Inter-State Relations in hindi ॥ अंतर्राज्यीय जल विवाद, अंतर्राज्यीय परिषद

अंतर्राज्यीय संबंध: पृष्ठभूमि
Inter-State Relations: Background

इस लेख में हम अंतर्राज्यीय संबंधों (Inter-State Relations) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे। इससे पहले हम ↗️केंद्र-राज्य संबंध पर विस्तार से चर्चा कर चुकें हैं।

अंतर्राज्यीय संबंध: पृष्ठभूमि
(Inter-State Relations: Background)

✅ एक संघात्मक व्यवस्था वाले देश में केंद्र और राज्य के मध्य के संबंध जितने मायने रखते हैं। कमोबेश उतने ही मायने राज्य और राज्य के मध्य संबंध भी रखते हैं।

दरअसल कुछ चीज़ें ऐसी हैं जो हमेशा विवाद पैदा करते हैं जैसे कि नदी। आजादी के बाद से ही नदी विवाद ने जोड़ पकड़ना शुरू कर दिया था।

जिसमें से अधिकतर का समाधान आज तक नहीं निकल पाया है। तो इस लेख में हम राज्यों के मध्य नदी विवाद और उसे सुलझाने के लिए क्या-क्या प्रावधान किए गए हैं। उसे समझेंगे।

इसके अलावा राज्यों के मध्य संबंध को और मजबूत, परस्पर समन्वयकारी और शौहार्दपूर्ण बनाने के लिए अंतरराज्यीय एवं क्षेत्रीय परिषदों का निर्माण किया गया है, उसे भी समझेंगे,

अंतरराज्यीय वाणिज्य और व्यापार जिसे की हमने जीएसटी में भी पढ़ा है। उसके भी कुछ पहलुओं को देखेंगे। तथा इससे संबन्धित कुछ अन्य तथ्यों पर भी गौर करेंगे।

अंतर्राज्यीय संबंध और पूर्ण विश्वास और साख का सिद्धांत
(Inter-State Relations and Principle of absolute trust and credit)

जैसे कि हमने संघीय व्यवस्था वाले लेख में भी पढ़ा है कि प्रत्येक राज्य का अधिकार क्षेत्र उसके राज्य क्षेत्र तक ही सीमित होती है।

ऐसे में ये संभव है कि एक राज्य दूसरे राज्य के कानून और दस्तावेज़ को स्वीकृति न दें। जैसे कि मान लीजिये कि आप अपने ग्रेजुएशन का डिग्री लेकर दूसरे राज्य में नौकरी या पढ़ाई के लिए जाते है,

और वो राज्य आपके इस डिग्री को मानने से इंकार कर दें, और ये बोल दिया जाये कि जिस राज्य से आए हैं उसी राज्य में जाइए। तो हो जाएगा न फिर गड़बड़ ।

इसी को दूर करने के लिए संविधान में पूर्ण विश्वास तथा साख का सिद्धांत (Principle of absolute trust and credit) है। जो कि कुछ इस प्रकार है।

केंद्र तथा प्रत्येक राज्य के लोक अधिनियमों, दस्तावेजों (जो किसी प्राधिकृत व्यक्ति या संस्था द्वारा जारी किया गया हो) एवं न्यायिक प्रक्रिया को पूरे भारत में पूर्ण विश्वास तथा साख प्रदान की गयी है।

यहाँ लोक अधिनियम (Public acts) का मतलब विधायी तथा कार्यकारी कानून से है।

न्यायिक प्रक्रिया (judicial procedure) का मतलब न्यायालय द्वारा सुनवाई के दौरान दी गयी अंतिम निर्णय से होता है।

सीधे-सीधे ऐसे समझ सकते हैं कि किसी न्यायालय द्वारा दिये गए निर्णय को कोई राज्य अमान्य करार नहीं दे सकता, और दूसरी बात ये कि इसे एक संदर्भ (reference) के तौर पर भविष्य में इस्तेमाल किया जा सकता है।

