Electoral reform in india (चुनाव सुधार: संक्षिप्त परिचर्चा)

इस लेख में हम भारत में चुनाव सुधार (Electoral reform in india) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे और इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने की कोशिश करेंगे।
Electoral reform in india

हम आज भी अगर ढूँढे तो चुनाव प्रक्रिया में ढेरों खामियाँ निकाल सकते हैं। ऐसी स्थिति तब है जब कि हमने समय और जरूरत के हिसाब से ढेरों सुधार किए है। चुनाव सुधार को हम ऐसा नहीं मान सकते है कि हमने एक बार हमने चीजों को बदल दी या सुधार कर दी और फिर काम खत्म। इसे हमें एक सतत प्रक्रिया के तौर पर देखने की जरूरत है। तो आइये देखते है कि किस प्रकार चुनाव सुधार की प्रक्रिया आगे बढ़ी है और वर्तमान की आवश्यकता क्या है?

चुनाव सुधार से संबंधित समितियाँ एवं आयोग (Committees and Commissions related to Electoral reform in india)

विभिन्न समितियों एवं आयोगों ने हमारी चुनाव प्रणाली तथा चुनावी मशीनरी के साथ-साथ चुनाव प्रक्रिया की जाँच की है और सुधार के सुझाव दिये हैं। ये समितियाँ एवं आयोग निम्नलिखित हैं-

1. तारकुंडे समिति (वर्ष 1974-75)

तारकुंडे समिति (1974-1975) का गठन स्वतंत्र संस्था ‘सिटिजंस ऑफ़ डेमोक्रेसी’ की ओर से जयप्रकाश नारायण ने चुनावी सुधार के लिए किया था। यानी कि ये एक गैर-सरकारी समिति थी। इस समिति की सबसे प्रमुख सिफ़ारिश यह थी कि एक ऐसा क़ानून होना चाहिए, जिसके तहत सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों द्वारा अपने खातों, आय के स्नोतों और खर्च के ब्यौरे का पूरा हिसाब दिया जाए। यदि खाते में गड़बड़ी आदि पाई जाए तो इसे दंडनीय अपराध माना जाए।

2. चुनाव सुधार पर दिनेश गोस्वामी समिति (वर्ष 1990) – इस समिति की बहुत सारी सिफ़ारिशों को 1996 में लागू किया गया, इसकी चर्चा आगे की गई है।

3. राजनीति के अपराधिकरण पर वोहरा समिति (वर्ष 1993)
4. चुनावों में राज्य वित्तपोषण पर इंद्रजीत गुप्ता समिति (वर्ष 1998)
5. चुनाव सुधारों पर विधि आयोग की रिपोर्ट (वर्ष 1999)
6. चुनाव सुधारों पर चुनाव आयोग की रिपोर्ट (वर्ष 2004)
7. शासन में नैतिकता पर वीरप्पा मोइली समिति (वर्ष 2007)
8. चुनाव कानूनों और चुनाव सुधार पर तनखा समिति (वर्ष 2010)

उपरोक्त समितियों एवं आयोगों की अनुशंसाओं के आधार पर चुनाव प्रणाली, चुनाव मशीनरी और चुनाव प्रक्रिया में कई सुधार किये गए हैं। अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से इसे दो भागों में बाँट लेते हैं।
(1) 2000 से पहले का चुनाव सुधार (Electoral reform in india before 2000)
(2) 2000 के बाद का चुनाव सुधार (Electoral reform in india after 2000)

(1) 2000 से पहले का चुनाव सुधार (Electoral reform in india before 2000)

वोट देने की आयु घटाना (Decrease voting age): 1988 के 61वें संविधान संशोधन अधिनियम’ के जरिए लोकसभा के साथ-साथ विधानसभाओं के चुनाव में वोट डालने की उम्र को 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया। तारकुंडे समिति ने इसकी सिफ़ारिश की थी जिसे कि राजीव गांधी सरकार ने अमल में लाया।

राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति चुनाव में प्रस्तावकों की संख्या में वृद्धि: 1977 में राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने के लिए प्रस्तावक एवं समर्थक निर्वाचकों की संख्या 50 कर दिया गया (जो कि पहले 10 था)। इसी तरह उप-राष्ट्रपति पद के लिए यह संख्या बढ़ाकर 20 कर दिया गया (जो कि पहले 5 था)। साथ ही जमानत की राशि को 2500 से बढ़ाकर 15000 रुपए कर दिया गया।

