National emergency provisions (राष्ट्रीय आपातकालीन प्रावधान)

इस लेख में हम राष्ट्रीय आपातकाल (National emergency) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे। ये संविधान के उन प्रावधानों में से एक है जिसे लोग कभी भूलता नहीं है, वो क्यों ?

क्योंकि कब स्थिति सामान्य से असामान्य हो जाये; हम में से किसी को नहीं पता। इसीलिए इसके बारे में सबकी समझ अच्छी होनी ही चाहिए।

Emblem of India
By Ministry of Home Affairswww.mha.nic.in, National emergency

भारत के आपातकालीन प्रावधान
(Emergency provisions of India)

संविधान के भाग 18 में अनुच्छेद 352 से 360 तक आपातकालीन प्रावधान (Emergency provisions) उल्लिखित हैं।

विपरीत परिस्थितियों में संवैधानिक सर्वोच्चता को बरकरार रखने के लिए केंद्र इसे एक टूल की तरह इस्तेमाल करती है।

संविधान में ये प्रावधान रखा ही इसलिए गया है ताकि असामान्य स्थितियों में भी देश की संप्रभुता, एकता, अखंडता एवं लोकतांत्रिक राजनैतिक व्यवस्था को कायम रखा जा सकें।

असामान्य स्थितियों में ये प्रावधान केंद्र को बेशुमार ताकत प्रदान करते हैं। एक संघीय व्यवस्था वाला देश होने के बावजूद भी, सभी राज्य केंद्र के पूर्ण नियंत्रण में आ जाते हैं।

और अजीब बात ये है कि इसे लागू करने के लिए कोई संविधान संशोधन की जरूरत नहीं पड़ती, जैसे ही ये लागू होता है देश संघीय से एकात्मक में परिणत हो जाता है।

ऐसे प्रावधान संविधान में क्यों रखे गए हैं? क्या ये वाकई जरूरी है? इसका एक कारण तो ये है कि –

ऐसा इसीलिए किया गया है ताकि विपरीत परिस्थितियाँ आने पर देश के ढाँचे को जरूरत के हिसाब से ढाला जा सकें। क्योंकि हम सब जानते हैं ‘सब दिन होत न एक समाना’

अब सवाल आता है कि वो विपरीत परिस्थितियाँ है क्या? जिन परिस्थितियों का हवाला देखर इसे लगाया जाता है या लगाया जा सकता है।

संविधान में ऐसी तीन परिस्थितियों का जिक्र किया गया है। जिसके रहने पर आपातकाल लगाया जा सकता है। ये तीनों अलग-अलग अनुच्छेदों में वर्णित है। जैसे कि –

अनुच्छेद 352
इसके तहत युद्ध, बाह्य आक्रमण और सशस्त्र विद्रोह के दौरान आपातकाल लगाया जा सकता है। इस प्रकार के आपातकाल को राष्ट्रीय आपातकाल कहा जाता है।
अनुच्छेद 356
जब राज्यों में संवैधानिक तंत्र विफल हो जाये, तब भी आपातकाल लगाया जा सकता है। इस प्रकार के आपातकाल को राष्ट्रपति शासन कहा जाता है।
इसे राज्य आपातकाल और संवैधानिक आपातकाल भी कह दिया जाता है। हालांकि संविधान में सिर्फ ‘राष्ट्रपति शासन’ शब्द का जिक्र किया गया है।
अनुच्छेद 360
जब भारत की वित्तीय स्थायित्व अथवा साख खतरे में हो तो उस समय भी आपातकाल लगाया जा सकता है। इस प्रकार के आपातकाल को वित्तीय आपातकाल कहा जाता है।

वित्तीय आपातकाल आजतक देश में लगा ही नहीं इसीलिए उसके व्यावहारिक पहलुओं पर बहुत ही कम जानकारी उपलब्ध होती है।

राष्ट्रीय आपातकाल और राष्ट्रपति शासन बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि इन दोनों के व्यावहारिकता का हमें अंदाजा भी है। और इसके लगने की संभावना भी अपेक्षाकृत ज्यादा होती है।

