Gender discrimination in Hindi pdf (लैंगिक भेदभाव निबंध)

इस लेख में लैंगिक भेदभाव (Gender discrimination) पर सरल और सहज चर्चा किया गया है। आप इस लेख का निबंध लेखन में भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

लैंगिक भेदभाव (Gender discrimination) पर एक सम्पूर्ण शोध पत्र भी नीचे दिया गया है जिसे आप डाउनलोड कर सकते है। लैंगिक भेदभाव से संबन्धित आप को जो भी चाहिए, वहाँ से मिल जाएगा।

लैंगिक भेदभाव एक गंभीर समस्या
Gender discrimination a serious problem

gender discrimination

स्त्री पुरुष मानव समाज की आधारशिला है | किसी एक के अभाव में समाज  की कल्पना नहीं की जा सकती, इसके बावजूद लैंगिक भेदभाव एक सामाजिक यथार्थ है | यह मूलतः स्त्रियों से संबंधित समस्या है, जहां स्त्रियों को पुरुषों के समान अवसर का न मिलना एवं व्यवहार का ना होना संभव होता है | इस रूप में स्त्रियों के साथ भेदभाव पूर्ण व्यवहार लैंगिक भेदभाव (gender discrimination) है ।

लैंगिक भेदभाव की शुरुआत
Beginning of gender discrimination

इसकी शुरुआत परिवार से ही समाजीकरण (Socialization) के क्रम में प्रारंभ होती है, जो आगे चलकर पोस्ट होती  जाती है | परिवार  मानव की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है |

यह समाज का आधारशिला है। समाज में जितने भी छोटे बड़े संगठन हैं, उनमें परिवार का महत्व सबसे अधिक है यह मानव की मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति से संबंधित है।

इसका प्रभाव व्यक्ति के जन्म के साथ शुरू होता है और अंत तक रहता है। इसलिए यह एक सार्वभौम संस्था है जो प्रत्येक समाज में अनिवार्य रूप से पाई जाती है।

व्यक्ति जन्म से जैविकीय प्राणी होता है और जन्म से ही लिंगों के बीच कुछ विशेष भिन्नताओं  को स्थापित और पुष्ट करती है | बचपन से ही लड़कों व लड़कियों के लिंग भेद के अनुरूप व्यवहार करना, कपड़ा पहनना एवं खेलने के ढंग आदि सिखाया जाता है |यह प्रशिक्षण निरंतर चलता रहता है, फिर जरूरत पड़ने पर लिंग अनुरूप सांचे में डालने  के लिए बाध्य किया जाता है तथा यदा-कदा सजा  भी दी जाती है।

बालक व बालिकाओं के खेल व खिलौने इस तरह से भिन्न होते हैं कि समाज द्वारा परिभाषित नर – नारी के क्षेत्र के अनुरूप ही उनका विकास  हो सके। सौंदर्य के प्रति अभिरुचि  की आधारशिला भी बाल्यकाल  से ही लड़की के मन में अंकित कर दी जाती है, इस प्रक्रिया में बालिका के संदर्भ में सौंदर्य को बुद्धि की तुलना में प्राथमिकता दी जाती है।

एक अर्थ में इसे छवि निर्माण के माध्यम से उसकी बौद्धिक क्षमताओं को द्वितीयक स्थान मिलता है। समाज की अनेक संस्थाएं नारी की प्रस्थिति को निम्न बनाने में सहायक होती है 

पितृ-सतात्मक समाज और स्त्री
Patriotic society and women

पितृ-सतात्मक भारतीय समाज आज भी महिलाओं की क्षमताओं को लेकर, उनकी आत्म-निर्भरता के सवाल पर पूर्वाग्रहों से ग्रसित है। स्त्री की कार्यक्षमता और कार्यदक्षता को लेकर तो वह इस कदर ससंकित है कि नवाचार को लेकर उनके किसी भी प्रयास को हतोत्साहित करता दिखता है।

देश में आम से लेकर ख़ास व्यक्ति तक लगभग सभी में यह दृष्टिकोण व्याप्त है कि स्त्री की दायरा यूँ तो घर की चारदीवारी तक ही होनी चाहिए। इस प्रकार स्त्रियों की लिंग भेद आधारित काम एवं अधीनता जैसी असमानता  जैविक नहीं बल्कि सामाजिक – सांस्कृतिक मूल्यों, विचारधाराओं और संस्थाओं की देन है। सामाजिक असमानता एक सार्वभौमिक तथ्य है। यह प्रायः सभी समाजों की विशेषता रही है

