मूल कर्तव्यों को समझिए॥ Fundamental duties॥

इस लेख में हम मूल कर्तव्यों पर सरल और सहज चर्चा करेंगे। तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें और मूल कर्तव्य को अच्छे से समझें।
मूल कर्तव्य

मूल कर्तव्यों की पृष्ठभूमि

▶▶अब तक हमने मूल अधिकार के बारे में विस्तार से चर्चा कर चूकें है। अगर आपने उसे नहीं पढ़न है तो ▶▶यहाँ क्लिक करके उसे जरूर पढ़ें।

🔷 आमतौर पर हम मूल अधिकार अक्सर चर्चा में रहता है। शायद इसीलिए क्योंकि वो एक अधिकार है। और हम कुछ भी करके अपने अधिकार को तो नहीं छोड़ने वाले। उसके लिए भले ही सुप्रीम कोर्ट ही क्यों न जाना पड़े पर अधिकार का किसी भी तरह से हनन नहीं होना चाहिए। पर मूल कर्तव्य का क्या?

इसके बारे में आमतौर पर कम ही चर्चा होती है। क्योंकि शायद हम लेना जानते हैं देना नहीं। जी हाँ मूल कर्तव्य मोटे तौर पर राष्ट्र को कुछ देने के बारे में हैं। क्या देने के बारे में उसकी चर्चा करने से पहले आइये आइये थोड़ा जान लेते हैं कि ये कैसे अस्तित्व में आया?

💢 मूल कर्तव्यों का अस्तित्व में आना

मूल कर्तव्य संविधान का हिस्सा नहीं था, यानी कि जब संविधान बनाया गया था उस समय इसको संविधान का हिस्सा नहीं बनाया गया था। पर इसकी जरूरत समझी इन्दिरा गांधी की सरकार ने।

हालांकि उन्होने इसकी जरूरत तब समझी जब देश में आपातकाल लगा हुआ था और ये आपातकाल लगाया भी उन्होने ही था। खैर उन्होने जो भी सोचा हो पर इसकी अच्छी बात ये थी कि उन्होने इसके लिए 1976 में एक समिति का गठन किया। ये समिति सरदार स्वर्ण सिंह के अध्यक्षता में बनाया गया था।

इस समिति का काम ये चेक करना था कि मूल कर्तव्य की आवश्यकता है या नहीं। याद रखिए उस समय आपातकाल लगा हुआ था। आपातकाल 1975 से 1977 तक चला था।

इस समिति ने सिफ़ारिश किया कि संविधान में मूल कर्तव्यों का एक अलग पाठ होना चाहिए। और उन्होने इस बात को भी रेखांकित किया कि नागरिकों को अधिकारों के प्रयोग के अलावा अपने कर्तव्यों को भी निभाना आना चाहिए।

चूंकि सरकार खुद भी ये चाहटी थी इसीलिए इस समिति की सफारिशों को मान लिया गया। और 1976 में ही 42वां संविधान संशोधन करके संविधान में एक नया भाग – भाग ‘क’ को जोड़ा गया। इसी भाग ‘क’ के अंतर्गत एक अनुच्छेद बनाया गया जिसे कि अनुच्छेद 51 ‘क’ कहा गया। और इसी अनुच्छेद 51 ‘क’ के अंतर्गत मूल कर्तव्यों को वर्णित किया गया।

सरदार स्वर्ण सिंह की समिति ने कुल 8 मूल कर्तव्यों को जोड़ने की सिफ़ारिश की थी लेकिन इन्दिरा गांधी को इसमें कुछ मिसिंग लगा इसीलिए उन्होने 2 और को जुड़वा दिया और इस तरह से कुल 10 मूल कर्तव्यों को एक संवैधानिक प्रावधान बना दिया गया। आगे चलकर 2002 में जब अटल बिहारी बाजपेई की सरकार थी तब इसमें एक और मूल कर्तव्य को जोड़ा गया और इस तरह से आज संवैधानिक रूप से 11 मूल कर्तव्य है जो अस्तित्व में है।

अब आइये उन 11 मूल कर्तव्यों को देख लेते हैं।

💢 मूल कर्तव्यों की सूची

भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा कि वह: –
1. संविधान का पालन करें और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्र गान का आदर करें।
2. स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखें और उनका पालन करें।
3. भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करें और उसे अक्षुण्ण रखें।
4. देश की रक्षा करें और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करें।
5. भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्वाण करें जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग आधारित सभी भेदभाव से परे हों, ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो स्त्रियॉं के सम्मान के विरुद्ध हैं।
6. हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझें और उसका परिरक्षन करें।
7. प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करें और उसका संवर्धन करें तथा प्राणिमात्र के प्रति दया भाव रखें।
8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें।
9. सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखें और हिंसा से दूर रहें।
10. व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करें जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊंचाइयों को छू ले।
11. 6 से 14 वर्ष की उम्र के बीच अपने बच्चों क शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना। (यही वाला 2002 में 86वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया)

आइये अब इन मूल कर्तव्यों की विशेषताओं को समझ लेते हैं।

मूल कर्तव्यों की विशेषताएं

💠 इसमें से कुछ कर्तव्य नैतिक किस्म के हैं जिसमें बाह्य तौर पर कुछ भी नहीं करना है बस अपने नैतिकता के प्रतिमानों को उस हिसाब से ढालना है। उदाहरण के लिए आप दूसरे नंबर के कर्तव्य को देखिये।

💠 इसी प्रकार से कुछ कर्तव्य ऐसे है जिसमें जरूरत पड़ने पर कुछ करने का भाव है। उदाहरण के लिए आप कर्तव्य नंबर 4, 6, 7, 9 आदि को देख सकते हैं।