राष्ट्रीय आपातकाल की छवि को ख़राब करने का श्रेय हमारे पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी को जाता है, वरना ये प्रावधान भी अन्य संवैधानिक प्रावधानों की तरह ही अच्छा था।

और राष्ट्रपति शासन की बात करें तो, इन तीनों में सबसे कॉमन यही है, क्योंकि सबसे ज्यादा बार यही लगा है। एक दो-राज्यों को छोड़कर सभी राज्यों में ये लग चुका है।

तो आइये राष्ट्रीय आपातकाल की चर्चा करते हैं। इसे लगाने के क्या प्रावधान है, इसे हटाने के क्या प्रावधान है, इसके प्रभाव तथा 1975 के आपातकाल ने इसमें क्या-क्या परिवर्तन किए हैं, इत्यादि।

राष्ट्रीय आपातकाल
(National emergency)

जैसा कि हमने ऊपर भी चर्चा किया है कि ये भी अन्य संवैधानिक प्रावधानों की तरह ही था। जब तक की इसका अनुचित इस्तेमाल नहीं किया गया। वो अनुचित इस्तेमाल श्रीमती गांधी ने किया। उन्होने जो भी किया उससे इसका स्वरूप पूरी तरह से बदल गया।

दरअसल 1971 के चुनाव में श्रीमती गांधी को 352 सीटें मिली और वे पूर्ण बहुमत के साथ सरकार में आयीं। चीजों को बदलने का नशा उनपर कुछ इस कदर छाया कि धीरे-धीरे वे तानाशाह होते चले गए। वे हर एक चीज़ को बदल देना चाहते थे, जो उनके हिसाब से ठीक नहीं था। और चूंकि उनके पास पूर्ण बहुमत था, इससे उनका काम और भी आसान हो जाता था।

यही कारण था कि जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उन्हे गलत तरीके से चुनाव जीतने का दोषी पाया और 6 साल तक के लिए उन्हे राजनीति से निलंबित कर दिया। तो वो ये बर्दास्त नहीं कर पायी। और अपनी सत्ता बचाने के लिए उन्होने राष्ट्रीय आपातकाल का सहारा लिया।

और उसके बाद जो-जो कानून आड़े आये, सब को उन्होने बदल दिया। उन्होने संविधान की मर्यादा को ताख पर रखकर उसमें अवांछित (Unwanted) बदलाव किए।

1976 का 42वां संविधान संशोधन उसी की परिणति है। इसके माध्यम से उन्होने संविधान में इतने बदलाव किए कि 42वां संविधान संशोधन को लघु संविधान (Mini constitution) कहा जाने लगा।

इतना बताने का मकसद बस इतना है कि 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान में उन्होने जितने भी असंवैधानिक बदलाव किए थे,

1978 में मोरार जी देशाई की सरकार ने, जो कि आपातकाल खत्म होने के बाद बनी थी। 44 वां संविधान संशोधन के माध्यम से सारे ऐसे असंवैधानिक प्रावधानों को खत्म कर दिये।

दूसरे शब्दों में कहें तो 42वां संविधान संशोधन के माध्यम से श्रीमती गांधी ने जो रायता फैलाया था, उसे श्रीमान मोरार जी देशाई ने साफ किया। ये कैसे किया, आपको आगे पता चलेगा।

इतना बताने के बाद मुझे लगता है कि अब आगे के लेख को आप आसानी से समझ जाएँगे। क्योंकि अभी राष्ट्रीय आपातकाल की जो वर्तमान स्थिति है,

वो 44वें संविधान संशोधन 1978 की ही देन है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि उसके बाद आजतक राष्ट्रीय आपातकाल लगा ही नहीं।

National emergency important video

वैसे अगर आप 1975 के आपातकाल के बेसिक्स को समझना चाहते हैं, जो कि आपको समझना ही चाहिए।

तो आप डॉ. विकास दिव्यकृति के इस विडियो को, इस लेख को पढ़ने के बाद फुरसत में जरूर देखें, आपको बहुत ही अच्छा फील होगा।

राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा
(Declaration of national emergency)

जैसा कि हमने ऊपर भी चर्चा किया है – जब पूरे देश अथवा इसके किसी भी भाग को युद्ध (War), बाह्य आक्रमण (External attack) अथवा सशस्त्र विद्रोह (Armed revolt) के कारण खतरा उत्पन्न हो जाये तो राष्ट्रपति अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की घोषणा कर सकता है।

ऐसा नहीं है कि जब खतरा आ जाये तब ही राष्ट्रपति आपातकाल की घोषणा कर सकता है। अगर ख़तरा आने की गुंजाइश भी हो तब भी इसे लगाया जा सकता है।

लेकिन राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा मंत्रिपरिषद की लिखित सिफ़ारिश पर ही कर सकता है। अगर अकेले प्रधानमंत्री चाहे या फिर राष्ट्रपति तो वे अपने मन से ऐसा नहीं कर सकते हैं।

ये व्यवस्था 1978 में 44वें संविधान संशोधन के द्वारा लाया गया था। ऐसा इसलिए लाया गया क्योंकि 1975 में इन्दिरा गांधी बिना अपने मंत्रिमंडल से पूछे ही राष्ट्रपति को आपातकाल लगाने के लिए कह दी थी।

जबकि एक राष्ट्रीय आपातकाल (National emergency) उससे पहले से ही चल रही थी जिसे खत्म नहीं किया गया था। वो कैसे?

◾️ पहला आपातकाल 26 अक्तूबर 1962 में भारत-चीन युद्ध के समय लगाया गया था। जिसे कि 10 जनवरी 1968 में खत्म कर दिया गया।

◾️ दूसरा आपातकाल 3 दिसम्बर 1971 में भारत पाकिस्तान युद्ध के समय लगाया गया था, जिसे कि खुद श्रीमती गांधी ने ही लगाया था। वो चल ही रहा था,

◾️ ऊपर से उन्होने एक और नया आपातकाल 25 जून 1975 को देश पर थोप दिया। और इन दोनों आपातकालों को 21 मार्च 1977 में खत्म किया गया।

यहाँ पर एक बात याद रखने वाली है कि 1962 और 1971 में जो आपातकाल लगाया गया था, वो बाह्य आक्रमण (External attack) के आधार पर लगाया गया था।

वही 1975 में जो आपातकाल लगाया गया था, वो आंतरिक अशांति (Internal Disturbance) के आधार पर लगाया गया था। और यही विवाद का कारण बन गया।

ये जो आंतरिक अशांति का प्रावधान था ये अपने आप में विवादास्पद था। क्योंकि आंतरिक अशांति तो कुछ भी हो सकता था।

अगर देश में प्रदर्शन भी हो तो उसे आंतरिक अशांति कहा जा सकता है। और श्रीमती गांधी ने यही तो सफाई दी थी।

क्योंकि इन्दिरा गांधी के खिलाफ उस समय देश में खूब प्रदर्शन चल रहे थे। जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति को कौन भूल सकता है।

भविष्य में फिर से कोई सरकार आंतरिक अशांति के आधार पर आपातकाल न लगा दे, इसी को ध्यान में रखकर 44वें संविधान संशोधन 1978 में इस को बदलकर सशस्त्र विद्रोह (Armed revolt) कर दिया गया।

यानी कि अब युद्ध और बाह्य आक्रमण को छोड़कर देश में तभी आपातकाल लगाया जा सकता है जब हथियार के दम पर लोग विद्रोह कर दें।

National emergency Facts

जब युद्ध और बाह्य आक्रमण के आधार पर आपातकाल लगाया जाता है तो उसे बाह्य आपातकाल कहा जाता है,

और जब आपातकाल सशस्त्र विद्रोह के आधार पर लगाया जाता है तो उसे आंतरिक आपातकाल कहा जाता है।

यहाँ पर एक बात और याद रखिए कि 38वें संविधान संशोधन 1975 द्वारा इन्दिरा गांधी ने सभी प्रकार के आपातकाल को न्यायिक समीक्षा की परिधि से बाहर रखा था।

