High Court in India (उच्च न्यायालय: गठन, भूमिका, स्वतंत्रता)

इस लेख में हम भारत में उच्च न्यायालय (High Court in India) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे, पूरी तरह से समझने के लिए लेख को अंत तक जरूर पढ़ें। अगर आपको ↗️सुप्रीम कोर्ट की अच्छी समझ है तो फिर आप उच्च न्यायालय को आसानी से समझ जाएँगे।
High Court in India

Background of High Court in India

हम जानते है कि भारतीय न्याय व्यवस्था एकीकृत है, यानी कि सबसे ऊपर सुप्रीम कोर्ट उससे नीचे राज्यों के हाइ कोर्ट और उसके बाद हाइ कोर्ट के अंदर अधीनस्थ न्यायालय। वैसे तो सुप्रीम कोर्ट के बाद हाइ कोर्ट का नंबर आता है लेकिन राज्य के सेंस में बात करें तो किसी राज्य में सबसे शीर्ष पर होती है।

भारत में हाइ कोर्ट का इतिहास सुप्रीम कोर्ट से ही पुराना है। कितना पुराना है इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि तीन उच्च न्यायालय का गठन 1862 में ही हो चुका था; कलकत्ता, बंबई और मद्रास में। उस समय ब्रिटिश भारत के जिस-जिस प्रांत में उच्च न्यायालय की स्थापना हुई वही स्वतंत्रता के बाद उस राज्य का उच्च न्यायालय बन गया।

वैसे तो भारत के संविधान के अनुच्छेद 214 के तहत प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय की व्यवस्था की गई है लेकिन सातवें संविधान संशोधन अधिनियम 1956 में संसद को अधिकार दिया गया है कि वह दो या दो से अधिक राज्यों के लिए एक ही उच्च न्यायालय की स्थापना कर सकेगी (ये बात अनुच्छेद 231 में लिखवा दिया गया)। इसी प्रकार अनुच्छेद 230 में लिखवा दिया गया कि उच्च न्यायालय के अधिकार का विस्तार केंद्रशासित प्रदेशों में भी किया जा सकता है।

इस समय देश में 24 उच्च न्यायालय है। इसमें से चार साझा उच्च न्यायालय है। केवल दिल्ली ऐसा संघ राज्य क्षेत्र है, जिसका अपना उच्च न्यायालय 1966 से है। अन्य संघ राज्य क्षेत्र विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों के न्यायिक क्षेत्र में आते है।

संसद एक उच्च न्यायालय के न्यायिक क्षेत्र का विस्तार, किसी संघ राज्य क्षेत्र में कर सकती है अथवा किसी संघ राज्य क्षेत्र को एक उच्च न्यायालय के न्यायिक क्षेत्र से बाहर कर सकती है।

आप नीचे भारत में मौजूद सभी उच्च न्यायालय (High Court in India) के लिस्ट और उसके न्याय क्षेत्र को देख सकते हैं।

High Court in India and its Jurisdiction

नामस्थापना वर्षन्यायक्षेत्र
1. त्रिपुरा 2013त्रिपुरा
2. मेघालय 2013मेघालय
3. मणिपुर2013मणिपुर
4. उत्तराखंड2000उत्तराखंड
5. झारखंड2000 झारखंड
6. छतीसगढ़2000छतीसगढ़
7. सिक्किम 1975सिक्किम
8. हिमाचल प्रदेश1971हिमाचल प्रदेश
9. दिल्ली1966दिल्ली
10. गुजरात1960गुजरात
11. केरल 1958केरल और लक्षद्वीप
12. मध्य प्रदेश1956मध्य प्रदेश
13. हैदराबाद1954आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना
14. राजस्थान1949राजस्थान
15. उड़ीसा1948उड़ीसा
16. गुवाहाटी1948असम, नागालैंड, मिज़ोरम और अरुणाचल प्रदेश
17. जम्मू एवं कश्मीर1928जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख
18. पटना1916बिहार
19. कर्नाटक 1884कर्नाटक
20. पंजाब एवं हरियाणा1875पंजाब, हरियाणा एवं चंडीगढ़
21. इलाहाबाद1966उत्तर प्रदेश
22. बंबई 1862महाराष्ट्र, गोवा, दादरा और नागर हवेली
23. कलकत्ता1862पश्चिम बंगाल तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह
24. मद्रास1982तमिलनाडुऔर पुडुचेरी
High Court in India

⚫ संविधान के भाग 6 में अनुच्छेद 214 से 231 तक उच्च न्यायालयों के गठन, स्वतंत्रता, न्यायिक क्षेत्र, शक्तियाँ, प्रक्रियाँ आदि के बारे में बताया गया है। जिसके बारे में हम एक-एक करके बातें करेंगे।

उच्च न्यायालय का गठन (Constitution of high court in India)

अनुच्छेद 216 के तहत उच्च न्यायालय के गठन की बात कही गई है। लेकिन उच्च न्यायालय का गठन कितने न्यायाधीशों से होगा इसके बारे में संविधान में कुछ नहीं कहा गया है, इसीलिए यह राष्ट्रपति के विवेक पर छोड़ दिया गया है, अगर राष्ट्रपति को लगता है कि किसी उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या कम है तो वे उसे बढ़ा सकते हैं।

न्यायाधीशों की नियुक्ति (Appointment of judges)

अनुच्छेद 217 उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति और उसके पद की शर्तों के बारे में बात करता है। उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्त राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा, भारत के मुख्य न्यायाधीश और उस राज्य के राज्यपाल से परामर्श के बाद की जाती है और अन्य न्यायधीशों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति उस न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श लेता है। और इसी प्रकार यदि दो या अधिक राज्यों के साझा उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति संबन्धित सभी राज्यों के राज्यपालों से परामर्श लेने के बाद की जाती है।

तीसरे न्यायाधीश मामले (Third judges case) 1998 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति पर उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों से परामर्श करना चाहिए। इस प्रकार, अकेले भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय से परामर्श प्रक्रिया पूरी नहीं होगी।

न्यायाधीशों की योग्यताएँ (Judges qualifications)

उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप मे नियुक्ति के लिए व्यक्ति के पास निम्न योग्यताएँ होनी चाहिए।
1. वह भारत का नागरिक हो,
2. उसे भारत के न्यायिक कार्य में 10 वर्ष का अनुभव हो, अथवा वह उच्च न्यायालय में लगातार 10 वर्षों तक अधिवक्ता रह चुका हो।

यहाँ पर दो बातें याद रखिए (1) संविधान में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्त के लिए कोई न्यूनतम आयु सीमा निर्धारित नहीं की गई है, और (2) संविधान में उच्चतम न्यायालय के जैसा प्रख्यात न्यायविदों को उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त करने का कोई प्रावधान नहीं है।

शपथ एवं प्रतिज्ञान (Oath and affirmation)

अनुच्छेद 219 के तहत न्यायाधीशों के शपथ या प्रतिज्ञान की व्यवस्था की गई है। जिस व्यक्ति को उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्ति किया गया है, पद संभालने से पूर्व उसे इस राज्य के राज्यपाल या इस कार्य के लिए उसके द्वारा नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति के सामने निम्नलिखित शपथ या प्रतिज्ञान करना होता है।

अपनी शपथ में उच्च न्यायालय का न्यायाधीश शपथ लेता है।
1. भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा का पालन करेगा।
2. भारत की प्रभुता और अखंडता को अक्षुण्ण रखेगा।
3. सम्यक प्रकार और श्रद्धापूर्वक तथा अपनी पूरी योग्यता, ज्ञान और विवेक से अपने पद के कर्तव्यों का भय या पक्षपात अनुराग या द्वेष के बिना पालन करेगा।
4. संविधान और विधि की मर्यादा बनाए रखेगा।

