भाषा को मुख्य रूप से दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है – आकृतिमूलक वर्गीकरण और पारिवारिक वर्गीकरण। इस लेख में हम भाषा का पारिवारिक वर्गीकरण सरल और सहज तरीके से समझेंगे;

इस लेख को समझने से पहले भाषा के आकृतिमूलक वर्गीकरण को अवश्य पढ़ लें, और साथ हमारे लेख को शेयर करें और हमारे फ़ेसबुक पेज़ को लाइक कर लें।

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भाषा का पारिवारिक वर्गीकरण

| भाषा का वर्गीकरण

भाषा मनुष्य की अभिव्यक्ति का आधार है या फिर दूसरे शब्दों में कहें तो भाषा लोगों के मौखिक और लिखित माध्‍यम की संप्रेषण प्रणाली (communication system) है। इंसानों ने कई हजारों सालों के दौरान अपने विचारों, कल्‍पनाओं और मनोभावों को व्‍यक्त करने के लिए उपयुक्त ध्‍वनि एवं लेखन की प्रणाली विकसित की है।

आज दुनिया भर में खुद को अभिव्यक्त (express) करने के लिए इंसानों के पास ढेरों भाषाएँ हैं, ऐसे में सवाल आता है कि इतनी सारी भाषाएँ आखिर कैसे अस्तित्व में आयी, क्या सभी भाषाएँ एक-दूसरे से संबंधित हैं, इन भाषाओं का वर्गीकरण कैसे किया जाता होगा?

भाषा विद्वानों ने अपनी-अपनी समझ के अनुसार विभिन्न आधारों पर भाषाओं का वर्गीकरण किया, जैसे कि, देश, काल, धर्म, महाद्वीप, आकृति और परिवार आदि। हालांकि इनमें से बहुत सारे वर्गीकरण आज स्वीकार नहीं किए जाते हैं क्योंकि उसका वर्गीकरण तर्कसंगत नहीं लगता है;

उदाहरण के लिए, देश के आधार पर भाषा के वर्गीकरण को लें तो इसके अंतर्गत मात्र एक देश के अंदर बोलनेवाला भाषा आता है, लेकिन ये इसलिए असंगत लगता है क्योंकि प्रवास के कारण आज एक देश की भाषाएँ दूसरे देश में भी बोली जाने लगी है, और दूसरी बात कि ये जरूरी भी तो नहीं है कि एक देश में सिर्फ एक ही भाषा बोली जाती हो, जैसे कि भारत को ही लें ले तो यहाँ इतनी भाषाएँ बोली जाती है कि ये कहना कि ये अमुक भाषा सिर्फ इस देश की भाषा है; असंभव है।

इसी तरह धार्मिक आधार पर, काल के आधार पर एवं महाद्वीप के आधार पर भाषा का वर्गीकरण असंगत लगता है। लेकिन वहीं आकृति के आधार पर और परिवार के आधार पर भाषा का वर्गीकरण आज मान्य है। ये दो महत्वपूर्ण भाषा का वर्गीकरण है जो कि भाषा के बारे में बहुत सारी चीज़ें पूर्ण रूप से स्पष्ट कर देती है।

| भाषा का पारिवारिक वर्गीकरण

जहां आकृतिमूलक वर्गीकरण में समान आकार वाले भाषा को रखा जाता है। अर्थात शब्द या पद के रचना के आधार पर जो वर्गीकरण किया जाता है, उसे आकृतिमूलक वर्गीकरण (Morphological Classification) कहा जाता है।

वहीं रचना तत्व और अर्थ तत्व के सम्मिलित आधार पर किया गया वर्गीकरण, पारिवारिक वर्गीकरण (genealogical classification) कहलाता है। जिस प्रकार से हमारे परिवार में कोई आदि पुरुष होता है और फिर उसका शाखा-प्रशाखा होते चले जाता है, उसी तरह से ऐसा समझा जाता है कि जो भी भाषा आज हम वर्तमान में जानते हैं या जिसका अभी अस्तित्व है उस सब का कोई आदि भाषा रहा होगा। इसी कारण से इस वर्गीकरण को ऐतिहासिक उत्पत्तिमूलक या वंशानुक्रमिक भी कहा जाता है।