पर एक बात याद रखिए कि ये सिर्फ दीवानी मामलों पर लागू होता हैं फ़ौजदारी मामलों पर नहीं। ऐसा इसलिए है ताकि एक राज्य के जो दंड देने का नियम है वे दूसरे राज्य पर लागू न हो।

अंतर्राज्यीय संबंध और नदी जल विवाद
(Inter-State Relations and River Water Disputes)

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि नदी जल विवाद पानी को लेकर होता है। और सभी राज्य, किसी नदी का जितना अधिक पानी उसके हिस्से में आ सकें उसके लिए प्रयासरत रहता है।

इसके लिए अनुच्छेद 262 में दो प्रावधान है। जो निम्नलिखित है।

🔹 1. संसद कानून बनाकर अंतर्राज्यीय नदियों तथा नदी घाटियों के जल के प्रयोग, बँटवारे तथा नियंत्रण से संबन्धित किसी विवाद पर शिकायत का न्यायनिर्णयन (Adjudication) कर सकती है।

🔹 2. संसद यह भी व्यवस्था कर सकती है कि ऐसे किसी विवाद में न ही उच्चतम न्यायालय तथा न ही कोई अन्य न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करें।

यानी कि सीधे-सीधे कहें तो संसद इस मामले में न्यायालय की भूमिका निभा सकता है।

इसी अनुच्छेद का इस्तेमाल करते हुए संसद ने दो कानून बनाए।
🔹 पहला है नदी बोर्ड अधिनियम (1956)

इसका काम था अंतरराज्यीय नदियों तथा नदी घाटियों के नियंत्रण तथा विकास के लिए नदी बोर्ड (River board) की स्थापना करना।

यहाँ याद रखने वाली बात ये है कि नदी बोर्ड की स्थापना संबन्धित राज्यों के निवेदन पर केंद्र सरकार द्वारा उन्हे सलाह देने हेतु की जाती है।

🔹 दूसरा है अंतरराज्यीय जल विवाद अधिनियम (1956), इस कानून का इस्तेमाल करके केंद्र सरकार दो या अधिक राज्यों के मध्य नदी जल विवाद के न्यायनिर्णयन हेतु एक अस्थायी न्यायालय कि गठन की शक्ति प्रदान करता है।

🔹 न्यायाधिकरण (Tribunal) का निर्णय अंतिम तथा विवाद से संबन्धित सभी पक्षों के लिए मान्य होता है।

इसका मतलब ये नहीं है इस मामले को लेकर उच्चतम न्यायालय नहीं ले जाया जा सकता है। इस सब मसले में अगर कानूनी दाव-पेंच का मामला आ जाता है।

तो उच्चतम न्यायालय को यह अधिकार है कि वह राज्यों के मध्य जल विवादों की स्थिति में उनसे जुड़े मामलों की सुनवाई कर सकता है।

इन क़ानूनों का इस्तेमाल करके अब तक कई अंतरराज्यीय जल विवाद न्यायाधिकरणों (Interstate Water Disputes Tribunals) का गठन किया जा चुका है।

जब ये लेख लिख रहा हूँ तो इसमें से वंशधरा जल विवाद अभी चर्चा में है। जो कि ओडिशा और आंध्रप्रदेश के मध्य एक जल विवाद है।

अन्य जल विवाद को आप इस तस्वीर में देख सकते हैं, जिसका समाधान अभी तक नहीं निकल पाया है।

inter-state relations

अंतर्राज्यीय संबंध में अंतर्राज्यीय परिषद की भूमिका
(Role of Inter-State Council in Inter-State Relations)

अनुच्छेद 263 राज्यों के मध्य तथा केंद्र एवं राज्यों के मध्य समन्वय के लिए अंतर्राज्यीय परिषद के गठन की व्यवस्था करता है। इसके निम्नलिखित प्रावधान है।

  • राज्यों के मध्य उत्पन्न विवादों की जांच करना तथा ऐसे विवादों पर सलाह देना।
  • ऐसे विषय, जिसमें राज्यों के साथ-साथ केंद्र का भी समान हित हो, उस पर अन्वेषन तथा विचार-विमर्श करना।
  • ऐसे विषयों के लिए विशेष तौर पर बनाये गये नीतियों के बेहतर क्रियान्वयन के लिए संस्तुति (Recommendation) देना।

राष्ट्रपति को यदि लगता है कि ऐसी परिषद का गठन सार्वजनिक हित में है तो वह ऐसी परिषद का गठन कर सकता है। और ऐसा किया भी गया है।

अब तक इन उपबंधों का उपयोग करके राष्ट्रपति निम्न परिषदों का गठन कर चुका है।

🔹 केन्द्रीय स्वास्थ्य परिषद,
🔹 केन्द्रीय स्थानीय सरकार तथा शहरी विकास परिषद,
🔹 बिक्री कर हेतु उत्तरी, पूर्वी, पश्चिमी तथा दक्षिणी क्षेत्रों के लिए चार क्षेत्रीय परिषदें।

उच्चतम न्यायालय जिस अनुच्छेद 131 का प्रयोग करके सरकारों के मध्य कानूनी विवादों के निर्णय देती है। उसी प्रकार के अधिकार इन परिषदों के पास भी होता है।

परिषद किसी विवाद, चाहे वो कानूनी हो अथवा गैर-कानूनी; का निष्पादन कर सकती है, किन्तु इसका कार्य सलाहकारी है न कि न्यायालय की तरह अनिवार्य रूप से मान्य।

अंतर्राज्यीय परिषद
(Inter-state council)

केंद्र तथा राज्य सम्बन्धों से संबन्धित सरकारिया आयोग (1983 – 87) ने संविधान के अनुच्छेद 263 के अंतर्गत नियमित अंतर्राज्यीय परिषद की स्थापना के लिए सशक्त शुझाव दिये। साथ ही साथ उसे कुछ जिम्मेदारियाँ भी देने की बात उन्होने कही।

सरकरिया आयोग की सिफ़ारिशों को मानते हुए, वी पी सिंह के नेतृत्व वाली जनता दल सरकार ने 1990 में अंतर्राज्यीय परिषद का गठन किया। इसमें निम्न सदस्य थे।

🔹 अध्यक्ष – प्रधानमंत्री।
🔹 सभी राज्यों के मुख्यमंत्री।
🔹 विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री।
🔹 उन केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासक जहां विधानसभा नहीं है
🔹 राष्ट्रपति शासन वाले राज्यों के राज्यपाल। तथा,
🔹 प्रधानमंत्री द्वारा नामित छह केन्द्रीय कैबिनेट मंत्री (गृह मंत्री को शामिल करते हुए)

इसके कार्य निम्नलिखित है।
जो कि अनुच्छेद 263 में वर्णित प्रावधानों के समान ही है।

  1. ऐसे विषयों पर अन्वेषन तथा विचार विमर्श करना जिनमें राज्यों अथवा केंद्र का साझा हित निहित हो।
  2. इन विषय पर नीति तथा इसके क्रियान्वयन में बेहतर समन्वय के लिए संस्तुति करना।
  3. ऐसे दूसरे विषयों पर विचार-विमर्श करना जो राज्यों के सामान्य हित में हो, और अध्यक्ष द्वारा इसे सौपे गए हों।

परिषद की एक वर्ष में कम से कम तीन बैठकें होती हैं। इसकी बैठके पारदर्शी होती है तथा प्रश्नों पर निर्णय एकमत से होता है।

परिषद की एक स्थायी समिति भी होती है। इसकी स्थापना 1996 में की गयी थी, ताकि परिषद के विचारार्थ मामलों पर सतत चर्चा होती रहे।

इसमें निम्नलिखित सदस्य होते हैं। केन्द्रीय गृहमंत्री (अध्यक्ष के रूप में), पाँच केन्द्रीय कैबिनेट मंत्री और नौ मुख्यमंत्री।

परिषद के सहायतार्थ एक सचिवालय भी होता है, जिसे अंतर-राज्य परिषद सचिवालय कहा जाता है।

इसकी स्थापना 1991 में की गयी थी और इसका प्रमुख भारत सरकार का एक सचिव होता है। 2011 से यह यही सचिवालय क्षेत्रीय परिषदों के सचिवालय के रूप में भी कार्य कर रहा है।

क्षेत्रीय परिषदें
(Regional councils)

क्षेत्रीय परिषदें सांविधिक (Statutory) निकाय है न कि सांविधानिक (Constitutional)। यानी कि इसका गठन संसद द्वारा अधिनियम बनाकर किया गया है, जो कि राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 है।

इस कानून ने देश को पाँच क्षेत्रों में विभाजित्त किया है। तथा प्रत्येक क्षेत्र के लिए एक क्षेत्रीय परिषद का गठन किया। जिसे की आप नीचे के तस्वीर में देख सकते हैं।

Inter-State Relations

प्रत्येक क्षेत्रीय परिषद में निम्नलिखित सदस्य होते हैं।
🔹 केंद्र सरकार का गृह मंत्री,
🔹 क्षेत्र के सभी राज्यों के मुख्यमंत्री,
🔹 क्षेत्र के प्रत्येक राज्य से दो अन्य मंत्री,
🔹 क्षेत्र में स्थित प्रत्येक केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासक।

इसके अतिरिक्त निम्नलिखित व्यक्ति क्षेत्रीय परिषद में सलाहकार के रूप में भाग ले सकते हैं, लेकिन उनको मताधिकार नहीं मिलता है।

🔹1. योजना आयोग द्वाएरा मनोनीत व्यक्ति
🔹2. क्षेत्र में स्थित प्रत्येक राज्य सरकार के मुख्य सचिव
🔹3. क्षेत्र के प्रत्येक राज्य के विकास आयुक्त

केंद्र सरकार का गृहमंत्री पांचों क्षेत्रीय परिषदों का अध्यक्षय होता है। प्रत्येक मुख्यमंत्री क्रमानुसार एक वर्ष के समय के लिए परिषद के उपाध्यक्ष के रूप में कार्य करता है।

पूर्वोत्तर परिषद
(North East Council)

अगर आप ऊपर वाले चार्ट में देखेंगे तो आपको नॉर्थ-ईस्ट नहीं दिखेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि इसे बाद में चलकर 1971 में बनाया गया।

इस परिषद में पूर्वोत्तर के आठों राज्य शामिल है। इसके भी कार्य कमोबेश बांकी परिषदों की तरह ही है, कुछ काम अलग है जैसे कि,

इस परिषद के सभी सदस्य राज्यों को समय-समय पर सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था बनाये रखने के लिए उठाये गए कदमों की समीक्षा करनी होती है।

क्षेत्रीय परिषदों का उद्देश्य
(The purpose of regional councils)

  • राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों तथा केंद्र के बीच सहभागिता तथा समन्वयता को बढ़ावा देना।
  • आर्थिक तथा सामाजिक योजना, भाषायी अल्पसंख्यक, सीमा विवाद, अंतरराज्यीय परिवहन आदि जैसे संबन्धित विषयों पर विचार-विमर्श करना तथा अपनी संस्तुति देना।
  • मुख्य विकास योजनाओं के सफल तथा तीव्र क्रियान्वयन के लिए एक – दूसरे की सहायता करना।
  • तीक्ष्ण राज्य भावना, क्षेत्रवाद, भाषायी तथा विषेशतावाद के विकास को रोकने में सहायता करना।
  • केंद्र तथा राज्यों को सामाजिक तथा आर्थिक विषयों पर एक दूसरे की सहायता करने में तथा एक समान नीतियों के विकास के लिए विचारों तथा अनुभवों के आदान-प्रदान में सक्षम बनाना।
  • देश के अलग-अलग क्षेत्रों के मध्य राजनैतिक साम्य सुनिश्चित करना।

