पीड़ा और यंत्रणा में अंतर (Difference between pain and torture)

इस लेख में हम पीड़ा और यंत्रणा (Pain and Torture) के मध्य सूक्ष्म अंतर को जानेंगे।
पीड़ा और यंत्रणा

पीड़ा और यंत्रणा में अंतर 

हर किसी को कभी न कभी किसी न किसी चीज़ के लिए पीड़ा होती ही है। पीड़ा अच्छी बात तो नहीं होती है, पर हमारे ज़िंदगी का हिस्सा तो है।

वैसे पीड़ा और यंत्रणा दोनों में ही कष्ट का भाव प्रधान है। पर इसके अलावा भी दोनों में कुछ और सूक्ष्म अंतर है। तो आइये देखते हैं वो क्या है।

🔲 पीड़ा और यंत्रणा दोनों ही शारीरिक और मानसिक कष्ट की अनुभूति है। जो हमें दुखी और व्यथित कर देती है।

🔲 यंत्रणा तो पीड़ा से भी अधिक तीव्र कष्ट है जिसमें दमन, यातना, वेदना, क्लेश आदि का भी पुट होता है।

शारीरिक चोट पहुँचने पर शारीरिक पीड़ा होती है। मानसिक आघात पहुँचने पर मानसिक पीड़ा होती है।

जैसे एक्सिडेंट हो जाने पर शारीरिक पीड़ा होती है। वहीं अपनों विरह और वियोग में मानसिक पीड़ा होती है।

🔲 यंत्रणा में यंत्र का प्रयोग हुआ है। यानी कि यंत्रणा में बाहरी वस्तुओं या यंत्रों का प्रयोग निहित है। जैसे कि किसी को हथकड़ी लगाकर काल कोठरी में बंद कर देना।

🔲 पीड़ा खुद से भी हो सकता है और दूसरों के द्वारा भी, पर यंत्रणा दूसरों के द्वारा पहुंचायी जाती है। तभी तो जब किसी को यंत्रणा दी जाती है तो उसे पीड़ा होती है।

किसी पीड़ा से ग्रसित व्यक्ति पीड़ित कहलाता है। वहीं यातना प्राप्त व्यक्ति को प्रताड़ित कह दिया जाता है।

कुल मिलाकर देखें तो दोनों ही शब्द ऐसी शारीरिक और मानसिक व्यथाओं के द्योतक हैं, जो हमें बहुत ही अधिक खिन्न, चिंतित और विकल कर देती है।

पीड़ा पहुंचाने के लिए ही यंत्रणा दी जाती है पर पीड़ा यंत्रणा के बगैर भी हो सकता है।

पीड़ा और यंत्रणा – पीडीएफ़

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