भाषा का पारिवारिक वर्गीकरण का निर्णय करने में विद्वानों ने कुछ आधार निश्चित किए है, इससे पता चल जाता है कि कौन सी भाषा कौन से कुल से संबंध रखता है। हालांकि इस बारे में भाषा विज्ञानियों का मत एक नहीं है, सबने अपने-अपने हिसाब से आधार बताए है फिर भी सभी को समग्र रूप से देखने पर भाषा वर्गीकरण के निम्नलिखित चार आधार को लिया जा सकता है ऐसा इसीलिए क्योंकि सभी भाषा विज्ञानियों ने किसी न किसी रूप में इन तत्वों को अपनाया है;

  1. स्थानिक समीपता
  2. शब्द समीपता
  3. व्याकरण साम्य
  4. ध्वनि साम्य

1. स्थानिक समीपता – प्रायः देखा जाता है कि जो भाषा आस-पास के भू-भाग में बोला जाता है वो सामान्यतः एक ही परिवार का होता है। उदाहरण के लिए मैथिली, बंगाली, आसामी आदि को देखा जा सकता है। शब्द, व्याकरण और ध्वनि के साथ अगर स्थानिक समीपता हो तो फिर ये और भी अधिक पुष्ट हो जाता है।

हालांकि कुछ विद्वान का कहना है कि स्थानिक समीपता परिवार के वर्गीकरण में कोई ठोस आधार नहीं है। उदाहरण के लिए मराठी और कन्नड़ एवं मराठी और तेलुगु को लिया जा सकता है जो कि स्थानिक समीपता तो रखता है लेकिन दोनों अलग-अलग भाषाएँ है।

इससे ये निष्कर्ष निकाला जाता है कि भाषा का स्थानिक समीपता मात्र उसके पारिवारिक एकता के संभावना को प्रकट करता है, जरूरी नहीं है कि वो एक ही परिवार का हो।

2. शब्द समीपता – विद्वानों के अनुसार, शब्द समानता के लिए केवल उस शब्द को चुना जाना अपेक्षित होता है जिसका व्यवहार प्रत्येक भाषा समाज के सभी लोगों के द्वारा किया जाता है। उदाहरण के लिए माता-पिता, भाई-बहन आदि सभी समाजों में इस्तेमाल किया जाता है।

शब्द समीपता के आधार पर अनेक भाषा के एक ही परिवार का सिद्ध किया जा सकता है, उदाहरण के लिए आप नीचे के टेबल को देख सकते हैं;

संस्कृतफ़ारसीग्रीकलैटिनअंग्रेजीहिन्दी
पितृपिदरPeterPaterFatherपिता

यहाँ पर आप शब्दों की समानता देख सकते हैं इससे ये कहा जा सकता है कि उपर्युक्त सभी भाषा एक ही परिवार की भाषा है।

यहाँ पर ये ध्यान रखना आवश्यक है कि शब्द समानता के लिए लिए जो शब्द चुना जाता है उसमें ध्वनि के साथ-साथ अर्थ साम्य भी होना चाहिए। जैसे कि पिता और father; यहाँ ध्वनि साम्य भी है और अर्थ साम्य भी।

ऐसा इसलिए जरूरी हो जाता है क्योंकि बहुत सारे ऐसे शब्द होते हैं जिसमें ध्वनि साम्य तो होता है लेकिन अर्थ साम्य नहीं होता है जैसे कि हिन्दी का ”मेल” और अंग्रेजी का ”Mail”।

# शब्द साम्य के लिए निम्नलिखित प्रकार के शब्द को स्वीकार नहीं किया जाता है;

(क) आकस्मिक समानतावाला शब्द – उदाहरण के लिए जर्मन भाषा का शब्द ‘मान (mana) और कोरियाई भाषा का ‘मान’ शब्द में ध्वनि और अर्थ दृष्टि से साम्य है लेकिन ये आकस्मिक है। इसका एक-दूसरे से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे ही अंग्रेजी का ‘near’ और भोजपुरी का ‘नियर’ लिया जा सकता है जिसका मतलब तो एक ही होता है लेकिन ये बस आकस्मिक समानता है और कुछ नहीं।

