Future Derivatives in Hindi with Example

इस लेख में हम फ्युचर डेरिवेटिव्स (Future derivatives) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे, तो लेख को अंत तक जरूर पढ़ें।
Future Derivatives
यहाँ क्लिक करें – ↗️शेयर मार्केट के बेसिक्स को समझें

पिछले लेख में हमने ↗️फॉरवर्ड डेरिवेटिव्स (Forward derivatives) को अच्छे से समझ लिया है। हमने देखा था की फॉरवर्ड कांट्रैक्ट में कुछ समस्याएँ थी जैसे कि उसमें पारदर्शिता नहीं थी, अगर कोई विवाद होता है तो उसका सेटेलमेंट बहुत मुश्किल था आदि। फ्युचर और ऑप्शन में इस तरह की कोई परेशानी नहीं इसके अलावा इसमें कई अच्छी बाते हैं जो ट्रेडर्स को भरोसे में रखता है। तो आइये इस लेख में फ्युचर डेरिवेटिव्स (Future derivatives) को समझते हैं।

Future Derivatives in Hindi

फ्युचर्स (Futures) भविष्य के लिए आज के डेट में आज के प्राइस पर किया गया एक कांट्रैक्ट है। यानी कि फ्युचर्स भी फॉरवर्ड की तरह ही एक कांट्रैक्ट है। लेकिन यहाँ पर जो अंतर है वो ये है कि यहाँ मध्यस्थता (Mediation) के लिए एक्स्चेंज होता है। ये एक्स्चेंज सारे के सारे लेन-देन पर नजर रखते है और ये खरीददार और बेचने वाले दोनों को एक लीगल प्लैटफ़ार्म प्रोवाइड करते हैं।

मूलतः दो कारणों से लोग फ्युचर कांट्रैक्ट करते हैं, या तो हेजिंग (Hedging) के लिए या फिर ट्रेडिंग (Trading) के लिए। हेजिंग मतलब अपना रिस्क कम करने से है जबकि ट्रेडिंग का मकसद ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना होता है। इसका क्या मतलब है ये आगे क्लियर हो जाएगा।

फ्युचर की कुछ मुख्य बातें
(Some highlights of the future)

फ्युचर डेरिवेटिव्स (Future derivatives) शॉर्ट टर्म के लिए होता है और ये शॉर्ट टर्म 1 महीने, 2 महीने और 3 महीने तक होता है। अगर हम 1 महीने का फ्युचर कांट्रैक्ट करते हैं तो उसे नियर मंथ (Near month) कहा जाता है और इसकी वैलिडिटि उस महीने के आखिरी गुरुवार (Thursday) तक होता है, यानी कि ये उसका एक्सपाइरी डेट होता है।

यहाँ पर ये याद रखिए कि शेयर एक्सपायर नहीं होता है लेकिन फ्युचर और ऑप्शन एक्सपायर होता है।

इसी तरह जब आप 2 महीने का फ्युचर कांट्रैक्ट करते हैं तो उसे नेक्स्ट मंथ (Next Month) कहा जाता है, और अगर आप 3 महीने का फ्युचर कांट्रैक्ट करते हैं तो उसे फार मंथ (Far month) कहा जाता है। सभी का एक्सपायरी आखिरी मंथ के लास्ट गुरुवार (Thursday) को ही होता है।

◾ दूसरी बात ये है कि ये एक बाइंडिंग कांट्रैक्ट होता है यानी कि एक बार अगर आप इस कांट्रैक्ट में इंटर कर गए तो आप वापस नहीं आ सकते यानी कि जितने महीने का आपने कांट्रैक्ट किया है उस महीने के लास्ट थर्सडे तक। {ये वाला पॉइंट याद रखिए यही वो पॉइंट है जो ऑप्शन (Option) को जन्म देता है}

◾ तीसरी बात ये कि चूंकि फ्युचर एक्स्चेंज के देख रेख में होता है। इसीलिए यहाँ पर ट्रेडिंग के लिए डीमैटअकाउंट (Demat account) की जरूरत पड़ती है। आइये इसे एक शेयर डेरिवेटिव्स के उदाहरण से समझते है।

Future Derivatives Example

मान लेते हैं कि एक गेहूं खरीददार (Wheat Buyer) का, एक गेहूं बेचने वाले किसान के साथ एक फ्युचर कांट्रैक्ट हो जाता है कि वो 2 महीने बाद 1 क्विंटल गेहूं 1000 रुपए में खरीदेगा, और किसान उसे इतना में ही बेचेगा भले ही मार्केट में उस समय गेहूं का मूल्य कितना भी क्यों न हो।

