संसद के पास समय कम होता है लेकिन काम बहुत ही ज्यादा। ऐसे में कार्य निष्पादन सही से हो सके, इसके लिए संसदीय समितियां (Parliamentary committees) काम में आती है।

इस लेख में भारत की संसदीय समितियों पर सरल और सहज चर्चा करेंगे। बेहतर समझ के लिए इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें;

संसदीय समितियां
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संसदीय समितियां क्या है?

सरकार के पास अपना काम करने के लिए विशाल और उन्नत प्रशासन तंत्र तथा संगठन उपलब्ध होता है जिसकी मदद से उसका सारा काम हो जाता है लेकिन संसद के मामले में ऐसा नहीं है, एक तो संसद साल में 70 – 80 दिन चलती है और ऊपर से उसके काम इतनी विविधता, जटिलता और व्यापकता लिए होती है कि वह अपने समक्ष लाये गए विषयों का प्रभावकारी ढंग से स्वयं निष्पादन करने तक में असमर्थ हो जाती है।

यानी कि संसद के पास न तो पर्याप्त समय होता है, न ही आवश्यक विशेषज्ञता जिससे कि वह समस्त विधायी उपायों तथा अन्य मामलों की गहन छानबीन कर सकें, यही कारण है कि संसद का बहुत सा काम सभा की समितियों द्वारा निपटाया जाता है, जिन्‍हें संसदीय समितियां (Parliamentary committees) कहते हैं।

संसदीय समितियों की विशेषताएँ

संविधान में संसदीय समितियों का जिक्र पृथक रूप में नहीं मिलता है बल्कि संदर्भ के रूप में मिलता है इसीलिए इन समितियों के गठन, कार्यकाल तथा कार्य आदि के संबंध में संसद के दोनों सदनों द्वारा बनाए गए नियम ही प्रभावी होते हैं। इन समितियों की विशेषताएँ है;

1. इन समितियों की नियुक्ति या निर्वाचन लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति द्वारा होता है, इसीलिए ये समितियां उसी के निर्देशानुसार कार्य करती है।
2. अपनी जांच खत्म करने के बाद ये समितियां अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति को सौंपती है।
3. इन समितियों जिसका एक सचिवालय होता है, जिसकी व्यवस्था लोकसभा या राज्यसभा सचिवालय करता है।

यहाँ पर एक बात याद रखिए कि परामर्शदात्री समिति (Consultative Committee) भी संसद सदस्यों से ही गठित होती है लेखिन यह संसदीय समिति नहीं होती क्योंकि यह उपरोक्त शर्तों को पूरा नहीं करती। जैसे कि सलाहकार समिति (Advisory Committee)।

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संसदीय समितियां कितने प्रकार की होती हैं?

मोटे तौर पर संसदीय समितियाँ दो प्रकार की होती है – स्थायी समितियाँ (Standing committees) तथा तदर्थ समितियां (Ad hoc committees)

स्थायी समितियां (Standing committees), स्थायी एवं नियमित होती है और ये निरंतरता के आधार पर कार्य करती है। इसका गठन प्रत्येक वर्ष अथवा समय-समय पर किया जाता है।

तदर्थ समितियां (Ad hoc committees), अस्थायी एवं अनियमित होती है। जिस प्रयोजन से इसका गठन किया जाता है वह पूरा होते ही इसे समाप्त कर दिया जाता है।

इस चार्ट की मदद से देख सकते हैं की स्थायी एवं तदर्थ समितियों के अंतर्गत कितनी समितियां आती है-

स्थायी समितियांतदर्थ समितियां
कार्य की प्रकृति के आधार पर मुख्य रूप से इसे 6 भागों में बांटा जाता है –तदर्थ समिति को मोटे तौर पर दो भागों में विभाजित किया जाता है –
1. वित्त समितियां 2. विभागीय स्थायी समितियां 3. जांच समितियां 4. परीक्षण एवं नियंत्रण के लिए गठित समितियां 5. सदन के दैनंदिन कार्यों से संबन्धित समितियां 6. सदन समितियां अथवा सेवा समितियां1. जांच समितियाँ 2. प्रवर या संयुक्त समितियाँ

स्थायी समितियां बहुत ही व्यापक है जबकि तदर्थ समितियां बनती और खत्म होती रहती है। आइये पहले तदर्थ समिति को समझते हैं

तदर्थ समितियाँ (Ad hoc Committees)