(ख) ध्वन्यनुकरणमूलक शब्द (Phonetic word) – ”म्याऊँ” शब्द बिल्ली के बोली के अनुकरण पर बना है और अनेक भाषा में म्याऊँ ही कहा जाता है लेकिन इसका ये मतलब नहीं है सभी एक ही भाषा परिवार का है।

3. व्याकरण साम्य – व्याकरण साम्य से आशय है – पद रचना तथा वाक्य रचना की समान शैली। अतः शब्द के समानता के ज्यादा महत्व व्याकरण साम्य का है। इसका कारण ये है कि शब्द आदान-प्रदान होने पर भी संपर्क में आने वाले किसी भाषा में व्याकरण साम्य नही होता है यानी कि उसके पद और वाक्य रचना शैली अपना ही रहता है।

उदाहरण के लिए मैथिली, हिन्दी या इसी कोटि के अन्यान्य भाषा में भरमार साम्य रहते हुए भी उस सब के वाक्य-रचना प्रायः अप्रभावित ही रहा है। अतः जहां शब्द समानता से किसी भाषा का एक होने की संभावना प्रकट होता है वहीं व्याकरण साम्य से उसी संभावना की पुष्टि हो जाती है।

4. ध्वनि साम्य – यह व्याकरण से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। जब दो भाषा एक दूसरे के निकट आता है और एक भाषा के शब्द में आता है, तब अपरिचित ध्वनि और संयुक्ताक्षर के स्थान पर उसी प्रकार के देशी ध्वनि और संयुक्ताक्षर आ जाता है। जैसे कि फ़ारसी का गरीब, कागज़ एवं सबूत आदि। अंग्रेजी के Signal, lantern, box के जगह पर क्रमशः सिंगनल, लालटेन, बक्सा।

इस प्रकार से स्थानिक समीपता, शब्द-साम्य, व्याकरण-साम्य तथा ध्वनि साम्य; ये चारो पारिवारिक वर्गीकरण का आधार है। इसमें व्याकरण पद रचना तथा वाक्य रचना साम्य का महत्व सर्वाधिक है तथा स्थानिक समीपता का महत्व सब से कम है। शब्द साम्य और ध्वनि साम्य से भाषा के पारिवारिक वर्गीकरण में अत्यधिक सहायता मिलती है।

| विश्व के भाषा-परिवार का संक्षिप्त परिचय

हालांकि अभी तक विश्व के बहुत सारे भाषा का अध्ययन ठीक-ठीक नहीं हो पाया है फिर भी जिन भाषाओं का अध्ययन हो चुका है उसके पारिवारिक समानता के अध्ययन पर विद्वानों ने भाषा को विभिन्न वर्ग में वर्गीकृत किया है। हालांकि विद्वानों का इस मामले में मत एक नहीं है।

फिर भी अगर प्रचलित मत की बात करें तो विद्वानों ने सम्पूर्ण भाषा को भौगोलिक आधार पर पहले चार खंड में विभाजित किया है, जो कि कुछ इस तरह है;

  1. अमेरिकी खंड
  2. अफ्रीका खंड
  3. यूरेशिया खंड
  4. प्रशांत महासागर खंड

भाषा का पारिवारिक वर्गीकरण की बात करें तो इस मामले में भी एक मत नहीं है कुछ भाषा विद्वान भाषाओं को 250 परिवार में वर्गीकृत किया है तो कुछ विद्वान ने 18 परिवारों में। हम यहाँ पर 18 परिवारों वाले वर्गीकरण पर चर्चा करने वाले है क्योंकि ये लगभग सभी भाषा को अपने अंदर समेट लेता है।

ये 18 भाषा परिवार कुछ इस प्रकार है;

