Derivatives in Hindi (डेरिवेटिव्स: परिचय, कार्य, प्रकार)

इस लेख में हम डेरिवेटिव्स (Derivatives) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें। इस लेख को पढ़ने से पहले आप ↗️शेयर मार्केट के बेसिक्स को जरूर समझ लें। इससे ये समझने में आसानी होगी। अगर आपने पहले ही पढ़ रखी है तो इसे नजरअंदाज करें।
Derivatives in Hindi

डेरिवेटिव्स: परिचय
(Derivatives: Introduction)

अब तक हमने शेयर मार्केट (Share Market), बॉन्ड मार्केट (Bond market), को अच्छी तरह से पढ़ और समझ लिया है। अगर आपने शेयर मार्केट को नहीं समझा है तो पहले उसे जरूर समझ लें उसे समझ लेने के बाद डेरिवेटिव्स समझना आसान हो जाएगा।

मोटे तौर पर कहें तो डेरिवेटिव्स (Derivatives) भी शेयर मार्केट का ही एक हिस्सा है और ये भी स्टॉक एक्स्चेंज (Stock exchange) के द्वारा ही क्रियान्वित होता है। हालांकि कुछ डेरिवेटिव्स के अलग से भी एक्सचेंज होते हैं। जैसे कि कमोडिटी डेरिवेटिव्स (Commodity derivatives) की ही बात करें तो इंडिया में इसके लिए अलग से भी एक्सचेंज है। ये क्या होता है इसे हम आगे समझेंगे।

डेरिवेटिव्स पूंजी बाज़ार में सबसे तेजी से धन कमाने का एक बेहतरीन जरिया है। कम से कम पैसों में भी इस विधि से लाभ कमाया जा सकता है। पर बात वही है कि अगर प्रॉफ़िट ज्यादा है तो रिस्क भी बहुत ज्यादा है। कुछ लोग तो इस मार्केट में बहुत ज्यादा पैसा कमाने के मकसद से ही आते हैं वहीं कुछ लोग अपना रिस्क कम करने के लिए आते है। ये सब कैसे होता है सब हम आगे समझने वाले हैं।

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हमने प्रतिभूतियों (Securities) वाले लेख में देखा था कि डेरिवेटिव्स (Derivatives) भी एक प्रकार की प्रतिभूति है। पर इसमें खास बात क्या है आइये इसे समझते हैं।

कोई भी ऐसा उपकरण (Instrument) जिसकी अपनी खुद की कोई वैल्यू नहीं होती है बल्कि उसकी वैल्यू किसी और ही चीज़ से प्राप्त होता है। उसे डेरिवेटिव्स (Derivatives) कहा जाता है।

दूसरे शब्दों में कहें तो कोई भी ऐसा उपकरण जिसकी अपनी तो कोई वैल्यू न हो लेकिन उसकी वैल्यू किस और चीज़ पर निर्भर करता हो। जिस चीज़ पर निर्भर करता है उसे हम अंतर्निहित परिसंपत्ति (Underlying Assets) कहते हैं। आइये इसे एक उदाहरण से समझते हैं।

मान लीजिये आप एक सरकारी ऑफिस का कई दिनों से चक्कर लगा रहे हैं और आपका काम नहीं हो रहा है। पर एक दिन आपको एक बड़े अधिकारी से बात होती है और वो आपको एक कागज पर कुछ लिख के और अपना साइन करके आपको देता है और कहता है कि आप इसे लेकर उस अमुक स्टाफ को दिखा दीजिये आपका काम हो जाएगा।

आप उस कागज को को लेकर जाते हैं और आपका काम हो जाता है। तो आप खुद ही सोचिए कि क्या उस कागज की कोई कीमत थी। बिलकुल नहीं, उस कागज की अपने आप में कोई कीमत नहीं थी। उसकी कीमत उस साइन के कारण है जो उस सक्षम अधिकारी ने उस पर की है। यानी कि वो कागज अपनी कीमत कहीं और से प्राप्त कर रही है। यही तो डेरिवेटिव्स है।

जहां से वो अपना वैल्यू प्राप्त कर रहा है यानी कि वो साइन, वो उस कागज का Underlying Asset है। क्योंकि अगर वो साइन नहीं होता तो कागज की कोई वैल्यू नहीं होती। ऐसे ही ढेरों उदाहरण आप अपने आस-पास से ले सकते हैं।