न्यायाधीशों का कार्यकाल (Tenure of judges)

संविधान में उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का कार्यकाल निर्धारित किया नहीं गया है। फिर भी इस संबंध में चार प्रावधान किए गए है।
(1) 62 वर्ष की आयु तक पद पर रहता है। उसकी आयु के संबंध में किसी प्रकार के विवाद की स्थिति में राष्ट्रपति अपना निर्णय सुनाने से पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करता है। इस संबंध में राष्ट्रपति का निर्णय अंतिम होता है।
(2) अगर वह चाहे तो राष्ट्रपति को त्यागपत्र भेज सकता है।

(3) संसद की सिफ़ारिश से राष्ट्रपति उसे पद से हटा सकता है यानी कि महाभियोग की प्रक्रिया द्वारा।
(4) उसकी नियुक्ति उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में हो जाने पर या उसका किसी दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरण हो जाने पर वह पद छोड़ देता है।

न्यायाधीशों को हटाना (Removal of judges)

अनुच्छेद 218 साफ-साफ कहता है कि अनुच्छेद 124 के खंड (4) और खंड (5) के उपबंध के तहत जिस प्रकार उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है उसी प्रकार उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को भी हटाया जाएगा।

दूसरे शब्दों में कहें तो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को राष्ट्रपति के आदेश से पद से जा सकता है। लेकिन हटाने के आधार सिद्ध कदाचार या अक्षमता होनी चाहिए। इसी के साथ ही न्यायाधीश को हटाने के प्रस्ताव को प्रत्येक सदन के विशेष बहुमत से पारित होना चाहिए। वो भी उसी सत्र में जिस सत्र में हटाने का प्रस्ताव लाया गया है।

इसके लिए न्यायाधीश जांच अधिनियम 1968 में महाभियोग का पूरा प्रावधान बताया गया है – जो कि निम्नलिखित है –

(1) पहली बात तो महाभियोग के प्रस्ताव को सदन में पेश करने के लिए ही लोकसभा में 100 सदस्यों अथवा राज्यसभा में 50 सदस्यों के हस्ताक्षरित प्रस्ताव अध्यक्ष या सभापति को सौंपना होगा।

(2) अध्यक्ष/सभापति प्रस्ताव को स्वीकृत या अस्वीकृत कर सकता है। यदि प्रस्ताव स्वीकृत हो जाता है तो अध्यक्ष या सभापति आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित करेगा।

(3) समिति में (पहला) उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या कोई न्यायाधीश, (दूसरा) उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और (तीसरा) एक प्रख्यात न्यायविद होने चाहिए।

(4) यदि समिति यह पाती है कि न्यायाधीश कदाचार का दोषी या अयोग्य है तो सदन प्रस्ताव पर विचार कर सकता है। और संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से प्रस्ताव पास होने के बाद न्यायाधीश को हटाने के लिए इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। अंतत: न्यायाधीशों को हटाने के लिए राष्ट्रपति आदेश पारित कर देते हैं।

अगर आपको उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने का प्रावधान याद हो तो आप देख सकते हैं कि ये बिल्कुल उसी के जैसा है। यह जानना रोचक है कि अब तक उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश पर महाभियोग नहीं लगाया गया है।

न्यायाधीशों का स्थानांतरण (Transfer of judges)

अनुच्छेद 222 के तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद राष्ट्रपति एक न्यायाधीश का स्थानांतरण एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में कर सकता है। स्थानांतरण पर यह वेतन, के अतिरिक्त ऐसे प्रतिपूरक भत्ते का हकदार होगा जो संसद द्वारा निर्धारित किए जाये।

1977 में उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी कि न्यायाधीशों का स्थानांतरण केवल अपवादस्वरूप और लोक कल्याण को ध्यान में रखकर ही किया न ही दंड के रूप में । दोबारा 1994 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि न्यायाधीशों के स्थानांतरण में मनमानी रोकने के लिए न्यायिक समीक्षा जरूरी है लेकिन वही न्यायाधीश इस मामले को चुनौती दे सकता है जिसे स्थानांतरित किया गया है।

