त्रियों को आरक्षण या वरीयता से जोड़ कर देखा जा सकता है।

पर जैसा कि हमने ऊपर भी चर्चा किया है कि स्त्रियों को वर्टिकल आरक्षण नहीं मिलता है बल्कि क्षैतिज आरक्षण मिलता है। यानि कि जो आरक्षण SC, ST, OBC एवं EWS को मिलती है उसी में से कुछ हिस्सा महिलाओं को मिल जाता है। उदाहरण के लिए इस मामले को देखिए;

यूनियन ऑफ इंडिया बनाम के.पी. प्रभाकरन (1997), मामले में रेलवे द्वारा यह निर्णय लिया गया था कि मुंबई, दिल्ली, कोलकाता और चेन्नई में Enquiry एवं reservation clerks की जो नियुक्ति होगी उसे सिर्फ महिलाओं द्वारा भरा जाएगा। रेलवे की तरफ से यह तर्क दिया गया कि हम यह काम अनुच्छेद 15(3) के तहत कर रहें है। लेकिन कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया और कहा कि अनुच्छेद 15(3) को अनुच्छेद 16 (1) एवं (2) के तहत गारंटी अधिकार के अपवाद के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता है।

एक दूसरे मामले पर नजर डालिए

चोकी बनाम राजस्थान राज्य मामला (1957) के तहत हुआ ये था कि माउंट चोकी और उसके पति ने साजिश रचकर अपने बच्चे की हत्या कर दी। फिर माउंट चोकी ने यह कहते हुए जमानत (bail) मांगी कि चूंकि वह एक महिला है इसीलिए उसे जमानत मिलनी चाहिए ताकि वो अपने बच्चे की देखभाल कर सके। राजस्थान उच्च न्यायालय ने इसे खारिज कर दिया और माउंट चोकी को जमानत नहीं मिला। तो उसने इसे सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया। और सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए उसे जमानत दे दी कि अनुच्छेद 15(3) महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान की बात करता है।

इन दोनों मामलों के माध्यम से आप समझ गए होंगे कि महिलाओं के लिए विशेष उपबंध (Special Provision) का क्या मतलब है।
Constitutional Basis of Reservation

याद रखें; महिलाओं को अलग से आरक्षण सिर्फ पंचायत एवं नगरपालिका में ही मिलता है, नौकरियों में नहीं। जहां तक प्रवेश (Admission) की बात है तो वहां चीज़ें कुछ इस तरह से काम करती है;

विश्वविद्यालय दो अलग-अलग श्रेणियों से आरक्षण प्रतिशत के आधार पर सीटें आवंटित करते हैं:

(1) Reservation Category – SC , ST , OBC, EWS और अन्य अल्पसंख्यक ;

(2) Open Category – General, SC, ST, OBC, EWS और अन्य अल्पसंख्यक) ;

आवंटन में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सहित आरक्षण श्रेणी को कुछ इस तरह से प्राथमिकता दी जाती है; Other Minority Women — ST women — SC Women — ST Male — SC Male — OBC Women — OBC Male — EWS Women — EWS Male और फिर Open Category आता है। 

तो यहां प्रवेश में आरक्षण के बारे में हमने जो भी समझा वो अनुच्छेद 15 के संदर्भ में समझा। अब हम आगे नियोजन या नियुक्ति में जो आरक्षण के बारे में समझने वाले हैं उसे हम अनुच्छेद 16 के संदर्भ में समझेंगे;

| पद के संबंध में या नियुक्ति में आरक्षण (Reservation in respect of post or appointment)

Constitutional Basis of Reservation

अनुच्छेद 16(1) के तहत कहा गया है कि राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबन्धित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी।

इसका मतलब यह है कि राज्य, उसके अधीन किसी भी पद पर ‘नियुक्ति (Appointment)’ या ‘रोजगार (Employment)’ से संबंधित मामलों में अवसर की समानता की गारंटी देता है।

इसी तरह से अनुच्छेद 16 के खंड (2) को देखें तो उसमें कहा गया है कि राज्य के अधीन किसी नियोजन या पद के संबंध में केवल धर्म (Religion), मूलवंश (Race), जाति (Caste), लिंग (Sex), उद्भव (Descent) जन्मस्थान (Place of Birth), निवास (Residence) या इनमें से किसी के आधार पर न तो कोई नागरिक अपात्र होगा और न उससे विभेद किया जाएगा।

यहां पर 7 ऐसे कारकों को चिन्हित किया गया है जिसके आधार पर राज्य अपने नागरिकों के साथ सार्वजनिक रोजगार में भेदभाव नहीं कर सकता है।

