न्याय चाहने वाला आमतौर पर न्यायालय जाता है, पर जब न्यायालय ही न्याय चाहने वाले के पास आ जाए तो इसे न्यायिक सक्रियता कहा जाता है।

इस लेख में हम भारत में न्यायिक सक्रियता (judicial activism) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे, एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझेंगे,

तो अच्छी तरह से समझने के लिए इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें, साथ ही अन्य संबन्धित लेख भी पढ़ें।

न्यायिक सक्रियता
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न्यायिक सक्रियता का अर्थ

आम लोकतांत्रिक व्यवस्था यही है कि अगर आप किसी प्रकार के विवादों में उलझे हैं या फिर आपके किसी प्रकार के अधिकार का हनन हो रहा हो तो न्यायालय के पास जाइए, वो आपके विवाद को सुलझा देंगे। लेकिन क्या हो किसी बहुत ही जरूरी मुद्दे पर न्यायालय खुद आपके पास आ जाये। न्यायिक सक्रियता इसी अवधारणा पर आधारित है।

दूसरे शब्दों में कहें तो इसका अर्थ है न्यायपालिका द्वारा सरकार के अन्य दो अंगों (विधायिका एवं कार्यपालिका) को अपने संवैधानिक दायित्वों के पालन के लिए बाध्य करना। इसीलिए इसे न्यायिक गतिशीलता (Judicial mobility) भी कहा जाता है।

इसकी शुरुआत अमेरिका से मानी जाती है और न्यायिक सक्रियता शब्द को प्रचलन में लाने का श्रेय आर्थर शेलीसंगर जूनियर नामक एक अमेरिकी इतिहासकार को जाता है। भारत की बात करें तो यहाँ न्यायिक सक्रियता का सिद्धांत 1970 के दशक के मध्य में आया। भारत में इसको लाने का श्रेय न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर, न्यायमूर्ति पी एन भगवती, न्यायमूर्ति ओ चिनप्पा रेड्डी तथा न्यायमूर्ति डी ए देशाई को दिया जाता है।

Compoundable and Non-Compoundable OffencesHindiEnglish
Cognizable and Non- Cognizable OffencesHindiEnglish
Bailable and Non-Bailable OffencesHindiEnglish

न्यायिक सक्रियता का औचित्य

अब सवाल है कि ऐसी स्थिति आती कब है जब न्यायालय को न्यायिक सक्रियता दिखाने की जरूरत पड़ती है। इस बात को डॉ. बी एल वढेरा ने अच्छे से समझाया है आइये उसे समझते हैं –

1. उत्तरदायी सरकार उस समय लगभग ध्वस्त हो जाती है जब सरकार की शाखाएँ (विधायिका एवं कार्यपालिका) अपने-अपने कार्यों का निष्पादन उस तरह से नहीं कर पाती जैसे कि उसे करना चाहिए था। ऐसी स्थिति में संविधान एवं लोकतन्त्र में नागरिकों का भरोसा टूटने लगता है। नागरिकों के अधिकार एवं आजादी बची रहे और लोकतंत्र में लोगो का भरोसा बना रहे इसके लिए न्यायालय पर पीड़ित जनता को आगे बढ़कर मदद पहुंचाने का भारी दबाव बनता है।

2. दूसरी बात है न्यायिक उत्साह यानी कि न्यायाधीश भी बदलते समय के समाज सुधार में भागीदार बनना चाहते है और अपने कार्यकाल के दौरान कुछ हीरो टाइप काम करना चाहते हैं। इसके लिए वे जनहित याचिकाओं को काफी तवज्जो देते हैं।

3. तीसरी बात है विधायी निर्वात, यानी कि कई बार ऐसा होता है कुछ क्षेत्र में क़ानूनों का अभाव होता है। ऐसी स्थिति में न्यायालय पर ही ज़िम्मेदारी आ जाती है कि वह परिवर्तित सामाजिक जरूरतों के हिसाब से न्यायालयी विधायन का कार्य करे।

4. चौथी बात ये कि भारत के संविधान में स्वयं ऐसे कुछ प्रावधान है जिनमें न्यायपालिका को विधायन यानी कानून बनाने की गुंजाइश है या एक सक्रिय भूमिका अपनाने का मौका मिलता है।

इसके अलावा सुभाष कश्यप ने इसमें कुछ और लाईने जोड़ी, आइये उसे भी देखते हैं –

इनके अनुसार न्यायपालिका अपने सामान्य क्षेत्राधिकार को लांघकर विधायिका या कायपालिका के ऐसे क्षेत्र में दखल तब देता है जब,
1. जब विधायिका अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन करने में विफल हो गई हो।

2. एक ऐसी विधायिका जिसमें किसी दल को बहुमत न मिला हो और सरकार कमजोर व असुरक्षित हो और ऐसे निर्णय लेने में अक्षम हो जिससे कोई जाति या समुदाय या अन्य समूह अप्रसन्न हो सकता है