लेकिन सामाजिक असमानता समस्या तब बनती है जब सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत सामाजिक मूल्यों एवं प्रतिमानों के कारण व्यक्तियों को विकास के समान अवसर नहीं प्राप्त हो पाते हैं | लैंगिक असमानता भारत की एक प्रमुख समस्या है। यहाँ जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में जितनी सुविधाएं एवं स्वतंत्रता पुरुषों को प्राप्त है उतनी स्त्रियों को नहीं।

लैंगिक भेदभाव आंकड़ों में
gender discrimination in statistics

2011 की जनगणना के अनुसार भारत में प्रति 1000 पुरुषों पर केवल 940 औरतें है, जनगणना के आंकड़े बताते  हैं कि 1901 में प्रति हजार  पुरुषों पर 972 औरतें थी।

1951 में औरतों की संख्या प्रति हजार 946 हो गई और 1981 तक आते-आते सिर्फ 934 रह गई। 1991 में यह 927 हुए और सन् 2001 में जनगणना की रिपोर्टों  के अनुसार यह  933 हो गई  एवं  2011 में 940  हो गई।

इस घटते हुए अनुपात का प्रमुख कारण समाज की  नारी के प्रति वे सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से है, जिनमें महिलाएं और बालिकाएं जीने  के लिए मजबूर है। अधिकांश परिवार यह  सोचते हैं की लड़कियां न तो बेटों के समान उनके वृद्धावस्था का सहारा बन सकती है और ना ही दहेज ला सकती है।

सन् 1991 की जनगणना के अनुसार महिला साक्षरता की दर 39.90 प्रतिशत एवं पुरुष साक्षरता 64.13 प्रतिशत थी। 2001 की जनगणना के अनुसार पुरुष साक्षरता 76 प्रतिशत थी तो महिलाओं की साक्षरता 54 प्रतिशत थी।

2011 की जनगणना के अनुसार पुरुष साक्षरता 78.26 प्रतिशत है एवं महिला साक्षरता 65.46 प्रतिशत है। जिनमें आन्ध्र-प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश में स्त्री पुरुष साक्षरता में 25 प्रतिशत का अंतर हैं।

भारत में महिलाओं की पुरुषों की अपेक्षा साक्षरता का अंतर का मुख्य कारण भेदभाव की प्रकृति ही जिम्मेदार है. व्यवसाय के संचालन में महिलाएँ भले ही सामान रूप से सक्षम हो, लेकिन महिला उद्यमी बनने की राह में आज भी तमाम सामाजिक और सांस्कृतिक अड़चने है। यदि हम वेतन की बात करें तो महिला कर्मचारियों को पुरुषों के मुकाबले कम वेतन मिलता है ।

लैंगिक भेदभाव एक सामाजिक कुरीति
Gender discrimination a social evil

अनेक पुरुष-प्रधान परिवारों में लड़की  को जन्म देने पर माँ को प्रतारित किया जाता हैं । पुत्र प्राप्ति के चक्कर में उसे बार-बार गर्भ धारण करना पड़ता हैं और मादा भ्रूण होने पर गर्भपात करना पड़ता हैं ।

यह सिलसिला वर्षो तक चलता रहता है चाहे महिला की जान ही क्यों न चला जाए। यही कारण है की हमारे देश में महिलाओं की संख्या में निरंतर कमी आती जा  रही है।

यदि समाज में लड़की को भी लड़कों के सामान समझा जाए और नारी के प्रति उसकी मानसिकता में परिवर्तन आ जाए तो महिलाओं के घटती संख्या को अवश्य ही रोका जा सकता हैं।

भारत की जनसंख्या का लगभग एक चौथाई हिस्सा 19 साल से कम उम्र की लड़कियों का है। भारत में लड़कियों के साथ सामाजिक, आर्थिक, मानसिक, आदि कई रूपों में भेदभाव देखने को मिलता है।