  1. भारोपीय परिवार (Indo-European family)
  2. द्रविड़ परिवार (Dravidian family)
  3. बुशस्की परिवार (Burushaski Family)
  4. युराल-अल्टाइ परिवार (Ural-Altai family)
  5. काकेशी परिवार (Caucasian Languages)
  6. चीनी परिवार (chinese family)
  7. अत्युत्तरी परिवार (हाइपर बोरी परिवार) (Paleo-Asiatic Languages)
  8. जापानी-कोरियाई परिवार (Japanese-Korean family)
  9. बास्क परिवार (Basque family)
  10. सामी-हामी परिवार (Semitic-Hamitic family)
  11. सुडानी परिवार (Sudanese family)
  12. बाँटू परिवार (Bantu family)
  13. होतेन्तोत बुशमैन परिवार (Bushman family)
  14. मलय-पोलिनेशियाई परिवार (Malayo-Polynesian family)
  15. दक्षिण पूर्व परिवार (Austroasiatic languages)
  16. पापुई परिवार (papuan family)
  17. ऑस्ट्रेलियाई परिवार (australian family)
  18. अमेरिकी परिवार (american family)

अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से कुछ विद्वान इन 18 भाषा परिवारों को भौगोलिक आधार पर किए गए खंड में समाहित करते हैं। ऐसा करने पर हमें इसका और भी सरल रूप प्राप्त होता है; जो कि कुछ इस प्रकार होता है

  1. यूरेशिया खंड – इसके अंतर्गत उपरोक्त क्रम संख्या 1 से लेकर 10 तक परिवार को रखा जाता है।
  2. अफ्रीका खंड – इसके अंतर्गत 10 से लेकर 13 तक परिवार को रखा जाता है। [यहाँ पर ये याद रखिए कि सामी-हामी परिवार अफ्रीका और एशिया दोनों में आता है इसीलिए इसे दोनों के अंतर्गत रखा जाता है।]
  3. प्रशांत महासागरीय खंड – इसके अंतर्गत 14 से लेकर 17 तक के परिवार को रखा जाता है।
  4. अमेरिकी खंड में 18वें परिवार को रखा जाता है।

हम इसमें से यूरेशिया खंड के भाषा को थोड़ा विस्तार से समझेंगे और बाकी के खंड को संक्षिप्त में समझेंगे। तो आइये एक-एक करके समझते हैं;

1. यूरेशिया खंड

ये खंड विश्व के सबसे सम्पन्न भाषा खंड के अंतर्गत आता है। इसीलिए इस भाषा परिवार में विश्व के विकास प्राप्त जाति सब के सभ्यता एवं संस्कृति के इतिहास लेखबद्ध प्राप्त होता है।

भारोपीय परिवार (Indo-European family) – इस परिवार को बहुत सारे नाम दिये गए हैं जैसे कि भारत-जर्मेनीक परिवार, संस्कृत परिवार, आर्य परिवार, भारोपीय परिवार। इस सब में भारोपीय परिवार निर्विवाद रूप से माना जाता है।

भारोपीय भाषाएं पश्चिमी और दक्षिणी यूरेशिया के मूल निवासी भाषा परिवार हैं। इसमें उत्तरी भारतीय उपमहाद्वीप और ईरानी पठार के साथ-साथ यूरोप की अधिकांश भाषाएँ शामिल हैं। इस परिवार की कुछ यूरोपीय भाषाएं, जैसे अंग्रेजी, फ्रेंच, पुर्तगाली, रूसी, डेनिश, डच और स्पेनिश, आधुनिक काल में उपनिवेशवाद के माध्यम से विस्तारित हुई हैं और अब कई महाद्वीपों में बोली जाती हैं।

भारोपीय परिवार कई शाखाओं या उप-परिवारों में विभाजित है, जिनमें से आठ समूह हैं जिनकी भाषाएं आज भी जीवित हैं: अल्बानियाई, अर्मेनियाई, बाल्टो-स्लाविक, सेल्टिक, जर्मनिक, हेलेनिक, इंडो-ईरानी और इटैलिक;

आज, सबसे अधिक आबादी वाली व्यक्तिगत भाषाएं अंग्रेजी, हिंदुस्तानी, स्पेनिश, बंगाली, फ्रेंच, रूसी, पुर्तगाली, जर्मन, फ़ारसी और पंजाबी हैं, जिनमें से प्रत्येक में 100 मिलियन से अधिक वक्ता हैं। कई अन्य भारोपीय भाषाएं छोटी हैं और विलुप्त होने के खतरे में हैं।