3. सत्तासीन दल सत्ता खोने के भय से ईमानदार और कड़ा निर्णय लेने से डर सकता है और इसी कारण से समय लगने और निर्णय लेने में देरी के कारण,

4. जहां कि विधायिका और कार्यपालिका नागरिकों के मूल अधिकारों जैसे- गरिमापूर्ण जीवन, स्वास्थ्यकर परिवेश का संरक्षण करने में विफल हो, अथवा कानून एवं प्रशासन को एक ईमानदार कार्यकुशल एवं न्यायपूर्ण व्यवस्था देने में विफल हो।

5. जब किसी पूर्ण बहुमत वाली सर्वसत्तावदी सरकार द्वारा गलत नीयत या उद्देश्यों से कार्य किया जा रहा हो जैसा कि आपातकाल के दौरान हुआ था।

6. कभी-कभी न्यायालय जाने-अनजाने स्वयं मानवीय प्रवृतियों, लोकलुभावनवाद, प्रचार, मीडिया की सुर्खियां बटोरने आदि के लिए भी न्यायिक सक्रियता का इस्तेमाल करती है।

ये तो हो गया कुछ ऐसे कारण जो विधायिका या कार्यपालिका जनित होते हैं, लेकिन इसके अलावा भी कुछ फैक्टर है जो न्यायिक सक्रियता को उकसाते है। प्रमुख न्यायविद उपेंद्र बक्शी ने इसका कुछ इस प्रकार वर्गीकरण किया है।

न्यायिक सक्रियता के उत्प्रेरक

1. नागरिक अधिकार कार्यकर्ता (Civil rights activists) – ये समूह मुख्यतः नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों से जुड़े मामले उठाते है।

2. उपभोक्ता अधिकार कार्यकर्ता (Consumer rights activists) – ये समूह राजनीति एवं आर्थिक व्यवस्था की जवाबदेही के ढांचे में उपभोक्ता अधिकार व्यवस्था की जवाबदेही के ढांचे में उपभोक्ता अधिकार संबंधी मामले उठाते है।

3. बंधुआ मजदूर समूह (Bonded labor group) – ये समूह भारत में मजदूरी दासता के उन्मूलन के लिए न्यायिक सक्रियता की अपेक्षा करते है

5. पर्यावरणीय कार्यवाही के लिए नागरिक समूह (Citizen Group for Environmental Action) – ये समूह न्यायिक सक्रियता को बढ़ते पर्यावरणीय गिरावट तथा प्रदूषण को समाप्त करने के लिए उत्प्रेरित करते हैं।

6. बाल अधिकार समूह (Child rights group) – ये लोग बाल श्रम, शिक्षा-साक्षरता का अधिकार, सुधार गृहों के किशोरों तथा यौन श्रमिकों के बच्चों के अधिकारों से संबन्धित मामलों को उठाते है।

7. निर्धनता अधिकार समूह (Poverty rights group) – ये समूह सूखे एवं अकाल के दौरान सहायता तथा शहरी गरीबों के मामलों को न्यायालय तक लाते हैं।

8. मूलवासी जन अधिकार समूह (Native People’s Rights Group) – ये समूह वनवासियों, संविधान की पाँचवी एवं छठी अनुसूचियों के नागरिकों तथा अस्मिता संबंधी अधिकारों के लिए कार्य करते हैं।

9. महिला अधिकार समूह (Women’s rights group) – ये समूह लैंगिक समानता, लिंग आधारित हिंसा एवं उत्पीड़न, बलात्कार तथा दहेज हत्या जैसे मामलों पर आंदोलन करते हैं।

10. बार आधारित समूह (Bar based group) – ये समूह भारतीय न्यायपालिका की स्वायत्तत्ता तथा जवाबदेही संबंधी मुद्दों के लिए आंदोलन करते हैं।

11. मीडिया स्वायत्ता समूह (Media autonomy group) – ये समूह प्रेस के साथ ही राज्य के स्वामित्व वाले जन माध्यमों की स्वायत्ता एवं जवाबदेही पर एकाग्र रहते हैं। ये कुछ महत्वपूर्ण फैक्टर है जिसकी हमने चर्चा की इसके अलावे भी अन्य कारण होते हैं।

न्यायिक सक्रियता को लेकर आशंकाएं

जाहिर है सभी बातें तो अच्छी हो नहीं सकती है, न्यायिक सक्रियता को लेकर कई सवाल उठते है तो कई आशंकाएं भी पनपती है, न्यायविद उपेंद्र बक्शी ने इसे कुछ इस तरह से वर्गीकृत किया है –

1. विचारात्मक भय (Reflective fear) : कहीं ऐसा तो नहीं है कि न्यायिक सक्रियता की आड़ में न्यायालय कार्यपालिका, विधायिका या अन्य स्वायत संस्थाओं की शक्तियाँ हड़प रहे हैं!