तृतीय न्यायाधीश मामले 1998 में उच्चतम न्यायालय ने राय दी कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के स्थानांतरण मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश को चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों से परामर्श करनी होगी।

इसमें से दो न्यायाधीश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश होंगे एक वहाँ से जहां से वो स्थानांतरित हो रहा है और एक वह के जहां वो जा रहा है। इतना होने के बाद ही राष्ट्रपति किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को स्थानांतरित कर सकता है।

कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश (Executive Chief Justice)

अनुच्छेद 223 के तहत राष्ट्रपति किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को उस उच्च न्यायालय का कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर सकता है। जब:
(1) या तो उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त हो, या
(2) उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश अस्थायी रूप से अनुपस्थित हो। या
(3) यदि मुख्य न्यायाधीश अपने कार्य निर्वाहन में अक्षम हो।

अतिरिक्त और कार्यकारी न्यायाधीश (Additional and Executive Judge)

अनुच्छेद 224 के तहत राष्ट्रपति कुछ खास परिस्थितियों में योग्य व्यक्तियों को उच्च न्यायालय के अतिरिक्त न्यायाधीशों के रूप में अस्थायी रूप से नियुक्त कर सकते हैं, जिसकी अवधि और दो वर्ष से अधिक की नहीं होगी।
(1) यदि अस्थायी रूप से उच्च न्यायालय का कामकाज बढ़ गया हो, या
(2) उच्च न्यायालय में बकाया कार्य अधिक हो।
(3) जब उच्च न्यायालय का न्यायाधीश (मुख्य न्यायाधीश के अलावा) अनुपस्थिति हो या अन्य कारणों से अपने कार्यों का निष्पादन करने में असमर्थ हो, या फिर
(4) किसी न्यायाधीश को अस्थायी तौर पर संबन्धित उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया हो।

एक कार्यकारी न्यायाधीश तब तक कार्य करता है, जब तक कि स्थायी न्यायाधीश अपना पदभार न संभाले। हालांकि अतिरिक्त या कार्यकारी न्यायाधीश 62 वर्ष की उम्र से के पश्चात पद पर नहीं रह सकता।

सेवानिवृत न्यायाधीश (Retired Judge)

अनुच्छेद 224 (क) के तहत उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश किसी भी समय उस उच्च न्यायालय अथवा किसी अन्य उच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश को अस्थायी अवधि के लिए बतौर कार्यकारी न्यायाधीश काम करने के लिए कह सकते है। हालांकि वह ऐसा राष्ट्रपति की पूर्व संस्तुति एवं संबन्धित व्यक्ति की मंजूरी के बाद ही कर सकता है।

ऐसे न्यायाधीश राष्ट्रपति द्वारा तय भत्तों का अधिकारी होता है। उसे उच्च न्यायालय के सभी न्यायिक क्षेत्र, शक्तियाँ एवं सुविधाएं और विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं, लेकिन वह उस उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नहीं माना जाता।

उच्च न्यायालय की स्वतंत्रता (Independence of the High Court in India)

न्यायिक स्वतंत्रता का सिद्धांत इसीलिए अपनाया जाता है ताकि न्यायाधीश अपने पूरे कार्यकाल के दौरान संविधान की सर्वोच्चता को बचाते हुए अपने न्यायिक विवेक से निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र रहे। भले ही वे निर्णय राजनीतिक रूप से कितने ही अलोकप्रिय हों या शक्तिशाली हितों द्वारा विरोध करता हो।

संविधान में उच्च न्यायालय के निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से कार्य करने के लिए निम्नलिखित उपबंध किए गए हैं:

