भारतीय प्रादेशिक नौपरिवहन उपग्रह प्रणाली । NavIC in hindi

भारतीय प्रादेशिक नौपरिवहन उपग्रह प्रणाली (Indian Regional Navigation Satellite System – IRNSS) अमेरिका के जीपीएस की तरह ही नौपरिवहन उपग्रह प्रणाली है लेकिन ये बस क्षेत्रीय स्तर तक ही सीमित है।

इस लेख में हम भारतीय प्रादेशिक नौपरिवहन उपग्रह प्रणाली पर सरल एवं सहज चर्चा करेंगे एवं इससे संबंधित अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं को भी समझेंगे।

भारतीय प्रादेशिक नौपरिवहन उपग्रह प्रणाली

| उपग्रह प्रणाली किसे कहते हैं?

कोई खगोलीय पिंड या फिर मानव निर्मित मशीन जब किसी तारे या ग्रह की परिक्रमा करता है, तो उसे उपग्रह (Satellite) कहा जाता है, जैसे कि चंद्रमा एक उपग्रह है क्योंकि यह पृथ्वी की परिक्रमा करता है। लेकिन जब से इंसानों ने ये समझ लिया कि वो भी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति या ज़िंदगी को बेहतर बनाने के लिए खुद उपग्रह बना सकता है और उसे पृथ्वी की कक्षा में भेज सकता है तो फिर क्या था उन्होने ढ़ेरों उपग्रह बनाए और पृथ्वी की कक्षा में भेजना शुरू किया। इससे हुआ क्या?

इससे इंसानों की पूरी ज़िंदगी ही बदल गई, उसकी कई कमियाँ खत्म हो गई और नई ताकतों में इजाफ़ा हुआ। इस क्षेत्र में वे आगे बढ़ते गए और फिर उसे पता चला कि अगर बहुत सारे उपग्रहों के समूहों का इस्तेमाल किया जाये तो फिर पूरी धरती के एक-एक लोकेशन को पिन पॉइंट किया जा सकता है और उसके इस्तेमाल से कई नामुमकिन सी चीज़ मुमकिन हो जाएगी, जैसे कि सटीक रियल टाइम स्थिति का पता लगाना, धरती पर दो जगहों की दूरी को आसानी से मापना, मूवमेंट को ट्रैक करना, खुफ़िया जानकारी जुटाना, भू-सर्वेक्षण करना आदि।

जीपीएस के इस क्षेत्र में पहला लॉंच अमेरिका ने सन 1978 में किया और फिर उसने धीरे-धीरे पूरे उपग्रह प्रणाली को सेट-अप किया। आज कुल 33 उपग्रह इस क्षेत्र में काम कर रहा है और पूरी धरती को जीपीएस सुविधा प्रोवाइड करा रहा है। अमेरिका की मोनोपोली को इस क्षेत्र में रोकने के लिए अन्य देशों ने भी इस तरह की उपग्रह प्रणाली को विकसित किया। रूस ने GLONASS नाम से इस सिस्टम को तैयार किया, चीन BeiDou नाम से इसे लॉंच किया, यूरोपियन यूनियन द्वारा Galileo और जापान द्वारा Quasi-Zenith नाम से उपग्रह प्रणाली को स्थापित किया गया।

इस क्षेत्र में इंडिया ने भी कदम रखा जब 1 जुलाई 2013 को भारतीय प्रादेशिक नौपरिवहन उपग्रह प्रणाली का पहला उपग्रह लॉंच किया गया। इंडिया के इस उपग्रह प्रणाली में कुल 7 उपग्रह है जिसमें से आखिरी उपग्रह को अप्रैल 2018 में लॉंच किया गया। इस तरह से भारतीय प्रादेशिक नौपरिवहन उपग्रह प्रणाली (Indian Regional Navigation Satellite System) को एक नया ऑपरेशनल नाम NavIC (नाविक) दिया गया। आज ये अच्छी तरह से काम कर रहा है। [यहाँ से – उपग्रह को विस्तार से समझें]

| भारतीय प्रादेशिक नौपरिवहन उपग्रह प्रणाली पर काम कैसे शुरू हुआ?

मई 1999 की बात है। घुसपैठियों का भेष धर के पाकिस्तानी सैनिक जम्मू-कश्मीर घुस आये और कारगिल में कई जगहों पर कब्जा जमकर बैठ गये। भारतीय सेना को घुसपैठियों की सही लोकेशन का पता लगाने में मुश्किल आ रही थी। ऐसे में भारत ने अमेरिका से मदद मांगी। अमेरिका का GPS उस समय पूरी तरह से काम कर रहा था जो सही लोकेशन भारत को मुहैया करा सकता था। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इससे भारत को एक बहुत बड़ा धक्का लगा और बहुत बड़ी सीख भी मिली कि हम ऐसे मामलों में दूसरों पर निर्भर नहीं रह सकते हैं!

इसरो ने उसकी अहमियत को समझा और न केवल स्वदेशी GPS तकनीक पर काम किया बल्कि मैपिंग और जियो लोकेशन से संबन्धित पूरे एक सिस्टम का निर्माण कर लिया। और आज भारत का नेवीगेशन प्रणाली जीपीएस से भी ज्यादा सटीकता से जानकारी मुहैया कराता है।

| NavIC क्या है?

