नागरिकता क्या है? । नागरिकता अधिनियम 1955 और विदेशी भारतीय नागरिकता

इस लेख में हम नागरिकता (Citizenship) पर सहज और सरल भाषा में चर्चा करेंगे।
नागरिकता क्या है

Citizenship and it’s provisions

इसमें कुल 7 अनुच्छेद आते है अनुच्छेद 5 से 11 तक। इससे पहले के अनुच्छेदों पर पहले ही चर्चा की जा चुकी है, अगर आपने अभी तक उसे नहीं पढ़ा तो पहले उसे जरूर पढ़ लीजिये।

नागरिकता क्या है?
(What is citizenship?)

🧿 समान्यतः किसी भी देश में दो तरह के लोग हो सकते हैं, देशी और विदेशी। देशी को उस देश का नागरिक कहा जाता है और विदेशी को तो विदेशी ही कहा जाता है।

अन्य आधुनिक देशों की तरह भारत में भी दो तरह के लोग हैं, नागरिक और विदेशी। नागरिक देश के पूर्ण सदस्य होते हैं और देश के संविधान के प्रति उसकी निष्ठा अटल होती है।

नागरिक को देश के सभी सिविल और राजनैतिक अधिकार प्राप्त होते हैं। यहीं अधिकार जब किसी को नहीं मिलता है तो उसे विदेशी कहते हैं।

🧿 भारत में एकल नागरिकता की व्यवस्था है। यानी कि आप देश के किसी भी भाग से क्यों न हो, आप बस भारत के ही नागरिक होंगे। उस क्षेत्र विशेष के नहीं।

नागरिकता के संवैधानिक उपबंध
(Constitutional provisions of citizenship)

संविधान के भाग 2 में अनुच्छेद 5 से 11 तक नागरिकता के बारे में चर्चा की गयी है। हालांकि एक बात याद रखना चाहिए कि

इन अनुच्छेदों में उन्ही लोगों के नागरिकता की चर्चा की गयी है जो आजादी के समय देश के नागरिक बन चुके थे या फिर बनने वाले थे ।

लेकिन नागरिकता एक ऐसा विषय है जिसकी जरूरत तो आये दिन पड़ती ही रहती है। इसीलिए सरकारों ने अपने समय के मांग के अनुरूप नागरिकता अधिनियम लाये।

और ऐसा ही एक अधिनियम है नागरिकता अधिनियम, जो कि सर्वप्रथम 1955 में आया था। उसके बाद तो इसे अब तक 9 बार संशोधित किया जा चुका है।

हाल ही में 2019 में इसमें संशोधन किया गया था, जिसके बारे में इतना बवाल हुआ इसके बारे में जानते ही होंगे।

इस संशोधनों की चर्चा आगे करेंगे पहले जान लेते हैं कि अनुच्छेद 5 से 11 तक क्या कहा गया है।

अनुच्छेद 5 

ये कहता है कि कोई भी भारतीय मूल के व्यक्ति नागरिक तभी है जब वे निम्न 3 में से कोई एक शर्त पूरा करता हो।

🧿 उसका जन्म भारत में होना चाहिए।
🧿 उसके माता-पिता में से किसी एक का जन्म भारत में होना चाहिए
🧿 संविधान लागू होने के 5 वर्ष पूर्व से वो भारत में रह रहा हो।  

अनुच्छेद 6

अनुच्छेद 6 कहता है कि अगर कोई व्यक्ति जो पाकिस्तान से भारत आया हो और उसके माता-पिता या दादा-दादी अविभाजित भारत में पैदा हुए हों तो वह भारत का नागरिक बन सकता है।

यदि वह 19 जुलाई 1948 से पूर्व स्थानांतरित हुआ हो, पर उसे कम से कम 6 महीने तक भारत में निवास करना आवश्यक है।

अनुच्छेद 7

अनुच्छेद 7 कहता है कि एक व्यक्ति जो 1 मार्च 1947 के बाद भारत से पाकिस्तान चला गया हो, लेकिन बाद में फिर भारत में पुनर्वास के लिए लौट आये तो

उसे भारत की नागरिकता मिल सकती है लेकिन उसे प्रार्थना पत्र भारत सरकार को देना होगा और 6 माह तक भारत में निवास करना होगा।

अनुच्छेद 8 

ये उन लोगों के लिए है जिसके माता-पिता या दादा-दादी अविभाजित भारत में पैदा हुए हों लेकिन वह भारत के बाहर कहीं भी रह रहे हों. फिर भी वह भारत का नागरिक बन सकता है.

लेकिन उसे नागरिकता के लिए पंजीकरण का आवेदन कूटनीतिक तरीके से करना होता है।  कुल मिलाकर देखें तो ऊपर के ये चार अनुच्छेद नागरिकता देने की बात करता है।

इसे याद कैसे रखें

इसे याद रखना बहुत ही आसान है। बस आप इस पैटर्न को याद रखिए।

⬛ इन चारों में इसका पहला अनुच्छेद यानी कि अनुच्छेद 5 भारत के मूल निवासी के लिए है। ⬛ दूसरा यानी कि अनुच्छेद 6 पाकिस्तान से भारत आये लोगों के लिए है।

⬛ तीसरा यानी कि अनुच्छेद 7 भारत से पाकिस्तान और फिर भारत आने वाले लोगों के लिए है। ⬛ और चौथा यानी कि अनुच्छेद 8 भारतीय मूल के विदेशी लोगों के लिए है।   

इतना याद हो गया हो तो अब आगे बढ़ते हैं और आगे के अनुच्छेदों पर नज़र डालते हैं।

अनुच्छेद 9

अनुच्छेद 9 कहता है कि – वह व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं माना जाएगा जो स्वेच्छा से किसी और देश का नागरिकता ग्रहण कर लेता हो। 

अनुच्छेद 10

अनुच्छेद 10 कहता है कि – उस प्रत्येक व्यक्ति को भारत का नागरिक माना जाएगा जिसे संसद द्वारा किसी विधान या कानून के अंतर्गत नागरिकता दी गयी है। 

अनुच्छेद 11  

अनुच्छेद 11 कहता है कि – संसद के पास यह अधिकार है कि नागरिकता अर्जन और समाप्ति या इसी से संबन्धित कोई भी नियम या विधि बना सकती है। 

अब आप समझ गए होंगे की नागरिकता संसोधन अधिनियम (CAA) किस अनुच्छेद के अंतर्गत बनाया गया है। 

तो अनुच्छेद 5 से 11 बस यही है। जाहिर है इसमें भविष्य को लेकर काफी कुछ स्पष्ट नहीं है, ये ज़्यादातर उसी समय के परिस्थितियों पर फोकस करता है। इसीलिए 1955 में नागरिकता अधिनियम लाया गया।

नागरिकता अधिनियम 1955
(Citizenship Act 1955)

नागरिकता अधिनियम 1955 भारत में नागरिकता अर्जन करने के पाँच तरीके बताता है।  

  1. 🧿 जन्म के आधार पर (By birth)
  2. 🧿 वंश के आधार पर (By descent)
  3. 🧿 पंजीकरण के द्वारा (By registration)
  4. 🧿 प्रकृतिक तौर पर और (Naturally)
  5. 🧿 क्षेत्र समाविष्ट के आधार पर (On the basis of area comprised)। 

इसे जानना बहुत जरूरी है, इसीलिए आइये एक-एक करके देखते है कि इनमें प्रावधान क्या-क्या है। 

1.जन्म के आधार पर नागरिकता

1 जुलाई 1947 से पूर्व भारत में जन्मा व्यक्ति भारत का नागरिक होगा। यदि उसके बाद भारत में जन्मा हो तो उसके माता-पिता में से किसी एक का भारत का नागरिक होना जरूरी है।

