Judicial review of ninth schedule explained in hindi

इस लेख में हम नवीं अनुसूची की न्यायिक समीक्षा (Judicial review of ninth schedule) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे और समझेंगे कि नवीं अनुसूची की समीक्षा सुप्रीम कोर्ट कर सकती है या नहीं।
Judicial review of ninth schedule

ये लेख न्यायिक समीक्षा (judicial review) वाले लेख का अगला पार्ट है अच्छी समझ के लिए उस लेख को अवश्य पढ़ें।

नवीं अनुसूची की न्यायिक समीक्षा (Judicial review of ninth schedule)

🔷 संविधान लागू होते ही उसमें कुछ अंतर्विरोध (contradiction) नजर आने लगा था खासकर के मूल अधिकार और राज्य के नीति निदेशक तत्व के बीच। ये कोई छोटा-मोटा अंतर्विरोध नहीं था, जिससे कि नजर फेर लिया जाता। वो क्या था आइये इसे उदाहरण से समझते हैं –

उदाहरण

अनुच्छेद 14, 15 और 16 समानता की बात करता है। खासकर के अनुच्छेद 15 की बात करें तो ये राज्य द्वारा, लिंग, जाति, धर्म, जन्मस्थान या मूलवंश के आधार पर विभेद का प्रतिषेध (Prohibition) करता है।

अनुच्छेद 16 की बात करें तो ये कहता है कि राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति के लिए सभी के पास समान अवसर उपलब्ध रहेंगे एवं राज्य, यहाँ भी धर्म, जाति, लिंग, जनस्थान, या मूलवंश के आधार पर नागरिकों के साथ कोई विभेद नहीं करेगा।

वहीं राज्य के नीति निदेशक तत्व के अनुच्छेद 46, मुख्य रूप से अनुसूचित जाति एवं जनजातियों को समाज के मुख्य धारा में लाने के लिए उसके आर्थिक और शैक्षणिक हितों को प्रोत्साहन देने की बात करता है।

यहाँ अंतर्विरोध ये है कि – एक तरफ अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 समानता की बात करता है तो वहीं दूसरी तरफ अनुच्छेद 46 एससी और एसटी वर्ग के लिए विशेष प्रकार की सुविधा या यूं कहें कि आरक्षण की बात करता है।

यहाँ एक समस्या आती है अगर समानता की रक्षा करेंगे तो निचले तबके के लोग कभी भी मुख्य धारा में नहीं आ पाएंगे और अगर आरक्षण देंगे तो फिर समानता नहीं बचेगा।

इसी से संबन्धित एक दिलचस्प मामला है चंपकम दोराइराजन बनाम मद्रास राज्य का मामला। इस मामले पर 1951 में फैसला आया था। क्या था वो आइये देखते हैं।

चंपकम दोराइराजन बनाम मद्रास सरकार का मामला – 1951

ऊपर जो पढ़ें हैं उससे संबन्धित एक दिलचस्प मामला है चंपकम दोराइराजन vs मद्रास सरकार का मामला (1951)। दरअसल मद्रास सरकार को लगा कि जब तक समाज के कुछ विशेष वर्ग को आरक्षण नहीं दिया जाएगा, तब तक वो समाज के मुख्य धारा में शामिल नहीं हो पाएगा इसीलिए मद्रास सरकार ने उन कुछ वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था कर दी।

चंपकम दोराइराजन नामक एक लड़की ने इसे हाइ कोर्ट में इस आधार पर चुनौती दी कि ये अनुच्छेद 15, 16 और 29(2) का हनन है, जो कि सही भी था।

