Powers and Functions of Parliament (संसद: शक्तियाँ एवं कार्य)

इस लेख में हम संसद की शक्तियाँ एवं कार्य (Powers and Functions of Parliament) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे, ↗️संसद (Parliament) को ज़ीरो लेवल से समझने के लिए दिये गए लिंक को विजिट करें।
powers and functions of parliament

संसद अगर किसी काम के लिए लोकप्रिय है तो वो है कानून बनाना। बेशक ये इसका एक मुख्य काम है पर वर्तमान राजनीतिक-प्रशासनिक व्यवस्था में संसद कानून बनाने के अलावा भी कई अन्य महत्वपूर्ण काम करती है। आइये उसकी इस बहुक्रियात्मक भूमिका को सरल और संक्षिप्त तरीके से समझते हैं।

संसद की शक्तियाँ एवं कार्य
(Powers and Functions of Parliament)

इसकी शक्तियों एवं कार्यों को निम्नलिखित शीर्षकों के तहत वर्गीकृत किया जा सकता है:-

1. विधायी शक्तियाँ एवं कार्य
(Legislative powers and functions of parliament)

जैसा कि हम सब जानते हैं संसद का प्राथमिक कार्य देश के संचालन के लिए विधियाँ बनाना है। आमतौर पर संसद अपने कुल समय का 1/5 भाग विधान कार्य पर खर्च करता है। इसके पास संघ सूची के विषयों पर, अवशिष्ट विषयों पर (जो विषय तीनों सूचियों में से किसी सूची में शामिल न हो) तथा समवर्ती सूची के विषयों पर तो विधि बनाने का अधिकार है ही। साथ ही साथ संविधान, संसद को राज्य सूची के विषयों पर विधि बनाने की शक्ति प्रदान करता है।

हालांकि ऐसा निम्नलिखित पाँच असामान्य परिस्थितियों के अंतर्गत हो सकता है:- 1. जब राज्यसभा इसके लिए एक संकल्प पारित करे, 2. जब राष्ट्रीय आपातकाल लागू हो, 3. जब दो या दो से अधिक राज्य संसद से ऐसा संयुक्त अनुरोध करें, 4. जब अंतर्राष्ट्रीय समझौते, संधि एवं समझौते के तहत ऐसा करना जरूरी हो, 5. जब राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो।

⚫संसद विधियों का खाका तैयार करती है और कार्यपालिका को, उसी मूल विधि के ढांचे में ही विस्तृत नियम और विनियम (Regulations) बनाने के लिए प्राधिकृत (Authorized) करती है। इसे प्रत्यायोजित विधान या कार्यपालिका विधान या अधीनस्थ विधान (Subordinate legislation) कहा जाता है। ऐसी नियमों और विनियमों को जांच के लिए संसद के समक्ष रखा जाता है।

2. कार्यकारी शक्तियाँ एवं कार्य
(Executive powers and functions of parliament)

भारत में संविधान ने सरकार के संसदीय रूप की स्थापना की है। जिसमें कार्यपालिका अपनी नीतियों एवं कार्यों के लिए संसद के प्रति उत्तरदायी होती है। यानी कि कार्यपालिका तब तक ही सत्ता में बना रहता है जब तक लोकसभा का विश्वास उसमें हो। लोकसभा अगर चाहे तो किसी भी समय बहुमत द्वारा सरकार को विघटित कर सकता है। लोकसभा सरकार के प्रति विश्वास की कमी का प्रस्ताव निम्नलिखित तरीके से ला सकती है :-

1. राष्ट्रपति के उद्घाटन भाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पास न कर, 2. धन विधेयक को अस्वीकार कर, 3. निंदा प्रस्ताव या स्थगन प्रस्ताव पास कर, 4. नीति संबंधी किसी आवश्यक मुद्दे पर सरकार को पराजित करके, 5. कटौती प्रस्ताव पास कर।

वैसे आमतौर पर संसद कार्यकारिणी पर प्रश्नकाल, शून्यकाल, आधे घंटे की चर्चा, अल्पावधि चर्चा, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, स्थगन प्रस्ताव, निंदा प्रस्ताव और अन्य चर्चाओं के जरिये नियंत्रण रखती है।

सदन अपनी अपनी समितियों जैसे सरकारी आश्वासनों संबंधी समिति, अधीनस्थ विधान संबंधी समिति, याचिका समिति इत्यादि के माध्यम से कार्यपालिका के कार्यों का अधीक्षण करती है।