(1) नियुक्ति की विधि और कार्यकाल की सुरक्षा –

उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा स्वयं न्यायपालिका के सदस्यों के परामर्श से की जाती है। जिसे कि अभी हमने ऊपर पढ़ा है पर न्यायाधीश राष्ट्रपति के प्रसाद्पर्यंत काम नहीं करते है यानी कि राष्ट्रपति अपने मन से उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटा नहीं सकते हैं। इस तरह से न्यायाधीशों का कार्यकाल सुरक्षित होता है और कठिन से कठिन फैसले ले सकता है।

(2) निश्चित सेवा शर्तें और राज्य की संचित निधि पर भारित व्यय –

उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का वेतन, भत्ते, विशेषाधिकार, अवकास एवं पेंशन का निर्धारण समय-समय पर संसद द्वारा किया जाता है। सिवाय वित्तीय आपातकाल के इनमें कमी नहीं की जा सकती।

दूसरी बात कि न्यायाधीश एवं स्टाफ के वेतन एवं भत्ते और उच्च न्यायालय का प्रशासनिक खर्चा संबन्धित राज्य की संचित निधि पर भारित होते हैं। और राज्य विधानमंडल में इस पर कोई मतदान नहीं हो सकता है।

यहाँ पर ध्यान देने योग्य बात है ये है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की पेंशन भारत के संचित निधि से दी जाती है, न कि राज्य की संचित निधि से।

(3) न्यायाधीशों के कार्य पर चर्चा नहीं की जा सकती –

उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के आचरण पर संसद अथवा राज्य विधानमंडल में चर्चा नहीं किया जा सकता है सिवाय उस स्थिति के जब संसद मे महाभियोग प्रस्ताव विचारधीन हो।

(4) सेवानिवृत के बाद वकालत पर प्रतिबंध

अनुच्छेद 220 के अनुसार उच्च न्यायालय का सेवानिवृत स्थायी न्यायाधीश भारत में उच्चतम न्यायालय और अन्य उच्च न्यायालयों के अलावा किसी भी न्यायालय में अथवा प्राधिकारी के सामने बहस अथवा कार्य नहीं कर सकता। ऐसा प्रावधान इसलिए किया गया है ताकि वे भविष्य में किस लाभ की आशा से किसी के साथ पक्षपात न करें।

(5) अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति

उच्च न्यायालय किसी भी व्यक्ति को अपनी अवमानना के लिए दंड दे सकता है। इस प्रकार, कोई भी इसके कार्यों और निर्णयों की आलोचना या विरोध नहीं कर सकता। यह शक्ति उच्च न्यायालय के प्राधिकार, गरिमा और उसके सम्मान को बनाए रखने के लिए दी गई है।

(6) अपने कर्मचारियों की नियुक्ति की स्वतंत्रता

उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश अपने अधिकारियों एवं कर्मचारियों की उच्च न्यायालय में (बिना कार्यपालिका के हस्तक्षेप के) नियुक्त कर सकता है और उनकी सेवा शर्ते भी तय कर सकता है। ये अपने आप में एक बड़ी स्वतंत्रता है।

(7) इसके न्यायिक क्षेत्र में कटौती नहीं की जा सकती

उच्च न्यायालय की संविधान में उल्लेखित न्यायिक क्षेत्र और न्यायिक शक्तियों को न तो संसद द्वारा और न ही राज्य विधानमण्डल द्वारा कम किया जा सकता है। लेकिन अन्य मामलों में इसके न्यायिक क्षेत्र एवं शक्ति को संसद एवं विधानमंडल द्वारा परिवर्तित किया जा सकता है।

(8) कार्यपालिका से पृथक्करण

संवैधानिक प्रावधान के अनुसार लोक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग रखा जाना चाहिए यानी कि कार्यपालिका को न्यायिक शक्तियाँ नहीं रखनी चाहिए।

तो ये रहा भारत में उच्च न्यायालय (High Court in India) और उससे संबन्धित महत्वपूर्ण बातें, इस लेख का एक पार्ट और है उसका लिंक नीचे है आप उसे भी जरूर पढ़ें⬇️
Jurisdictions of High Court

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