इन दोनों खंडों के अलावा जो अन्य खंड है वे इन्ही दोनों खंडों का अपवाद (Exception) है। क्योंकि इन दोनों खंडों के हिसाब से तो आरक्षण जैसी चीज़ें होनी ही नहीं चाहिए, लेकिन फिर भी नौकरियों में आरक्षण मिलता है, क्यों मिलता है, आइये समझते हैं;

| अनुच्छेद 16 (3) के तहत निवास (Residence) और आरक्षण

अनुच्छेद 16(2) के तहत बताया गया है कि 7 आधारों पर किसी नागरिक के साथ नौकरियों में भेदभाव नहीं किया जाएगा। जिसमें से एक निवास (Residence) भी है। लेकिन अनुच्छेद 16 का यह खंड इसे अपवाद बनाता है।

इसे आप इस तरह से समझ सकते हैं कि यदि एक विकसित राज्य के लोग अविकसित राज्यों में जाकर नौकरियाँ ले रहा है, तो जाहिर है इससे अविकसित राज्यों के विकास में काफी बाधाएं आ सकती है।

इसी को ध्यान में रखकर अनुच्छेद 16 के तीसरे प्रावधान के तहत यह व्यवस्था की गई है कि जहां पर नौकरियाँ उत्पन्न हुई है वहाँ के लोकल लोगों को इसमें प्राथमिकता दी जाए। यानि कि निवास को आरक्षण का आधार बनाया जा सकता है।

लेकिन यहाँ पर याद रखिए कि इसका ये मतलब नहीं है कि अगर किसी गाँव में नौकरियाँ निकली है तो सिर्फ गाँव के लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी। बल्कि उस राज्य के लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी। यानी कि इस प्रावधान का लाभ लेने के लिए राज्य को एक यूनिट माना जाता है न कि गाँव, प्रखण्ड या जिले को।

| एससी, एसटी एवं ओबीसी के लिए नौकरियों में आरक्षण का संवैधानिक आधार (Constitutional basis of reservation in Jobs for SC, ST and OBC):

अनुच्छेद 16(4) के तहत कहा गया है कि इस अनुच्छेद में किसी बात के होते हुए भी, राज्य पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों में आरक्षण की व्यवस्था कर सकता है। [किस वर्ग को कितना आरक्षण मिलेगा इसे हम अगले भाग में समझने वाले हैं;]

यह प्रावधान बहुत ही महत्वपूर्ण है, ऐसा इसीलिए क्योंकि सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों (Backward Class) को जो आरक्षण मिलता है वो इसी के तहत दी जाती है। यानी कि यह प्रावधान भी अनुच्छेद 16 के पहले और दूसरे प्रावधान के अपवाद हैं।

लेकिन यहां पर यह याद रखिए कि केवल तभी लागू हो सकता है जब दो शर्तें पूरी होती हों; यानि कि 

(पहला) नागरिकों का वह वर्ग पिछड़ा (Backward) होना चाहिए; और 

(दूसरा) इस वर्ग का प्रतिनिधित्व राज्य सेवाओं में कम होना चाहिए।

[अब ये पिछड़ा वर्ग (backward class) कौन है या फिर कौन पिछड़ा वर्ग हो सकता है इसकी चर्चा अनुच्छेद 342A के तहत किया गया है, अनुच्छेद 16 में इसे परिभाषित नहीं किया गया है। यहां बस इतना याद रखिए कि यहां जो पिछड़ा वर्ग  (Backward Class) एक शब्द है जिसका उपयोग भारत में उन सामाजिक समूहों या समुदायों को संदर्भित करने के लिए किया जाता है जो ऐतिहासिक रूप से समाज के अधिक विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों की तुलना में सामाजिक और शैक्षिक रूप से वंचित रहे हैं।]

◾ यहाँ यह याद रखिए कि अनुच्छेद 16 के खंड 1 और 2 के कुछ प्रावधान ऐसे हैं जो कि आरक्षित लोगों पर समान रूप से लागू होता है जैसे कि पेंशनवेतनवृद्धिनियोजन की शर्तें इत्यादि। कहने का अर्थ है कि वेतन (Salary), वेतनवृद्धि (increment), उपदान (Gratuity), पेंशन आदि में कोई आरक्षण काम नहीं करता है।

यहाँ पर एक बात और याद रखने वाली है कि दो संशोधनों के माध्यम से अनुच्छेद 16(4) में दो उपखंड (4A और 4B) जोड़े गए हैं;

77वें संविधान संशोधन 1995 की मदद से एससी एवं एसटी वर्ग के लोगों के लिए आरक्षण और प्रोन्नति (Promotion) में पारिणामिक ज्येष्ठता (Consequential seniority) को जोड़ा गया है। और,

