Educated Unemployment Crisis in hindi। शिक्षित बेरोजगारी निबंध पीडीएफ़

शिक्षित बेरोजगारी समस्या
(The problem of educated unemployment)

इस लेख में हम शिक्षित बेरोजगारी (Educated unemployment) पर निबंधात्मक चर्चा करेंगे। इस लेख को पूरा पढ़ें।

educated unemployment

शिक्षित बेरोजगारी (educated unemployment) भारत की आर्थिक समस्याओं की प्रमुख समस्या है। यह स्थिति हमारे आर्थिक विकास में बाधक है। शिक्षित वर्ग में बेरोजगारी अलग किस्म की बेरोजगारी है।

जैसे कोई भी व्यक्ति वह स्नातक, स्नातकोत्तर पढ़ाई कर लेते है और वह बेरोजगार हो जाते है तो इसी स्थिति को शिक्षित बेरोजगारी कहाँ जाता है।  

भारत में शिक्षित बेरोजगारी की समस्या गंभीर रूप में उपस्थित है।  इसके समाधान के लिए अलग से विशेष प्रयास की आवश्यकता है।

इनमें से कुछ लोग तो ऐसे है जो अल्प-रोजगार की स्थिति में है। इनको थोड़ा बहुत काम तो मिला हुआ होता है लेकिन यह काम या तो उनके शिक्षा के अनुसार नहीं होता या फिर इनकी क्षमता से कम होता है.

इस रूप में इनकी बेरोजगारी छिपी होती है। कुछ शिक्षित व्यक्ति ऐसे भी है जिनको कुछ काम मिला नहीं होता है अर्थात् वे खुले रूप से बेरोजगार होते है ।

शिक्षित बेरोजगारी की संख्या में निरंतर वृद्धि होती जा रही है।  यह एक भयावह समस्या सूचक है, फिर भी शिक्षित बेरोजगारी की संख्या के सम्बन्ध में कोई प्रमाणिक अनुमान उपलब्ध नहीं है।

शिक्षित बेरोजगारी का बढ़ना
(Increased educated unemployment)

शिक्षित बेरोजगारी (educated unemployment) के सम्बन्ध में भारत में श्रम तथा रोजगार मंत्रालय तथा योजना आयोग के अनुमानों में अंतर्विरोध है

फिर भी इन आंकड़ों के आधार पर निश्चित रूप से कहाँ जा सकता है कि भारत में 1961 और 1991 तक 30 वर्षों के दौरान शिक्षित बेरोजगारों की संख्या 5.90 लाख से बढ़कर 224.34 लाख हो गयी है ।

इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि शिक्षित बेरोजगारों की संख्या में बहुत तेजी से वृद्धि हुई है। एक और बात जो इन आंकड़ो से जाहिर होती है,

वह यह है कि स्नातक एवं स्नातकोत्तर शिक्षितों में बेरोजगारी की मात्रा न केवल कुल रूप में अपितु सापेक्ष रूप में भी बढ़ी है।  

इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि भारतीय समाज में अत्यधिक शिक्षा प्राप्त करने की प्रवृति विद्यमान है।

हाई स्कूलों और सेकेंडरी व इंटरमीडिएट के पश्चात नौकरी न मिलने के कारण लोग स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तरीय शिक्षा प्राप्त करना चाहते है ।

शिक्षित बेरोजगारी: भारत की एक समस्या
(Educated Unemployment: A Problem in India)

जहाँ तक भारत में शिक्षित बेरोजगारी (educated unemployment) के कारणों का प्रश्न है, इसके अनेक उत्तरदायी कारण है, जैसे कि

दोषपूर्ण शिक्षा व्यवस्था, रोजगार तलाश करने वालों में तकनीकी प्रशिक्षण तथा आवश्यक योग्यता की कमी तथा विशिष्ट लोगों की मांग व पूर्ति में असंतुलन आदि.