कुल मिलाकर, दुनिया की आबादी का 46 प्रतिशत (3.2 अरब) पहली भाषा के रूप में एक इंडो-यूरोपीय भाषा बोलता है, जो अब तक किसी भी भाषा परिवार में सबसे ज्यादा है। एथनोलॉग के अनुमान के अनुसार, लगभग 445 जीवित इंडो-यूरोपीय भाषाएं हैं, जिनमें से दो-तिहाई (313) भारत-ईरानी शाखा से संबंधित हैं।

विस्तार से पढ़ें – भारोपीय परिवार (Indo-European Languages Family)

सेमेटिक अथवा सामी-हामी परिवार – ये परिवार सामी (सेमेटिक) और हामी (हेमेटिक) के योग से बना है। सेम और हेम दो भाई थे, ये दोनों भाई नोह (noah) के पुत्र थे। अरब, सीरिया आदि के लोग सेम को अपना आदि पुरुष मानते हैं जबकि मिस्र एवं इथियोपिया आदि के लोग हेम को अपना आदि पुरुष मानते हैं।

सामी शाखा का प्राचीन भाषा अक्कादी है। इसके अलावा आर्मेनियन, हिब्रू तथा अरबी भाषा इसी शाखा के अंतर्गत आता है। अरब, ईरान, इस्राइल, सीरिया, मिस्र आदि आदि देश में इस भाषा को बोला जाता है।

हामी शाखा के अंतर्गत प्राचीन मिस्री तथा बार्बर भाषा आता है। वैसे ये मुख्य रूप से दक्षिण-पश्चिम एशिया का भाषा है और ये पश्चिम में मोरक्को तक बोला जाता है।

ज्यादा जानकारी के लिए पढ़ें – सामी-हामी परिवार की भाषाएँ एवं विशेषताएँ

द्रविड़ परिवार (Dravidian family) – द्रविड़ भाषाएं 220 मिलियन लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं का एक परिवार है, जो कि मुख्य रूप से दक्षिण भारत और उत्तर-पूर्व श्रीलंका में एवं दक्षिण एशिया में कहीं जगहों पर बोली जाती है। औपनिवेशिक युग के बाद से, मॉरीशस, हांगकांग, सिंगापुर, मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलीपींस, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, कनाडा, जर्मनी, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त राज्य अमेरिका में भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर छोटे लेकिन महत्वपूर्ण अप्रवासी समुदाय रहे हैं।

द्रविड़ भाषाओं को पहली बार दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में तमिल-ब्राह्मी लिपि के रूप में तमिलनाडु के मदुरै और तिरुनेलवेली जिलों में गुफा की दीवारों पर अंकित किया गया है। सबसे अधिक बोलने वाली द्रविड़ भाषाएँ (बोलने वालों की संख्या के अवरोही क्रम में) तेलुगु, तमिल, कन्नड़ और मलयालम हैं, जिनमें से सभी की लंबी साहित्यिक परंपराएँ हैं। छोटी साहित्यिक भाषाएँ तुलु और कोडवा हैं। कई द्रविड़-भाषी अनुसूचित जनजातियाँ भी हैं, जैसे पूर्वी भारत में कुरुख और मध्य भारत में गोंडी।

इस परिवार के भाषा को दक्षिण भारत सहित उत्तरी श्रीलंका, बलूचिस्तान, मध्य भारत आदि में बोला जाता है। इसके अंतर्गत तमिल, टेलगु, कन्नड, मलयालम, गोंडी, कोंकण, कोलामी और ब्रहुई आदि भाषा आता है।

ज्यादा जानकारी के लिए पढ़ें – द्रविड़ (Dravidian) परिवार की भाषाएँ एवं विशेषताएँ

काकेशस परिवार (caucasus family) – इसका नाम भौगोलिक आधार पर आधारित है। यूरोप के पूर्व में कैस्पियन सागर एवं काला सागर के 40′ उत्तरी अक्षांश से 45 डिग्री अक्षांश मध्यवर्ती काकेशस पर्वत भू-भाग के भाषा इसी पर्वत के नाम पर पड़ा है।