2. मीमांसात्मक भय (Epistemic fear) – क्या वे अर्थशास्त्र, परमाणु विज्ञान या अन्य ऐसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखते है, कि वे इन क्षेत्रों में न्यायिक सक्रियता दिखा सकें।

3. लोकतन्त्र संबंधी भय (Democratic fear) – जनहित याचिका वास्तव में लोकतन्त्र का पोषण कर रही है या भविष्य में इसकी संभावनाओं को समाप्त कर रही है।

5. आत्मवृत संबंधी भय (Autobiographical fears) – कहीं ऐसा तो नहीं कि सेवानिवृत के पश्चात राष्ट्रीय मामलों में अपना स्थान सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक सक्रियता का इस्तेमाल किया जाता हो।

न्यायिक सक्रियता बनाम न्यायिक संयम

न्यायिक सक्रियता के विपरीत भी एक सिद्धांत है जिसे न्यायिक संयम (Judicial restraint) कहते हैं, इसकी भी उत्पत्ति अमेरिका ही है। जहां न्यायिक सक्रियता में विश्वास करने वाले लोग चाहते हैं कि न्यायालय आगे बढ़कर खुद मामलों को अपने हाथ में लें।

वहीं न्यायिक संयम के पैरोकार मानते हैं कि न्यायाधीश की भूमिका सीमित होनी चाहिए, उनका काम इतना भर बताना है कि कानून क्या है, कानून बनाने का काम उन्हे विधायिका एवं कायपालिका पर ही छोड़ देना चाहिए। इसके अलावा न्यायाधीशों को किसी भी स्थिति में अपने निजी राजनीतिक मूल्यों एवं नीतिगत एजेंडा को अपने न्यायिक विचार पर हावी नहीं होने देना चाहिए। इसे ही उनलोगों ने न्यायिक संयम कहा।

न्यायिक संयम पर भारत में भी काफी बातें होती है, खुद सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर बहुत कुछ कहा है, आइये उसे भी देखते हैं-

? सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ

सन 2007 में एक मामले में फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक संयम की बात की और न्यायालयों से कहा कि वे विधायिका एवं कार्यपालिका के कार्य अपने हाथ में न ले। यह भी कहा कि संविधान में शक्तियों का बंटवारा किया गया है और सरकार के प्रत्येक एजेंसी को अन्य अंगों के प्रति सम्मान का भाव रखते हुए एक दूसरे के कार्यक्षेत्र का अतिक्रमण नहीं करना चाहिए। इस संदर्भ में संबन्धित पीठ ने बहुत सारी टिप्पणियाँ की, आइये उसमें से कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियों को देखते हैं-

1. पीठ यानी बेंच ने कहा, बार-बार हमारे सामने ऐसे मामले आ रहे है जिनमें जजों ने विधायी अथवा कार्यपालिका कार्य अपने हाथ में ले लिए जिसका कोई औचित्य नहीं है। यह साफ-साफ असंवैधानिक है। न्यायिक सक्रियता के नाम पर जज अपनी सीमा का उल्लंघन नहीं कर सकते है।

2. पीठ ने कहा जजों कों अपनी ज़िम्मेदारी और सीमा जान लेनी चाहिए और सरकार चलाने की कोशिश बिलकुल नहीं करनी चाहिए। उनमें सदाशयता तथा विनम्रता होनी चाहिए और सम्राटों की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए।

3. न्यायालय, प्रशासनिक पदाधिकारियों को असुविधा में न डालें और इस बात को स्वीकार करे कि प्रशासनिक अधिकारियों को प्रशासन के क्षेत्र में विशेषता है न्यायालयों कि नहीं।

4. यदि विधायिका और कार्यपालिका ढंग से कार्य नहीं कर रही है तो उन्हे ठीक करने की ज़िम्मेदारी लोगो है है जो अगले चुनाव में अपने मताधिकार का सही रूप से प्रयोग करे और ऐसे उम्मीदवारों को मत दे जोकि उनकी अपेक्षाओं को पूरा कर सके या फिर अन्य कानूनी तर्के अपनाकर व्यवस्था को दुरुस्त करे जैसे शांतिपूर्वक प्रदर्शन।

तो कुल मिलाकर न्यायिक सक्रियता बहुत ही जरूरी है पर उसकी भी एक सीमा जरूर होनी चाहिए। न्यायिक सक्रियता की अवधारणा जनहित याचिका को अवधारणा से निकटता से जुड़ी है। यह सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक सक्रियता ही है जिसके कारण जनहित याचिकाओं की संख्या बढ़ी है।

अब ये जनहित याचिका (public interest litigation) या फिर जिसे पीआईएल (PIL) कहा जाता है; क्या है? इसके लिए आप नीचे दिये गए लेख को अवश्य पढ़ें – https://wonderhindi.com/public-interest-litigation-in-india-in-hindi/

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