81वां संविधान संशोधन अधिनियम 2000 की मदद से SC, ST एवं OBC की बैकलॉग रिक्तियों (backlog vacancies) को आगे आने वाले वर्षों में भरे जाने की व्यवस्था की गई है। 

आइये इसे समझ लेते हैं;

अनुच्छेद 16 खंड 4 उपखंड 4A

आप देखेंगे कि अनुच्छेद 16(4) में पिछड़े वर्ग की आरक्षण की बात तो की गई है लेकिन SC एवं ST वर्ग का उसमें जिक्र नहीं है।

इस खंड में उसी को स्पष्ट किया गया है कि सरकार, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों, (जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की नजर में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है),के लिए आरक्षण की व्यवस्था कर सकती है।

77वां संविधान संशोधन अधिनियम 1995 के तहत इतना ही जोड़ा गया था लेकिन साल 2001 में पचासीवां संविधान संशोधन अधिनियम की मदद से इसमें एक और प्रावधान जोड़ा गया। और वो प्रावधान यह था कि एससी एवं एसटी वर्ग के लोगों के लिए प्रोन्नति (Promotion) में भी आरक्षण दिया जाएगा वो भी पारिणामिक ज्येष्ठता (Consequential seniority) के सिद्धांत का पालन करते हुए;

Promotion में आरक्षण तो समझ में आता है लेकिन ये पारिणामिक ज्येष्ठता (Consequential seniority) क्या है?

परिणामिक वरिष्ठता (Consequential seniority) क्या है?
मान लीजिये एक सामान्य वर्ग का आदमी सरकारी नौकरी में लेवल 3 पर है। अनुसूचित जाति के एक आदमी को उसी लेवल पर लेकिन सामान्य वर्ग के आदमी से जूनियर नियुक्त किया जाता है।
चूंकि प्रोन्नति (Promotion)में आरक्षण की व्यवस्था है इसीलिए अनुसूचित जाति के आदमी को सामान्य वर्ग से पहले प्रोन्नति मिल जाता है और वो अब उस सामान्य वर्ग के आदमी से सीनियर हो जाता है।
पारिणामिक वरिष्ठता कहता है कि अब अगर वो सामान्य वर्ग का आदमी को प्रोन्नति मिल भी जाता है तो भी वो अनुसूचित जाति के आदमी से जूनियर ही रहेगा।
Constitutional Basis of Reservation

दरअसल हुआ ये था कि विरपाल सिंह बनाम भारत सरकार 1995 और अजित सिंह जांजूआ बनाम पंजाब सरकार मामला 1996 के तहत न्यायालय द्वारा ये व्यवस्था दिया गया कि – SC या ST वर्ग को प्रमोशन में आरक्षण दिया जाता है और वो सामान्य वर्ग के व्यक्ति से सीनियर हो जाता है; ये ठीक है।

पर इसके बाद जब फिर से सामान्य वर्ग को प्रोन्नति मिलेगी तो फिर से वो अपनी स्थिति (position) को फिर से प्राप्त कर लेगा। यानी कि अगर सामान्य वर्ग का व्यक्ति पहले से SC वर्ग के व्यक्ति का सीनियर था तो वे फिर से उसका सीनियर हो जाएगा। इसे Catch up Rule कहा गया।

किन्ही कारणों से उस समय के सरकार ने इसे ठीक नहीं समझा और न्यायालय के इस व्यवस्था को ख़त्म करने के लिए साल 2001 में संविधान में 85वां संशोधन करके अनुच्छेद 16 (4A) में ये जोड़ दिया कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति को सरकारी सेवकों के प्रोन्नति के मामले में परिणामिक वरिष्ठता (Consequential seniority) का लाभ मिलेगा। [यानी कि Catch up Rule को इस प्रावधान के तहत खत्म कर दिया गया।]

अनुच्छेद 16 खंड 4 उपखंड 4B

इस उपखंड के तहत कहा गया है कि अनुच्छेद 16(4) और (4A) के तहत जो आरक्षण देने के लिए किसी वर्ष सीटों का निर्धारण किया जाता है वो अगर किसी कारणवश उस वर्ष नहीं भरा जाता है तो उन खाली सीटों को अगले साल पृथक (separate) रिक्तियों (Vacancy) के रूप में Treat किया जाएगा। भले ही ऐसा करने से आरक्षण की सीमा 50% को पार कर जाए।