प्रस्तावकों की संख्या में वृद्धि (Increase in number of proposers): 1988 में, राज्यसभा एवं राज्यों के विधान परिषदों के चुनाव के लिए नामांकन-पत्रों पर प्रस्तावक के रूप में हस्ताक्षर करने वाले निर्वाचकों की संख्या बढ़ाकर चुनाव क्षेत्र के कुल निर्वाचकों का दस प्रतिशत या ऐसे दस निर्वाचक, जो भी कम हों, कर दिया गया। ऐसा व्यर्थ के उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए किया गया।

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (Electronic voting machine): वैसे तो 1982 में केरल जनरल इलैक्शन के दौरान इसका प्रयोग किया गया था लेकिन इसको इस्तेमाल करने को लेकर कोई उचित कानून नहीं था। इसीलिए 1989 में जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 (representation of the People Act, 1951) में संशोधन करके इसे कानूनी रूप दिया गया। इसकी चर्चा इस अधिनियम के धारा 61क में किया गया है।

इसके अलावा दिनेश गोस्वामी समिति ने भी अपनी सिफ़ारिश में कहा कि सभी चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीन (ईवीएम) का प्रयोग किया जाए। फलस्वरूप, 1999 के गोवा विधानसभा चुनाव में पहली बार ईवीएम का पूरे राज्य में इस्तेमाल हुआ।

बूथ कब्जा (Booth capture): 1989 में बूथ कब्जा होने पर चुनाव स्थगित करने या रद्द करने का प्रावधान किया गया। इसे भी जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में संशोधन करके डाला गया। इसकी चर्चा इस अधिनियम के धारा 58क में किया गया है।

मतदाता फोटो पहचान पत्र (EPIC): चुनावों में बोगस मतदाता और किसी के बदले मत डालने की प्रथा को रोकने के लिए देश भर में मतदाताओं को फोटो पहचान पत्र जारी करने के लिए वर्ष 1993 में चुनाव आयोग द्वारा निर्णय लिया गया था।

समान्यतः हर साल के 1 जनवरी को मतदाता सूची को अपडेट किया जाता है और उस वक्त तक 18 वर्ष की उम्र प्राप्त कर चुके जनता का नाम इस सूची में जोड़ दिया जाता है और उसे एक मतदाता फोटो पहचान पत्र प्रदान किया जाता है।

🔴 1990 में वी.पी. सिंह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार ने तत्कालीन कानून मंत्री दिनेश गोस्वामी की अध्यक्षता में चुनाव सुधार समिति का गठन किया। समिति से चुनाव प्रणाली का विस्तार से अध्ययन करने और प्रणाली की कमियों को दूर करने के लिए अपने सुझाव देने को कहा गया। समिति ने 1990 में ही अपनी रिपोर्ट दे दी और चुनाव सुधार के कई सुझाव दिए। जिसमें से कुछ अनुशंसाएं 1996 में लागू की गई। जैसे कि

उम्मीदवारों के नामों को सूचीबद्ध करना (Listing the names of candidates):

उम्मीदवारों के नामों को सूचीबद्ध करने के लिए चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को तीन वर्गों में बांटा जाएगा। ये वर्ग हैं

(1) मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के उम्मीदवार,
(2) पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के उम्मीदवार, और;
(3) अन्य (निर्दलीय) उम्मीदवार।

चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की सूची और मतपत्र में उनके नाम अलग-अलग उपरोक्त क्रम में रहेंगे तथा सभी वगों में नामों को वर्णक्रमानुसार रखा जाएगा।

राष्ट्रीय गौरव का अनादर करने पर अयोग्य घोषित करने का कानून:

राष्ट्रीय गौरव अपमान निरोधक अधिनियम 1971pdf के तहत निम्नलिखित अपराधों के लिए सजा प्राप्त व्यक्ति छह साल तक लोकसभा और राज्य विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य होगा:
(1) राष्ट्रीय झंडे के अनादर का अपराध;
(2) भारत के संविधान का अनादर करने का अपराध, और;
(3) राष्ट्रगान गाने से रोकने का अपराध।

शराब बिक्री पर प्रतिबंध (Liquor sale ban):

