संसदीय समितियां (भाग 1) : तदर्थ समितियां

संसद के पास समय कम होता है लेकिन काम बहुत ही ज्यादा। ऐसे में कार्य निष्पादन सही से हो सके, इसके लिए संसदीय समितियां (Parliamentary committees) काम में आती है।

इस लेख में भारत की संसदीय समितियों पर सरल और सहज चर्चा करेंगे। सुविधा की दृष्टि से इस लेख को दो भागों में बांट दिया गया है। आप अभी इसके पहले भाग को पढ़ने वाले हैं।

संसदीय समितियां

संसदीय समितियां क्या है?

सरकार के पास अपना काम करने के लिए विशाल और उन्नत प्रशासन तंत्र तथा संगठन उपलब्ध होता है जिसकी मदद से उसका सारा काम हो जाता है लेकिन संसद के मामले में ऐसा नहीं है, एक तो संसद साल में 70 – 80 दिन चलती है और ऊपर से उसके काम इतनी विविधता, जटिलता और व्यापकता लिए होती है कि वह अपने समक्ष लाये गए विषयों का प्रभावकारी ढंग से स्वयं निष्पादन करने तक में असमर्थ हो जाती है।

यानी कि संसद के पास न तो पर्याप्त समय होता है, न ही आवश्यक विशेषज्ञता जिससे कि वह समस्त विधायी उपायों तथा अन्य मामलों की गहन छानबीन कर सकें, यही कारण है कि संसद का बहुत सा काम सभा की समितियों द्वारा निपटाया जाता है, जिन्‍हें संसदीय समितियां (Parliamentary committees) कहते हैं।

संसदीय समितियों की विशेषताएँ

संविधान में संसदीय समितियों का जिक्र पृथक रूप में नहीं मिलता है बल्कि संदर्भ के रूप में मिलता है इसीलिए इन समितियों के गठन, कार्यकाल तथा कार्य आदि के संबंध में संसद के दोनों सदनों द्वारा बनाए गए नियम ही प्रभावी होते हैं। इन समितियों की विशेषताएँ है;

1. इन समितियों की नियुक्ति या निर्वाचन लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति द्वारा होता है, इसीलिए ये समितियां उसी के निर्देशानुसार कार्य करती है।
2. अपनी जांच खत्म करने के बाद ये समितियां अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति को सौंपती है।
3. इन समितियों जिसका एक सचिवालय होता है, जिसकी व्यवस्था लोकसभा या राज्यसभा सचिवालय करता है।

यहाँ पर एक बात याद रखिए कि परामर्शदात्री समिति (Consultative Committee) भी संसद सदस्यों से ही गठित होती है लेखिन यह संसदीय समिति नहीं होती क्योंकि यह उपरोक्त शर्तों को पूरा नहीं करती। जैसे कि सलाहकार समिति (Advisory Committee)।

संसदीय समितियां कितने प्रकार की होती हैं?

मोटे तौर पर संसदीय समितियाँ दो प्रकार की होती है – स्थायी समितियाँ (Standing committees) तथा तदर्थ समितियां (Ad hoc committees)

स्थायी समितियां (Standing committees), स्थायी एवं नियमित होती है और ये निरंतरता के आधार पर कार्य करती है। इसका गठन प्रत्येक वर्ष अथवा समय-समय पर किया जाता है।

तदर्थ समितियां (Ad hoc committees), अस्थायी एवं अनियमित होती है। जिस प्रयोजन से इसका गठन किया जाता है वह पूरा होते ही इसे समाप्त कर दिया जाता है।

इस चार्ट की मदद से देख सकते हैं की स्थायी एवं तदर्थ समितियों के अंतर्गत कितनी समितियां आती है-

स्थायी समितियांतदर्थ समितियां
कार्य की प्रकृति के आधार पर मुख्य रूप से इसे 6 भागों में बांटा जाता है –तदर्थ समिति को मोटे तौर पर दो भागों में विभाजित किया जाता है –
1. वित्त समितियां 2. विभागीय स्थायी समितियां 3. जांच समितियां 4. परीक्षण एवं नियंत्रण के लिए गठित समितियां 5. सदन के दैनंदिन कार्यों से संबन्धित समितियां 6. सदन समितियां अथवा सेवा समितियां1. जांच समितियाँ 2. प्रवर या संयुक्त समितियाँ

स्थायी समितियां बहुत ही व्यापक है जबकि तदर्थ समितियां बनती और खत्म होती रहती है। आइये पहले तदर्थ समिति को समझते हैं

तदर्थ समितियाँ (Ad hoc Committees)

तदर्थ समिति को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में विभाजित किया जाता है – (1) जांच समिति (Inquiry committees) एवं (2) प्रवर या संयुक्त समिति (Select or Joint Committees)

जांच समितियों (Inquiry committees) का गठन समय-समय पर लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति द्वारा किया जाता है इसे किसी विशिष्ट मामले की जांच करने और प्रतिवेदन (Report) देने के लिए गठित किया जाता है।

जैसे कि राष्ट्रपति अभिभाषण के दौरान सदस्यों के आचरण की जांच के लिए गठित समिति, संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (MPLADS) के लिए गठित समिति आदि।

प्रवर या संयुक्त समितियों का गठन विशिष्ट विधेयकों पर विचार करने और प्रतिवेदन देने के लिए किया जाता है। ये समितियां अन्य तदर्थ समितियों से इस मायने में भिन्न होता है कि इसका संबंध सिर्फ विधेयकों से होता है और इस समिति द्वारा जिस प्रक्रिया या नियमों को अपनाया जाता है वह लोकसभा अध्यक्ष या सभापति द्वारा दिये गए निर्देशों पर आधारित होता है

जब किसी सदन में कोई विधेयक सामान्य चर्चा के लिए लाया जाता है, तब सदन चाहे तो उसे सदन की प्रवर समिति (Select Committee) को अथवा दोनों सदनों की संयुक्त समिति (joint Committee) को भेज सकता है। प्रवर समिति किसी एक सदन के सांसदों से मिलकर ही बनती है यानी कि प्रवर समिति में किसी एक सदन के ही सदस्य होते हैं। वहीं संयुक्त समिति की बात करें तो इसके सदस्य दोनों सदनों से होते हैं।

इन समितियों के पास विधेयक को कैसे भेजा जाता है?

किसी भी विधेयक को प्रवर समिति (Select Committee) या संयुक्त समिति (joint Committee) के पास निम्नलिखित तीन तरीकों से भेजा जाता है –

(1) जब कोई मंत्री सदन में ये प्रस्ताव रखता है कि उसके विधेयक की सदन के प्रवर या संयुक्त समिति द्वारा जाँच की जाए,

(2) यदि मंत्री इस प्रकार का कोई प्रस्ताव नहीं रखता है तो उस विधेयक को प्रवर या संयुक्त समिति या विभागीय स्थायी समिति के पास भेजना है या नहीं ये लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति निर्णय करता है।

(3) एक सदन द्वारा अगर विधेयक पारित भी हो गया हो तो वह दूसरे सदन द्वारा प्रवर समिति के पास भेजा जा सकता है।

इन समितियों के पास भेजे जाने के फायदे –

▪️ समिति विधेयक पर उसी प्रकार प्रावधान दर प्रावधान विचार करती है जैसे कि दोनो सदन द्वारा किसी विधेयक पर विचार किया जाता है।

▪️ यह विशेषज्ञों, हितधारकों और नागरिकों से टिप्पणियों और सुझावों को आमंत्रित करती है और सरकार के दृष्टिकोण पर भी विचार करती है। इससे होता ये है कि उस विधेयक की संभावित त्रुटियाँ दूर हो जाती है।

▪️ इसके बाद रिपोर्ट तैयार की जाती है, जिसमें समिति के सदस्य द्वारा विभिन्न प्रावधानों पर संशोधन भी प्रस्तावित किए जा सकते हैं। हालांकि इसके रिपोर्ट बाध्यकारी नहीं होते हैं इसीलिए इसे माना भी जा सकता है और नहीं भी। इसे आमतौर पर 3 महीनों में अपनी रिपोर्ट देनी होती है।

कुछ तदर्थ समिति

क्र.सं.समिति का नामकार्यकाल
1.रेल अभिसमय समितिएक लोक सभा की अवधि के लिए
2.संसद सदस्‍यों तथा लोक सभा सचिवालय के अधिकारियों को कंप्‍यूटर उपलब्‍ध कराने संबंधी समितिएक लोक सभा की अवधि के लिए
3.संसद सदस्‍य स्‍थानीय क्षेत्र विकास योजना समिति1 वर्ष
4.आचार समितिनियत नहीं। पुनर्गठन किए जाने तक बनी रहेगी।
5.संसद भवन परिसर में खाद्य प्रबंधन संबंधी समिति1 वर्ष
6.संसद भवन परिसर में राष्‍ट्रीय नेताओं और संसदविदों की मूर्तिया/तस्‍वीर लगाने संबंधी समितिएक लोक सभा की अवधि के दौरान
7.संसद भवन परिसर में सुरक्षा संबंधी संयुक्‍त समिति1 वर्ष
8.लाभ के पद संबंधित सांविधानिक और विधिक स्‍थिति की जांच करने संबंधी समितिप्रतिवेदन प्रस्‍तुत किए जाने तक।
9.लोक सभा के सदस्‍यों के कदाचार की जांच करने संबंधी समितिनियत नहीं

स्थायी समितियाँ (Standing committees)

स्थायी समितियों पर चर्चा अगले लेख में की गई है, बेहतर समझ के लिए उसे भी पढ़ें। दिये गए लिंक की मदद से उसे पढ़ा जा सकता है। यहाँ से पढ़ें↗️

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Article Based On,
एम लक्ष्मीकान्त – भारत की राजव्यवस्था↗️
हमारी संसद – सुभाष कश्यप
संसदीय समिति लोकसभा आदि।

डाउनलोड‌‌‌‌ संसदीय समितियां पीडीएफ़‌

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