इस लेख में हम मूल कर्तव्यों (Fundamental duties) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे, एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने का प्रयास करेंगे;

तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें और मूल कर्तव्य को अच्छे से समझें, साथ ही अन्य संबन्धित लेखों को भी पढ़ें।

हम इस धरती (इंडिया) पर जन्म लिए है। इस धरती ने हमें अच्छी ज़िंदगी जीने के लिए ढेरों अधिकार दिये है, ऐसे में उसकी, हमसे कुछ अपेक्षाएँ होना वाज़िब है।

मूल कर्तव्यों
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मूल कर्तव्य क्या है?

मूल अधिकार जहां हमें अधिकार देती है वहीं मूल कर्तव्य हमसे कुछ अपेक्षाएँ रखती है। वैसे मूल कर्तव्य मूल संविधान का हिस्सा नहीं थी इसे 1976 में संविधान का हिस्सा बनाया गया।

क्यों बनाया गया ये थोड़ा विवादास्पद मुद्दा है लेकिन फिर भी समाज या संविधान पर इससे कोई बुरा असर पड़ा है ऐसा नहीं कहा जा सकता है।

▶ आमतौर पर मूल अधिकार अक्सर चर्चा में रहता है। शायद इसीलिए क्योंकि वो एक अधिकार है और हम कुछ भी करके अपने अधिकार को तो नहीं छोड़ने वाले। उसके लिए भले ही सुप्रीम कोर्ट ही क्यों न जाना पड़े। पर मूल कर्तव्य का क्या?

इसके बारे में आमतौर पर कम ही चर्चा होती है। क्योंकि शायद हम लेना जानते हैं देना नहीं। मूल कर्तव्य मोटे तौर पर राष्ट्र को कुछ देने के बारे में हैं। क्या देने के बारे में उसकी चर्चा करने से पहले आइये थोड़ा जान लेते हैं कि ये कैसे अस्तित्व में आया?

मूल कर्तव्यों का अस्तित्व में आना

जब संविधान बनाया गया था उस समय मूल कर्तव्य को संविधान का हिस्सा नहीं बनाया गया था। हालांकि राज्य के नीति निदेशक तत्व के रूप में राज्यों के कर्तव्य तय कर दिये गए थे पर विशेष रूप से जनता के लिए कर्तव्य तय नहीं किए गए। इसकी जरूरत समझी इन्दिरा गांधी की सरकार ने।

हालांकि उन्होने इसकी जरूरत तब समझी जब देश में आपातकाल लगा हुआ था और ये आपातकाल लगाया भी उन्होने ही था। इसीलिए कुछ लोग इसे अच्छी नजर से नहीं देखते हैं, वे मानते हैं कि इसे लाने के पीछे उनका नियत सही नहीं था।

खैर उन्होने जो भी सोचा हो पर इसकी अच्छी बात ये थी कि उन्होने इसके लिए 1976 में एक समिति का गठन किया। ये समिति सरदार स्वर्ण सिंह के अध्यक्षता में बनाया गया था।

इस समिति का काम मूल कर्तव्यों की आवश्यकता एवं प्रावधान आदि सिफ़ारिश करना था। उस समय देश में आपातकाल लगा हुआ था। विपक्ष के सारे बड़े नेता जेल में बंद कर दिये गए थे, प्रेस पर कई प्रकार का प्रतिबंध लगा दिया गया था। आपातकाल 1975 से 1977 तक चला था।

इस समिति ने सिफ़ारिश किया कि संविधान में मूल कर्तव्यों का एक अलग पाठ होना चाहिए। और उन्होने इस बात को भी रेखांकित किया कि नागरिकों को अधिकारों के प्रयोग के अलावा अपने कर्तव्यों को भी निभाना आना चाहिए।

चूंकि सरकार खुद भी यही चाहती थी इसीलिए इस समिति की सफारिशों को मान लिया गया। और 1976 में ही 42वां संविधान संशोधन करके संविधान में एक नया भाग – भाग ‘4क’ को जोड़ा गया।

इसी भाग के अंतर्गत एक अनुच्छेद बनाया गया जिसे कि अनुच्छेद 51 ‘क’ कहा गया। और इसी अनुच्छेद 51 ‘क’ के अंतर्गत मूल कर्तव्यों को वर्णित किया गया।

सरदार स्वर्ण सिंह की समिति ने कुल 8 मूल कर्तव्यों को जोड़ने की सिफ़ारिश की थी लेकिन इन्दिरा गांधी को इसमें कुछ मिसिंग लगा इसीलिए उन्होने 2 और को जुड़वा दिया और इस तरह से कुल 10 मूल कर्तव्यों को एक संवैधानिक प्रावधान बना दिया गया।

आगे चलकर 2002 में जब अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार थी तब इसमें एक और मूल कर्तव्य को जोड़ा गया और इस तरह से आज संवैधानिक रूप से 11 मूल कर्तव्य है जो अस्तित्व में है।