मतदान खत्म होने की अवधि के 48 घंटे पहले तक मतदान केंद्र के इलाके में किसी दुकान, खाने की जगह, होटल या किसी भी सार्वजनिक या निजी स्थल में किसी तरह के शराब या नशीले पेय नहीं बेचा या बांटा जा सकता। इस कानून का उल्लंघन करने वाला व्यक्ति 6 माह के कैद या 2000 रुपये के जुर्माने या दोनों सजा का भागी होगा।

प्रस्तावकों की संख्या (Number of proposers):

लोकसभा या विधानसभा का चुनाव लड़ने वाला व्यक्ति अगर किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल का उम्मीदवार नहीं है तो उसके नामांकन-पत्र पर क्षेत्र के दस पंजीकृत मतदाताओं के हस्ताक्षर प्रस्तावक के रूप में होने चाहिए। अगर उम्मीदवार किसी मान्यता प्राप्त दल का है तो सिर्फ एक प्रस्तावक की जरूरत होगी। ऐसा व्यर्थ के लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए किया गया था।

उम्मीदवार की मृत्यु (Death of candidate): चुनाव लड़ रहे किसी उम्मीदवार का निधन मतदान के पूर्व हो जाने पर पहले चुनाव रद्‌द कर दिया जाता था और उसके बाद उस क्षेत्र में फिर से चुनाव प्रक्रिया शुरू होती थी। लेकिन अब मतदान के पूर्व चुनाव लड़ रहे किसी उम्मीदवार का निधन हो जाने पर चुनाव रदूद नहीं होता। हालांकि मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के उम्मीदवार का निधन होने की स्थिति में उस दल को सात दिनों के अंदर दूसरा उम्मीदवार देने का विकल्प दिया जाता है।

उप-चुनाव की समय सीमा (By-election deadline):

संसद या राज्य विधानमंडल के किसी सदन की सीट खाली होने के छह महीने के अंदर उप-चुनाव कराना होगा। लेकिन यह व्यवस्था दो स्थितियों में लागू नहीं होती है:
(1) जिस सदस्य की खाली जगह भरी जानी है, उसका कार्यकाल अगर एक साल से कम अवधि का बचा हुआ हो, या
(2) जब चुनाव आयोग केंद्र सरकार से सलाह-मशविरा कर यह सत्यापित करे कि निर्धारित अवधि के अंदर उप-चुनाव कराना कठिन है।

हथियार पर रोक (Weapon freeze):

किसी मतदान केंद्र के आसपास किसी तरह के हथियार के साथ जाना संज्ञेय अपराध↗️ है। ऐसा करने पर दो साल की सजा या जुर्माना या दोनों दंड दिया जा सकता है।

चुनाव प्रचार की अवधि में कमी: नामांकन वापस लेने की आखिरी तिथि और मतदान की तिथि के बीच का न्यूनतम अंतराल 20 दिनों से घटाकर 14 दिन कर दिया गया है।

चुनाव ड्यूटी के लिए कर्मचारियों को बुलाना: 1998 में यह व्यवस्था की गई कि स्थानीय शासन, राष्ट्रीयकृत बैंकों, विश्वविद्यालयों, जीवन बीमा निगम, लोक उप-क्रमों, एवं सरकारी सहायता पाने वाले दूसरे संस्थानों के कर्मचारियों को चुनाव ड्यूटी पर तैनात करने के लिए बुलाया जा सकता है।

डाक मतपत्र के जरिए वोट डालना: 1999 में कुछ खास तरह के मतदाताओं के लिए डाक मतपत्र के जरिए वोट देने की व्यवस्था की गई। ये सुविधा किसको देना है ये चुनाव आयोग सरकार के साथ मिलकर तय करता है।

2000 के बाद चुनाव सुधार (Electoral reform in india after 2000)

प्रॉक्सी के जरिए वोट देने की सुविधा: 2003 में सशस्त्र सेना में कार्यरत वोटरों और ऐसे सशस्त्र बल में कार्यरत लोगों को, जहां सेना अधिनियम (Army act)↗️ लागू होता है, को प्रॉक्सी के जरिए वोट देने का विकल्प चुनने की सुविधा उपलब्ध कराई गई। यानी कि उसे अपने बदले में किसी और को वोट डालने के लिए नियुक्त करना होगा और इसकी सूचना अपने निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव अधिकारी को देनी होगी।