Carry Forward Rule क्या है ?
इन्दिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कैरी फॉरवर्ड नियम को स्वीकृति दे दी लेकिन उसमें भी एक शर्त ये लगा दी कि ये 50% से ज्यादा नहीं होना चाहिए। दरअसल 1955 से ही कैरी फॉरवर्ड का नियम चलता आ रहा था लेकिन वो कुछ अलग ढंग से काम करता था।

इसे उदाहरण से समझिए – मान लीजिए किसी साल कुल 50 सीटों पर रिक्तियाँ निकली है और उसमें से 10 सीटों को SC वर्ग के व्यक्तियों से भरा जाना है। अगर किसी कारण से मान लीजिए कि 10 में से 8 सीटें खाली रह गया। तो वो 8 सीटें अगले साल कैरी फॉरवर्ड हो जाएंगी। अब मान लीजिए कि अगले वर्ष फिर से 50 सीटों पर रिक्तियाँ निकलती है और उसमें से 10 सीटें SC वर्ग के व्यक्तियों से भरा जाना है तो अब वे सीटें 18 हो जाएंगी क्योंकि 8 सीटें पिछले साल वाला भी खाली है। इसमें समस्या ये थी कि अगर किसी कारणवश कुछ साल SC के सभी सीटों को नहीं भरा जाता है तो फिर ऐसा वक्त आएगा जब सारी की सारी सीटें सिर्फ SC को ही चली जाएंगी और अन्य वर्ग के लिए कोई रिक्तियाँ बचेगी ही नहीं।
इसीलिए इन्दिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कैरी फॉरवर्ड नियम के लिए 50 % की ऊपरी सीमा तय कर दी ताकि किसी भी स्थिति में 50 % सीटें अन्य वर्गों के व्यक्तियों के लिए उपलब्ध रहे।
पर सरकार इससे खुश नहीं था क्योंकि वो चाहता था कि कैरी फॉरवर्ड के तहत चाहे जितनी भी सीटें क्यों न हो उसपर कोई ऊपरी सीमा नहीं रहनी चाहिए।

इसीलिए तत्कालीन सरकार ने 81वां संविधान संशोधन 2000 के माध्यम से अनुच्छेद 16 में एक नया क्लॉज़ 4 ‘B’ जोड़ दिया और और उसके तहत ये व्यवस्था कर दिया गया कि अनुच्छेद 16 (4) एवं 16 (4A) के तहत दिये गए आरक्षण में अगर किसी वर्ष सीटें खाली रह जाती और उसे अगले साल के लिए कैरी फॉरवर्ड किया जाता है तो अगले साल उसे पृथक (separate) सीटों के रूप में देखा जाएगा न कि उस साल निकले रिक्तियों में जोड़कर।

इसे उदाहरण से समझिए – मान लीजिए कि किसी वर्ष कुल 100 सीटों में से 15 सीटें SC वर्ग के व्यक्तियों से भरा जाना था लेकिन उस वर्ष सिर्फ 5 ही सीटें भर पायी और 10 सीटें खाली रह गई। मान लीजिए फिर से अगले साल 100 सीटों पर रिक्तियाँ निकलता है और 15 सीटें SC वर्ग के व्यक्तियों के लिए है तो पिछले साल वाली 10 सीटें इसमें नहीं जुड़ेंगे बल्कि ये 15 ही रहेगा और उन 10 सीटों को उससे अलग काउंट किया जाएगा। [अगले भाग में इसे आप और भी अच्छे से समझेंगे;]
Constitutional Basis of Reservation

🔹 इतना समझने के बाद आइये अब अनुच्छेद 16 के खंड (6) को समझते हैं जिसे कि 103वां संविधान संशोधन अधिनियम 2019 की मदद से अनुच्छेद 16 में जोड़ा गया और इसके तहत पदों एवं नियुक्तियों में आर्थिक आधार कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई। 

| EWS के लिए आरक्षण का संवैधानिक आधार (Constitutional Basis of Reservation for EWS):

अनुच्छेद 16(6) के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (economically weaker section – EWS) के व्यक्तियों के लिए अलग से 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई है;

हालांकि यह केवल तभी लागू हो सकता है जब दो शर्तें पूरी होती हों; यानि कि 

(पहला) अनुच्छेद 16(4) के तहत मिल रहे पिछड़े वर्गों के आरक्षण के अंतर्गत वह न आता हो; और 