यानी कि आपातकाल को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती थी। पर जाहिर है इस प्रावधान को खत्म तो होना ही था। क्योंकि ये संविधान सम्मत नहीं था।

इसीलिए 44वें संविधान संशोधन 1978 द्वारा इस प्रावधान को भी खत्म किया गया। अब आपातकाल को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

और न्यायालय उसकी समीक्षा भी कर सकता है कि सही आधार पर लगाया गया है कि नहीं।

संसदीय अनुमोदन तथा समयावधि
(Parliamentary approval and time period)

आपातकाल के घोषणा के बाद चीज़ें खत्म नहीं हो जाती, बल्कि उसके बाद भी उस उद्घोषणा को कई प्रकार के संवैधानिक प्रावधानों से गुजरना पड़ता है।

आपातकाल की उद्घोषणा जारी होने के एक माह के भीतर संसद के दोनों सदनों से इसका अनुमोदित (Approved) होना जरूरी है।

पहले ये समय दो माह हुआ करता था, पर इसे भी 1978 में 44वें संविधान संशोधन द्वारा 1 माह किया गया।

क्यों कर दिया गया? ताकि अगर वो अनुचित तरीके से लगाया गया हो तो 1 महीने के अंदर ही खत्म हो जाये।

पर मान लीजिये अगर आपातकाल उस समय लागू हुआ हो जब लोकसभा का विघटन (Dissolution) हो गया हो। या फिर लोकसभा तो हो लेकिन 1 महीने के अंदर अनुमोदन से पहले ही विघटित हो गया हो।

ऐसी स्थिति में पुनः जैसे ही लोकसभा का गठन होगा। उसकी पहली बैठक से तीस दिनों के भीतर पास करवाना जरूरी है। नहीं तो वो खत्म हो जाएगा।

हाँ, लेकिन इसमें एक कंडिशन ये है कि उससे पहले राज्य सभा से वो पास रहना चाहिए। क्योंकि राज्यसभा भंग नहीं होता है।

इस प्रकार यदि दोनों सदनों से वो पास हो जाये तो आपातकाल छह माह तक जारी रह सकता है।

हर छह महीने के बाद इसे जितना मर्जी उतना बार बढ़ाया जा सकता है लेकिन हर छह माह में फिर से उसी प्रक्रिया से गुजरना होगा। यानि कि दोनों सदनों से मंजूरी लेना।

पहले बस एक बार संसद से अनुमोदन (Approval) लेना पड़ता था फिर जितना चाहे उसे उतनी बार बढ़ाया जा सकता था।

पर इन्दिरा गांधी ने जिस प्रकार इस कानून का दुरुपयोग किया, कोई और न करे इसी को ध्यान में रखकर 1978 में 44वें संविधान संशोधन द्वारा इसे संशोधित करके आवधिक विस्तार (Periodic expansion) वाला व्यवस्था लाया गया।

यानी कि हर छह महीने में फिर से संसद से अनुमोदन लेना पड़ेगा। पर अगर कभी ऐसी स्थिति बन जाये कि आपातकाल को छह माह तक और एक्सटैंड करना हो पर उस समय लोकसभा भंग हो।

ऐसी स्थिति में भी राज्यसभा से पहले अनुमोदन लेकर रखना पड़ता है। और जैसे ही पुनः लोकसभा का गठन होता है उसकी पहली बैठक से 30 दिनों से भीतर उसको लोकसभा से अनुमोदन करवाना पड़ता है।

आपातकाल की उद्घोषणा अथवा इसके जारी रहने का प्रत्येक प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत (Special majority) से पारित होना चाहिए। अगर विशेष बहुमत नहीं जानते हैं तो उसे यहाँ क्लिक करके पढ़ लें।

राष्ट्रीय आपातकाल के उद्घोषणा की समाप्ति
(End of proclamation of National Emergency)

अब अगर लगाया गया है तो वो हमेशा के लिए तो रहेगा नहीं, इसीलिए राष्ट्रीय आपातकाल (National emergency) को निम्नलिखित तरीकों से समाप्त किया जा सकता है।

पहला
राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल की उद्घोषणा को किसी भी समय एक दूसरी उद्घोषणा से समाप्त की जा सकती है।
मतलब ये कि खत्म करने के लिए संसद के अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होती है। राष्ट्रपति इसे अपने ऑर्डर से खत्म कर सकती है।
दूसरा
अगर संसद, आपातकाल को अनुमोदन (Approval) न दें तो राष्ट्रपति को उसे खत्म करना पड़ता है। ये व्यवस्था भी पहले नहीं थी।
पहले तो राष्ट्रपति के विवेक पर निर्भर करता था कि वो जब चाहे समाप्त कर सकता था। इसे 1978 के 44वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया।
तीसरा
इसके अलावा 1978 के 44वें संविधान संशोधन से यह भी व्यवस्था की गयी कि अगर लोकसभा के कुल सदस्य का 1/10 सदस्य स्पीकर को (यदि सदन चल रहा हो तो और अगर नहीं चल रहा हो तो राष्ट्रपति को) लिखित नोटिस दे तो 14 दिन के अंदर आपातकाल को खत्म करने के लिए सदन की विशेष बैठक बुलायी जा सकती है।
उस बैठक में उसे लोकसभा से पारित करवाना पड़ता है। पारित होते ही आपातकाल खत्म।

इस प्रकार आप देख सकते हैं कि 1978 के बाद आपातकाल लगाना थोड़ा मुश्किल हो गया है वही अगर किसी तरह इसे लगा दिया गया तो उसे खत्म करना आसान कर दिया गया है।

राष्ट्रीय आपातकाल का प्रभाव
(Effect of national emergency)

आपातकाल की उद्घोषणा के राजनीतिक तंत्र पर तीव्र तथा दूरगामी प्रभाव होते हैं। इन परिणामों को निम्न तीन वर्गों में रखा जा सकता है:

◼️ 1. केंद्र-राज्य सम्बन्धों पर प्रभाव
◼️ 2. लोकसभा तथा राज्य विधानसभा के कार्यकाल पर प्रभाव
◼️ 3. मौलिक अधिकारों पर प्रभाव।

आइये एक-एक करके इसके प्रभावों का आकलन करते हैं।

केंद्र-राज्य सम्बन्धों पर प्रभाव
(Impact on Center-State Relations)

हमें केंद्र-राज्य संबंध में भी इसका जिक्र किया था कि किस प्रकार आपातकाल के दौरान केंद्र-राज्य संबंध बदल जाते हैं।

कुछ जरूरी बातों का यहाँ जिक्र कर रहा हूँ। कांसेप्ट क्लेयरेंस के लिए केंद्र-राज्य संबंध जरूर पढ़ें

केंद्र-राज्य संबंध के तीनों क्षेत्रों पर इसका प्रभाव पड़ता है। यानी कि कार्यपालक संबंध, विधायी संबंध और वित्तीय संबंध।

कार्यपालक संबंध
(Executive relations)

सामान्य स्थिति में केंद्र कुछ ही विषय पर राज्य को कार्यकारी निर्देश दे सकता है। पर आपातकालीन स्थिति में राज्य पूरी तरह केंद्र के नियंत्रण में आ जाता है। और केंद्र को किसी भी प्रकार के कार्यकारी निर्देश देने कि शक्ति प्राप्त हो जाती है।

विधायी संबंध
(Legislative relations)

राष्ट्रीय आपातकाल के समय संसद को राज्य सूची में वर्णित विषयों पर कानून बनाने का अधिकार प्राप्त हो जाता है।

इसका ये मतलब नहीं है कि राज्य के विधायिका (Legislature) के विधायी शक्तियों को निलंबित किया जा सकता है।

बस केंद्र कानून बना सकता है और इस समय केंद्र जो भी कानून बनाता है वो आपातकाल खत्म होने के छह महीने तक प्रभावी रहता है।

इसके अलावा राष्ट्रपति इस अवधि में राज्य सूची के विषय पर अध्यादेश भी जारी कर सकता है।

वित्तीय संबंध
(Financial relations)

राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान राष्ट्रपति केंद्र से राज्यों को दिये जाने वाले धन (वित) को कम अथवा समाप्त कर सकता है।

ऐसे संशोधन केवल उस वित वर्ष तक ही लागू रहता है जिस वित वर्ष में आपातकाल लगाया गया है। और राष्ट्रपति के किसी भी आदेश को संसद के पटल पर रखा जाना आवश्यक होता है।

लोकसभा तथा राज्य विधानसभा के कार्यकाल पर प्रभाव
(Impact on tenure of Lok Sabha and State Legislative)

राष्ट्रीय आपातकाल (National emergency) के दौरान लोकसभा के कार्यकाल को, जो कि सामान्य दिनों में 5 वर्ष का होता है।

उसे विधि बनाकर जितने समय तक चाहे उतने समय तक बढ़ाया जा सकता है। लेकिन इसे एक बार में बस एक वर्ष के लिए ही बढ़ाया जा सकता है।

और आपातकाल खत्म होते ही छह माह के भीतर चुनाव कराना आवश्यक होता है। इन्दिरा गांधी ने भी इस प्रावधान के तहत अपने कार्यकाल को बढ़ाया था।

इसी प्रकार राज्य विधानसभा (State assembly) को भी कितने भी समय तक के लिए बढ़ाया जा सकता है। पर आपातकाल खत्म होते ही छह माह के भीतर चुनाव कराना पड़ता है।

राष्ट्रीय आपातकाल का मूल अधिकारों पर प्रभाव
(Impact of National Emergency on Fundamental Rights)

मूल अधिकारों के निलंबन से संबन्धित प्रावधानों का जिक्र अनुच्छेद 358 और अनुच्छेद 359 में किया गया है।

अनुच्छेद 358 के अनुसार

राष्ट्रीय आपातकाल (National emergency) जैसे ही घोषित होता है। उसके साथ ही अनुच्छेद 19 द्वारा जो स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है वो स्वतः निलंबित हो जाता है। इसके लिए कोई अगल से आदेश की जरूरत नहीं पड़ती है।

दूसरे शब्दों में कहें तो अनुच्छेद 19 के तहत जो छह स्वतंत्रता मिलती है, वो आपातकाल के लागू रहने तक छीन ली जाती है।

आपातकाल खत्म होते ही अनुच्छेद 19 पुनः जीवित हो जाती है। पर इससे जो जनता को नुकसान होगा उसके भरपाई की कोई व्यवस्था नहीं है।

और दूसरी बात ये कि इसे सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती नहीं दी जा सकती है। इसका ये मतलब कतई नहीं है कि आपातकाल को चुनौती नहीं दी जा सकती है।

बस अनुच्छेद 19 के निलंबन से आपके मूल अधिकारों का जो हनन होता है, उसको चुनौती नहीं दी जा सकती ।

इससे संबन्धित 1978 के 44वें संविधान संशोधन द्वारा दो व्यवस्थाएं दी गयी है, पहला कि केवल ‘बाह्य आपातकाल’ के दौरान ही अनुच्छेद 19 निलंबित होगा। ‘आंतरिक आपातकाल’ के दौरान नहीं।

और दूसरी व्यवस्था ये दी गयी कि केवल उसी कानून को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है, जो आपातकाल से संबन्धित है।

अगर कोई कानून आपातकाल से संबन्धित नहीं है, तो उसे चुनौती दी जा सकती है।

अनुच्छेद 359 के अनुसार

अनुच्छेद 19 तो अपने आप ही निलंबित हो जाता है लेकिन अनुच्छेद 359 के तहत अगर राष्ट्रपति चाहे तो वे अनुच्छेद 20 और अनुच्छेद 21 को छोड़कर किसी भी अन्य मूल अधिकारों को भी निलंबित कर सकती है।

पहले राष्ट्रपति अनुच्छेद 20 और अनुच्छेद 21 को निलंबित कर सकता था, पर अनुच्छेद 20 जो कि अपराध के संबंध में दोषसिद्धि से संरक्षण की बात करता है वही अनुच्छेद 21 जो कि जीने का अधिकार देता है।

ये दोनों अनुच्छेद बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसीलिए इसे 44वें संविधान संशोधन 1978 द्वारा जोड़ा गया है। क्यों महत्वपूर्ण है इसके लिए इस लेख को जरूर पढ़ें

यहाँ पर एक बात याद रखिए कि ये सारे अधिकार निलंबित होता है खत्म नहीं। यानी कि मूल अधिकार तो होता ही है लेकिन अगर आपके मूल अधिकारों का हनन होता है तो आप कोर्ट नहीं जा सकते।

जिन अधिकारों का निलंबन राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 359 के तहत किया जाएगा। उन अधिकारों के संबंध में जो भी आदेश दिये जाएँगे या जो भी विधि बनाए जाएँगे, उसे आदेश के समाप्ती के बाद अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।

जो भी आदेश दिये जाएँगे उस आदेश के प्रभाव में किए गए किसी भी विधायी या कार्यकारी कार्य को आदेश समाप्ति के उपरांत चुनौती नहीं दी जा सकती है।

राष्ट्रीय आपातकाल और अनुच्छेद 358 एवं अनुच्छेद 359
(National Emergency and Article 358 and Article 359)

मूल अधिकारों पर जो भी प्रभाव पड़ता है उसे इस चार्ट के माध्यम से समझते हैं।

अनुच्छेद 358 और अनुच्छेद 359 के तहत मूल अधिकारों पर प्रभाव
अनुच्छेद 358 का संबंध केवल अनुच्छेद 19 के तहत आने वाले स्वतंत्रता के उन छह अधिकारों से है।
जबकि अनुच्छेद 359 का संबंध उन सभी मूल अधिकारों से है जो राष्ट्रपति से आदेश से निलंबित हो जाता है।
अनुच्छेद 358 के तहत स्वतः ही अनुच्छेद 19 का निलंबन हो जाता है इसके लिए राष्ट्रपति के आदेश की जरूरत नहीं पड़ती।
वहीं अगर राष्ट्रपति को अनुच्छेद 19 के अतिरिक्त किसी अन्य मूल अधिकारों को निलंबित करना है तो वे अनुच्छेद 359 के तहत ऐसा कर सकते हैं। लेकिन अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर ।
अनुच्छेद 358 के तहत अनुच्छेद 19 का निलंबन केवल बाह्य आक्रमण के आधार पर ही होता है।
जबकि अनुच्छेद 359 के तहत मूल अधिकारों का निलंबन बाह्य और आंतरिक दोनों आपातकाल में होता है।
अनुच्छेद 358 के तहत अनुच्छेद 19 तब तक निलंबित रहता है। जब तक आपातकाल लागू रहता है
वहीं अनुच्छेद 359 के तहत मूल अधिकारों का निलंबन; राष्ट्रपति जितनी अवधि तय करता है, उतनी अवधि तक रहता है।
अनुच्छेद 358 के तहत अनुच्छेद 19 सम्पूर्ण देश में निलंबित हो जाता है।
वहीं अनुच्छेद 359 के तहत मूल अधिकारों का निलंबन पूरे देश में या फिर देश के किसी भाग में किया जा सकता है।
अनुच्छेद 358 के तहत ऐसे नियम भी बनाए जा सकते हैं जो अनुच्छेद 19 से संबंध नहीं रखते हैं।
लेकिन अनुच्छेद 359 के तहत सिर्फ ऐसे नियम ही बनाए जा सकते हैं जो इसी अनुच्छेद के तहत निलंबित मूल अधिकारों से संबन्धित हो।

ये लेख चूंकि काफी बड़ा हो गया है इसीलिए राष्ट्रपति शासन और बोम्मई मामले को अगले लेख में समझेंगे।

↗️यहाँ क्लिक करके उसे पढ़ें
President’s rule

………….

National Emergency
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