अब यहाँ पर किसान की जो पोजीशन है उसे शॉर्ट पोजीशन (Short position) कहा जाएगा क्योंकि किसान बेच रहा है, वहीं खरीददार का जो पोजीशन है उसे लॉन्ग पोजीशन (Long position) कहा जाएगा क्योंकि ये खरीदने वाला है।

अब दोनों ने तो 1000 रुपए में कांट्रैक्ट कर लिया है लेकिन गेहूं का मार्केट प्राइस तो रोज अप और डाउन होगा। ऐसे में यहाँ पर तीन स्थितियां हो सकती है – 2 महीने बाद जब Square off (यानी कि कांट्रैक्ट खत्म होने का वक्त) आएगा तो या तो गेहूं का मार्केट या प्राइस बढ़ जाएगा या कम हो जाएगा या फिर उसी दाम पर स्थिर होगा।

अगर मान ले कि कांट्रैक्ट खत्म होने के दिन उस दिन 1 क्विंटल गेहूं का मार्केट प्राइस बढ़कर 1000 रुपए से 1500 रुपए हो जाता है तो उस स्थिति में क्या होगा? अब चूंकि दोनों पार्टी इस कांट्रैक्ट से बंधा हुआ है इसीलिए खरीददार को उसे लेना ही पड़ेगा और किसान को बेचना ही पड़ेगा।

1 क्विंटल गेहूं का कांट्रैक्ट 1000 रुपए में हुआ है इसीलिए उस खरीददार को तो वो 1000 रुपए में ही मिल जाएगा क्योंकि यही कांट्रैक्ट हुआ है। लेकिन चूंकि अब 1 क्विंटल गेहूं का मार्केट प्राइस 1500 रुपए हो गया है इसीलिए उस खरीददार को 500 रुपए का फायदा हो जाएगा। कैसे होगा? जाहिर है वो खरीददार उस किसान से 1000 में खरीदेगा लेकिन उतनी ही गेहूं का मूल्य मार्केट में अभी 1500 रुपया है इसीलिए जब उसे मार्केट में बेचेगा तो उसे 500 रुपये का फायदा हो जाएगा,

लेकिन उसी समय उस किसान को 500 रुपए का लॉस हो जाएगा। क्यों? क्योंकि मार्केट रेट अभी 1500 है जबकि उसने 1000 में ही देने का कांट्रैक्ट कर लिया था। इसीलिए उसे 500 रुपए का लॉस उठाना पड़ेगा। तो यहाँ पर आपने देखा कि किसान को लॉस हुआ और उस खरीददार को फायदा हुआ।

इसका मतलब ये है कि यहाँ पर किसी को फायदा तभी होता है जब किसी को नुकसान हो। अगर एक पार्टी को फायदा होगा तो दूसरे पार्टी को लॉस जरूर होगा। इसीलिए इसे Zero Sum Game कहा जाता है और यहीं वो बात है जो इसे शेयर से अलग करता है क्योंकि शेयर में सभी का फायदा हो सकता है या फिर सभी का नुकसान हो सकता है।

इसी प्रकार से अगर देखें तो किसान को फायदा तभी होगा जब गेहूं का मार्केट प्राइस 1000 रुपए से कम जाएगा। जितना कम होगा उतना ही किसान को फायदा होगा। लेकिन अगर मार्केट प्राइस न घटता है और न ही बढ़ता है तो दोनों का न तो लॉस होगा और न ही प्रॉफ़िट।

अब इसके सेटेलमेंट की बात करते हैं कि इसमे पैसा मिलता कैसे है?

Future Settlement

इतना पहले याद रखिए कि एक फ़िक्स्ड मार्जिन अमाउंट (Margin amount) ट्रेडिंग अकाउंट में रखना पड़ता है। ये कितना होता है ये ब्रोकर (Broker) डिसाइड करता है। मार्जिन अमाउंट वो कम से कम अमाउंट होता है जितने में आपको ब्रोकर फ्युचर खरीदने देता है।

इसमें दो तरह से सेटेलमेंट होता है। पहला है Cash Settlement और दूसरा है Delivery Settlement। ज़्यादातर Cash Settlement का ही उपयोग होता है। जैसे अगर मान ले कि किसान को 500 रुपए का फायदा हुआ तो 500 रुपए किसान के अकाउंट में ट्रान्सफर हो जाएगा। इसी तरह अगर खरीददार को 500 रुपए का अगर फायदा हुआ तो 500 रुपए खरीददार के अकाउंट में क्रेडिट हो जाएगा।