3. वित्तीय शक्तियाँ एवं कार्य
(Financial powers and functions of parliament)

कार्यपालिका को ↗️बजट (Budget) तैयार करने का अधिकार प्राप्त है पर संसद की सहमति के बिना कार्यपालिका न ही किसी कर की उगाही कर सकती है, न ही कोई कर लगा सकती और न ही किसी प्रकार का व्यय कर सकती है। इसीलिए बजट को स्वीकृति के लिए संसद के समक्ष रखा जाता है।

बजट के माध्यम से संसद सरकार को आगामी वित्त वर्ष में आय एवं व्यय की अनुमति प्रदान करती है। इसके अलावा संसद, विभिन्न वित्तीय समितियों के माध्यम से सरकार के खर्चों की भी जांच करती है और उस पर नियंत्रण रखती है। इन समितियों में शामिल हैं- लोक लेखा समति, प्राक्कलन समिति एवं सार्वजनिक उपक्रमों संबंधी समिति। ये अवैध, अनियमित, अमान्य, अनुचित प्रयोगों एवं सार्वजनिक खर्चों के दुरुपयोग के मामलों को भी सामने लाती है।

कार्यपालका के वित्तीय मामलों पर संसद का नियंत्रण निम्न दो तरीकों से संभव हो पाता है:- 1. बजटीय नियंत्रण (Budgetary control), जो कि बजट के प्रभावी होने से पूर्व अनुदान मांगों के रूपो में होता है। तथा, 2. उत्तर बजटीय नियंत्रण (Post budgetary control), जो अनुदान मांगों कों स्वीकृति दिये जाने के पश्चात तीन वित्तीय समितियों के माध्यम से स्थापित किया जाता है।

बजट, वार्षिकता के सिद्धान्त पर आधारित होता है। जिसमें संसद, सरकार को एक वर्ष में व्यय करने के लिय धन उपलब्ध कराती है। यदि मंजूर किया धन, वर्ष के अंत तक व्यय नहीं होता तो शेष धन का ‘छास’ हो जाता है तथा भारत की संचित निधि में चला जाता है। इस प्रक्रिया को ‘छास का सिद्धान्त’ कहते हैं।

इससे संसद का प्रभावी वित्तीय नियंत्रण स्थापित होता है तथा उसकी अनुमति के बिना कोई भी आरक्षित कोश नहीं बनाया जा सकता है। हालांकि, इस सिद्धान्त के कारण वित्त वर्ष के अंत में व्यय का भारी कार्य उत्पन्न हो सकता है, जिसे ‘मार्च रश’ कहते हैं।

4. संवैधानिक शक्तियाँ एवं कार्य
(Constitutional powers and functions of parliament)

अनुच्छेद 368 के अंतर्गत, संसद में संविधान संशोधन की शक्तियाँ निहित है जिससे वह संविधान में किसी भी प्रावधान को जोड़कर, समाप्त करके या संशोधित करके इसमें संशोधन कर सकती है।

संविधान के कुछ भागों को विशेष बहुमत द्वारा तथा कुछ अन्य भागों को साधारण बहुमत द्वारा संसद बदल सकती है। यह बहुमत संसद में उपलब्ध सदस्यों के बीच से तय होती है।

कुछ व्यवस्थाएं ऐसी भी हैं, जिसे संसद विशेष बहुमत एवं करीब आधे राज्य विधानमंडलों की सहमति के बाद ही संशोधित का सकती है।

कुछ मिलाकर देखें तो संसद संविधान को तीन प्रकार से संशोधित कर सकती है :- 1. साधारण बहुमत द्वारा 2. विशेष बहुमत द्वारा एवं 3. विशेष बहुमत द्वारा, लेकिन आधे राज्यों के विधानमंडलों की स्वीकृति के साथ।

यहाँ पर याद रखने वाली बात ये है कि संसद की यह शक्ति असीमित नहीं है, यह संविधान के मूल ढांचे की शर्तानुसार है। दूसरे शब्दों में, संसद संविधान के मूल ढांचे के अतिरिक्त किसी भी व्यवस्था को संशोधित कर सकती है। यह निर्णय उच्चतम न्यायालय ने केशवानन्द भारती मामले 1973 में दिया था।

5. न्यायिक शक्तियां एवं कार्य
(Judicial powers and functions of parliament)

संसद की न्यायिक शक्तियाँ और कार्य में निम्नलिखित शामिल हैं: 1. संविधान के उल्लंघन पर यह राष्ट्रपति को पदमुक्त कर सकती है। 2. यह उपराष्ट्रपति को उसके पद से हटा सकती है। 3. यह उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों, मुख्य चुनाव आयुक्त, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक को हटाने के लिए राष्ट्रपति से सिफ़ारिश कर सकती है। 4. यह अपने सदस्यों या बाहरी लोगों को इसकी अवमानना या विशेषाधिकार के उल्लंघन के लिए दंडित कर सकती है।

6. निर्वाचक शक्तियाँ एवं कार्य
(Electoral powers and functions of parliament)

संसद राष्ट्रपति के निर्वाचन में भाग लेती है और उप-राष्ट्रपति को चुनती है। लोकसभा अपने अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष को चुनती है, जबकि राज्यसभा, उपसभापति का चयन करती है।

संसद को यह भी शक्ति है कि वह राष्ट्रपति एवं उप-राष्ट्रपति के निर्वाचन से संबन्धित नियम बना सकती है या उनमें संशोधन कर सकती है। वह संसद के दोनों सदनों एवं राज्य विधायिका के निर्वाचन से संबन्धित नियम बना सकती है या उनमें संशोधन कर सकती है। इसी आधार पर संसद ने राष्ट्रपतीय एवं उपराष्ट्रपतीय निर्वाचन अधिनियम 1952, लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 एवं लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 आदि बनाए हैं।

अन्य शक्तियाँ एवं कार्य
(Other powers and functions)

जानकारी प्राप्त करने का अधिकार

जानकारी संसद के लिए बहुत महत्व रखती है। वैसे तो संसद को अनेक प्रकार से, विभिन्न स्रोतों से जानकारी प्राप्त होती है पर चूंकि सरकार जानकारी का सबसे बड़ा स्रोत होता है इसीलिए संसद एवं इसके सदस्यों को जानकारी की अपनी आवश्यकताओं के लिए सरकारी विभागों पर निर्भर रहना पड़ता है।

हालांकि सरकार का स्वयं ये कर्तव्य होता है कि वह समय पर पूरी, सही और स्पष्ट जानकारी संसद को उपलब्ध कराए। संसद के प्रश्न पुछने के व्यवस्था के माध्यम से सरकार जानकारी संसद के पटल पर रखती भी है।

संघर्षों का समाधान करना और राष्ट्रीय एकता सुनिश्चित करना

विचारों एवं हितों का टकराव मानव जीवन का एक स्वाभाविक पहलू है। संसदीय लोकतंत्र को बेहतर एवं अधिक सभ्य शासन प्रणाली इसीलिए माना जाता है क्योंकि टकरावों से उत्पन्न होने वाली लड़ाइयों का स्थान संसद में वाद-विवाद एवं चर्चाएं ले लेती है। इससे समाज के भीतर के तनाव और असंतोष प्रकाश में आ जाता है और संसदीय निमयों एवं प्रक्रियाओं के कारण समझौता करना आसान हो जाता है।

भर्ती और प्रशिक्षण

संसद प्रतिभा के राष्ट्रीय रक्षित भंडार के रूप में कार्य करता है जहां से राजनीतिक नेता उभरते है। विभिन्न संसदीय समितियों में काम करते हुए सदस्यगण विशिष्ट क्षेत्रों में काफी जानकारी और विशेषज्ञता प्राप्त कर लेते हैं और वे आमतौर पर योग्य मंत्री सिद्ध होते हैं।

⚫ इसके अलावा भी संसद की अन्य कई शक्तियाँ एवं कार्य हैं, जैसे कि 1. यह देश में विचार-विमर्श की सर्वोच्च इकाई है। यह राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर बहस करती है। 2. यह तीनों तरह के आपातकाल की संस्तुति करती है। 3. यह संबन्धित राज्य विधानसभा की स्वीकृति से विधान परिषद की समाप्ति या उसका गठन कर सकती है। 4. यह राज्यों के क्षेत्र, सीमा एवं नाम में परिवर्तन कर सकती है। 5. यह उच्चतम एवं उच्च न्यायालय के गठन एवं न्यायक्षेत्र को नियंत्रित करती है और दो या अधिक राज्यो के बीच समान न्यायालय की स्थापना कर सकती है।

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