parliament ‘s law making power संसद में कानून बनाने की प्रक्रिया

Note- अगर आप संसद (parliament) में कानून बनने की प्रक्रिया को अच्छे से समझना चाहते हैं तो ⬇️ नीचे दिये गए लिंक को क्लिक करें।

↗️ Law making process in parliament

आप इस लेख को भी पढ़ सकते हैं लेकिन इसमें उतनी डिटेलिंग नहीं है, तो मैं आपको कहूँगा कि आप ऊपर वाला लेख ही पढ़ें।

संसद(parliament) में कानून बनाने की प्रक्रिया

समान्यतः संसद 3 सत्रों में काम करता है :-

1. बजट सत्र (फरवरी से मई)
2. मानसून सत्र (जुलाई से सितंबर)
3. शीतकालीन सत्र (नवम्बर से दिसम्बर)

राष्ट्रपति की अधिसूचना से सदनों(indian parliament) का सत्रारंभ होता है । यहाँ एक बात याद रखने वाली है कि सदन तभी चलता है

जब लोकसभा में कम से कम 55 सदस्य उपस्थित हो और राज्यसभा में कम से कम 25 सदस्य उपस्थित हो,इसे कोरम कहा जाता है अगर कोरम पूरा नहीं है तो सदन को स्थगित कर दिया जाता है। 

                          सदन की कार्यवाही की भाषा हिन्दी और अंग्रेजी है हालाँकि पीठासीन अधिकारी अगर आज्ञा दे तो कोई सदस्य अपनी मातृभाषा में भी बोल सकता है। 

                          अब आइये जानते है संसद में काम कैसे होता है। संसद में एक दिन में दो पालियों में काम होता है।

सुबह की पहली बैठक 11 बजे से 1 बजे तक और दूसरी बैठक 2 बजे से 6 बजे तक । हालाँकि अगर पीठासीन अधिकारी अगर चाहे तो वे इस समय को कम या ज्यादा कर सकते है। 

प्रश्नकाल :- 

संसद का पहला घंटा यानि कि 11 बजे से लेकर 12 बजे तक प्रश्नकाल का समय होता है। इस दौरान सदस्य प्रश्न पुछते है और और प्रश्न के विभाग से संबन्धित मंत्री उसका उत्तर देते है।

कुछ ऐसे प्रश्न होते है जिसका जवाब मौखिक रूप से दिया जा सकता है ऐसे प्रश्न को तारांकित प्रश्न कहते है।

ऐसे प्रश्न, जिसका जवाब लिखित रूप से दिया जाता है ऐसे प्रश्न को अतारांकित प्रश्न कहा जाता है।

वे प्रश्न जो कम से कम 10 दिन का नोटिस देकर पूछा जाता है ऐसे प्रश्नों को अल्प सूचना का प्रश्न कहा जाता है। 

शून्यकाल :- 

प्रश्नकाल के तुरंत बाद शून्यकाल शुरू होता है इस काल में कोई भी सदस्य बिना किसी पूर्व सूचना के कोई भी मामला संसद के पटल पर विमर्श के लिए रख सकता है।

ये भी समान्यतः 1 घंटा चलता है। इसके बाद जो भी समय बचता है उसमें मुख्य कार्यक्रम तय किए जाते है जो दूसरी पाली में किया जाना होता है।

दूसरी पाली में प्रस्तावों पर चर्चा होना शुरू होता है। जो कि ज़्यादातर सताधारी पार्टी के मंत्री लेकर आते है। पर कोई अन्य सदस्य भी चाहे तो किसी विषय पर प्रस्ताव लेकर आ सकता है। चर्चा के लिए लाये गए प्रस्तावों की तीन प्रमुख श्रेणियाँ हैं। 

1. महत्वपूर्ण प्रस्ताव :-

ये कुछ ऐसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव होते हैं जो राष्ट्रीय राजनैतिक स्थिति को पूरी तरह से बदल सकता है। जैसे कि राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग । 

2. स्थानापन्न प्रस्ताव :-

किसी कारणवश अगर प्रस्तावकर्ता को लगता है कि उसके द्वारा पहले लाये गए प्रस्ताव में कुछ त्रुटि रह गयी है या फिर ये जन आकांक्षा के विरुद्ध है। तो वे उसकी जगह पर एक नया प्रस्ताव ला सकती है। जो कि पहले लाये गए प्रस्ताव का स्थान ले लेती है। 

3. पूरक प्रस्ताव :-

यदि मूल प्रस्ताव के किसी एक भाग को बदलना हो तो उस स्थिति में इस प्रकार का प्रस्ताव लाया जाता है।

                        इसके अलावे भी अन्य कई तरह के प्रस्ताव होते है जो परिस्थिति अनुसार संसद सदस्यों द्वारा इस्तेमाल में लाया जाता है। जैसे कि – 

निंदा प्रस्ताव :-

यह मंत्रिपरिषद की कुछ नीतियों या कार्य के खिलाफ निंदा के लिए लाया जाता है। 

अविश्वास प्रस्ताव :-

यह दरअसल यह सत्यापित करने के लिए लाया जाता है कि सरकार अभी भी बहुमत में है कि नहीं, यदि सरकार के खिलाफ ये अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाता है तो पूरी की पूरी मंत्रिपरिषद को इस्तीफा देना पड़ता है और सरकार गिर जाती है। 