याद रखिये कि ये केवल चर्चात्मक तथा परमर्शदात्री निकाय हैं। यानी कि इनके सुझाव बाध्यकारी नहीं हैं।

अंतरराज्यीय व्यापार तथा वाणिज्य
(Inter-state trade and commerce)

संविधान के भाग 13 के अनुच्छेद 301 से 307 में भारतीय क्षेत्र में व्यापार, वाणिज्य तथा समागम का वर्णन है।

अनुच्छेद 301 के अनुसार सम्पूर्ण भारतीय क्षेत्र में व्यापार, वाणिज्य तथा समागम स्वतंत्र होगा।

राज्यों के मध्य सीमा अवरोधों को हटाया जाएगा तथा देश में व्यापार, वाणिज्य तथा समागम के अबाध प्रवाह को प्रोत्साहित करने हेतु एक इकाई बनाया जाएगा।

इस प्रावधान के अनुसार स्वतंत्रता, अंतरराज्यीय व्यापार, वाणिज्य तथा समागम तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसका विस्तार राज्यों के भीतर व्यापार, वाणिज्य तथा समागम पर भी है।

अतः यदि किसी राज्य की सीमा पर या पहले अथवा बाद के स्थानों पर प्रतिबंध लगाए जाते हैं तो यह अनुच्छेद 301 का उल्लंघन होगा।

हालांकि ऐसा नहीं है व्यापार पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है। पर सिर्फ अनुच्छेद 302 से अनुच्छेद 305 के तहत आने वाला प्रतिबंध ही मान्य होगा।

Inter-State Relations and
Article 302 to 305

इसके प्रावधानों को कुछ इस तरह से समझा जा सकता है।

अनुच्छेद 302

संसद सार्वजनिक हित में, राज्यों के मध्य अथवा किसी राज्य के भीतर व्यापार, वाणिज्य तथा समागम की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगा सकती है।

किन्तु संसद एक राज्य को दूसरे राज्य पर प्राथमिकता नहीं दे सकती अथवा भारत के किसी भाग में वस्तुओं की कमी की स्थिति को छोड़कर राज्यों के मध्य विभेद नहीं कर सकती।

अनुच्छेद 303

इसी प्रकार राज्य की विधायिका भी सार्वजनिक हित में, उस राज्य अथवा उस राज्य के अंदर व्यापार, वाणिज्य तथा समागम की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध लगा सकती है।

किन्तु इस उद्देश्य हेतु विधेयक विधानसभा में राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से ही पेश किया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त राज्य विधायिका एक राज्य को दुसरे पर प्रथिमकता नहीं दे सकती अथवा राज्यों के मध्य विभेद नहीं कर सकती।

अनुच्छेद 304

किसी राज्य की विधायिका दुसरे राज्य अथवा संघ राज्य से आयातित उन वस्तुओं पर कर लगा सकती है जो उस संबन्धित राज्य में उत्पादित होते हैं।

अनुच्छेद 305

अनुच्छेद 301 के अंतर्गत जो स्वतंत्रता मिली हुई है, वो चूंकि राष्ट्रीयकृत विधियों के अधीन है।

इसलिए, संसद अथवा राज्य विधायिका, किसी व्यापार, व्यवसाय, उद्योग अथवा सेवा को जिसमें सामान्य नागरिक शामिल हो या न हो, जारी रखने के लिए कानून बना सकती है।

संसद व्यापार, वाणिज्य तथा समागम की स्वतंत्रता को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से उचित प्राधिकरण की नियुक्त कर सकती है तथा इसे प्रतिबंधित भी कर सकती है।

संसद इस प्राधिकरण को आवश्यक शक्ति तथा कार्य दे सकती है किन्तु अभी तक ऐसे किसी प्राधिकरण का गठन नहीं किया गया है।

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