राजनीतिक दलों को चंदा लेने की स्वतंत्रता: 2003 में राजनीतिक दलों को किसी व्यक्ति या सरकारी कंपनी छोड़कर बाकी किसी कंपनी से कोई भी राशि स्वीकार करने की स्वतंत्रता
दी गई। अब आयकर में राहत का दावा करने के लिए उन्हें 20000 रुपए से अधिक के हर चंदे की जानकारी चुनाव आयोग को देनी होगी। साथ ही चंदे के रूप में दी गई रकम पर कंपनी को भी आयकर में छूट मिलेगी।

ईवीएम में ब्रेल लिपि को शुरू करनाः आयोग को दृष्टिहीन मतदाताओं द्वारा किसी सहायक के बिना मतदान करने के लिए उन्हें सुविधा प्रदान करने हेतु ब्रेल लिपिबद्ध ईवीएम को शुरू करने के लिए दृष्टिहीनों के विभिन्‍न संघों से अभ्यावेदन प्राप्त हुआ है। वर्ष 2005 में, बिहार, झारखंड और हरियाणा के विधान सभा चुनावों के दौरान एक विधान सभा क्षेत्र में इसका प्रयास किया गया था।

अयोग्य घोषित कराने के लिए मामला दर्ज कराने की समय सीमा: 2009 में भ्रष्ट तरीका अपनाने का दोषी पाये गए व्यक्ति को अयोग्य करार देने के लिए उसके मामले को तीन माह के अंदर राष्ट्रपति के पास पेश करने का समय अधिकृत अधिकारी को दिया गया है।

जमानत की राशि में बढोतरी: 2009 में लोकसभा चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों द्वारा जमा की जाने वाली जमानत की राशि सामान्य कोटि के उम्मीदवारों के लिए 10 हजार से बढ़ाकर 25 हजार और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए पांच हजार से बढ़ाकर बारह हजार रुपया कर दी गई।

इसी तरह राज्य विधानसभा का चुनाव लड़ने वाले सामान्य कोटि के उम्मीदवारों की जमानत राशि पांच हजार से बढ़ाकर दस हजार और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए ढाई हजार से पांच हजार रुपया कर दी गई। ऐसा अगंभीर उम्मीदवारों की संख्या बढ़ने से रोकने के लिए किया गया।

विदेशों में रहने वाले भारतीयों को वोट का अधिकारः 2010 में विभिन्‍न कारणों से विदेशों में रहने वाले भारतीयों (Overseas Voters) को वोट का अधिकार प्रदान करने का प्रावधान किया गया। इसके अनुसार भारत का हर नागरिक-
(1) जिसका नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं है,
(2) जिसने किसी दूसरे देश की नागरिकता नहीं ग्रहण की है, और
(3) जो नौकरी, शिक्षा या किसी अन्य कारणों से भारत के अपने सामान्य निवास के बजाए विदेश में रहा है – अपना नाम अपने संसदीय/विधानसभा क्षेत्र, जो उसके पासपोर्ट में अंकित है, की मतदाता सूची में दर्ज करा सकता है।

मतदाता सूची में ऑनलाइन नामांकन: वर्ष 2013 में, मतदाता सूची में नामांकन के लिए ऑनलाइन फाइलिंग के लिए एक प्रावधान किया गया था। यहाँ मैं दो लिंक दे रहा हूँ, जिसकी मदद से आप मतदाता सूची में नामांकन के लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। Link 1 – https://voterportal.eci.gov.in/↗️ Link 2 – राष्ट्रीय मतदाता सेवा पोर्टल↗️

नोटा (NOTA) विकल्प शुरू करना: उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुसार चुनाव आयोग ने ‘उपर्युक्त में से कोई नहीं’ यानी कि None of the above के लिए मतदाता पत्रों/ ईवीएम मशीनों में प्रावधान किया ताकि मतदान केन्द्र तक आने वाले मतदाता चुनाव में खड़े हुए किसी भी उम्मीदवारों में से किसी को चुनने का फैसला न करने वाले अपने मतदान की गोपनीयता को बनाए रखते हुए ऐसे उम्मीदावारों को मत नहीं डालने के अपने अधिकार का प्रयोग कर सकें।

नोटा के लिए प्रावधान को 2013 में छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, मिजोरम, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्‍ली और राजस्थान के राज्य विधान सभाओं के आम चुनाव से ही लागू कर दिया गया है और सोलहवीं लोक सभा (2014) के लिए आम चुनावों के साथ वर्ष 2014 में आंध्र प्रदेश, अरूणाचल प्रदेश, ओडिशा और सिक्किम के राज्य विधान सभा चुनावों में जारी रहा है।

