परिवार न्यायालय आम न्यायालय से थोड़ा अलग और खास होता है, ऐसा इसीलिए क्योंकि ये कमोबेश दोनों पक्षों की संतुष्टि पर कार्य करता है;

दूसरे शब्दों में कहें तो, पारिवारिक मामले आमतौर पर मध्यस्थता, क्षतिपूर्ति आदि से ही निपटा लिया जाता है इसीलिए ये न्यायालय थोड़ा खास है।

इस लेख में हम परिवार न्यायालय (Family Court) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे एवं इसके विभिन्न पहलुओं को समझने की कोशिश करेंगे।

परिवार न्यायालय
भारतीय न्यायिक व्यवस्था
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परिवार न्यायालय क्या है?

विवाह एवं पारिवारिक मामलों से संबन्धित विवादों में मध्यस्थता व बातचीत के माध्यम से हल निकालने एवं त्वरित समाधान सुनिश्चित करने के लिए 1984 में परिवार न्यायालय अधिनियम अधिनियमित किया गया। इसी अधिनियम के तहत परिवार न्यायालय की स्थापना की जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो परिवार न्यायालय एक वैधानिक संस्था है जिसका मकसद बातचीत, मध्यस्थता एवं क्षतिपूर्ति आदि के माध्यम से पारिवारिक विवादों को सुलझाना है।

परिवार न्यायालय की जरूरत क्यों पड़ी?

भारत में इतने सारे न्यायालय होने के बावजूद एक पृथक परिवार न्यायालय स्थापित करने की जरूरत इसीलिए पड़ी क्योंकि
(1) कुछ महिला संगठन एवं कुछ अन्य संस्थाओं ने इसके गठन पर काफी ज़ोर दिया। उनका मानना था कि एक विशेषीकृत, सस्ता और सुलभ न्यायालय का सृजन होना चाहिए जो केवल पारिवारिक मामले ही देखेगा और पारिवारिक मामले सुलझाने में विशेषज्ञता रखेगा।

2. विधि आयोग ने अपनी 59वीं रिपोर्ट में इस बात पर ज़ोर दिया है कि परिवार संबन्धित ववादों में न्यायालय को समझौताकारी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और आमतौर पर उसे सामान्य सिविल प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। लेकिन न्यायालयों द्वारा पारिवारिक वादों के समाधान के लिए मध्यस्थता या समझौताकारी उपायों का यथेष्ट (considerable) उपयोग नहीं किया गया और इन मामलों को सामान्य सिविल मामलों कि तरह ही देखा और बरता जाता रहा, इसीलिए जनहित में इस बात की आवश्यकता अनुभव कि गई पारिवारिक विवादों के समाधान के लिए परिवार न्यायालय स्थापित किए जाये।

Compoundable and Non-Compoundable OffencesHindiEnglish
Cognizable and Non- Cognizable OffencesHindiEnglish
Bailable and Non-Bailable OffencesHindiEnglish

परिवार न्यायालय की विशेषताएँ

पारिवारिक न्यायालय अधिनियम 1984 (Family Court Act 1984) के अनुसार परिवार न्यायालय की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत है:-

1. यह अधिनियम राज्य सरकारों द्वारा उच्च न्यायालयों की सहमति से परिवार न्यायालयों की स्थापना का प्रावधान करता है।

2. यह अधिनियम राज्य सरकारों को लिए के लिए एक लाख से अधिक जनसंख्या वाले प्रत्येक नगरों में एक परिवार न्यायालय की स्थापना के लिए बाध्य करता है।

3. इस अधिनियम के अनुसार परिवार न्यायालय का क्षेत्राधिकार (Jurisdiction of Family Court) निम्नलिखित होगा –

(1) विवाह संबंधी मामले जैसे कि – विवाह की अमान्यता (Invalidation of marriage), न्यायिक बिलगाव, तलाक (Divorce), वैवाहिक अधिकारों की बहाली (Restoration of marital rights) पति या पत्नी की देख-रेख एवं निर्वाह भत्ता आदि।
(2) दंपत्ति या उनमें से एक की संपत्ति से संबन्धित मामले
(3) किसी व्यक्ति का अभिभावक अथवा किसी नाबालिग का संरक्षक (custodian)
(4) पत्नी, बच्चों एवं माता-पिता का गुजारा आदि संबंधी मामलों को शामिल करता है।

4. परिवार न्यायालय के लिए यह अनिवार्य ज़िम्मेदारी है कि वह प्रथमतः किसी पारिवारिक विवाद मे संबन्धित पक्षों के बीच मेल मिलाप या समझौते का प्रयास करे। और मामले की जरूरत के हिसाब से समझौता वाले चरण में समाज कल्याण एजेंसियों तथा सलाहकारों के साथ ही चिकित्सकीय एवं कल्याण विशेषज्ञों के सहयोग का भी प्रावधान करें।

5. यह प्रावधान करता है न्याय मित्र के रूप में किसी विधि विशेषज्ञ से सलाह ली जा सकती है लेकिन किसी पक्ष की तरफ से विधि अभ्यासी (Law practitioner) द्वारा प्रतिनिधित्व नहीं किया जाएगा।

6. यह साक्ष्य तथा प्रक्रिया संबन्धित नियमों को सरलीकृत करने पर ज़ोर देता है और यह केवल एक अपील का अधिकार देता है जो कि उच्च न्यायालय में ही की जा सकती है। यानी कि अगर दोनों पक्षों की सहमति से समझौता या निर्णय दिया गया है तो उसके बाद कहीं और इसकी अपील नहीं की जा सकती लेकिन अगर सहमति नहीं बन पाती है तो फिर केवल उच्च न्यायालय में ही इसकी अपील की जा सकती है।

7. परिवार न्यायालय के पास ये शक्ति होती है कि वे जिसे भी ठीक समझे बच्चे की कस्टडी उसे सौंप दे।

परिवार न्यायालय कैसे संचालित होती है?

परिवार न्यायालय के पास ये शक्ति होती है कि संचालन संबंधी वे अपना प्रावधान बना सके। इन्हे गवाह के लंबे मौखिक बयान को दर्ज करने की आवश्यकता नहीं होती है।

परिवार न्यायालय किसी भी दस्तावेज या बयान को प्राप्त कर सकता है, भले ही वह भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 के तहत स्वीकार्य न हो।

परिवार न्यायालय के आदेशों का प्रवर्तन (Enforcement) नागरिक प्रक्रिया संहिता (Code of Civil Procedure), 1908 के तहत होता है।

वर्तमान मे देश भर में 535 परिवार न्यायालय संचालित है। लिस्ट आप यहाँ से देख सकते हैं।

Family Court Statewise list

परिवार न्यायालय की संख्या

परिवार न्यायालय में किस तरह के मामले आते हैं?

पारिवारिक मामला एक प्रकार का दीवानी मामला ही है, लेकिन वे आमतौर पर घरेलू मामलों से जुड़े होते हैं। परिवार न्यायालय में कुछ इस तरह के मामले लाये जाते हैं –

विवाह विघटन (Marriage dissolution) – जब कोई विवाह समाप्त करना चाहता है, तो वे पारिवारिक न्यायालय में मामला दायर कर सकते हैं। विवाह को तलाक या विलोपन के मामलों के माध्यम से समाप्त किया जा सकता है। ये अदालत संपत्ति, गुजारा भत्ता और बाल हिरासत के संबंध में आदेश जारी कर सकती है। हिन्दू विवाह विच्छेद ‘हिन्दू विवाह अधिनियम 1955’ के 13B के तहत होता है।

पितृत्व और बाल हिरासत (Paternity and child custody) – जब एक आदमी को एक बच्चे का पिता घोषित करने की आवश्यकता होती है, तो माता-पिता परिवार अदालत से पितृत्व (Fatherhood) का निर्धारण करने के लिए कह सकते हैं। यह स्थायी रूप से बच्चे के पिता को घोषित करता है।

घरेलू हिंसा के खिलाफ संरक्षण के आदेश (Protection order against domestic violence) – घरेलू हिंसा से पीड़ित परिवार या कोई व्यक्ति अपने अपमान को दूर करने के लिए अदालत से संरक्षण आदेश जारी करने के लिए कह सकते हैं। अदालत संरक्षण आदेश Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005 के तहत जारी करता है।

नाम परिवर्तन (Name change) – एक बच्चा या एक वयस्क कानूनी रूप से पारिवारिक अदालत में नाम परिवर्तन मामले के माध्यम से अपना नाम बदल सकता है।

संरक्षकता (Guardianship) – संरक्षकता में, यह निर्धारित किया जाता है कि एक बच्चा या वयस्क जो स्वयं की देखभाल नहीं कर सकता है उस पर चिकित्सा, व्यक्तिगत और वित्तीय निर्णयों के लिए कौन जिम्मेदार होगा!

माता-पिता के अधिकारों और दत्तक ग्रहण की समाप्ति (End of parental rights and adoption) – यदि किसी गंभीर कारण के आधार पर अदालत को लगता हैं कि माता-पिता का अब बच्चे के साथ रिश्ता नहीं होना चाहिए (जैसे कि परित्याग, उपेक्षा, दुर्व्यवहार, आदि), तो परिवार अदालत उस माता-पिता के अधिकारों को समाप्त कर सकती है।

यदि कोई व्यक्ति किसी और के बच्चे का कानूनी माता-पिता बनना चाहता है, तो परिवार न्यायालय एक गोद लेने की अनुमति दे सकता है। इसके लिए बकायदे एक कानून है जिसका नाम है The Hindu Adoption and Maintenance Act 1956।

जुवेनाइल मैटर्स (Juvenile Matters) – पारिवारिक न्यायालय उन सभी मामलों की देखरेख करता है जहां बाल शोषण, बाल उपेक्षा के आरोप हैं, या जहां नाबालिगों पर अवैध व्यवहार में भाग लेने का आरोप है। इसके लिए भी कानून है जिसका नाम है Juvenile Justice (Care and Protection) Act, 2015।

कम उम्र के लोगों की मुक्ति और स्वीकृति (Liberation and acceptance of young people) – 18 वर्ष से कम उम्र के लोग जो अपने माता-पिता के नियंत्रण से कानूनी रूप से मुक्त होना चाहते हैं अनुमोदन के लिए परिवार अदालत में याचिका दायर कर सकते हैं।

कुल मिलाकर ये रही परिवार न्यायालय से संबन्धित सबसे महत्वपूर्ण जानकारी। उम्मीद है समझ में आया होगा। नीचे अन्य महत्वपूर्ण लेखों का लिंक दिया हुआ है उसे भी जरूर विजिट करें।

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