भारतीय प्रादेशिक नौपरिवहन उपग्रह प्रणाली (IRNSS) भारत का एक स्वायत्त नौपरिवहन उपग्रह प्रणाली है जो सटीक रियल टाइम स्थिति (Position) बताने में सक्षम है। जैसा कि हमने ऊपर भी चर्चा किया; इसी का ऑपरेशनल नाम यानी कि उपयोग में लाया जाने वाला नाम 2016 में NavIC – NAVigation with Indian Constellation रखा गया। 

अमेरीकन जीपीएस से भी ज्यादा सटीक कही जाने वाली, ISRO द्वारा निर्मित NavIC को साल 2020 में मोबाइल चिप बनाने वाली कंपनी Qualcomm ने सपोर्ट देने की बात कही। इससे Map based services के लिए और इसी प्रकार के अन्य सर्विसेज के लिए गूगल के मैप की जगह स्वदेशी NavIC का इस्तेमाल जल्द ही कर पाने की उम्मीदें बढ़ गई।

अब देखने वाली बात है कि कब तक हमें NavIC का सपोर्ट सभी स्मार्टफोन में मिलना शुरू हो जाएगा। लेकिन यहाँ ये प्रश्न उठता है कि कोई भी जीपीएस जैसी उपग्रह प्रणाली काम कैसे करता है?

| जीपीएस काम कैसे करता है?

मान लीजिये कि आप पृथ्वी पर कहीं खड़े है और आपके ऊपर आकाश में तीन सैटेलाइट है। यदि आप को पता है कि आप सैटेलाइट A से कितने दूर है तो आप को ये भी पता होगा कि आप सैटेलाइट B के सर्कल में कहीं तो हो सकते हैं। इसी तरह से अगर आपको पता है कि आप सैटेलाइट B से कितने दूर है तो आप ये भी पता लगा सकते हैं कि सैटेलाइट C के सर्कल में कहाँ हैं। यही काम सैटेलाइट C के लिए भी होगा। इस तरह से पता चल जाएगा कि ये तीनों सर्कल कहाँ पर प्रतिच्छेद (Intersect) कर रहा है। जहां पर प्रतिच्छेद कर रहा है वो लोकेशन सटीक आपका लोकेशन होगा। इसी तरह से जीपीएस सटीक लोकेशन प्राप्त करता है और इस प्रतिच्छेद विधि को ट्रायलिटिरेशन (trilateration) कहा जाता है। नीचे तस्वीर में आप देख सकते हैं;

| भारतीय प्रादेशिक नौपरिवहन उपग्रह प्रणाली किन मामलों में दूसरों से अलग है?

ये अमेरिका के जीपीएस और रूस के ग्लोनास से भी अपेक्षाकृत ज्यादा सटीक है। ISRO की माने तो इसकी सटीकता 10 सेंटीमीटर तक है। जबकि जीपीएस की बात करें तो उसकी सटीकता 30 सेंटीमीटर तक है।

जहां अमेरीकन जीपीएस में केवल L बैंड का उपयोग किया गया है NavIC में L और S दो बैंडों का इस्तेमाल किया गया है।जिससे कि इसकी क्षमता इसके समकक्षों से अपेक्षाकृत और बढ़ जाती है।

हालांकि जीपीएस में 31 सैटेलाइट है और ये पूरे पृथ्वी को कवर करता है लेकिन चूंकि NavIC एक क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली है इसमें केवल 7 सैटेलाइट है और यह भारत के बाहर केवल 1500 किलोमीटर तक के दायरे में काम करता है।

| No. of Satellites in NavIC

NavIC के इस पूरे प्रणाली में कुल 7 उपग्रह है। तीन पृथ्वी के Geo Stationary Orbit में और चार Geo Synchronous Orbit में। हालांकि दो और उपग्रह होंगे जो स्टैंड बाय मोड में रखे जाएँगे।

indian gps navic
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| जीपीएस तुलना चार्ट

विशेषताएँNavICGPSGLONASSBEIDOU
देशभारतअमेरिकारूसचीन
सैटेलाइट संख्या7312435
कवरेजक्षेत्रीयग्लोबलग्लोबलग्लोबल
सटीकता100-10 cm500-30 cm738-280 cm260-10 cm
सैटेलाइट की उम्र12 साल10 साल10 साल12 साल
पहला लॉंच2013197819822000

| NavIC के फायदे

  • दूर-दराज इलाकों पर नजर 
  • ट्रेफिक जाम में इस्तेमाल 
  • ट्रेनों की रियल टाइम मैपिंग 
  • वैकल्पिक मार्गों की जानकारी 
  • आपदा प्रबंधन में मदद 
  • पूर्वानुमान में मदद 
  • कूटनीतिक लाभ के लिए
  • नक्शे तैयार करने में आसानी 
  • भूगर्भीय आंकड़े जुटाने में सहायक 
  • भटक गये विमानों की खोज 
  • सेना को सामरिक जानकारी
  • जीपीएस तकनीक इस्तेमाल 

कुल मिलाकर यही है भारतीय प्रादेशिक नौपरिवहन उपग्रह प्रणाली यानी कि NavIC, उम्मीद है समझ में आया होगा। नीचे कुछ अन्य बेहतरीन लेखों का लिंक दिया जा रहा है उसे भी अवश्य पढ़ें;

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