मूल कर्तव्यों

“मूल कर्तव्यों का नैतिक मूल अधिकारों को कोमल करना नहीं होना चाहिए लेकिन लोकतांत्रिक संतुलन बनाते हुए लोगों को अपने अधिकारों के समान कर्तव्यों के प्रति भी सजग रहना चाहिए।”

इन्दिरा गांधी

List of Fundamental duties (Art. 51A)

भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा कि वह: –
1. संविधान का पालन करें और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्र गान का आदर करें।
2. स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखें और उनका पालन करें।
3. भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करें और उसे अक्षुण्ण रखें।
4. देश की रक्षा करें और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करें।
5. भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्वाण करें जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग आधारित सभी भेदभाव से परे हों, ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो स्त्रियॉं के सम्मान के विरुद्ध हैं।
6. हमारी सामासिक संस्कृति (Composite culture) की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझें और उसका परिरक्षन करें।
7. प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करें और उसका संवर्धन करें तथा प्राणिमात्र के प्रति दया भाव रखें।
8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें।
9. सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखें और हिंसा से दूर रहें।
10. व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करें जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊंचाइयों को छू ले।
11. 6 से 14 वर्ष की उम्र के बीच अपने बच्चों के लिए शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराएं। (इसे 2002 में 86वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया)

मूल कर्तव्यों की विशेषताएं

▶ इसमें से कुछ कर्तव्य नैतिक किस्म के हैं जिसमें बाह्य तौर पर कुछ भी नहीं करना है बस अपने नैतिकता के प्रतिमानों को उस हिसाब से ढालना है। उदाहरण के लिए आप दूसरे नंबर के कर्तव्य को देखिये।

▶ इसी प्रकार से कुछ कर्तव्य ऐसे है जिसमें जरूरत पड़ने पर कुछ करने का भाव है। उदाहरण के लिए आप कर्तव्य नंबर 4, 6, 7, 9 आदि को देख सकते हैं।

▶ जहां मूल अधिकार के हनन पर आप सीधे न्यायालय जा सकते हैं और न्यायालय मूल अधिकारों को लागू करवाता है, वहीं मूल कर्तव्य गैर-न्यायोचित है, यानी कि इसके हनन पर न्यायालय इसे क्रियान्वित नहीं करवा सकता है।

▶ कुछ मूल अधिकार ऐसे हैं जो विदेशियों पर भी लागू होता है लेकिन मूल कर्तव्य केवल देश के नागरिकों पर लागू होता है। मूल कर्तव्यों को भारतीय परंपरा, पौराणिक कथाओं, धर्म आदि के अनुरूप ही बनाया गया है ताकि ये आसानी से लोगों के जीवन का हिस्सा बन जाये।

मूल कर्तव्यों का महत्व

▶ ये एक सचेतक के रूप में काम करता है। यानी कि जब भी हम मूल अधिकारों का इस्तेमाल करते हैं तो हमें ये याद दिलाता है कि देश के प्रति हमारा कुछ कर्तव्य भी है और हमें उसका भी निर्वहन करना चाहिए।

▶ मूल कर्तव्य हमें राष्ट्र विरोधी काम करने से रोकने का काम करता है। जैसे कि राष्ट्र ध्वज को जलाना, सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करना आदि।

▶ मूल कर्तव्य हम में प्रेरणा की भावना को बलवती करता है और ये हमें एहसास दिलाता है कि ये देश हमारा है और देश को गढ़ने में हमारा भी योगदान मायने रखता है।

मूल_कर्तव्यों से जुड़े कुछ तथ्य

▶ जब मूल कर्तव्य को संसद में लाया गया था तो विपक्षी दलों ने इसका काफी विरोध किया था। वे लोग इसे संविधान में जोड़े जाने के पक्ष में नहीं थे।

लेकिन दिलचस्प बात ये है कि 1977 में जब इन्दिरा गांधी की सरकार गिर गयी और मोरार जी देशाई की सरकार सत्ता में आयी तो उसने इसमें कोई बदलाव नहीं किया।

जबकि आपको पता होगा कि 1978 में 44वां संविधान संशोधन करके मोरार जी देशाई की सरकार ने इन्दिरा गांधी द्वारा बनाए गए बहुत सारे नियम-क़ानूनों को खत्म कर दिया था। लेकिन मूल कर्तव्यों को खत्म नहीं किया इससे पता चलता है कि मूल कर्तव्य देश के लिए वाकई जरूरी था ।

▶ 1976 में मूल कर्तव्य को लागू करते समय, इसको और ज्यादा प्रभावी और बाध्यकारी बनाने को लेकर भी सिफ़ारिशें आयी थी जैसे कि (1) अगर कोई मूल कर्तव्यों का अनुपालन न करें तो उसे आर्थिक दंड या शारीरिक दंड दिया जाए। (2) कर अदायगी (Tax payment) को नागरिक का मूल कर्तव्य बनाया जाना चाहिए।