तदर्थ समिति को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में विभाजित किया जाता है – (1) जांच समिति (Inquiry committees) एवं (2) प्रवर या संयुक्त समिति (Select or Joint Committees)

जांच समितियों (Inquiry committees) का गठन समय-समय पर लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति द्वारा किया जाता है इसे किसी विशिष्ट मामले की जांच करने और प्रतिवेदन (Report) देने के लिए गठित किया जाता है।

जैसे कि राष्ट्रपति अभिभाषण के दौरान सदस्यों के आचरण की जांच के लिए गठित समिति, संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (MPLADS) के लिए गठित समिति आदि।

प्रवर या संयुक्त समितियों का गठन विशिष्ट विधेयकों पर विचार करने और प्रतिवेदन देने के लिए किया जाता है। ये समितियां अन्य तदर्थ समितियों से इस मायने में भिन्न होता है कि इसका संबंध सिर्फ विधेयकों से होता है और इस समिति द्वारा जिस प्रक्रिया या नियमों को अपनाया जाता है वह लोकसभा अध्यक्ष या सभापति द्वारा दिये गए निर्देशों पर आधारित होता है

जब किसी सदन में कोई विधेयक सामान्य चर्चा के लिए लाया जाता है, तब सदन चाहे तो उसे सदन की प्रवर समिति (Select Committee) को अथवा दोनों सदनों की संयुक्त समिति (joint Committee) को भेज सकता है। प्रवर समिति किसी एक सदन के सांसदों से मिलकर ही बनती है यानी कि प्रवर समिति में किसी एक सदन के ही सदस्य होते हैं। वहीं संयुक्त समिति की बात करें तो इसके सदस्य दोनों सदनों से होते हैं।

इन समितियों के पास विधेयक को कैसे भेजा जाता है?

किसी भी विधेयक को प्रवर समिति (Select Committee) या संयुक्त समिति (joint Committee) के पास निम्नलिखित तीन तरीकों से भेजा जाता है –

(1) जब कोई मंत्री सदन में ये प्रस्ताव रखता है कि उसके विधेयक की सदन के प्रवर या संयुक्त समिति द्वारा जाँच की जाए,

(2) यदि मंत्री इस प्रकार का कोई प्रस्ताव नहीं रखता है तो उस विधेयक को प्रवर या संयुक्त समिति या विभागीय स्थायी समिति के पास भेजना है या नहीं ये लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति निर्णय करता है।

(3) एक सदन द्वारा अगर विधेयक पारित भी हो गया हो तो वह दूसरे सदन द्वारा प्रवर समिति के पास भेजा जा सकता है।

इन समितियों के पास भेजे जाने के फायदे –

▪️ समिति विधेयक पर उसी प्रकार प्रावधान दर प्रावधान विचार करती है जैसे कि दोनो सदन द्वारा किसी विधेयक पर विचार किया जाता है।

▪️ यह विशेषज्ञों, हितधारकों और नागरिकों से टिप्पणियों और सुझावों को आमंत्रित करती है और सरकार के दृष्टिकोण पर भी विचार करती है। इससे होता ये है कि उस विधेयक की संभावित त्रुटियाँ दूर हो जाती है।

▪️ इसके बाद रिपोर्ट तैयार की जाती है, जिसमें समिति के सदस्य द्वारा विभिन्न प्रावधानों पर संशोधन भी प्रस्तावित किए जा सकते हैं। हालांकि इसके रिपोर्ट बाध्यकारी नहीं होते हैं इसीलिए इसे माना भी जा सकता है और नहीं भी। इसे आमतौर पर 3 महीनों में अपनी रिपोर्ट देनी होती है।

कुछ तदर्थ समिति

क्र.सं.समिति का नामकार्यकाल
1.रेल अभिसमय समितिएक लोक सभा की अवधि के लिए
2.संसद सदस्‍यों तथा लोक सभा सचिवालय के अधिकारियों को कंप्‍यूटर उपलब्‍ध कराने संबंधी समितिएक लोक सभा की अवधि के लिए
3.संसद सदस्‍य स्‍थानीय क्षेत्र विकास योजना समिति1 वर्ष
4.आचार समितिनियत नहीं। पुनर्गठन किए जाने तक बनी रहेगी।
5.संसद भवन परिसर में खाद्य प्रबंधन संबंधी समिति1 वर्ष
6.संसद भवन परिसर में राष्‍ट्रीय नेताओं और संसदविदों की मूर्तिया/तस्‍वीर लगाने संबंधी समितिएक लोक सभा की अवधि के दौरान
7.संसद भवन परिसर में सुरक्षा संबंधी संयुक्‍त समिति1 वर्ष
8.लाभ के पद संबंधित सांविधानिक और विधिक स्‍थिति की जांच करने संबंधी समितिप्रतिवेदन प्रस्‍तुत किए जाने तक।
9.लोक सभा के सदस्‍यों के कदाचार की जांच करने संबंधी समितिनियत नहीं