इसकी प्रमुख भाषा उत्तरी काकेशी एवं दक्षिणी काकेशी के अंतर्गत आता है। उत्तरी काकेशी में सिर कैसियन, किस्तिमन, लेस्यियन एवं दक्षिणी काकेशी में जार्तीयन, सुकईयन, मियोलियान आदि आता है।

कोकेशियन भाषाओं में काकेशस पर्वत में और उसके आसपास दस मिलियन से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं की एक बड़ी और अत्यंत विविध श्रेणी शामिल है। इसका अपना लिपि है।

ज्यादा जानकारी के लिए पढ़ें – काकेशस (Caucasus) परिवार की भाषाएँ एवं विशेषताएँ

यूराल-अल्टाइक परिवार (Ural-Altic family) – यह भी एक भौगोलिक नामकरण है। इस परिवार के भाषा को दक्षिणी फ़िनलैंड, उत्तरी फ़िनलैंड, उत्तरी नोर्वे, हंगरी, अस्तोनिया, साइबेरिया, तुर्की, किरगीज, मंगोलिया, अजरबेजान, उज्बेकिस्तान, मंचूरिया आदि स्थान पर बोला जाता है। क्षेत्र विस्तार की दृष्टि से भारोपीय भाषा परिवार के बाद दूसरे स्थान पर आता है।

इस परिवार में एस्टोनी, हंगेरियन, समोयद, याकूत, फिनो-उग्री, तुर्की, आदि अनेक भाषा आता है।

ज्यादा जानकारी के लिए पढ़ें – यूराल-अल्टाइक (Ural-Altic) परिवार की भाषाएँ एवं विशेषताएँ

बुरुशस्की परिवार (Bushsky Family) – इसे खजुना परिवार के नाम से जाना जाता है। कुछ विद्वान इस परिवार को मुंडा एवं द्रविड़ परिवार से सम्बद्ध मानते हैं। इसका मुख्य कारण ये है कि इसके तहत आने वाला भाषा उपर्युक्त परिवार से घिरा होता है। इसका क्षेत्र भारत के उत्तर पश्चिम कश्मीर (गिलगित-बाल्टिस्तान) में पसरा हुआ है। कहा जाता है कि यह भाषा परिवार खत्म होने के कगार पर है क्योंकि मुश्किल से कुछ सौ लोग ही इसे जानते हैं।

ज्यादा जानकारी के लिए पढ़ें – बुरुशस्की परिवार की भाषाएँ एवं विशेषताएँ

चीनी या एकाक्षरी परिवार (Chinese or monosyllabic family) – इस भाषा का क्षेत्र चीन, बर्मा आदि है। इस परिवार के तहत चीनी भाषा प्रमुख है। लगभग 30 भाषा इस परिवार के अंतर्गत बोला जाता है। श्यामी, थाईलैंड में बोली जाती है। बर्मी, बर्मा में और तिब्बती, तिब्बत में। इन भाषाओं की ख़ासियत ये है कि नाक से ज़्यादा ध्वनि निकाली जाती है।

ज्यादा जानकारी के लिए पढ़ें – चीनी या एकाक्षरी परिवार की भाषाएँ एवं विशेषताएँ

अत्युत्तरी परिवार (हाइपरबोरी परिवार) – साइबेरिया के उत्तरी एवं पूर्वी भागों में इस परिवार की भाषाएं बोली जाती है। युकगिर, कमचटका, चूकची एवं एनू आदि यहाँ की प्रमुख भाषाएं है। इसे हाइपरबोरी परिवार इसीलिए कहा जाता है क्योंकि हाइपर का मतलब होता है ‘अत्यंत’ एवं बोरी का मतलब ‘उत्तरी’ अर्थात सबसे उत्तरी भाषा।

ज्यादा जानकारी के लिए पढ़ें – हाइपरबोरी परिवार की भाषाएँ एवं विशेषताएँ

जापानी-कोरियाई परिवार (Japanese-Korean family) – जापान और कोरियाई प्रायद्वीप पर बोली जाने वाली भाषा को इसके तहत रखा जाता है। इस परिवार के तहत मुख्य रूप से दो भाषा आता है जिसे कि ‘कोरियन (Korean) और (Japanese) भाषा के नाम से जाना जाता है।