लेकिन अगर खरीददार कैश नहीं लेना चाहता है बल्कि गेहूं ही लेना चाहता है तो फिर उस किसान को उस गेहू की डेलीवेरी उसे देनी पड़ेगी। लेकिन आम तौर पर ऐसा होता नहीं है। क्यों नहीं होता है? क्योंकि खरीदने और बेचने के लिए आम मार्केट तो है ही।

कुल मिलाकर यही इसका बेसिक है लेकिन अगर आप शेयर के माध्यम से इसे समझना चाहते हैं तो आइये उसे भी समझ लेते हैं। इससे थोड़ा और क्लैरिटी मिल जाएगी।

Future Derivatives Example 2

मान लीजिये कि रिलायंस के एक शेयर का आज की तारीख में मूल्य 100 रुपए है। अगर आपको ऐसा लगता है कि ठीक 2 महीने बाद इस शेयर मूल्य 200 रुपया हो जाएगा तो आप क्या करेंगे? आप आज ही 2 महीने बाद की तारीख के लिए एक फ्युचर कांट्रैक्ट साइन कर लेंगे।

इसका मतलब ये हुआ कि दो महीने बाद उस शेयर की कीमत भले ही कितना ही क्यों न हो आपको वो 100 रुपए में ही मिलेगा और अगर सच में शेयर की कीमत 2 महीने बाद 200 रुपए हो जाती है तो आपको पूरे 100 रुपए का फायदा होगा। क्योंकि आपको तो वो 100 रुपए में ही मिला था लेकिन अभी उसका मार्केट रेट 200 हो गया।

यहाँ पर आप एक बात बात गौर करेंगे कि आपने शेयर खरीदा ही नहीं आपने बस उसका फ्युचर खरीदा। ये तो इसका बेसिक कान्सैप्ट है लेकिन याद रखिए कि एक शेयर का फ्युचर कभी भी नहीं बिकता है। ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि अगर एक शेयर का फ्युचर बिकने लगा तो फिर नॉर्मल शेयर और फ्युचर में अंतर ही क्या रह जाएगा।

फ्युचर इस मायने में अलग है कि जब आप किसी कंपनी के शेयर का फ्युचर खरीदते हैं तो आपको शेयर का एक लॉट मिलता है। एक लॉट में कितना भी शेयर हो सकता है, ये कंपनी-कंपनी पर निर्भर करता है। जैसे कि आप अगर रिलायंस की बात करें तो उसके एक लॉट में 500 शेयर होता है। इसका मतलब ये हुआ कि जब भी आप रिलायंस कंपनी के शेयर का फ्युचर कांट्रैक्ट करेंगे तो आपके पास कुल 500 शेयरों का फ्युचर कांट्रैक्ट होगा।

यहाँ पर ब्रोकर का रोल बहुत ही अहम होता है। कैसे होता है? आइये ऊपर वाले उदाहरण को फिर से देखते हैं और समझते हैं।

मान लीजिये आपके पास सिर्फ 5000 रुपए है और अभी रिलायंस के एक शेयर का मूल्य 100 रुपया है। यानी कि अगर आप नॉर्मल शेयर खरीदे तो आप इतने रुपए में आप रिलायंस का 50 शेयर खरीद सकते हैं। मार्केट ट्रेंड देखकर आपको लगता है कि 2 महीने बाद रिलायंस के एक शेयर का मूल्य 200 रुपया हो जाएगा। यानी कि आज आप अगर इसे खरीद लेंगे तो 2 महीने बाद आपको एक शेयर पर नेट 100 रुपये का फायदा होगा। अगर दो महीने बाद सच में उस शेयर का मूल्य 200 रुपए हो जाता है तो आपको सच में एक शेयर पर 100 रुपए का फायदा हो जाएगा। यानी कि 50 शेयर पर 5000 रुपए का फायदा होगा।

लेकिन आप सोचिए कि अगर आपको रिलायंस का फ्युचर उसी 5000 रुपए में मिल जाये तो आपको कितना फायदा होगा? चलिये इसे कैलकुलेट करते हैं।

चूंकि रिलायंस के फ्युचर में 500 शेयर होता है इसीलिए अगर आप नॉर्मल शेयर खरीदते तो आपको 500 शेयर के 50000 रुपया पे करना पड़ता और दो महीने बाद अगर एक शेयर का मूल्य 200 रुपए हो जाता तो आपको 50000 रुपए का फायदा होता। यानी कि आपने 500 शेयर के लिए 50000 रुपए लगाए तब जाकर आपको 50000 रुपए का फायदा हुआ लेकिन क्या हो अगर आपको 50000 का शेयर सिर्फ 5000 रुपए में मिल जाये।