ध्यानाकर्षण प्रस्ताव :-

सदन(indian parliament) का कोई भी सदस्य, बहुत ही जरूरी लोक महत्व के किसी विषय को अगर किसी मंत्री के संज्ञान में लाना चाहता है तो इस प्रस्ताव को लाता है।   

विशेषाधिकार प्रस्ताव :-

यह किसी सदस्य द्वारा तब पेश किया जाता है, जब सदस्य यह महसूस करता है कि किसी मंत्री द्वारा गलत तथ्यों को पेश कर सदन को गुमराह करने की कोशिश की गयी है। 

कटौती प्रस्ताव :-

यह प्रस्ताव तब लाया जाता है जब किसी मुद्दे पर वाद-विवाद ज्यादा लंबा खींच जाता है और किसी विधेयक पर मतदान के लिए समय की कमी को महसूस किया जाता है। तो यदि ये प्रस्ताव पारित हो जाता है तो वाद-विवाद को रोककर मतदान की प्रक्रिया को शुरू किया जाता है। 

धन्यवाद प्रस्ताव :-

प्रत्येक आम चुनाव के पहले सत्र को राष्ट्रपति द्वारा संबोधित किया जाता है और संसद उस वित्तीय वर्ष के लिए काम करना शुरू कर देते है।

राष्ट्रपति के भाषण पर दोनों सदनों में चर्चा की जाती है और इस पर आभार व्यक्त किया जाता है इसी को धन्यवाद प्रस्ताव कहा जाता है। 

                     और अब  संसद(indian parliament) अपना काम करना शुरू करती है जो कि है नीति निर्माण करना ।

अब विधेयकों को पेश करने का काम शुरू होता है जो कि दो तरह के होते हैं। सरकारी विधेयक एवं गैर-सरकारी विधेयक और ये 4 श्रेणियों में पेश किए जाते है। 

1. साधारण विधेयक :- वित्तीय विषयों के अलावे जीतने भी विधेयक पेश किए जाते है, साधारण विधेयक होते है। 

2. धन विधेयक :- कर(टैक्स), लोक  व्यय इत्यादि से संबन्धित विधेयक को धन विधेयक कहा जाता है। 

3. वित्त विधेयक :-  राजस्व या व्यय से संबन्धित विधेयक को वित्त विधेयक कहा जाता है। यहाँ एक बात समझ लेनी जरूरी है कि सारे धन विधेयक वित्त विधेयक होते है पर सारे वित्त विधेयक धन विधेयक नहीं होते। 

 किसी भी विधेयक को अधिनियम या कानून बनने से पहले उसे निम्नलिखित चरणों से होकर गुजरना पड़ता है।

1. प्रथम पाठन :-

जब कोई सदस्य विधेयक को संसद(indian parliament) पटल पर रखता है तो प्रस्तुतकर्ता इस विधेयक को शीर्षक एवं इसका उद्देश्य स्पष्ट करता है । इस चरण में इस विधेयक पर कोई चर्चा नहीं होती । फिर इस विधेयक को भारत के राजपत्र में प्रकाशित किया जाता है। विधेयक के इसी प्रस्तुतीकरण को प्रथम पाठन कहा जाता है। 

2. द्वितीय पाठन :-

इस चरण में विधेयक पर समीक्षा की जाती है तथा इसे अंतिम रूप प्रदान किया जाता है। इस चरण में साधारण बहस होती है, विशेषज्ञ समिति द्वारा जांच कराई जाती है । फिर इसपर विचार करने के लिए लाया जाता है। 

3. तृतीय चरण :-

इस चरण में इस विधेयक पर मतदान होता है और कोई संसोधन का काम नहीं होता है। निचले सदन से पारित होने के बाद पीठासीन अधिकारी द्वारा विधेयक पर विचार एवं स्वीकृति के लिए उसे दूसरे सदन में भेज दिया जाता है। 

                           दूसरे सदन में भी इसी प्रक्रिया से गुजरने के बाद अगर इसे पारित कर दिया जाता है तो इसे संसद(indian parliament) द्वारा पारित समझा जाता है।

इसके बाद आती है राष्ट्रपति की बारी – संसद द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है।

राष्ट्रपति के पास 3 विकल्प होते है –
1. या तो वह विधेयक को अपनी स्वीकृति दे दें
2. या तो वह विधेयक को अपनी स्वीकृति देने से रोक दें
3. या वह उस विधेयक को पुनर्विचार हेतु पुनः संसद को भेज दें  । 

                      यदि राष्ट्रपति अपनी स्वीकृति नहीं देता है तो वह विधेयक वही निरस्त हो जाता है।

और यदि पुनर्विचार के लिए भेजता है और जरूरी संसोधन के बाद वह विधेयक फिर से राष्ट्रपति के पास आता है तो राष्ट्रपति इस पर स्वीकृति देने को बाध्य होता है । 

और अगर राष्ट्रपति विधेयक को स्वीकृति दे देता है तो यह अधिनियम या कानून बन जाता है । और इस प्रकार देश को एक नया कानून मिलता है। 

So this is the How does parliament make a law

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