लड़कियों के प्रति किया जाने वाला यह भेदभाव बचपन से लेकर बुढ़ापे तक चलता है। शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा यह ग्रामीण क्षेत्रों में यह भेदभाव अधिक देखने को मिलता हैं। अनुमान है की भारत में हर छठी महिला की मृत्यु लिंग-भेद के कारण होती हैं।

लड़का और लड़की के शिक्षा में अंतर

यदि हम भारत में लड़कियों की शिक्षा की बात करें तो स्वतंत्रता के बाद अवश्य ही लड़कियों की साक्षरता दर बढ़ी है, लेकिन लड़कियों को शिक्षा दिलाने में वह उत्साह नहीं देखी जाती है।

भारतीय परिवार में लड़के की शिक्षा पर धन व्यय करने की प्रवृति है क्योंकि वे सोचते है कि ऐसा करने से ‘धन’ घर में ही रहेगा

जबकि बालिकाओं के शिक्षा के बारे में उनके माता–पिता की यह सोच है कि उन्हें शिक्षित करके आर्थिक रूप से भला क्या लाभ होगा।                               

इस प्रकार कहा जा सकता है कि महिलाओं में साक्षरता में कमी का कारण स्पष्ट रूप से लैंगिक भेदभाव ही है।

जो लडकियाँ आत्मविश्वास से शिक्षित होने में सफल हो जाती है और पुरुषों से समक्ष अपना विकास करना चाहती है, उन्हें पुरुषों के समाज में बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

कुल मिलकर लैंगिक भेदभाव
Overall gender discrimination

भारतीय समाज में स्त्री के स्थिति को बड़े ही आदर्श रूप में प्रस्तुत किया गया है। हिन्दू दर्शन में स्त्रियों को अर्धांगिनी के रूप में चित्रित किया गया है, देवीयों के विभिन्न रूपों में सरस्वती, काली, लक्ष्मी, दुर्गा आदि का वर्णन मिलता है।

यहाँ तक की भारत को भारतमाता के रूप में जाना जाता है। परन्तु व्यवहार में स्त्रिओं की स्थिति को पुरुषों के समान नहीं देखी गयी है तथा उन्हें उचित सम्मान नहीं मिला है।

कहने को तो लड़के और लडकियाँ एक ही सिक्के के दो पहलू है पर लडकियाँ सिक्के का वो पहलू है, जिन्हें दूसरे पहलू (लड़कों) द्वारा दबाकर रखा जाता हैं।

समस्या की मूल जड़ इसी सोच के साथ जुड़ी है, जहां लड़कों को बचपन से यही सिखाया जाता है कि वे परिवार के भावी मुखिया हैं और लड़कियों को यह बताया जाता है कि वे तभी अच्छी मानी जाएंगी, जब वे हर स्थिति में पहली प्राथमिकता परिवार को देंगी।

‘प्रभुत्व’ का भाव पुरुषों के हिस्से और देखभाल का भाव स्त्री के हिस्से मान लिया जाता है। ये दोनों भाव पुरुष और स्त्री के व्यक्तित्व को ऐसे गढ़ देते हैं कि वे इस खोल से निकलने की कोशिश ही नहीं करते।

लैंगिक भेदभाव और यूनिसेफ़ का मत
Gender discrimination and UNICEF opinion

यूनीसेफ का मानना है कि शुरू से ही माता-पिता के साथ सकारात्मक संपर्क बच्चों के दिमागी विकास के लिए महत्वपूर्ण होता है। इससे वे ज्यादा स्वस्थ और सुखी रह पाते हैं और सीखने की उनकी क्षमता भी बढ़ती है।

घर व बाहर, दोनों जगह के कार्यों का दबाव स्त्रियों को शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार कर रहा है, तो क्या यह जरूरी नहीं हो जाता है कि –

घर के काम में पुरुष सदस्य सहयोग करें? पिता का दायित्व सिर्फ आर्थिक दायित्वों की पूर्ति नहीं है, आरंभिक काल में बच्चों की देखभाल भी है।

भारत को भी इस दिशा में विचार करने की जरूरत है कि कामकाजी माताओं के दायित्वों को साझा करने के लिए पितृत्व अवकाश की अवधि में बढ़ोतरी हो। अगर ऐसा होता है, तो यकीनन लैंगिक समानता की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम होगा।

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