इसे इस तरह से समझ सकते है कि हम और आप तो 1 जुलाई 1947 से पहले नहीं जन्में है फिर भी भारत के नागरिक है क्योकि हमारे माता-पिता या हमारे पूर्वज यहीं पैदा हुए हैं।

2.वंशानुगत नागरिकता

कोई व्यक्ति जिसका जन्म 26 जनवरी 1950 को या उसके बाद पर 10 दिसम्बर 1992 से पहले भारत के बाहर हुआ हो तो वो वंश के आधार पर भारत का नागरिक बन सकता है। 

अगर 10 दिसम्बर 1992 के बाद पर 3 दिसम्बर 2004 से पहले उसका जन्म बाहर हुआ हो भी वह भारत का नागरिक बन सकता है लेकिन उस समय उसके माता-पिता में से किसी एक का भारत का नागरिक होना जरूरी है।

उसके बाद भी नागरिकता मिलती है लेकिन बच्चे के जन्म होने के 1 साल के भीतर भारतीय कॉन्सुलेट में इसके लिए पंजीकरण कराना अनिवार्य है। 

3.पंजीकरण द्वारा नागरिकता

केंद्र सरकार किसी भी व्यक्ति को भारतीय नागरिक के रूप में पंजीकृत कर सकती है बशर्ते कि वह अवैध प्रवासी न हो। हाँ पर उसे भारत के नागरिक के रूप में निष्ठा की शपथ लेनी पड़ती है। 

4.प्राकृतिक रूप से नागरिकता

भारत सरकार आवेदन प्राप्त होने पर किसी को प्रकृतिक तौर पर नागरिकता प्रदान कर सकती है बशर्ते कि वह अवैध प्रवासी न हो । इसमें कुछ और प्रावधान है। जैसे कि – 

यदि कोई व्यक्ति 14 वर्षों से भारत में रह रहा हो, उसे किसी भी भारतीय भाषा का ज्ञान हो, उसका चरित्र अच्छा हो तथा ऐसे देश से संबन्धित हो जहां पर भारतीय लोगों को भी प्राकृतिक तौर पर नागरिकता देने का प्रावधान हो।

हालांकि भारत सरकार चाहें तो इसमें से किसी क्राइटेरिया में छुट भी दे सकती है लेकिन उन्हे भारत के प्रति निष्ठा की शपथ लेनी पड़ती है। 

अब आप खुद ही सोचिये कि इसे प्राकृतिक क्यों कहा गया है, जाहिर है अगर कोई व्यक्ति 14 साल तक किसी देश में रहेगा तो एक तरह से तो वो उस देश का हिस्सा ही हो जाएगा,

तो फिर उसे नागरिकता दे देने में कोई बुराई नहीं है। जैसे कि अदनान सामी को दिया गया है।

5.क्षेत्र समाविष्ट के आधार पर नागरिकता

किसी भी विदेशी क्षेत्र का जब भारत के द्वारा अधिग्रहण किया जाता है तो उस क्षेत्र विशेष के अंदर रह रहें लोगों को भारत की नागरिकता दी जाती है।

जैसे कि जब पॉण्डिचेरी और गोवा को भारत में शामिल किया गया तो उसके लोगों को भारत की नागरिकता दी गयी। 

नागरिकता खोने के प्रावधान
(Provisions for losing citizenship)

उक्त अधिनियम में नागरिकता खोने के भी तीन कारण बताए गए हैं। 

1. स्वैच्छिक त्याग
(Voluntary renunciation)

जब भारत किसी युद्ध में व्यस्त हो, तो कोई भी व्यक्ति चाहे तो वह भारत के नागरिकता को त्याग कर सकता है और किसी और देश के नागरिकता को ग्रहण कर सकता है। 

2. बर्खास्तगी के द्वारा
(By dismissal)
 

यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेछा से किसी अन्य देश की नागरिकता ग्रहण कर ले तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वयं बर्खास्त हो जाएगी। ये तब होता है जब भारत किसी युद्ध में संलग्न नहीं रहता है। 