अगर नोटा के पक्ष में मत देने वाले मतदाताओं की संख्या किसी भी उम्मीदवार को मिले मतों से अधिक है तब भी जिस उम्मीदवार को सबसे अधिक मत मिले, उसे ही निर्वाचित घोषित किया जाएगा।”

वोटर वेरिफायबल पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) की शुरुआत: वीवीपीएटी, ईवीएम से जुड़ी एक स्वतंत्र प्रणाली है जो मतदाताओं को अनुमति देती है कि वे यह सत्यापित कर सकते हैं कि उनका मत उक्त उम्मीदवार को पड़ा है जिसके पक्ष में उन्होंने मत डाला था।

सिद्धदोषी सांसदों एवं विधायकों की तत्काल अयोग्यता प्रभावी:

2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी कि अभियुक्त (accused) सांसद और विधायक अपराध के लिए दोषी सिद्ध होने पर अपील के लिए तीन माह का नोटिस दिए जाने के बिना ही संसद या विधानसभा की सदस्यता से तत्काल प्रभाव से अयोग्य हो जाएंगे।

दरअसल जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 8 के उपधारा 4↗️ में ये लिखा हुआ है कि सांसद या विधायक के लगे दोष सिद्ध हो जाने पर वो तब तक अयोग्य घोषित नहीं किया जा सकता है जब तक दोषसिद्ध होने की तारीख से लेकर 3 माह बीत न गए हो। इस तीन महीने में वो न्यायालय में अपील कर सकता है और मामले को रफा-दफा भी करवा सकता है। इसीलिए न्यायालय ने उपरोक्त व्यवस्था दी।

इसके साथ ही पीठ ने ये भी कहा, “संविधान के अनुच्छेद 102 एक अनुच्छेद 191 के दो प्रावधानों से पूरी तरह से स्पष्ट हो जाता है कि एक व्यक्ति के संसद के किसी सदन अथवा विधानसभा का सदस्य चुने जाने से अयोग्य करने तथा सदस्य बनने के लिए एक ही कानून बनाना है।

यानी कि संसद को अनुच्छेद 102 तथा 191 के अंतर्गत यह शक्ति नहीं है कि एक व्यक्ति को संसद या विधानसभा का सदस्य चुने जाने से अयोग्य करने तथा एक व्यक्ति को संसद या विधानसभा सदस्य बने रहने देने से अयोग्य करने के सम्बन्ध में अलग-अलग कानून बनाए।

चुनाव खर्च की सीमा बढी: 2014 में केन्द्र सरकार ने बड़े राज्यों में लोकसभा चुनावों के लिए खर्च सीमा बढ़ाकर रु. 70 लाख (पहले रु. 40 लाख) कर दी। अन्य राज्यों एवं संघशासित प्रदेशों में यह सीमा रु. 50 लाख (पहले 6-40 लाख रुपये) की गई।

इसी प्रकार बड़े राज्यों में विधानसभा सीट के लिए चुनावी खर्च की 6 लाख रुपये से बढ़ाकर 28 लाख रुपये की गई जबकि अन्य राज्यों एवं संघशासित राज्यों के लिए यह सीमा 20 लाख रुपये (पहले 8-6 लाख रुपये) की

ईवीएम एवं मतपत्रों पर उम्मीदवारों के फोटो: चुनाव आयोग के एक आदेशानुसार 1 मई, 2015 के बाद होने वाले किसी भी चुनाव में ईवीएम एवं मतपत्रों पर उम्मीदवारों का फोटो, नाम तथा पार्टी चुनाव चिन्ह के साथ प्रकाशित रहेंगे ताकि इस बारे में मतदाताओं के भ्रम का निवारण हो सके।

जून 2015 में पांच राज्यों में छह उपचुनाव हुए जिनमें प्रथम बार मतपत्रों पर उम्मीदवारों के फोटो का उपयोग किया गया।

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तो ये रहा कुछ महत्वपूर्ण चुनाव सुधार (Electoral reform in india) जो अब तक हुए है, बेहतर समझ के लिए चुनाव से संबन्धित अन्य लेखों को भी अवश्य पढ़ें।

Electoral reform in india
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