परन्तु शिक्षित बेरोजगारी (educated unemployment) का मूल कारण वहीं है जो देश में सामान्य बेरोजगारी का मूल कारण है और वह आर्थिक विकास में मंथर गति है।

श्रमिक वर्ग की बेकारी उतनी चिंत्य नहीं है जितनी की शिक्षित वर्ग की। श्रमिक वर्ग श्रम के द्वारा कहीं न कहीं सामयिक काम पाकर अपना जीवनयापन कर लेता है,

किन्तु शिक्षित वर्ग जीविका के अभाव में शारीरिक और मानसिक दोनों व्याधियों का शिकार बनता जा रहा है।

वह व्यवहारिकता से शून्य पुस्तकीय शिक्षा के उपार्जन में अपने स्वास्थ्य को तो गवां ही देता है, साथ ही शारीरिक श्रम से विमुख हो अकर्मण्य भी बन जाता है। परंपरागत पेशे में उसे एक प्रकार की झिझक का अनुभव होता है ।

 इस कथन से स्पष्ट होता है कि मांग से कहीं अधिक शिक्षितों की संख्या का होना ही इस समस्या का मूल कारण है।

विश्वविद्यालय, कॉलेज व स्कूल प्रतिवर्ष बुद्धिजीवियों, क्लर्क और कुर्सी से जूझने वाले बाबुओं को पैदा करते जा रहे है। नौकरशाही तो भारत से चली गयी किन्तु नौकरशाही भारतवासियों के मस्तिष्क से नहीं गयी है ।

विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु आया विद्यार्थी आई.ए.एस और पी.सी.एस के नीचे तो सोचता ही नहीं है।

यही हाल हाई स्कूल और इंटरवालों का भी है। पुलिस की सब-इंस्पेक्टरी और रेलवे की नौकरियों के दरवाजे खटखटाते रहते है।

कई व्यक्ति ऐसे है, जिनके यहाँ बड़े पैमाने पर खेती हो रही है। यदि अपने शिक्षा का सदुपयोग वैज्ञानिक प्रणाली से खेती करने में करें तो देश की आर्थिक स्थिति ही सुधर जाए।

हमारी पंचवर्षीय योजना के कारण रोजगार बढ़ रहे है। शिक्षा और रोजगार में सम्बन्ध स्थापित करने के लिए बहुत कुछ करने की आवश्यकता है ।

शिक्षित बेरोजगारी आंकड़ें
(Educated unemployment figures)

आंकड़ों के मुताबिक देश में बेरोजगारी की संख्या 10 करोड़ से अधिक है। सबसे ख़राब स्थिति पश्चिम-बंगाल, जम्मू-कश्मीर, झारखण्ड, बिहार, ओड़िसा और असम की है। वही सबसे अच्छे राज्यों में गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र और तमिलनाडु है।

वर्ष 2001 की जनगणना में जहाँ 23 प्रतिशत लोग बेरोजगार थे, वही 2011 की जनगणना में इनकी संख्या बढ़कर 28 फिसद हो गयी ।

पिछले 3 वर्षों में रोजगार वृद्धि के लिए कोई प्रयास या नीति नहीं बनाई गयी, जो रोजगार सृजन के लिए उत्प्रेरक की भूमिका निभाती ।                                        

इस बीच अंतर्राष्ट्रीय श्रम आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में भारत में बेरोजगारी के मसले को उठाया था। उसके अनुसार, महिला रोजगार संकट में है, पूंजी आधारित रोजगार के अवसर कम हो रहे है।

कृषि जैसे क्षेत्रों में अब उतनी मजदूरी नहीं बची। वहां से लोगों को निकाला जा रहा है ।  लेकिन ये महिलाएँ अभी दूसरे श्रेणी जैसे सर्विस सेक्टर में काम नहीं कर सकती क्योंकि उनके पास उतनी योग्यता नहीं है ।                      

शिक्षित वर्ग की बेकारी को दूर करने के लिए वर्तमान शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन करना आवश्यक है।

शिक्षा सैद्धांतिक न होकर पूर्णतः व्यवहारिक होनी चाहिए, ताकि स्वाबलंबी स्नातक पैदा हो सकें और देश की भावी उन्नति में योगदान दे सकें।

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भारत में जनसंख्या समस्या, उसका प्रभाव एवं समाधान: पढ़िये एक दिलचस्प अंदाज में

आज जब जनसंख्या समस्या की बात कर रहे है तो वो समय याद आता है। हाँ ! वही समय – जब भूत प्रेत हुआ करता था, लोगों को अंधेरे से डर लगता था, जंगलों से डर लगता था।

पर अब ऐसा समय आ गया है कि अगर भुतिया जंगलों में भी जाओगे तो भूत मिले न मिले लोग जरूर मिलेंगे वो भी अगर फोन से चिपके मिले तो उसमें कोई बड़ी बात नहीं! जिधर देखो लोग ही लोग नजर आते है।

और शायद इसीलिए भारत में जनसंख्या आज एक बहुत बड़ी समस्या का रूप ले चुका है। पता नहीं लोगों को हो क्या गया था। 
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