💠 जहां मूल अधिकार के हनन पर आप सीधे न्यायालय जा सकते हैं और न्यायालय मूल अधिकारों को लागू करवाता है, वहीं मूल कर्तव्य गैर-न्यायोचित है, यानी कि इसके हनन पर न्यायालय इसे क्रियान्वित नहीं करवा सकता है।

💠 कुछ मूल अधिकार ऐसे हैं जो विदेशियों पर भी लागू होता है लेकिन मूल कर्तव्य केवल देश के नागरिकों पर लागू होता है।

💠 मूल कर्तव्यों को भारतीय परंपरा, पौराणिक कथाओं, धर्म आदि के अनुरूप ही बनाया गया है ताकि ये आसानी से लोगों के जीवन का हिस्सा बन जाये।

मूल कर्तव्यों का महत्व

💢 ये एक सचेतक के रूप में काम करता है। यानी कि जब भी हम मूल अधिकारों का इस्तेमाल करते हैं तो हमें ये याद दिलाता है कि देश के प्रति हमारा कुछ कर्तव्य भी है और हमें उसका भी निर्वहन करना चाहिए।

💢 मूल कर्तव्य हमें राष्ट्र विरोधी काम करने से रोकने का काम करता है। जैसे कि राष्ट्र ध्वज को जलाना, सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करना आदि।

💢 मूल कर्तव्य हम में प्रेरणा की भावना को बलवती करता है और ये हमें एहसास दिलाता है कि ये देश हमारा है और देश को गढ़ने में हमारा भी योगदान मायने रखता है।

मूल_कर्तव्यों से जुड़े कुछ तथ्य

💠 जब मूल कर्तव्य को संसद में लाया गया था तो विपक्षी दलों ने इसका काफी विरोध किया था। वे लोग इसे संविधान में जोड़े जाने के पक्ष में नहीं थे। लेकिन दिलचस्प बात ये है कि 1977 में जब इन्दिरा गांधी की सरकार गिर गयी और मोरार जी देशाई की सरकार सत्ता में आयी तो उसने इसमें कोई बदलाव नहीं किया। जबकि आपको पता होगा कि 1978 में 44वां संविधान संशोधन करके मोरार जी देशाई की सरकार ने इन्दिरा गांधी द्वारा बनाए गए बहुत सारे नियम-क़ानूनों को खत्म कर दिया था। लेकिन मूल कर्तव्यों को खत्म नहीं किया इससे पता चलता है कि मूल कर्तव्य देश के लिए वाकई जरूरी था ।

💠 1976 में मूल कर्तव्य को लागू करते समय, इसको और ज्यादा प्रभावी और बाध्यकारी बनाने को लेकर भी सिफ़ारिशें आयी थी, लेकिन श्रीमती गांधी ने इसको इगनोर कर दिया था।

हालांकि जरूरत पड़ने पर बहुत सारे मूल कर्तव्यों को सपोर्ट देने के लिए कई नियम-अधिनियम आदि बनाए गए हैं।

जैसे कि इंडियन फ्लैग कोड को ही लें तो इसे 2002 में जारी किया गया था जिसमें भारतीय झंडे के आदर, सम्मान और झंडे फहराने के नियम आदि को वर्णित किया गया है। आप इसे ↗️यहाँ क्लिक करके जरूर पढ़ें।

💠 इसके अलावे भी आप अगर वन्य जीव संरक्षण संरक्षण अधिनियम 1972, वन संरक्षण अधिनियम 1980, सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955, राष्ट्रीय गौरव अपमान अधिनियम 1971 आदि को देखें तो ये मूल कर्तव्यों के प्रावधानों से ही तो मैच करता है।

उदाहरण के लिए अगर आप कर्तव्य नंबर 7 को देखें और वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 और वन संरक्षण अधिनियम 1980 को देखें तो आपको समानता नजर आ जाएगी।

यहाँ पर एक बात और याद रखिए कि जितने भी इस प्रकार के कर्तव्य है जिस पर किसी न किसी रूप में कानून बनी हुई है उसे पहली बार 1999 में वर्मा समिति ने आइडेंटिफाई किया था।

हालांकि अब ये मस्ती में चल रहा है लेकिन कुछ आधारों पर इसकी आलोचना की जाती है, आइये उसे देख लेते हैं।

💢मूल कर्तव्यों की आलोचना
Criticism of fundamental duties

💢 कर्तव्यों की सूची अधूरी है क्योंकि इसमें बहुत सारे अन्य कर्तव्यों को शामिल नहीं किया गया है जैसे कि – मतदान, टैक्स आदायगी, परिवार नियोजन आदि।

हालांकि 1976 में स्वर्ण सिंह समिति ने कर आदायगी को भी मूल कर्तव्य बनाने की बात सरकार के सामने रखी थी लेकिन उसे श्रीमती गांधी ने शामिल नहीं किया।

💢 कुछ कर्तव्यों की भाषा इतनी अस्पष्ट और क्लिष्ट है कि आम लोगों की समझ से परे है। जैसे कि – सामासिक संस्कृति (Composite culture), उच्च आदर्श आदि।

💢 चूंकि ये गैर-न्यायोचित है इसीलिए लोग इसे माने या न माने इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। हालांकि स्वर्ण सिंह मूल कर्तव्य में दंड या सजा को जोड़ने के पक्ष में थे लेकिन श्रीमती गांधी ने इसे भी नकार दिया था।

तो ये रहा मूल कर्तव्य, उम्मीद है आप समझ गए होंगे।

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