| स्थायी समितियाँ (Standing committees)

स्थायी समितियां

कार्य की प्रकृति के आधार पर स्थायी समितियों को निम्नलिखित 6 भागों में विभक्त किया गया है, जिसकी चर्चा हम एक-एक करके करने वाले हैं।

1. वित्त समितियां (finance committees)

2. विभागीय स्थायी समितियां (Departmental Standing Committees)

3. जांच समितियां (investigation committees)

4. परीक्षण एवं नियंत्रण के लिए गठित समितियां (Committees constituted for testing and control)

5. सदन के दैनंदिन कार्यों से संबन्धित समितियां (Committees related to the day-to-day work of the House)

6. सदन समितियां अथवा सेवा समितियां (house committees or service committees)

1. वित्तीय समितियाँ (Financial committees)

संसद की समितियां सरकार के खर्चे की और कार्य निष्पादन की विस्तृत छानबीन करने का काम करती है जिससे कि सरकार का वित्तीय मामलों में संसद के प्रति उत्तरदायित्व सुनिश्चित होता है। तीन ऐसी वित्तीय समितियां हैं जो संसद द्वारा बनाई गई नीतियों और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में अकुशलताओं और अपव्यय को प्रकाश में लाती है।

(1). लोक लेखा समिति (Financial committees)

इस समिति का गठन पहली बार 1921 में हुआ और तब से यह अस्तित्व में है। वर्तमान में इसमें 22 सदस्य हैं जिसमें से 15 लोकसभा से तथा 7 राज्यसभा से हैं।

लोकलेखा समिति का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि क्या धन संसद द्वारा प्राधिकृत रूप से खर्च किया गया है और क्या उसी प्रयोजन के लिए खर्च किया गया है जिसके लिए वह प्रदान किया गया था।

यदि किसी वित्त वर्ष के दौरान किसी सेवा पर उसके प्रयोजन के लिए सदन द्वारा प्रदान की गई राशि से अतिरिक्त राशि खर्च की गई हो तो समिति उन परिस्थितियों की जांच करती है जिसके कारण अतिरिक्त व्यय किया गया है।

यह समिति तकनीकी अनियमितताओं का तो पता लगाती ही है साथ ही साथ वित्तीय मामलों के संचालन में अगर कोई अपव्यय, भ्रष्टाचार आदि हुआ हो तो उसे भी प्रकाश में लाती है।

लोक लेखा समिति के सदस्यों का चुनाव प्रतिवर्ष संसद द्वारा इसके सदस्यों में से समानुपातिक प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त के अनुसार एकल हस्तांतरणीय मत के माध्यम से किया जाता है।

सदस्यों का कार्यकाल एक वर्ष का होता है। कोई मंत्री इस समिति का सदस्य नहीं हो सकता। समिति के अध्यक्ष की नियुक्ति लोकसभा अध्यक्ष द्वारा लोकसभा के सदस्यों में से ही की जाती है। 1967 से एक परंपरा चली आ रही है जिसके अनुसार समिति का अध्यक्ष विपक्षी दल से ही चुना जाता है।

समिति के कुछ महत्वपूर्ण कार्य निम्नलिखित है :-

◼ नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) राष्ट्रपति को तीन प्रतिवेदन सौंपता है –

(1) विनियोग लेखा पर लेखा परीक्षा प्रतिवेदन (Audit report on appropriation account),

(2) वित्त लेखा पर लेखा परीक्षा प्रतिवेदन (Audit report on finance account) तथा

(3) सार्वजनिक उद्यमों पर लेखा परीक्षा प्रतिवेदन।

राष्ट्रपति इन तीनों को संसद में पेश करता है। इसमें से प्रतिवेदन (1) और प्रतिवेदन (2) की जांच लोक लेखा समिति करती है। इसके अलावा भी अगर लोकसभा द्वारा इसे कोई अन्य लेखा दिया गया हो तो ये उसकी भी जांच करती है।

◼ राज्य निगमों, व्यापार संस्थानों तथा विनिर्माण परियोजनाओं के लेखा तथा इस पर CAG के लेखा परीक्षा प्रतिवेदन की जांच करना। ◼ स्वशासी एवं अर्ध-स्वशासी निकायों के लेखा की जांच, जिनका लेखा परीक्षण CAG के द्वारा किया जाता है।

(2). प्राक्कलन समिति (Estimate Committee)

1950 में, उस समय वित्त मंत्री जॉन मथाई की सिफ़ारिश पर पहली पहली प्राक्कलन समिति का गठन किया गया। तब इसमें सिर्फ 25 सदस्य थे लेकिन 1956 में इसकी सदस्य संख्या बढ़ाकर 30 कर दी गई।

इसके तीसों सदस्य लोकसभा के होते हैं यानी कि इस समिति में राज्य सभा का कोई प्रतिनिधित्व नहीं होता है। इसके सदस्यों का चुनाव प्रतिवर्ष समानुपातिक प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त के अनुसार एकल हस्तांतरणीय मत के माध्यम से की जाती है। समिति का कार्यकाल एक वर्ष होता है और इसमें भी कोई मंत्री सदस्य नहीं हो सकता।

समिति के अध्यक्ष की नियुक्ति लोकसभा अध्यक्ष द्वारा लोकसभा सदस्यों में से की जाती है और वह सत्ताधारी दल का होता है।

यह समिति ‘स्थायी मितव्ययता समिति‘ के रूप में काम करता है इसका मुख्य उद्देश्य है सरकारी फिजूलखर्ची पर रोक लगाना। (मितव्ययता का मतलब है – एक तरह से कंजूसी करना या फिर सार्थक खर्च करना)

▪️ यह समिति वार्षिक अनुमानों की विस्तृत जांच करती है और बताती है कि – प्रशासन में कुशलता एवं मितव्ययता लाने के लिए क्या वैकल्पिक नीतियाँ अपनाई जा सकती है;

▪️ यह जांच करती है कि प्राक्कलन में निहित नीति के अनुसार ही राशि का समुचित प्रावधान किया गया है साथ ही संसद में प्राक्कलन किस रूप में प्रस्तुत हो, इसके बारे में भी सुझाव देता है।

▪️ इसके अलावा ये यह भी बताता है कि संसद द्वारा बनाए गए नीतियों से जो अनुमान लगाए जा रहे है क्या ये नीतियाँ संगत मितव्ययता (Relevant economy), संगठन में सुधार या प्रशासनिक सुधार ला सकता है।

याद रखिए – 1. यह बजट प्राक्कलनों की जांच तभी कर सकती है जबकि इसके लिए संसद में मतदान हो चुका हो, उसके पहले नहीं 2. यह संसद द्वारा निर्धारित नीतियों पर प्रश्न नहीं कर सकती तथा इसकी सिफ़ारिशे परामर्श के रूप में होती है यानी कि मंत्रालयों पर बाध्यकारी नहीं होती।

(3). सार्वजनिक उद्यम समिति (Public Enterprises Committee)

यह समिति 1964 में कृष्ण मेनन समिति की सिफ़ारिश पर पहली बार गठित की गई थी। उस समय 15 सदस्य होते थे हालांकि 1974 में इसकी सदस्य संख्या बढ़ाकर 22 कर दी गई (15 लोकसभा और 7 राज्यसभा से)।

इस समिति के सदस्यों का चुनाव भी उसी तरह से होता है जैसे कि ऊपर के अन्य दो समितियों का होता है। इसका भी कार्यकाल एक वर्ष का होता है और इसका भी सदस्य कोई मंत्री नहीं बन सकता है। इसके अध्यक्ष की नियुक्ति भी लोकसभा अध्यक्ष द्वारा लोकसभा सदस्यों में से ही की जाती है।

आपको याद होगा कि CAG तीन प्रकार के रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपते है जिसमें से दो की जांच तो लोक लेखा समिति द्वारा किया जाता है जबकि इसके तीसरे रिपोर्ट (सार्वजनिक उद्यमों पर लेखा परीक्षा प्रतिवेदन) की जांच इस समिति द्वारा किया जाता है।

इसके अलावा सार्वजनिक उद्यमों से संबन्धित ऐसे अन्य कार्य जो लोकसभा अध्यक्ष द्वारा दिये जाते हैं; उसकी भी जांच ये करती है। ये यह भी जांच करती है कि सार्वजनिक उद्यमों का प्रबंधन ठोस व्यावसायिक सिद्धांतों तथा युक्तिसंगत व्यवपारिक प्रचलनों के अनुसार किया जा रहा है।

समिति की सीमाएं – 1. प्रमुख सरकारी नीतियों से जुड़े मामले जो कि सार्वजनिक उद्यमों के व्यावसायिक अथवा व्यापारिक प्रकार्यों से जुड़े नहीं हो; उसकी जांच ये नहीं कर सकती है।

2. ऐसे मामले जिन पर विचार के लिए किसी विशेष वैधानिक प्रावधान के तहत कोई मशीनरी स्थापित की गई है, जिसके अंतर्गत कोई सार्वजनिक उद्यम विशेष की स्थापना हुई है; उसकी भी जांच नहीं कर सकती।

3. यह एक वर्ष के अंदर बारह से अधिक सार्वजनिक उद्यमों की जांच के मामले नहीं ले सकती

4. यह तकनीकी मामलों की जांच नहीं कर सकती क्योंकि इसके सदस्य तकनीकी विशेषज्ञ नहीं होते।

5. इसकी सिफ़ारिशे परामर्श के लिए होती है यानी कि मंत्रालयों के लिए बाध्यकारी नहीं होती।

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2. विभागीय स्थायी समितियां (Departmental standing committees)

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है ये समितियां मंत्रालय के किसी विभाग से जुड़े हुए होते हैं। लोकसभा की नियम समिति की अनुशंसाओं पर संसद में 1993 में 17 विभाग संबंधी स्थायी समितियां गठित की गई, जिसे कि 2004 में बढ़ाकर 24 कर दिया गया।

इन स्थायी समितियों का मुख्य उद्देश्य संसद के प्रति कार्यपालिका को अधिक उत्तरदायी बनाना है, खासकर के इसके वित्तीय दायित्व को। ये समितियां संसद की बजट पर अधिक सार्थक चर्चा में सहायक होती है।

इसके अलावा यह संबन्धित मंत्रालय या विभाग के विधेयकों की जांच करता है और उसके वार्षिक प्रतिवेदनों पर विचार भी करती है।

इन 24 स्थायी समितियों के कार्यक्षेत्र में केंद्र सरकार के सभी मंत्रालय और विभाग आते है। प्रत्येक स्थायी समिति में 31 सदस्य होते हैं (21 लोकसभा से और 10 राज्यसभा से)।

लोकसभा के सदस्यों का चुनाव लोकसभा अध्यक्ष करते है जबकि राज्य सभा के सदस्य का चुनाव सभापति द्वारा होता है। इस समिति का कार्यकाल 1 वर्ष का होता है और इस समिति का भी हिस्सा कोई मंत्री नहीं हो सकता है।इन समितियों की सिफ़ारिशे भी परामर्श की तरह होती है यानी कि संसद पर बाध्यकारी नहीं होती।

इन 24 स्थायी समितियों में से 8 समितियां राज्य सभा तथा 16 समितियां लोकसभा के अंतर्गत कार्य करती है। इन चौबीसों समितियों को ? विकिपीडिया से देख सकते हैं।

3. जांच समितियां (Inquiry committees)

याचिका या आवेदन समिति (Petition or application committee) – जब भी कोई विधेयक लाया जाता है तो कई लोगों को उससे कुछ शिकायतें होती है, कुछ लोग सुझाव देना चाहते है, कुछ लोग कुछ प्रावधानों को बदलवाना चाहते हैं, आम सार्वजनिक महत्व के मामलों पर दायर इसी प्रकार के याचिकाओं एवं आवेदनों पर जांच समिति विचार करती है।

दोनों सदनों के अपने अलग-अलग समिति होते हैं जिसमें से लोकसभा समिति में 15 सदस्य जबकि राज्यसभा समिति में 10 सदस्य होते है।

विशेषाधिकार समिति (Privileges Committee) – संसद के सदस्यों को व्यक्तिगत रूप से और सामूहिक रूप से कुछ विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं, जब इन विशेषाधिकारों के भंग होने का प्रश्न उत्पन्न होता है, उसे जांच करने के लिए और उस पर रिपोर्ट देने के लिए विशेषाधिकार समिति को निर्दिष्ट किया जाता है।

दोनों सदनों के अपने-अपने विशेषाधिकार समिति होता है जो पीठासीन अधिकारी द्वारा प्रत्येक वर्ष गठित किया जाता है। समिति का कार्य अर्ध-न्यायिक प्रकृति का होता है फिर भी अगर ये कभी शिकायतें करती है तो आमतौर पर इसे नजरंदाज नहीं किया जाता है।

आचार समिति (ethics Committee) – राज्यसभा में इस समिति का गठन 1997 तथा लोकसभा में सन 2000 में हुआ था। यह समिति संसद सदस्यों के लिए आचार संहिता लागू करवाती है। यह सांसदों के दुराचरण के मामलों की जांच करती है तथा समुचित कार्यवाही की सिफ़ारिश करती है।

4. परीक्षण एवं नियंत्रण के लिए समतियाँ

सरकारी आश्वासन समिति (Government assurance committee) – यह समिति मंत्रियों द्वारा सदन में समय-समय पर दिये गए आश्वासन, वचनों एवं प्रतिज्ञाओं की जांच करती है और किस सीमा तक उसका कार्यान्वयन हुआ है, इस पर रिपोर्ट देती है।

अधीनस्थ विधायन समिति (Subordinate legislative committee) – 1953 में लागू इस समिति का मुख्य कार्य इस बारे में छानबीन करना और रिपोर्ट सौंपना है कि क्या विनियम, नियम, उपनियम तथा नियमावली बनाने के लिए संसद द्वारा कार्यपालिका को संविधान द्वारा प्रदत शक्तियों का उपयोग भली-भांति हो रहा है या नहीं। दोनों सदनों में अलग-अलग समिति होती है जिसकी सदस्य संख्या 15 होती है।

सदन के पटल पर पुरःस्थापित दस्तावेजों की समिति (Committee of documents) – इस समिति का मुख्य काम सदन के पटल पर रखे गए सभी दस्तावेजों का अध्ययन करके यह देखना होता है कि वे संविधान के प्रावधान, अधिनियम अथवा नियम के अनुरूप है या नहीं। यह समिति 1975 में गठित की गई थी। दोनों सदनों की अपनी-अपनी समिति है जिसमें से लोकसभा समिति में 15 सदस्य होते है जबकि राज्यसभा समिति में 10 सदस्य।

अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति कल्याण समिति (Scheduled Castes and Scheduled Tribes Welfare Committee) – इस समिति का मुख्य काम है अनुसूचित जाति राष्ट्रीय आयोग तथा अनुसूचित जनजाति राष्ट्रीय आयोग के रिपोर्टों पर विचार करना और अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के कल्याण से संबन्धित सभी मामलों की जांच करना, इस समिति के 30 सदस्य होते हैं – 20 लोकसभा तथा 10 राज्य सभा से।

महिला सशक्तिकरण समिति (Women Empowerment Committee) – इस समिति का मुख्य कार्य राष्ट्रीय महिला आयोग के रिपोर्टों पर विचार करना तथा केंद्र सरकार द्वारा महिलाओं की स्थिति, गरिमा तथा सभी क्षेत्रों में समानता के लिए क्या कदम उठाए गए हैं, इसकी जांच करना है। यह समिति 1997 में गठित हुई थी। इसके 30 सदस्य होते हैं – 20 लोकसभा तथा 10 राज्यसभा से।

लाभ के पदों पर संयुक्त समिति (Joint Committee on Profit Posts) – यह समिति, केंद्र, राज्य तथा केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा गठित विभिन्न समितियों तथा निकायों के गठन तथा चरित्र की जांच करती है इस समिति में 15 सदस्य होते है। 10 लोकसभा तथा 5 राज्यसभा से।

5. सदन के दैनंदिन के कामकाज से संबन्धित समितियां

कार्य सलाहकार समिति (Work advisory committee) – इस समिति का मुख्य काम सदन के कार्यक्रमों तथा समय सारिणी को नियमित रखना है। यह सदन के समक्ष सरकार द्वारा लाये गए विधायी तथा अन्य कार्यों पर चर्चा के लिए समय निर्धारित करती है।

दोनों सदनों के अपने-अपने कार्य सलाहकार समिति होते हैं जिसमें से लोकसभा समिति के 15 सदस्य होते है तथा लोकसभा अध्यक्ष इसके अध्यक्ष होते है। राज्यसभा समिति में 10 सदस्य होते है तथा सभापति इसके अध्यक्ष होते हैं।

निजी सदस्यों के विधेयक तथा संकल्पों के लिए समिति (Committee for Private Members’ Bills and Resolutions) – इस समिति का मुख्य काम विधेयकों का वर्गीकरण करना है तथा निजी या व्यक्तिगत स्तर पर सदस्यों द्वारा प्रस्तुत विधेयकों और संकल्पों पर चर्चा के लिए समय निर्धारित करना है।

15 सदस्यों वाला यह समिति लोकसभा की विशेष समिति है और जिसके अध्यक्ष उप लोकसभाध्यक्ष होते है। राज्यसभा में ऐसी कोई समिति नहीं होती।

नियम समिति (Rules committee) – यह समिति सदन में कार्य पद्धति तथा संचालन से संबन्धित मामलों पर विचार करती है और साथ ही सदन के नियमों में आवश्यक संशोधन भी सुझाती है। लोकसभा की बात करें तो उसमें 15 सदस्य होते हैं तथा लोकसभाध्यक्ष इसके पदेन अध्यक्ष होते हैं। इसी प्रकार राज्यसभा समिति में 16 सदस्य होते है और सभापति इसके पदेन अध्यक्ष होते है।

सदस्यों की अनुपस्थिति संबंधी समिति (Committee on Absence of Members) – जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह समिति सदन की बैठकों से सदस्यों की अनुपस्थिति के अवकाश संबंधी सभी आवेदनों पर विचार करती है और ऐसे सदस्यों के मामलों की जांच करती है जो बिना अनुमति 60 या अधिक दिन तक सदन से अनुपस्थित रहे हों। यह समिति लोकसभा की एक विशेष समिति होती है जिसके 15 सदस्य होते हैं। राज्यसभा में ऐसी कोई समिति नहीं होती।

6. गृह-व्यवस्था समितियां (Housekeeping Committees)

सामान्य प्रयोजन समिति (General purpose committee) – यह समिति सदन से संबन्धित ऐसे तदर्थ मामलों को देखती है जो अन्य संसदीय समितियों के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते। प्रत्येक सदन का एक सामान्य प्रयोजन समिति होता है और इसके पीठासीन अधिकारी इसके पदेन अध्यक्ष होते हैं।

इस समिति के सदस्यों में उपाध्यक्ष या उप सभापति, उस सदन के सभी स्थायी समितियों के सभापति, मान्यता प्राप्त दलों या ग्रुपों के नेता और ऐसे अन्य सदस्य होते हैं जो पीठासीन अधिकारी द्वारा मनोनीत किए जाये।

आवास समिति (Housing committee) – इस समिति का काम है संसद सदस्यों को आवासीय तथा अन्य सुविदाएं देना, जैसे – भोजन, चिकित्सकीय सहायता, इत्यादि जो की उन्हे उनके आवासों अथवा हॉस्टलों में प्रदान की जाती है। लोकसभा में इसके 12 सदस्य होते है।

पुस्तकालय समिति (Library committee) – यह समिति संसद के पुस्तकालय से संबन्धित मामलों को देखती है तथा सांसदों को पुस्तकालय सेवा का लाभ उठाने में सहायता करती है। इस समिति में 9 सदस्य होते है, 6 लोकसभा तथा 3 राज्यसभा

सदस्यों के वेतन-भत्ते से संबन्धित संयुक्त समिति (Joint Committee on Salaries and Allowances of Members) – यह समिति, संसद सदस्यों का वेतन, भत्ता तथा पेंशन अधिनियम 1954 के अंतर्गत काम करता है। इसके 15 सदस्य होते हैं (10 लोकसभा से तथा 5 राज्यसभा से)। यह सदस्यों के वेतन, भत्ते तथा पेंशन नियमित करने के संबंध में नियमावली बनाती है।

सलाहकार समिति (Advisory Committee)

इन समितियों का गठन संसदीय कार्य मंत्रालय द्वारा की जाती है। इन समितियों के गठन, कार्य तथा कार्यपद्धति के बारे में दिशा निर्देश संबन्धित मंत्रालय द्वारा दिये जाते है। ये एक अनौपचारिक चर्चा का मंच है जहां मंत्रियों और संसद सदस्यों के बीच सरकार की नितियों एवं कार्यक्रमों तथा उनके कार्यान्वयन के तौर-तरीकों पर चर्चा होती है।

इसमें दोनों सदनों के सदस्य होते हैं और ये केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों से जुड़ी रहती है। एक मंत्रालय की सलाहकार समिति का अध्यक्ष उसी मंत्रालय का मंत्री अथवा प्रभारी राज्य मंत्री होता है।

इन समितियों की सदस्यता स्वैच्छिक होती है और इसे संसद सदस्यो तथा नेताओं की रुचि पर छोड़ दिया जाता है। समिति की अधिकतम सदस्य संख्या 30 हो सकती है और न्यूनतम 10। ये समितियां लोकसभा भंग होने के साथ ही स्व

संसदीय समितियां – Practice Quiz


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Chapter Wise Polity Quiz

संसदीय समितियां अभ्यास प्रश्न

  1. Number of Questions - 12 
  2. Passing Marks - 75 %
  3. Time - 10 Minutes
  4. एक से अधिक विकल्प सही हो सकते हैं।

1 / 12

विभिन्न प्रकार के स्थायी समितियों के संदर्भ में दिए गए कथनों में से सही कथन का चुनाव करें;

  1. संसद के पुस्तकालय से संबन्धित मामलों को देखने के लिए पुस्तकालय समिति होता है।
  2. लोक लेखा समिति के सदस्यों का चुनाव समानुपातिक प्रतिनिधित्व के सिद्धान्त के अनुसार होता है।
  3. लोक लेखा समिति में 22 सदस्य होते हैं।
  4. संसद सदस्यों को आवासीय सुविधाएं देने के लिए आवास समिति भी होती है।

2 / 12

प्राक्कलन समिति के संबंध में दिए गए कथनों में से सही कथन का चुनाव करें;

3 / 12

निम्न में से कौन सी समिति स्थायी समिति है?

4 / 12

इसमें से किस रिपोर्ट की जांच लोक लेखा समिति नहीं करती है?

5 / 12

संसदीय समितियों के बनाए जाने के पीछे के सबसे उपयुक्त कारण निम्न में से कौन सा है?

6 / 12

संसदीय समितियों के संदर्भ में दिए गए कथनों  में से सही कथन का चुनाव करें;

7 / 12

दिए गए कथनों में से सही कथन का चुनाव करें;

8 / 12

सदन के दैनंदिन के कामकाज से संबन्धित समितियों के संबंध में दिए गए कथनों में से सही कथन का चुनाव करें;

  1. नियम समिति सदन में कार्य पद्धति तथा संचालन से संबन्धित मामलों पर विचार करती है।
  2. लोकसभा स्पीकर नियम समिति का अध्यक्ष होता है।
  3. 60 दिन या उससे अधिक दिन तक संसद से अनुपस्थित रहने वाले सांसदों की जांच करने के लिए एक पृथक समिति है।
  4. सदन के कार्यक्रमों तथा समय सारिणी को नियमित रखने के लिए कार्य सलाहकार समिति होती है।

9 / 12

निम्न में से कौन सा कथन सही है?

  1. एक सदन द्वारा विधेयक पारित हो जाने पर दूसरे सदन द्वारा उसे प्रवर समिति को नहीं भेजा जा सकता है।
  2. प्रवर समिति विधेयक पर उसी प्रकार प्रावधान दर प्रावधान विचार करती है जैसे कि दोनों सदन द्वारा किसी विधेयक पर विचार किया जाता है।
  3. संयुक्त संसदीय समिति में दोनों सदन के सदस्य शामिल होते हैं।
  4. संयुक्त संसदीय समिति के रिपोर्ट को मानना सरकार के लिए बाध्य होता है।

10 / 12

इनमें से कौन सा कथन संसदीय समितियों की विशेषता है?

  1. जांच खत्म करने के बाद ये समितियां अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को ही सौंप सकती है।
  2. इन समितियों की नियुक्ति लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति द्वारा होता है।
  3. इन समितियों का एक सचिवालय होता है।
  4. इन समितियों को एक सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को देनी होती है।

11 / 12

वित्तीय समितियों के संदर्भ में दिये गए कथनों में से सही कथन का चुनाव करें;

12 / 12

इनमें से कौन सा कथन विभागीय स्थायी समितियों के संबंध में सत्य है?

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