इसे संविधान में शामिल तो नहीं किया गया। लेकिन मूल कर्तव्य के असफल रहने रहने पर संसद उनमें उचित अर्थदंड या सजा का प्रावधान कर सकती है।

हालांकि जरूरत पड़ने पर बहुत सारे मूल कर्तव्यों को सपोर्ट देने के लिए कई नियम-अधिनियम आदि बनाए गए हैं। जैसे कि इंडियन फ्लैग कोड को ही लें तो इसे 2002 में जारी किया गया था जिसमें भारतीय झंडे के आदर, सम्मान और झंडे फहराने के नियम आदि को वर्णित किया गया है। आप इसे यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

▶ इसके अलावे वन्य जीव संरक्षण संरक्षण अधिनियम 1972, वन संरक्षण अधिनियम 1980, सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955, राष्ट्रीय गौरव अपमान अधिनियम 1971 आदि को देखें तो ये मूल कर्तव्यों को और भी जरूरी बनती है।

जितने भी इस प्रकार के कर्तव्य है जिस पर किसी न किसी रूप में कानून बनी हुई है उसे पहली बार 1999 में वर्मा समिति ने आइडेंटिफाई किया था।

मूल कर्तव्यों की आलोचना (Criticism of fundamental duties)

▶ कर्तव्यों की सूची अधूरी है क्योंकि इसमें बहुत सारे अन्य कर्तव्यों को शामिल नहीं किया गया है जैसे कि – मतदान, टैक्स आदायगी, परिवार नियोजन आदि। हालांकि 1976 में स्वर्ण सिंह समिति ने कर आदायगी को भी मूल कर्तव्य बनाने की बात सरकार के सामने रखी थी लेकिन उसे श्रीमती गांधी ने शामिल नहीं किया।

▶ कुछ कर्तव्यों की भाषा इतनी अस्पष्ट और क्लिष्ट है कि आम लोगों की समझ से परे है। जैसे कि – सामासिक संस्कृति (Composite culture), उच्च आदर्श आदि।

▶ चूंकि ये गैर-न्यायोचित है इसीलिए लोग इसे माने या न माने इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। हालांकि स्वर्ण सिंह मूल कर्तव्य में दंड या सजा को जोड़ने के पक्ष में थे लेकिन श्रीमती गांधी ने इसे संविधान में शामिल करने से माना कर दिया था।

कुल मिलाकर यही है मूल कर्तव्य, उम्मीद है आप समझ गए होंगे। अन्य जरूरी लेखों को पढ़ने के लिए नीचे स्क्रॉल करें।

विस्तार से पढ़ें – अनुच्छेद 51क – भारतीय संविधान [मूल कर्तव्य]

Fundamental Duties Practice Quiz


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Chapter Wise Polity Quiz

मूल कर्तव्य (Art 51A) अभ्यास प्रश्न

  1. Number of Questions - 4
  2. Passing Marks - 75 %
  3. Time - 3 Minutes
  4. एक से अधिक विकल्प सही हो सकते हैं।

Which of the following is not a fundamental duty?

  1. to serve the nation when called upon
  2. To develop scientific temper, humanism and the spirit of learning and reform
  3. To provide opportunities for education to their children between the age of 6 to 14 years
  4. Worshiping freedom fighters.

1 / 4

इनमें से कौन सा एक मूल कर्तव्य नहीं है?

  1. आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करना
  2. वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करना
  3. 6 से 14 वर्ष की उम्र के बीच अपने बच्चों के लिए शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना
  4. स्वतंत्रता सेनानियों की पूजा करना।

Which of the following is correct about Fundamental Duties?

  1. It was added to the Constitution by the 42nd Constitutional Amendment.
  2. That's what article 51 is about.
  3. Sardar Swaran Singh Committee is related to this.
  4. Part '4A' of the Constitution is related to this.

2 / 4

मूल कर्तव्य के बारे में इनमें से क्या सही है?

  1. इसे 42वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में जोड़ा गया।
  2. अनुच्छेद 51 इसी के बारे में है।
  3. सरदार स्वर्ण सिंह समिति इसी से संबंधित है।
  4. संविधान का भाग '4क' इसी से संबंधित है।

3 / 4

मूल कर्तव्य गिनती में कितने हैं?

Which of the following is correct about the importance of Fundamental Duties?

  1. It reminds us that along with exercising rights, we also have some duties.
  2. It stops us from doing anti-national work.
  3. It inculcates in us the feeling of doing something for the country.
  4. Provision has also been made to punish those who do not fulfill these duties.

4 / 4

मूल कर्तव्यों के महत्व के बारे में इनमें से क्या सही है?

  1. ये हमें याद दिलाता है कि अधिकारों का इस्तेमाल करने के साथ-साथ हमारे कुछ कर्तव्य भी है।
  2. ये हमें राष्ट्रविरोधी काम करने से रोकता है।
  3. ये हमारे अंदर देश के लिए कुछ करने का भाव पैदा करता है।
  4. इन कर्तव्यों को पूरा न करने पर दंड देने की भी व्यवस्था की गई है।

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