जैसे कि बैंक नोट को ले लीजिये वो तो बस एक कागज का टुकरा भर है। लेकिन उसकी अपनी एक वैल्यू होती है क्योंकि आरबीआई उसे अप्रूव करती है। यानी कि एक बैंक नोट की वैल्यू आरबीआई से प्राप्त हो रही है इसीलिए आरबीआई उस नोट का Underlying Asset हुआ।

इसी तरह मान लीजिये पनीर है। उसकी अपनी कोई वैल्यू नहीं है। उसकी वैल्यू तो उस दूध पर निर्भर करती है जिससे वो बना है। दूध के दाम के अनुसार ही पनीर का दाम भी बदलेगा। यानी कि इस केस में दूध उस पनीर का Underlying Asset है।

इसी प्रकार अगर हम पेट्रोल को लें तो उसका अपने आप में कोई वैल्यू नहीं है उसकी वैल्यू क्रूड ऑइल पर निर्भर करता है। यानी कि वो अपनी कीमत क्रूड ऑइल से प्राप्त करता है इसीलिए पेट्रोल का Underlying Asset क्रूड ऑइल हो गया।

इसी प्रकार मान लीजिये रिलायंस का एक शेयर है तो उस शेयर की अपनी कोई वैल्यू नहीं है। उसकी वैल्यू तो कंपनी की नेट वर्थ (Net worth) तथा डिमांड और सप्लाइ से प्राप्त हो रहा है। इसीलिए शेयर का Underlying Asset वो कंपनी या मार्केट है।

अगर किसी डेरिवेटिव्स का Underlying Asset कोई वस्तु हो जैसे कि गेहूं, चावल, आलू, कॉटन, गोल्ड, सिल्वर आदि तो हम इसे कोमोडिटी डेरिवेटिव्स (Commodity Derivatives) कहते हैं।

इसी प्रकार अगर किसी डेरिवेटिव्स का Underlying Asset कोई उपकरण (Instrument) हो जैसे कि शेयर, इंडेक्स आदि तो हम उसे फ़ाईनेंसियल डेरिवेटिव्स (Financial derivatives) कहते हैं।

जब हम किसी कंपनी के स्टॉक या शेयर को खरीदते है या बेचते है तो उसे स्टॉक ट्रेडिंग या इन्वेस्टिंग कहते हैं। लेकिन अगर हम किसी कंपनी के स्टॉक को खरीद या बेच न करके उसके डेरिवेटिव्स को खरीद या बिक्री करते हैं तो उसे स्टॉक बेस्ड डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग कहा जाता है। ये कैसे होता है इसे हम आगे समझेंगे। पहले सवाल ये आता है कि जब हम शेयर में इन्वेस्ट कर सकते है और उससे भी पैसे कमा सकते हैं तो फिर डेरिवेटिव्स की क्या जरूरत है।

तो बात दरअसल ये है कि शेयर लॉन्ग टर्म इनवेस्टमेंट के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होता है। लेकिन अगर आपको कम समय में ही बहुत ज्यादा पैसे छापने है तो डेरिवेटिव्स इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त है। बहुत ही कम समय में अधिक से अधिक पैसा इससे कमाया जा सकता है। ये सब कैसे होता है सब आगे समझने वाले हैं। आइए पहले डेरिवेटिव्स (Derivatives) के प्रकार की बात करते हैं।

डेरिवेटिव्स के प्रकार
(Types of derivatives
)

डेरिवेटिव्स चार प्रकार के होते हैं। 1. फॉरवर्ड (Forward) 2. फ्युचर (Future) 3. ऑप्शन (Option) 4. स्वैप (Swap)।

इसमें से आपने फ्युचर और ऑप्शन का नाम जरूर सुना होगा क्योंकि अक्सर इसकी बातें भी होती है और ये न्यूज़ में भी रहती है। हम सभी को एक-एक करके अलग-अलग लेखों में समझने वाले हैं। हम फॉरवर्ड से शुरू करने वाले हैं। 🔽नीचे फॉरवर्ड डेरिवेटिव्स का लिंक है।

Forward_derivatives
Forward derivatives

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