ज्यादा जानकारी के लिए पढ़ें – जापानी-कोरियाई परिवार की भाषाएँ एवं विशेषताएँ

बास्क परिवार (Basque family) – फ्रांस और स्पेन की सीमा पर मुख्य रूप से पेरिनीज़ पर्वत के पश्चिमी भाग में इस परिवार के भाषा को बोला जाता है। मुख्य रूप से 7 बोलियाँ इसमें प्रचलित है जो कि लगभग 2 लाख लोगों द्वारा बोली जाती है।

ज्यादा जानकारी के लिए पढ़ें – बास्क परिवार की भाषाएँ एवं विशेषताएँ

2. अफ्रीका खंड

सूडानी परिवार (sudanese family) – इस परिवार की भाषाएं आमतौर पर भूमध्य रेखा के उत्तर में पूर्व से पश्चिम तक बोली जाती है। इस परिवार के तहत लगभग 435 भाषाएं आती है। जिसमें से वुले, मन-फू, कनेरी, निलोटिक एवं हौसा इत्यादि प्रमुख भाषाएं है।

ज्यादा जानकारी के लिए पढ़ें – सूडानी परिवार की भाषाएँ एवं विशेषताएँ

बाँटू परिवार (Bantu family) – इस परिवार की भाषाएं आमतौर पर भूमध्य रेखा के दक्षिण में दक्षिण अफ्रीका के अधिकांश भागों में एवं जंजीबार द्वीप पर बोली जाती है। इस परिवार के तहत लगभग 150 भाषाएं आती है। जिसमें से जूलु, स्वाहिली, काफिर, सेसुतो एवं कांगो इत्यादि प्रमुख भाषाएं है।

ज्यादा जानकारी के लिए पढ़ें – बाँटू परिवार की भाषाएँ एवं विशेषताएँ

होतेन्तोत-बुशमैनी परिवार (Hottentot-Bushman family) – इस परिवार की भाषाएं दक्षिण-पश्चिमी अफ्रीका में ऑरेंज नदी से नागामी झील तक बोली जाती है। सान, होतेन्तोत, दमारा एवं संदवे इत्यादि इस भाषा परिवार की प्रमुख भाषाएं है।

ज्यादा जानकारी के लिए पढ़ें – होतेन्तोत-बुशमैनी परिवार की भाषाएँ एवं विशेषताएँ

3. प्रशांत महासागरीय खंड

मलय-पोलिनेशियाई परिवार (Malay-Polynesian family) – पश्चिम में अफ्रीका के मेडागास्कर द्वीप से लेकर पूर्व में ईस्टर द्वीप तक एवं उत्तर में फ़रमोसा से लेकर दक्षिण में न्यूजीलैंड तक इस परिवार की भाषाएं बोली जाती है। इसमें इन्डोनेशिया के सुमात्रा, जावा एवं बोर्नियो द्वीप भी सम्मिलित है।

मुख्य रूप से इस परिवार के तहत द्वीपीय देश आते हैं। मलय, जावी, फारमोसी, फिजियन, माओरी, हवाइयन एवं टोंगन आदि इस परिवार की प्रमुख भाषाएं है।

ज्यादा जानकारी के लिए पढ़ें – मलय-पोलिनेशियाई परिवार की भाषाएँ एवं विशेषताएँ

दक्षिण पूर्व परिवार या आस्ट्रो-एशियाटिक परिवार – भारत के उत्तरी पहाड़ी भाग एवं मध्य-प्रदेश एवं ओड़ीसा के कुछ भाग तथा पूर्व में थाईलैंड, कंबोडिया एवं अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह पर इस परिवार की भाषाएं बोली जाती है। मुंडा, मोन-ख्मेर, मुआङ्ग एवं निकोबारी इस परिवार की प्रमुख भाषाएं है।

ज्यादा जानकारी के लिए पढ़ें – आस्ट्रो-एशियाटिक परिवार की भाषाएँ एवं विशेषताएँ

पापुई परिवार (papui family) – यह भाषा परिवार बहुत ही छोटा है एवं मुख्य रूप से मध्य न्यू गिनी एवं सोलोमन द्वीप आदि पर बोला जाता है। मफोर इस परिवार की प्रमुख भाषा है।