3. वंचित करने द्वारा
(By depriving) 

केंद्र सरकार द्वारा भारतीय नागरिक को आवश्यक रूप से बर्खास्त करना होगा यदि: 

नागरिकता फर्जी तरीके से प्राप्त की गयी हो ⚫ यदि नागरिक ने संविधान के प्रति अनादर जताई हो। ⚫ यदि नागरिक ने युद्ध के दौरान शत्रु के साथ गैर- कानूनी रूप से संबंध स्थापित किया हो या उसे कोई राष्ट्रविरोधी सूचना दी हो। 

⚫ पंजीकरण या प्रकृतिक नागरिकता के पाँच वर्ष के दौरान नागरिक को किसी देश में दो वर्ष की कैद हुई हो। ⚫ नागरिक सामान्य रूप से भारत के बाहर सात वर्षों से रह रह हों। इत्यादि-इत्यादि

विदेशी भारतीय नागरिकता
(Foreign Indian citizenship) 

नागरिकता अधिनियम में 2003 में संशोधन करके विदेशी भारतीय नागरिकता का प्रावधान किया गया । ये भारतीय मूल के व्यक्तियों के लिए (पाकिस्तान और बांग्लादेश को छोडकर)  दोहरी नागरिकता का प्रावधान करता है।

इसे PIO कार्ड स्कीम कहा गया यानी कि Person of indian origin कार्ड स्कीम। पुनः 2015 में नागरिकता अधिनियम में संसोधन करके भारतीय विदेशी नागरिकता कार्ड होल्डर यानी कि Overseas Citizen of India Cardholder के नाम से एक नई योजना शुरू की गयी और इसी में PIO कार्ड स्कीम को मिला दिया गया।  

अगर भारत सरकार किसी भारतीय मूल के व्यक्ति को overseas citizen of india cardholder प्रदान करती है तो उसे वे सभी अधिकार प्राप्त होंगी  जो केंद्र सरकार निर्देशित करेंगी।  

◼ लेकिन उसे भारतीय नागरिक जितना अधिकार नहीं मिलता है। ⚫ जैसे कि वह कभी भारत का राष्ट्रपति, ⚫ उपराष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश, ⚫ उच्च न्यायालय का न्यायाधीश  नहीं बन सकता।

⚫ उसे सार्वजनिक रोजगार के मामले में अवसर की संभावना का अधिकार नहीं होगा। ⚫ वह एक मतदाता के रोप मे पंजीकृत किए जाने का अधिकारी नहीं होगा। ⚫ वह जन प्रति निधि नहीं बन सकता है। इत्यादि-इत्यादि।

NRI और भारतीय मूल के व्यक्ति कौन होते हैं और उसके क्या-क्या अधिकार होते है। इस विषय पर एक अलग से लेख मौजूद है। अपने कन्फ़्युजन को दूर करने के लिए आप उसे एक बार जरूर पढ़ें। यहाँ क्लिक करें

🔆नागरिकता रिकॉल करें

हम इस लेख में जो भी पढ़ें है उसे याद करने का आसान तरीका है। उस पैटर्न को एक बार रिकॉल कर लेना –

🔷 पहले चार अधिनियमों में हमने नागरिकता लेने के बारे में पढ़ा और

🔷 उसके आगे बाँकी के तीन अधिनियमों में नागरिकता देने के अन्य तरीके और लेने के अन्य तरीके के बारे में पढ़ा। 

🔷 फिर हमने नागरिकता अधिनियम 1955 के तहत भारतीय नागरिकता अर्जन करने के पाँच तरीके के बारे में जाना।

🔷 फिर नागरिकता त्याग करने के तीन प्रावधानों के बारे में जाना।

🔷 और अंत में भारतीय मूल के विदेशियों के लिए दोहरी नागरिकता के बार में जाना।

तो था न ये कितना आसान। उम्मीद करते हैं आपको ये लेख अच्छा लगा होगा। 

नागरिकता – डाउनलोड करें

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