(दूसरा) आर्थिक रूप से कमजोर या दुर्बल हो।

याद रखने के लिए आप यह याद रख सकते हैं कि जिन नागरिकों की आय 8 लाख रुपये प्रति वर्ष से कम है, लेकिन वे एससी, एसटी या ओबीसी श्रेणियों में नहीं आते हैं, उन्हें भारत सरकार द्वारा आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) को आरक्षण क्यों मिलता है?
1991 में पी. वी. नरसिंहराव की सरकार ने सामान्य वर्गों के गरीब या आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को 10 % अलग से आरक्षण देने की पहल की। लेकिन उस समय उच्चतम न्यायालय ने इन्दिरा साहनी मामले में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की मांग को खारिज कर दिया। दरअसल इस आरक्षण के पीछे का मूल तर्क यही है कि उच्च कहे जाने वाले जातियों में भी सभी की स्थिति ठीक नहीं है वहाँ भी ऐसे लोग है जो कि गरीबी, बदहाली या अपने ही लोगों द्वारा दबाये गए है। 
2019 में 103वां संविधान संशोधन के माध्यम से बीजेपी की सरकार ने आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग को 10 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की जो कि अभी चल रही है। 
Constitutional Basis of Reservation

यहां यह याद रखिए कि EWS को जो आरक्षण मिलता है वो ऊर्ध्वाधर (vertical) प्रकार का होता है। यानि कि जिस तरह से OBC को 27% आरक्षण मिलता है, SC को 15% आरक्षण मिलता है और ST को 7.5% आरक्षण मिलता है उसी प्रकार से अब EWS को 10% आरक्षण मिलता है।

विस्तार से समझें; Vertical and Horizontal Reservation : Differences↗

[अनुच्छेद 16 (4ए और 4B क्या है और क्यों है एवं पारिणामिक वरिष्ठता का सिद्धांत क्या है, इस सब को हम उदाहरणों के साथ अगले भाग में समझने वाले है]

[🔹 यहाँ ये भी याद रखिए कि ग्रूप सी एवं ग्रुप D की नियुक्तियों के मामले में जहां किसी राज्यक्षेत्र से लोगों को नियुक्ति किया जाना होता है वहाँ पर उस समुदाय की जनसंख्या उस राज्य की जनसंख्या में जितनी होती है उतनी ही आरक्षण उसे मिल सकती है। हालांकि ये प्रतिशत 27 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती है। साथ में ये भी ध्यान में रखा जाता है कि एससी एसटी एवं ओबीसी को दिये जाने वाले आरक्षण 50 परसेंट को क्रॉस न करें। 

खुली प्रतियोगी परीक्षाओं के तहत जब सीधी भर्ती की जाती है तो उस केस में एसटी को 7.5 प्रतिशत, एससी को 15 प्रतिशत, ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण मिलता है। वहीं अगर भर्ती बिना किसी खुली प्रतियोगिता के हो तो उस केस में 16.66 प्रतिशत एससी को, 7.5 प्रतिशत एसटी को और 25.84 प्रतिशत ओबीसी को आरक्षण मिलता है।] 

FAQs Related to Reservation [pdf]

तो कुल मिलाकर इस लेख में हमने चार अलग-अलग प्रकार के आरक्षण और उस आरक्षण के संवैधानिक आधार (Constitutional basis of reservation) को समझा है, कुछ भागों को जानबूझ कर ज्यादा विस्तार नहीं दिया गया है क्योंकि अगले भाग में हम विस्तार से उन सभी पहलुओं पर चर्चा करने वाले हैं।

अगले भाग को यहाँ से पढ़ें –

आरक्षण का विकास क्रम↗[3/4]
आरक्षण के पीछे का गणित यानी कि रोस्टर सिस्टम↗[4/4]
Related to Constitutional Basis of Reservation in India

Constitutional Basis of Reservation References,
https://legislative.gov.in/sites/default/files/COI.pdf
https://dopt.gov.in/sites/default/files/ch-11.pdf
Reservation in India
https://persmin.gov.in/DOPT/Brochure_Reservation_SCSTBackward/Ch-01_2014.pdf
https://socialjustice.nic.in/UserView/index?mid=76663
Commentary on constitution (fundamental rights) – d d basu
https://en.wikipedia.org/wiki/Reservation_in_India
FAQs Related to Reservation
https://dopt.gov.in/sites/default/files/FAQ_SCST.pdf
National Commission for Scheduled Castes [NCSC
National Commission for Scheduled Tribes [NCST]
National Commission for Backward Classes (NCBC)
Right to Equality
Fundamental Rights Introduction : Article 12 & 13
Conflict Between Fundamental Rights and DPSP 
STATE/UT WISE SEATS IN THE LOK SABHA
https://blog.ipleaders.in/article-15/
अनुच्छेद 15
अनुच्छेद 16
https://blog.ipleaders.in/article-16-of-indian-constitution/#Descent_and_Residence_under_Clause_2_of_Article_16
& Encyclopedia Etc