ज्यादा जानकारी के लिए पढ़ें – पापुई परिवार की भाषाएँ एवं विशेषताएँ

ऑस्ट्रेलियाई परिवार (australian family) – सम्पूर्ण ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप एवं तस्मानिया में इस परिवार की भाषाएं बोली जाती है। मैक्वारी एवं कामिलरोई इस परिवार की प्रमुख भाषाएं है। यहाँ के मूल निवासी इस भाषा को बोलते हैं जो कि अंग्रेजी भाषा के व्यपाक चलन के कारण लगभग सिमट सा गया है और 80 हज़ार से भी कम लोग अब इस भाषा को बोलते हैं।

ज्यादा जानकारी के लिए पढ़ें – ऑस्ट्रेलियन परिवार की भाषाएँ एवं विशेषताएँ

4. अमेरिकी खंड

अमेरिकी खंड के तहत एक ही भाषा परिवार आता है वो है अमेरिकी परिवार (american family) – इसके तहत सम्पूर्ण उत्तरी अमेरिका एवं दक्षिणी अमेरिका आ जाता है। वैसे तो यहाँ आमतौर पर इंग्लिश का ही बोलबाला है, लेकिन फिर भी कई अन्य भाषाएं है इस परिवार में जो आज भी कमोबेश बोली जाती है।

अथपस्कन, अज़तेक, मय, करीव, कुईचुआ एवं अरवक इस भाषा परिवार की प्रमुख भाषाएं है। इनमें से बहुत सारी भाषाओं को बोलने वाले की संख्या महज़ कुछ हज़ार रह गई है।

ज्यादा जानकारी के लिए पढ़ें – अमेरिकी परिवार की भाषाएँ एवं विशेषताएँ

[कुल मिलाकर हमने यहाँ तक 18 भाषा परिवारों को चार खंड में बांटकर बहुत ही संक्षिप्त में समझा है। विस्तार से समझने के लिए हरेक भाषा परिवार के नीचे दिये गए लिंक का प्रयोग कर सकते हैं। आइये अब इसके कुछ अन्य पहलुओं को समझ लेते हैं।]

भाषा का पारिवारिक वर्गीकरण एवं इसकी उपयोगिता

हमने ऊपर देखा कि दुनियाँ में कितनी सारी ज्ञात भाषाएँ है ऐसे में भाषा का पारिवारिक वर्गीकरण कई प्रकार जटिलता को कम कर देता है एवं कई प्रकार के फायदे देता है;

भाषा का तुलनात्मक अध्ययन – इसके तहत संबद्ध भाषा का अध्ययन तुलनात्मक रूप से हो जाता है तथा उसके समान और आसमान विशेषता से हम परिचित हो जाते हैं।

मूल भाषा ज्ञान – सम्मिलित रूप से अध्ययन करने के कारण संबद्ध भाषा के बारे में भी थोड़ा-बहुत ज्ञान हो जाता है, जो कि लुप्त हो चुका है।

विभिन्न जाति के एकता – पारिवारिक वर्गीकरण द्वारा संसार में दूर-दूर बिखरे हुए जाति सब के बीच एकता सिद्ध हुआ है और इसका कारण ये है कि उन सभी दूर-दूर बिखरे हुए जाति के भाषा में समानता होता है। जैसे कि यूरोप के जिप्सीयों के भाषा भारत के पंजाबी, राजस्थानी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भाषा से मिलता-जुलता है। इस से सिद्ध होता है कि यूरोप के जिप्सी भारत से ही जाकर वहाँ बसा है।

कुल मिलाकर ये था भाषा का पारिवारिक वर्गीकरण, सभी भाषाओं पर यहाँ संक्षिप्त में चर्चा की गई है इसीलिए आप सभी भाषा परिवारों को विस्तार से जरूर पढ़ें ताकि स्पष्ट रूप से आप समझ सकें कि इस क्षेत्र के लोग किस तरह के भाषाओं एवं बोलियों का इस्तेमाल करते हैं।

भाषा उत्पत्ति के सिद्धांत