मूलअधिकार के अन्य उपबंध अनुच्छेद 33, अनुच्छेद 34 और अनुच्छेद 35

इस लेख में हम बचे हुए मूलअधिकार के अन्य उपबंध जैसे कि अनुच्छेद 33, अनुच्छेद 34 और अनुच्छेद 35 की चर्चा करेंगे।

मूलअधिकार के अन्य उपबंध

मूलअधिकार के अन्य उपबंध
(Other provisions of Fundamental Rights)

हालांकि मुख्य रूप से मूल अधिकार सिर्फ अनुच्छेद 14 से लेकर अनुच्छेद 32 तक ही है। अनुच्छेद 33, 34 और 35 के तहत इसके कुछ अन्य प्रावधानों की चर्चा की गयी है।

अनुच्छेद 33

हम पहले भी देख चुके है कि हर मूल अधिकारों में कुछ न कुछ अपवाद जरूर है। अनुच्छेद 33 को मैं इस सब में सब से बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण अपवाद मानता हूँ।

🔷 राज्य के कुछ क्षेत्र ऐसे होते हैं जहां हम मूल अधिकारों को लागू नहीं कर सकते हैं, जैसे कि सेना।

अगर वहाँ भी मूल अधिकार यथावत लागू कर दिया जाएगा तो फिर काहे का सेना; वो तो एक झुंड बन कर रह जाएगा जहां सब अपने-अपने अधिकारों के लिए लड़ने लगेगा।

कोई ये भी कह सकता है कि हम देश के लिए क्यों मरे जबकि हमें अनुच्छेद 21 के तहत जीने का अधिकार प्राप्त है।

सोचिए कि ऐसी स्थिति में देश की सुरक्षा का क्या होगा। ऐसी स्थिति उत्पन्न न हो इसी को ध्यान में रखकर अनुच्छेद 33 का प्रावधान किया गया।

अनुच्छेद 33 संसद को यह अधिकार देता है कि वह सशस्त्र बलों (Armed forces), अर्ध-सैनिक बलों (Paramilitary forces), पुलिस बलों (Police forces), खुफिया एजेंसी (intelligence Agency) एवं अन्य के मूल अधिकार पर युक्तियुक्त प्रतिबंध (Reasonable Restriction) लगा सकें।

ताकि उसके समुचित कार्य के बीच अनुशासन बनाए रखा जा सकें। कुल मिलाकर अनुच्छेद 33 यही है।

अनुच्छेद 34

ये अनुच्छेद मार्शल लॉ लगने जैसी असामान्य परिस्थिति में मूल अधिकारों पर प्रतिबंध की बात करता है।

दूसरे शब्दों में, जब भी भारत में कहीं भी मार्शल लॉ लागू होगा वहाँ अनुच्छेद 34 के तहत मूल अधिकारों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

मार्शल लॉ का सीधा सा मतलब होता है सामान्य प्रशासन को सेना द्वारा अपने नियंत्रण में ले लेना। ऐसा होते ही वहाँ साधारण कानून पूरी तरह से समाप्त हो जाता है।

यह अनुच्छेद संसद को इस बात की शक्ति देता है कि मार्शल लॉ या सैनिक शासन वाले क्षेत्रों में सेना को दंड देने की शक्ति भी दे सकता है। उम्मीद कीजिये कि भारत को ये दिन कभी देखना न पड़े।

वैसे अगर आप मार्शल लॉ और राष्ट्रीय आपातकाल में अंतर जानना चाहते हैं तो यहाँ क्लिक कीजिये।

अनुच्छेद 35

अनुच्छेद 35 केवल संसद को कुछ विशेष मूल अधिकारों को प्रभावी बनाने के लिए कानून बनाने कि शक्ति प्रदान करता है।

हमने इससे पहले भी इसके बारे में बात की है कि किस तरह कभी-कभी सिर्फ मूल अधिकारों से काम नहीं बनता है तब संसद को उस मूल अधिकार को प्रभावी बनाने के लिए अलग से कानून बनाना पड़ता है।

जैसे कि अनुच्छेद 23 मानव दुर्व्यापार और बलात श्रम का निषेध करता है। पर सच तो ये है कि आज भी मानव व्यापार होता है और बंधुआ मजदूरी करने को बहुत से लोग आज भी विवश हैं।

इसका मतलब तो यही हुआ कि ये मूल अधिकार होने के बावजूद भी खत्म नहीं हुआ। लोग इस को गंभीरतापूर्वक ले और इस का पालन करें इसीलिए इसके सपोर्ट में कुछ कानून बनाए गए।

जैसे कि – बंधुआ मजदूरी व्यवस्था निरसन अधिनियम 1976, समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 आदि।

यह अधिकार राज्य विधानमंडल को नहीं प्राप्त है। कुल मिलाकर देखें तो यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि भारत में मूल अधिकारों का क्रियान्वयन उचित प्रकार से होता रहे।

इस दिशा में अनुच्छेद 35 निम्नलिखित व्यवस्था करता है। संसद को निम्नलिखित मामलों में अनुच्छेद 35 के तहत कानून बनाने का अधिकार होगा।

अनुच्छेद 16, अनुच्छेद 17, अनुच्छेद 23, अनुच्छेद 24, अनुच्छेद 32, अनुच्छेद 33, अनुच्छेद 34 ।

जैसे कि अगर संसद चाहे तो अनुच्छेद 32 के तहत अन्य न्यायालयों को भी रिट जारी करने का अधिकार दे सकता है।

संसद के पास मूल अधिकारों के मामलों में दंडित करने का अधिकार है जैसे 17 और 23 के मामलों मे कई अधिनियम बनाए गए है।

इसी अनुच्छेद 35 में एक अन्य प्रावधान जोड़कर अनुच्छेद 35A बना दिया गया था जो कि जम्मू-कश्मीर राज्य को अपने नागरिक चुनने का अधिकार देता था। जिसे कि 5 अगस्त 2019 को खत्म कर दिया गया। याद ही होगा!

ये थे मूलअधिकार के अन्य उपबंध

…🔷🔷🔷…

Related Articles⬇️

विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया
fundamental duties

Follow me on….⬇️

अन्य बेहतरीन लेख⬇️

शिक्षा
प्रशासन और प्रबंधन में अंतर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *