राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सही समझ

किसी भी सभ्य देश में मानवाधिकारों का हनन न हो इसका ध्यान रखा ही जाना चाहिए; इसी संदर्भ में भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना की गई।

इस लेख में हम राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission) पर सरल एवं सहज चर्चा करेंगे एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझेंगे;

इसीलिए इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें, उम्मीद हैं सभी महत्वपूर्ण जानकारी आपको यहाँ मिल जाएंगी।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग

विषय सूची

मानवाधिकार क्या है?

ऐसे अधिकार जो हमें मानव होने के नाते मिलना ही चाहिए। दूसरे शब्दों में कहें तो मानव अधिकार का मतलब उन मौलिक अधिकार एवं स्वतंत्रता से है जिसके की सभी मानव प्राणी हकदार है। जैसे कि जीवन और आजाद रहने का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, कानून के सामने समानता, भोजन का अधिकार, काम करने का अधिकार, शिक्षा का अधिकार एवं आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के साथ ही साथ सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार आदि।

अब ऐसा तो नहीं हो सकता है न कि कोई देश इसे दे और कोई न दे। क्योंकि ये किसी राज्य की सीमाओं से बंधी तो होती नहीं है बल्कि ये तो पूरी मानवजाति के लिए होती है। इसीलिए इस संबंध में महत्वपूर्ण पहल करते हुए दिसम्बर 1948 में संयुक्त राष्ट्र आमसभा ने यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ़ ह्यूमन राइट्स (UDHR) को स्वीकार किया और इसे सभी सभ्यताओं एवं देशों से अपनाने का आह्वान किया गया।

यूडीएचआर एक मील का पत्थर दस्तावेज है जो उन मौलिक अधिकारों की घोषणा करता है, जो हर किसी को एक इंसान होने के कारण मिलता हैं वो भी नस्ल, रंग, धर्म, लिंग, भाषा, राजनीतिक राय, राष्ट्रीय या सामाजिक मूल, संपत्ति, जन्म या अन्य स्थिति की परवाह किए बिना।

मानवाधिकार की पैरवी करने वाले ढेरों देश और संस्थाएं आज भी इस दस्तावेज़ से प्रेरणा लेते हैं और इस मानदंड पर खड़ा उतरने की कोशिश करते हैं। इसमें क्या लिखा है, इसे आप खुद ही देख लीजिये।

मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (UDHR)

चूंकि, मानव परिवार के सभी सदस्यों के जन्मजात गौरव और सम्मान तथा अविच्छिन अधिकार की स्वीकृति ही विश्व-शांति, न्याय और स्वतंत्रता की बुनियाद है,
चूंकि, मानव अधिकारों के प्रति उपेक्षा और घृणा के फलस्वरूप ही ऐसे बर्बर कार्य हुए जिनसे मनुष्य की आत्मा पर अत्याचार किया गया, इसीलिए यह अनिवार्य है कि ऐसे विश्व की स्थापना हो जिसमें सभी मनुष्य भाषण तथा विश्वास की स्वतंत्रता हासिल तथा भय तथा अभाव से मुक्ति प्राप्त कर सकें, जो मानव समुदाय की सबसे महत्वपूर्ण अभिलाषा है।
चूंकि, यह आवश्यक है कि मनुष्य को अत्याचार तथा दमन के विरुद्ध अंतिम अस्त्र के रूप में विद्रोह न करना पड़े, इसीलिए विधि के शासन के द्वारा मनवाधिकारों की रक्षा हो,
चूंकि, राष्ट्रों के मध्य मित्रतापूर्ण संबन्धों की स्थापना को प्रोत्साहित करना आवश्यक है,
चूंकि, संयुक्त राष्ट्रसंघ के देशों ने घोषणा पत्र में मूलभूत मानवाधिकारों, मनुष्य की गरिमा तथा महत्व तथा पुरुषों तथा महिलाओं के समान अधिकारों के प्रति अपना विश्वास पुनः व्यक्त किया तथा व्यापक स्वतंत्रता की उपलब्धि हेतु उत्तम जीवन स्तर तथा सामाजिक विकास को प्रोत्साहित करने का संकल्प लिया है,
चूंकि, सदस्य देशों ने संयुक्त राष्ट्रसंघ के सहयोग से मानव अधिकारों तथा मूल स्वतंत्रताओं के विश्व स्तर पर सम्मान तथा अनुपालन को प्रोत्साहित करने का संकल्प लिया है,
चूंकि, उक्त संकल्पों की पूर्ण उपलब्धि हेतु इन अधिकारों और स्वतंत्रताओं की सार्वदेशिक अवधारणा सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
अतः आज संयुक्त राष्ट्रसंघ महासभा, मनवाधिकारों के विश्वजनीन घोषणा पत्र को सभी सभ्यताओं तथा देशों के लिए उपलब्धि के सर्वमान्य मानदंड के रूप में एतदर्थ घोषित करती है कि प्रत्येक व्यक्ति तथा समाज का प्रत्येक अंग इस घोषणा पत्र का सदा विचार रखते हुए इन अधिकारों तथा स्वतंत्रता, स्वतंत्रताओं की मर्यादा को अध्यापन तथा शिक्षा के माध्यमों द्वारा प्रोत्साहित करेगा तथा विकासोन्मुख राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साधनों द्वारा इनकी सार्वदेशिक तथा सशक्त स्वीकृति एवं अनुपालन को आपस में, सदस्य देशों की जनता के बीच तथा उनके क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आनेवाले प्रदेशों की जनता के बीच स्थापित करेगा।
UDHR Hindi Pdf↗️ English Booklet↗️

मानव के इसी अधिकार को सुनिश्चित करने एवं इन अधिकारों के संरक्षण और संवर्धन के लिए संविधान के भाग 3 में इसकी विस्तृत चर्चा की गई है। 1993 में, इसी क्षेत्र में एक कदम और बढ़ाते हुए भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission) की स्थापना की गई। आइये इसे विस्तार से समझते है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission), एक सांविधिक (Statutory) निकाय है। क्योंकि इसका गठन संसद में पारित एक अधिनियम के अंतर्गत हुआ था, जिसका नाम है – ”मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 (Protection of Human Rights Act 1993)”। 2006 में इस अधिनियम को संशोधित किया गया था।

इस अधिनियम का Section 2(1)(d) मानवाधिकार को ऐसे अधिकार के रूप में परिभाषित करता है जो कि जीवन, स्वतंत्रता, समता और व्यक्तिगत मर्यादा से संबंधित है और भारतीय संविधान द्वारा अभिनिश्चित (guaranteed), अंतर्राष्ट्रीय संधियों में निर्मित और भारतीय न्यायालय द्वारा अधिरोपित (enforceable) है।

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का गठन पेरिस सिद्धांतों के अनुरूप है जिन्हें अक्तूबर, 1991 में पेरिस में मानव अधिकार संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए राष्ट्रीय संस्थानों पर आयोजित पहली अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला में अंगीकृत किया गया था और दिसम्बर 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा एक संकल्प के रूप में इसे समर्थित किया गया था।

Vision & Mission

यह आयोग, मानव अधिकारों के संरक्षण एवं संवर्द्धन के प्रति भारत की चिंता का प्रतीक अथवा संवाहक है।

आयोग राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जनता के बीच मानव अधिकारों के बारे में जागरूकता फैलाने और मानवाधिकार साक्षरता के क्षेत्र में सभी हितधारकों के प्रयासों को प्रोत्साहित करने के लिए जिम्मेदार है।

मानवाधिकारों के उल्लंघन की शिकायतों की जांच के या किसी लोक सेवक द्वारा इस तरह के उल्लंघन की रोकथाम में लापरवाही को एड्रेस करने के अलावा, आयोग संधियों और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध विभिन्न प्रकार के उपकरणों का अध्ययन भी करता है तथा सरकार को उनके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए सिफारिशें करता है।

NHRC एक अनूठी संस्था है क्योंकि यह दुनिया के कुछ राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थानों में से एक है, जिसके अध्यक्ष देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश हैं।

आयोग की स्थापना के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं:

1.उन संस्थागत व्यवस्थाओं को मजबूत करना, जिसके द्वारा मानवाधिकार के मुद्दों का पूर्ण रूप में समाधान किया जा सके।

2.अधिकारों के अतिक्रमण को सरकार से स्वतंत्र रूप में इस तरह से देखना ताकि सरकार का ध्यान उसके द्वारा मानवाधिकारों की रक्षा की प्रतिबद्धता पर केंद्रित किया जा सके।

3.इस दिशा में किए गए प्रयासों को पूर्ण व सशक्त बनाना।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की संरचना

आयोग एक बहु-सदस्यीय संस्था है, जिसमें एक अध्यक्ष व चार सदस्य होते हैं। आयोग का अध्यक्ष भारत का कोई सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश होना चाहिए। इसके अलावा सदस्यों की बात करें तो, एक सदस्य उच्चतम न्यायालय में कार्यरत अथवा सेवानिवृत्त न्यायाधीश, एक उच्च न्यायालय का कार्यरत या सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश और दो अन्य व्यक्तियों को मानवाधिकार से संबंधित जानकारी अथवा कार्यानुभव होना चाहिए।

इन पूर्णकालिक सदस्यों के अतिरिक्त आयोग में चार अन्य पदेन सदस्य भी होते हैं – राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति व राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग व राष्ट्रीय महिला आयोग के अध्यक्ष।

▪️ आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री के नेतृत्व में गठित छह सदस्यीय समिति की सिफारिश पर होती है। समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, राज्यसभा के उप-सभापति, संसद के दोनों सदनों के मुख्य विपक्षी दल के नेता व केंद्रीय गृहमंत्री होते हैं। इसके अतिरिक्त, भारत के मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर, उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश अथवा उच्च न्यायालय के किसी मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति हो सकती है।

▪️ आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों का कार्यकाल पांच वर्ष अथवा 70 वर्ष हो (जो भी पहले हो ), होता है। अपने कार्यकाल के पश्चात आयोग के अध्यक्ष व सदस्य, केंद्र सरकार अथवा राज्य सरकारों में किसी भी पद के योग्य नहीं होते हैं।

▪️ कुछ खास परिस्थितियों में, राष्ट्रपति अध्यक्ष व सदस्यों को उनके पद से किसी भी समय निम्नलिखित परिस्थितियों में हटा सकता है:

1.यदि वह दिवालिया हो जाए, या
2. यदि वह अपने कार्यकाल के दौरान, अपने कार्यक्षेत्र से बाहर से किसी प्रदत्त रोजगार में संलिप्त होता है, या
3. यदि वह मानसिक व शारीरिक कारणों से कार्य करने में असमर्थ हों, या
4. यदि वह मानसिक रूप से अस्वस्थ हो तथा सक्षम न्यायालय ऐसी घोषणा करे, या
5. यदि वह न्यायालय द्वारा किसी अपराध का दोषी व सजायाफ्ता हो।

इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति, अध्यक्ष तथा किसी भी सदस्य को उसके दुराचरण या अक्षमता के कारण भी पद से हटा सकता। हालांकि इस स्थिति में राष्ट्रपति इस विषय को उच्चतम न्यायालय में जांच के लिए सौंपेगा। यदि जांच के उपरांत उच्चतम न्यायालय इन आरोपों को सही पाता है तो उसकी सलाह पर राष्ट्रपति इन सदस्यों व अध्यक्ष को उनके पद से हटा सकता है।

▪️ आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों के वेतन, भत्तों व अन्य सेवा शर्तों का निर्धारण केंद्रीय सरकार द्वारा किया जाता है परंतु नियुक्ति के उपरांत उनमें अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता है।

उपरोक्त सभी उपबंधों का उद्देश्य, आयोग की कार्यशैली को स्वायत्तता, स्वाधीनता तथा निष्पक्षता प्रदान करना है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के कार्य

1. मानवाधिकारों के उल्लंघन की जांच करना अथवा किसी लोक सेवक के समक्ष प्रस्तुत मानवाधिकार उल्लंघन की प्रार्थना, जिसकी कि वह अवहेलना करता हो, की जांच स्व:प्ररेणा या न्यायालय के आदेश से करना।

2. न्यायालय में लंबित किसी मानवाधिकार से संबंधित कार्यवाही में हस्तक्षेप करना।

3. मानवाधिकार की रक्षा हेतु बनाए गए संवैधानिक व विधिक उपबंधों की समीक्षा करना तथा इनके प्रभावी कार्यान्वयन हेतु उपायों की सिफारिशें करना।

4. आतंकवाद सहित उन सभी कारणों की समीक्षा करना, जिनसे मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है तथा इनसे बचाव के उपायों की सिफारिश करना।

5. मानवाधिकारों से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय संधियों व दस्तावेजों का अध्ययन व उनको प्रभावशाली तरीके से लागू करने हेतु सिफारिशें करना।

6. मानवाधिकारों के क्षेत्र में शोध करना और इसे प्रोत्साहित करना। साथ ही मानवाधिकारों के क्षेत्र में कार्यरत गैर-सरकारी संगठनों के प्रयासों की सराहना करना।

7. लोगों के बीच मानवाधिकारों की जानकारी फैलाना व इनकी सुरक्षा के लिए उपलब्ध उपायों के प्रति जागरूक करना। साथ ही ऐसे आवश्यक कार्यों को करना, जो कि मानवाधिकारों के प्रचार के लिए आवश्यक हों।

8. राज्य सरकार के नियंत्रणाधीन किसी जेल अथवा किसी अन्य संस्थान, जहां लोगों को उपचार, सुधार अथवा संरक्षण के उद्देश्य से कैद अथवा बंद रखा जाता है, का दौरा करना। और वहां के संवासियों (Residents) के जीवनयापन की दशाओं का अध्ययन कर उनके संबंध में संस्तुतियाँ (Recommendations) करना।

9. समाज के विभिन्न वर्गों के बीच मानव अधिकार शिक्षा का प्रसार करना तथा प्रकाशनों, मीडिया, सेमिनार तथा अन्य उपलब्ध साधनों से इन अधिकारों के संरक्षण हेतु उपलब्ध सुरक्षोपायों की जागरूकता को बढ़ाना

10. मानव अधिकारों के संवर्धन हेतु आवश्यक समझे जाने वाले इसी प्रकार के अन्य कार्य करना।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की कार्यप्रणाली

आयोग का प्रधान कार्यालय दिल्‍ली में स्थित है हालांकि वह भारत में अन्य स्थानों पर भी अपने कार्यालय खोल सकता है। आयोग की अपनी कार्यप्रणाली है तथा वह यह करने के लिए अधिकृत है। आयोग के पास सिविल न्यायालय जैसे सभी अधिकार व शक्तियां हैं तथा इसका चरित्र भी न्यायिक है। आयोग केंद्र अथवा राज्य सरकार से किसी भी जानकारी अथवा रिपोर्ट की मांग कर सकता है।

आयोग के पास मानवाधिकारों के उल्लंघन से संबंधित शिकायतों की जांच हेतु एक स्वयं का जांच दल है । इसके अतिरिक्त आयोग केंद्र अथवा राज्य सरकारों की किसी भी अधिकारी या जांच एजेंसी की सेवाएं ले सकता है। आयोग व गैर-सरकारी संगठनों के बीच एक प्रभावशाली सहभागिता भी है जो प्रथम दृष्टया मानवाधिकार उल्लंघन की सूचना प्राप्ति में सहायक है।

आयोग द्वारा किस प्रकार की शिकायतों पर विचार नहीं किया जाता ?

सामान्यत: निम्नलिखित प्रकृति की शिकायतों पर आयोग द्वारा विचार नहीं किया जाता :-

(a) शिकायतें दर्ज करवाने से पहले घटना को 1 वर्ष से अधिक समय बीत जाने पर। यानी कि आयोग उन्हीं मामलों में जांच कर सकता है जिन्हें घटित हुए एक वर्ष से कम समय हुआ हो

(b) किसी न्यायालय के तहत चल रहे मामलों के संबंध में

(c) जो अस्पष्ट, अनाम अथवा छद्मनाम से हों या फिर वो ओछी प्रकृति की हों

(d) जो सेवा मामलों से संबंधित हों

आयोग शिकायतों पर जांच किस प्रकार करता है ?

मानव अधिकारों के हनन की शिकायतों पर जांच करते समय आयोग निर्धारित समय के भीतर केन्द्र सरकार अथवा किसी राज्य सरकार अथवा किसी अन्य प्राधिकारी से सूचना अथवा रिपोर्ट मांग सकता है; अगर आयोग को निर्धारित समय के भीतर वह सूचना अथवा रिपोर्ट प्राप्त नहीं होती, तो आयोग शिकायत पर स्वयं ही जांच शुरू कर सकता है;

दूसरी ओर यदि सूचना अथवा रिपोर्ट प्राप्त होने पर आयोग संतुष्ट हो कि आगे जांच की आवश्यकता नहीं है अथवा संबद्ध सरकार अथवा प्राधिकारी द्वारा अपेक्षित कार्रवाई प्रारंभ कर दी गई तो, तो आयोग शिकायत पर कार्यवाही नहीं कर सकता तथा शिकायतकर्ता को तदनुसार (accordingly) सूचित कर सकता है।

जांच के बाद आयोग क्या कदम उठा सकता है ?

आयोग जांच के दौरान या उपरांत निम्नलिखित में से कोई भी कदम उठा सकता है:

1. यह पीड़ित व्यक्ति को क्षतिपूर्ति या नुकसान के भुगतान के लिए या तत्काल अंतरिम सहायता प्रदान करने से संबंधित सरकार या प्राधिकरण को सिफारिश कर सकता है।

2. यह दोषी लोक सेवक के विरुद्ध बंदीकरण हेतु कार्यवाही प्रारंभ करने के लिए संबंधित सरकार या प्राधिकरण को सिफारिश कर सकता है। अथवा, जहां जांच से मानव अधिकार के हनन होने का पता चले, वहाँ आयोग संबद्ध सरकार अथवा प्राधिकरण को संबद्ध व्यक्तियों के विरुद्ध अभियोजन (Prosecution) या अन्य कार्रवाई करने की संस्तुति कर सकता है।

3. आयोग इस संबंध में आवश्यक निर्देश, आदेश अथवा रिट के लिए उच्चतम अथवा उच्च न्यायालय में जा सकता है।

जांच के संबंध में आयोग को कौन सी शक्तियां दी गई हैं ?

अधिनियम के अंतर्गत शिकायतों पर जांच करते समय आयोग को कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर 1908 के अंतर्गत वे सभी शक्तियां प्राप्त हैं जो सिविल कोर्ट किसी वाद के विचारण के समय अपनाता है। विशेषरूप से निम्नलिखित है :-

(a) गवाहों की उपस्थिति हेतु समन करना तथा हाजिर करना तथा शपथ पर उनकी जांच करना
(b) किसी दस्तावेज को ढूंढना एवं प्रस्तुत करना
(c) हलफनामे (Affidavit) पर साक्ष्य प्राप्त करना
(d) किसी पब्लिक रिकॉर्ड को मांगना अथवा किसी न्यायालय अथवा कार्यालय से उनकी प्रति मांगना
(e) गवाहों अथवा दस्तावेजों की जांच के लिए शासन पत्र (Government letter) जारी करना
(f) निर्धारित किया गया कोई अन्य काम करना।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अन्वेषण दल

मानव अधिकारों के हनन की शिकायतों पर जांच करने के लिए पुलिस महानिदेशक की अध्यक्षता में आयोग का अपना जांच स्टाफ है। अधिनियम के अंतर्गत किसी अधिकारी अथवा केन्द्र अथवा किसी राज्य सरकार के अन्वेषण अभिकरण की सेवाओं का उपयोग करने के लिए यह आयोग मुक्त है। आयोग जांच कार्य के लिए अनेक मामलों में गैर-सरकारी संगठनों को अपने साथ जोड़ा है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्वायत्तता

अन्य बातों के साथ-साथ आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति, उनके कार्यकाल के निर्धारण को सांविधिक गारंटी दी गई है, साथ ही अपना अन्वेषण दल उनकी नियुक्ति तथा उनका संचालन करना भी इसमें शामिल हैं। आयोग की वित्तीय स्वायत्तता का वर्णन अधिनियम की धारा 32 में किया गया है।

मानवाधिकार संशोधन अधिनियम 2006

संसद ने मानवाधिकार संरक्षण (संशोधन) अधिनियम 2006 पारित किया है। इसके तहत मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 (Protection of Human Rights Act, 1993) में कुछ प्रमुख संशोधन किए गए जो कि निम्नलिखित विषयों से संबन्धित है:

1. राज्य मानवाधिकार आयोगों के सदस्यों की संख्या घटाकर 5 से 3 की गई।
2. मानवाधिकार आयोग के सदस्य की नियुक्त के लिए अर्हता शर्तों में परिवर्तन किया गया।
3. मानवाधिकार आयोगों के साथ उपलब्ध अनुसंधान मशीनरी को मजबूत बनाना।
4. आयोग को जांच के दौरान भी क्षतिपूर्ति की अनुशंसा करने का अधिकार देकर सशक्त बनाया गया।
5. राष्ट्रीय मानवाधिकार संरक्षण आयोग को राज्य सरकार को सूचित किए बिना भी बंदीगृहों में जाने का अधिकार दिया गया।
6. गवाहों के साक्ष्य का अभिलेखीकरण करने की प्रक्रिया को मजबूती प्रदान की गई।
7. यह स्पष्ट करना कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष इन दोनों आयोगों के सदस्यों से भिन्न स्थिति रखते हैं।
8. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को इस योग्य बनाना कि वह अपने पास आई शिकायतों को संबन्धित राज्य मानवाधिकार आयोग को स्थानांतरित कर दे।
9. यह स्पष्ट करना कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग अथवा राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्य के चयन के लिए गठित चयन समिति के किसी सदस्य की अनुपस्थिति से चयन समिति के निर्णयों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

10. इसकी व्यवस्था करना कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष तथा राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य होंगे।

11. केंद्रीय सरकार को भविष्य के किसी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिज्ञा पत्रों तथा परम्पराओं को अधिसूचित करने योग्य बनाना जिन पर कि अधिनियम लागू होता है।

मानवाधिकार दिवस (Human rights day)

मानवाधिकार दिवस हर साल 10 दिसंबर को मनाया जाता है। इसी दिन 1948 में संयुक्त राष्ट्र महासभा (United Nations General Assembly) ने मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (Universal Declaration of Human Rights) (यूडीएचआर) को अपनाया था। इसीलिए इस दिन को मानवाधिकार दिवस के रूप में मनाया जाता है।

यूडीएचआर में निर्धारित मानवाधिकारों और स्वतंत्रताओं के संवर्धन और संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र की इकाई UNHCHR यानी कि United Nations High Commissioner for Human Rights↗️ मानवाधिकार को प्रतिनिधित्व करने वाली दुनिया की अग्रणी इकाई है।

Important Links

File Online Complainthttps://hrcnet.nic.in/HRCNet/public/webcomplaint.aspx

सुविधा केन्द्र (मदद) : (011) 24651330, 24663333
मोबाइल नं. – 9810298900 (शिकायतों के लिए 24 घंटे)
ई मेल: cr.nhrc@nic.in
वेबसाइट : www.nhrc.nic.in

Closing Remarks (समापन टिप्पणी)

आयोग का कार्य वस्तुतः सिफारिश देने वाला या सलाहकार का होता है। आयोग मानवाधिकार उल्लंघन के दोषी को दंड देने का अधिकार नहीं रखता है, न ही आयोग पीड़ित को किसी प्रकार की सहायता, जैसे- आर्थिक सहायता दे सकता है।

आयोग की सिफ़ारिशें संबंधित सरकार अथवा अधिकारी पर बाध्य नहीं हैं लेकिन उसकी सलाह पर की गई कार्यवाही पर उसे, आयोग को एक महीने के भीतर सूचित करना होता है । तो कुल मिलाकर आयोग की भूमिका सिफ़ारिश देने वाले या सलाहकार की हो सकती है फिर भी सरकार आयोग द्वारा दिए गए मामलों पर विचार करती है क्योंकि आयोग अपने अधिकारों का पूर्ण रूप से प्रयोग करता है और कोई भी सरकार इसकी सिफारिशों को आसानी से नकार नहीं सकती, इस प्रकार यह कहना व्यर्थ होगा कि आयोग शक्तिविहीन है।

हालांकि सशस्त्र बल के सदस्यों द्वारा किए गए मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में आयोग की भूमिका, शक्तियां व न्यायिकता सीमित होती है। इस संदर्भ में आयोग केंद्र सरकार से रिपोर्ट प्राप्त कर अपनी सलाह दे सकता है। केंद्र सरकार को तीन महीने के भीतर, आयोग की सिफारिश पर की गई कार्यवाही के बारे में बताना होगा।

आयोग अपनी वार्षिक अथवा विशेष रिपोर्ट केंद्र सरकार व संबंधित राज्य सरकारों को भेजता है। इन रिपोर्ट्स को संबंधित विधायिका के समक्ष रखा जाता है। इसके साथ ही इसका विवरण भी किया जाता है, जिनमें आयोग द्वारा की गई सिफारिशों पर की गई कार्यवाही का उल्लेख तथा ऐसी किसी सिफारिश को न मानने के कारणों का उल्लेख होता है।

दुनिया भारत के NHRC को मानवाधिकारों के संवर्धन और संरक्षण के प्रभावी कार्यान्वयन को बढ़ावा देने और निगरानी में एक रोल मॉडल के रूप में देखती है। भारत के NHRC, मानव अधिकारों के परिप्रेक्ष्य से जागरूकता बढ़ाने के लिए दुनिया के अन्य मानवाधिकार संस्थाओं के साथ समन्वय में एक सक्रिय भूमिका निभाता है।

इसने संयुक्त राष्ट्र निकायों और अन्य राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोगों के साथ-साथ कई देशों के नागरिक समाज, वकीलों और राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रतिनिधिमंडलों की मेजबानी भी की है।

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संघ लोक सेवा आयोग
राज्य लोक सेवा आयोग
केंद्रीय अन्वेषन ब्यूरो – CBI
राज्य मानवाधिकार आयोग
केन्द्रीय सूचना आयोग – CIC
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक – CAG
वित्त आयोग (Finance Commission)

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