अनुच्छेद 29(2) तो साफ-साफ कहता है कि राज्य निधि से संचालित कोई भी संस्था किसी नागरिक को धर्म, जाति, मूलवंश, लिंग एवं जन्मस्थान के आधार पर विभेद नहीं करेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समुदाय के आधार पर दिया गया आरक्षण मूल अधिकारों का हनन करता है इसीलिए राज्य एड्मिशन के मामले में जाति या धर्म के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था नहीं कर सकता है, क्योंकि इससे अनुच्छेद 16(2) और अनुच्छेद 29(2) का हनन होता है।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने एक और बड़ी बात कही कि जब भी कभी मूल अधिकार और नीति निदेशक तत्वों में टकराव होगा तो उस स्थिति में मूल अधिकार को ही प्रभावी माना जाएगा न कि DPSP को।

क्योंकि राज्य के नीति निदेशक तत्व को अगर लागू नहीं भी किया जाएगा तो ठीक है, वैसे भी उसे लागू करना अनिवार्य नहीं है। लेकिन मूल अधिकार को बचाना सुप्रीम कोर्ट का एक अतिआवश्यक दायित्व है।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने ये स्पष्ट कर दिया कि मूल अधिकारों को संसद द्वारा संविधान संशोधन प्रक्रिया के माध्यम से संशोधित जरूर किया जा सकता है।

🔷 जाहिर है राज्य का नीति निदेशक तत्व बाध्यकारी नहीं है, लेकिन मूल अधिकार तो है और सुप्रीम कोर्ट ने मूल अधिकार को ही प्राथमिकता दी। पर जब सब कुछ मूल अधिकार ही है तो फिर राज्य के नीति निदेशक तत्व की फिर जरूरत ही क्या है?

उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जो कि एक समाजवादी विचारधारा के नेता थे, समझ गए कि अगर समाज के वंचित तबके को मुख्य धारा में लाना है तो संविधान में संशोधन करके उसके कुछ प्रावधानों को हटाना ही पड़ेगा। क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया तो सुप्रीम कोर्ट हर बार टांग अड़ाएगा और समाज के वंचित हमेशा वंचित ही रह जाएँगे।

पहला संविधान संशोधन (First Amendment to the Constitution)

इस प्रकार जून 1951 में पंडित नेहरू ने संविधान का पहला संशोधन किया। संशोधन कुछ इस प्रकार था।

🔷 जमींदारी प्रथा को खत्म कर दी गयी और भूमि अधिग्रहण (land acquisition) को आसान बना दिया।
🔷 अनुच्छेद 31 (A) में ही ये लिखवा दिया गया कि भूमि सुधार (Land Reforms) से संबन्धित जितने भी कानून बनेंगे, उस सब पर अनुच्छेद 31 के प्रावधान काम नहीं करेगा। यानी कि इसके माध्यम से जमींदारों एवं अन्य से लोक हित में जमीन अधिग्रहण करना आसान कर दिया गया।

नोट– भूमि सुधार कानून के अंतर्गत जमींदारी प्रथा उन्मूलन, भूमि अधिग्रहण आदि आते हैं।

🔷 अनुच्छेद 15 में भी संशोधन करके ये लिखवा दिया कि अगर किसी वर्ग को आरक्षण दिया जाता है तो उसे अनुच्छेद 29(2) के हनन के नाम पर सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज नहीं किया जा सकेगा।

🔷🔷 सबसे खास और दिलचस्प बात ये कि अनुच्छेद 31 (B) के तहत एक नौवीं अनुसूची (Ninth schedule) बनाया गया और इसमें लिखवा दिया कि 9वीं अनुसूची में निर्दिष्ट अधिनियमों और विनियमों में से कोई भी और न ही इसके प्रावधानों में से कोई भी शून्य माना जाएगा, या कभी भी शून्य हो जाएगा।

यानी कि इसे आसान भाषा में कहें तो इसमें जो भी अधिनियम या प्रावधान डाले जाएँगे उसकी समीक्षा न्यायालय में नहीं हो सकती। उस समय 1951 में इसमें 13 विषय डाले गए। जो आज की तारीख में बढ़कर 284 हो चुका है।

भूमि कानून को चुनौती देने वाला पहला मामला कामेश्वर सिंह बनाम बिहार राज्य था, इस मामले में बिहार भूमि सुधार अधिनियम 1950 को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि मुआवजे देने के उद्देश्य से बनाए गए ज़मींदारों का वर्गीकरण भेदभावपूर्ण था। पटना उच्च न्यायालय ने कानून के इस भाग को अनुच्छेद 14 के उल्लंघन के रूप में रखा क्योंकि इसने भेदभावपूर्ण तरीके से मुआवजे के भुगतान के उद्देश्य से जमींदारों को वर्गीकृत किया।

इन न्यायिक घोषणाओं के परिणामस्वरूप, सरकार आशंकित हो गई कि संपूर्ण कृषि सुधार कार्यक्रम खतरे में पड़ जाएंगे। यह सुनिश्चित करने के लिए विधायिका ने वर्ष 1951 में इस कानून को नौवीं अनुसूची में डाल दिया।

🔷 इस प्रकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 31(बी) ने यह सुनिश्चित किया कि नौवीं अनुसूची के किसी भी कानून को अदालतों में चुनौती नहीं दी जा सकती है और सरकार भूमि और कृषि कानूनों में सुधार करके सामाजिक कार्यक्रम को तर्कसंगत बना सकती है। 

दूसरे शब्दों में, नौवीं अनुसूची के तहत कानून न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर हैं, भले ही वे संविधान के भाग III के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। यानी कि सुप्रीम कोर्ट नौवीं अनुसूची की समीक्षा (Judicial review of ninth schedule) नहीं कर सकता है।

अनुच्छेद 31(बी) की अन्य विशेषता यह है कि यह प्रकृति में पूर्वव्यापी (Retrospective) है जब किसी न्यायालय द्वारा किसी अधिनियम को असंवैधानिक घोषित किया जाता है और बाद में इसे नौवीं अनुसूची में शामिल किया जाता है, तो यह माना जाता है कि इसके प्रारंभ होने के समय से ही ये संवैधानिक है।

अनुच्छेद 31 (बी) और नौवीं अनुसूची (Ninth schedule) के लिए तर्क संपत्ति के अधिकारों से संबंधित कानून की रक्षा करना था और किसी अन्य प्रकार का कानून नहीं। लेकिन, व्यवहार में, अनुच्छेद 31-बी का उपयोग इसके अलावा भी अन्य उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है।

जब तक सुप्रीम कोर्ट ने शंकर प्रसाद और सज्जन सिंह मामले का फैसला किया, तब तक सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण विधान के अनुरूप और समान था। सुप्रीम कोर्ट ने देखा कि नौंवी अनुसूची के कारण विधायिका की बढ़ी हुई शक्ति से कोई खतरा नहीं था उल्टे ये गरीबी को कम करने और ग्रामीण इलाकों में भूमि जोतों के समान वितरण के लिए जरूरी था।

गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि यदि संविधान के भाग III द्वारा गारंटीकृत एक मौलिक अधिकार को छीन लिया गया या ले लिया गया, तो संशोधित अधिनियम स्वयं ही शून्य हो जाएगा, दूसरे शब्दों में, संसद के पास संविधान के भाग III के तहत निहित मौलिक अधिकारों में संशोधन या दूर करने की कोई शक्ति नहीं है। 

इसके बाद केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि संविधान के सभी प्रावधानों में संशोधन किया जा सकता है, लेकिन संविधान के मौलिक अधिकारों / बुनियादी ढांचे को प्रभावित करने वाले प्रावधान में संशोधन नहीं किया जा सकता है; और यदि कोई संवैधानिक संशोधन, जो संविधान के मूल ढांचे को बदल देता है, तो न्यायालय द्वारा उस अधिनियम को शून्य किया जा सकता है।

वामन राव बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले

वामन राव बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले (1981) में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि (1) ऐसे किसी भी कानून या प्रावधान को नौवीं अनुसूची में नहीं डाला जा सकता है जो संविधान के मूल ढाँचे और मूल अधिकारों का उल्लंघन कर रहा हो,
(2) 24 अप्रैल 1973 यानी कि केशवानन्द भारती मामले से पहले संविधान में जो संशोधन किया गया था, और जिसके द्वारा संविधान की नौवीं अनुसूची में समय-समय पर विभिन्न अधिनियमों एवं प्रावधानों को डाला गया है वे मान्य और संवैधानिक हैं। 

लेकिन 24 अप्रैल, 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में डाले गए अधिनियमों या प्रावधानों की उच्चतम न्यायालय द्वारा न्यायिक समीक्षा की जा सकती है अगर उस अधिनियम से संविधान के मूल ढांचे को नुकसान पहुँच रहा हो।

पहला संशोधन (1951), चौथा संशोधन (1955), सातवाँ संशोधन (1964) और उनतीसवाँ संशोधन (1972) को 24 अप्रैल 1973 से पहले नौवीं अनुसूची में डाला गया था।

34वां संशोधन (1974), 39वां संशोधन (1975), 40वां संशोधन (1976), 47वां संशोधन (1984), 66वां संशोधन (1990), 76वां संशोधन (1994), 78वां संशोधन (1995) को 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में डाला गया है।

IR Coelho बनाम तमिलनाडु राज्य

IR Coelho बनाम तमिलनाडु राज्य मामले में 11 जनवरी 2007 को सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि 24 अप्रैल 1973 को या उसके बाद संविधान में किए गए सभी संशोधन, जिनमें विभिन्न कानूनों को शामिल करके नौवीं अनुसूची में संशोधन किया जाना है, का परीक्षण होगा।

यदि संविधान के भाग III में किसी भी अधिकार का उल्लंघन करने वाला कानून 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में शामिल किया गया है, तो ऐसा उल्लंघन उस आधार पर चुनौती देने के लिए खुला होगा, जो मूल अधिकार या संविधान के मूल ढाँचे को नष्ट या क्षतिग्रस्त कर देता है

कुल मिलाकर IR Coelho मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद, अब यह अच्छी तरह से सुलझा हुआ सिद्धांत है कि 23 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची के तहत रखा गया कोई भी कानून कोर्ट के जांच के अधीन है यदि उसने मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया है या संविधान के मूल ढाँचे को क्षति पहुंचाया है।

🔴 अगर नवीं अनुसूची के किसी कानून की वैधता को इस न्यायालय ने सही ठहराया है तो इस निर्णय द्वारा घोषित सिद्धांत पर बने ऐसे कानून को पुनः चुनौती नहीं दी जा सकती। तथापि न्यायालय द्वारा अगर किसी कानून को भाग 3 के आधार पर का उल्लंघनकारी ठहराया गया हो और उस कानून को 24 अप्रैल 1973 के बाद नवीं अनुसूची मे शामिल कर लिया गया हो तो ऐसा उल्लंघन चुनौती देने के योग्य होगा, इस आधार पर कि यह संविधान की मूल संरचना और मूल अधिकार को क्षति पहुंचाता है।

तो कुल मिलाकर हमारे संस्थापक पूर्वजों ने, बुद्धिमानीपूर्वक स्वयं संविधान में ही न्यायिक समीक्षा का प्रावधान सम्मिलित कर दिया जिससे कि संघवाद का संतुलन कायम रहे, नागरिकों को दिये मौलिक अधिकार एवं मूल स्वतंत्रता की रक्षा हो सके और समता, स्वाधीनता और आजादी की उपलब्धता उपलब्धि तथा आनंद हासिल करने का एक स्वस्थ राष्ट्रवाद का सृजन करने में सफल हो सके।

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Article Based On,
एम लक्ष्मीकान्त – भारत की राजव्यवस्था↗️
मूल संविधान भाग 3↗️ भाग 4↗️
मूल अधिकारों एवं निदेशक तत्वों में टकराव
I.R. Coelho (Dead) By Lrs vs State Of Tamil Nadu & Ors on 11
Waman Rao And Ors vs Union Of India (Uoi) And Ors. on 13 आदि।

डाउनलोड- Judicial review of ninth schedule

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