जी हाँ ऐसा ही होता है, आपका ब्रोकर आपको लीवरेज (Leverage) देता है। इसे एक तरह का उधारी ही समझिए। यानी कि उसी 5000 रुपए में जहां आप सिर्फ 50 शेयर खरीद पाते वहीं आप अगर आप फ्युचर खरीदते है तो आपको 500 शेयर मिल जाता है। जितने पैसे ब्रोकर आपके लिए लगाता है उसे Leverage कहा जाता है और जितने पैसे आपको देने पड़ते है उसे Initial Margin Amount कहा जाता है। आम तौर पर Initial Margin Amount 10 से 20 परसेंट के आस-पास होता है।

हमारे केस में Initial Margin Amount 10 परसेंट है यानी कि 5000 रुपए। क्यों? क्योंकि हमारे एक लॉट में 500 शेयर्स है और एक का दाम 100 रुपए है। पूरे का दाम 50,000 रुपए हो गया, उसका 10 परसेंट 5000 रुपए होता है।

अब दो महीने बाद अगर एक शेयर का मूल्य 200 रुपए होता है तो आपको कुल 50,000 रुपए का फायदा होगा। क्यों? क्योंकि आप के पास कुल 50 हज़ार रुपए के शेयर्स थे। यानी कि सिर्फ 5000 रुपए से आपने 50,000 रुपए का प्रॉफ़िट जेनरेट कर लिया। जबकि आप नॉर्मल शेयर खरीदते तो आपको यही 50 हज़ार रुपया कमाने के लिए 50,000 रुपए इन्वेस्ट करना पड़ता। यही फ्युचर का सबसे बड़ा फायदा है और इसी कारण से ज़्यादातर लोग इसमें आते हैं। क्योंकि पैसे कम रहने के बावजूद भी फायदा बहुत बड़ा होता है।

नोट – ये बस एक उदाहरण है एक्चुअल Initial Margin Amount और एक्चुअल लॉट साइज़ इससे अलग हो सकता है।

Future derivatives Drawback

लेकिन सबकुछ हमेशा अच्छा ही नहीं होता है। मान लीजिये कि अगर एक शेयर का मूल्य बढ़ने के बजाय घट जाए तो फिर क्या होगा। अगर उस 100 रुपए वाले शेयर का मूल्य दो महीने बाद अगर 50 रुपए हो जाये तो। तो ऐसी स्थिति में होगा ये कि चूंकि पूरे लॉट का मूल्य 50000 रुपए है इसीलिए 2 महीने बाद उस शेयर का मूल्य घटकर 25000 हो जाएगा। यानी कि सीधे 25000 रुपए का लॉस। लेकिन आपने तो सिर्फ 5000 रुपए ही लगाए थे बाद बाँकी तो आपका ब्रोकर आपको लीवरेज दिया था। यानी कि और और बचे हुए पैसे तो आपके ब्रोकर ने दिया था। इसीलिए जब 25000 रुपए का लॉस होगा तो आपने 5000 रुपए तो पहले ही दे चुके है इसीलिए अब आपको अपने पास से 20,000 रुपए ब्रोकर को देने पड़ेंगे।

यही इसका सबसे बड़ा drawback है। क्योंकि एक शेयर में उतना ही घाटा लगता है जितना कि आपने इन्वेस्ट किया है। लेकिन फ्युचर में जितना आपका मूलधन था उससे भी कई गुना ज्यादा घाटा लग सकता है। आपने ऊपर के उदाहरण में देखा ही कि जब घाटा हुआ तो 20,000 रुपए एक्सट्रा घाटा लग गया। वहीं अगर इसकी जगह पर शेयर होता तो ज्यादा से ज्यादा 5000 रुपए का ही घाटा होता।

कुल मिलाकर यही है फ्युचर डेरिवेटिव्स (Future derivatives)। जब आदमी इसमें कमाता है तो रातो रात करोड़पति बन जाता है, लेकिन जब गंवाता है तो रातो-रात करोड़ पति से रोडपति हो जाता है।

इसी में थोड़ा और रिस्क कम करने या फिर घाटा कम करने के लिए लाया गया ऑप्शन (Option)। जिसे कि हम अगले लेख में समझेंगे। उसका लिंक ⏬नीचे है।

Option derivatives
Option derivatives

⚫⚫⚫⚫

Future derivatives
🔽Download

Mutual Fund in Hindi
Insurance in hindi

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *