इस लेख में हम संसद के कार्य एवं शक्तियां (Powers and Functions of Parliament) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे, एवं इसके विभिन्न महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने का प्रयास करेंगे;

तो अच्छी तरह से समझने के लिए लेख को अंत तक जरूर पढ़ें साथ ही अन्य संबंधित लेख भी पढ़ें।

[संसद (Parliament) को ज़ीरो लेवल से समझने के लिए दिये गए लिंक को विजिट करें।]

संसद के कार्य एवं शक्तियां

संसद के कार्य एवं शक्तियां

संसद अगर किसी काम के लिए लोकप्रिय है तो वो है कानून बनाना। बेशक ये इसका एक मुख्य काम है पर वर्तमान राजनीतिक-प्रशासनिक व्यवस्था में संसद कानून बनाने के अलावा भी कई अन्य महत्वपूर्ण काम करती है। इसकी बहुक्रियात्मक भूमिका को समझने के लिए इसके कार्य एवं शक्तियों को निम्नलिखित शीर्षकों के तहत वर्गीकृत किया जा सकता है:-

1. संसद के विधायी कार्य एवं शक्तियां
2. संसद के कार्यकारी कार्य एवं शक्तियां
3. संसद के वित्तीय कार्य एवं शक्तियां
4. संसद के संवैधानिक कार्य एवं शक्तियां
5. संसद के न्यायिक कार्य एवं शक्तियां
6. संसद के निर्वाचक कार्य एवं शक्तियां
7. संसद के अन्य कार्य एवं शक्तियां

1. संसद के विधायी कार्य एवं शक्तियां

जैसा कि हम सब जानते हैं संसद का प्राथमिक कार्य देश के संचालन के लिए विधियाँ बनाना है। आमतौर पर संसद अपने कुल समय का 1/5 भाग विधान कार्य पर खर्च करता है। इसके पास संघ सूची के विषयों पर, अवशिष्ट विषयों पर (जो विषय तीनों सूचियों में से किसी सूची में शामिल न हो) तथा समवर्ती सूची के विषयों पर विधि बनाने का अधिकार है। कोई भी विधि बनने से पहले विधेयक के रूप में होती है और ऐसे चार प्रकार के विधेयक होते हैं जो संसद में पेश किए जाते हैं-

1. साधारण विधेयक – वित्तीय विषयों के अलावा अन्य सभी विषयों से संबद्ध विधेयक साधारण विधेयक कहलाते हैं। [विस्तार से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें]

2. धन विधेयक – ये विधेयक वित्तीय विषयों जैसे की करारोपन, लोक व्यय इत्यादि से संबन्धित होते हैं।

3. वित्त विधेयक – ये विधेयक भी वित्तीय विषयों से ही संबन्धित होते हैं लेकिन धन विधेयक से भिन्न होते हैं। [विस्तार से जानने के लिए धन विधेयक और वित्त विधेयक पढ़ें]

4. संविधान संशोधन विधेयक – इस विधेयक के माध्यम से संविधान में संशोधन किया जाता है। [विस्तार से जानने के लिए संविधान संशोधन की प्रक्रिया पढ़ें[

इसके साथ ही साथ संविधान, संसद को राज्य सूची के विषयों पर विधि बनाने की शक्ति भी प्रदान करता है। हालांकि ऐसा निम्नलिखित पाँच असामान्य परिस्थितियों के अंतर्गत हो सकता है:-
1. जब राज्यसभा इसके लिए एक संकल्प पारित करे,
2. जब राष्ट्रीय आपातकाल लागू हो,
3. जब दो या दो से अधिक राज्य संसद से ऐसा संयुक्त अनुरोध करें,
4. जब अंतर्राष्ट्रीय समझौते, संधि एवं समझौते के तहत ऐसा करना जरूरी हो,
5. जब राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो।
[ऐसा क्यों होता है इसे समझने के लिए इसे पढ़ें – राज्य क्षेत्र में संसदीय विधान↗️ ]

⚫संसद विधियों का खाका तैयार करती है और कार्यपालिका को, उसी मूल विधि के ढांचे में ही विस्तृत नियम और विनियम (Regulations) बनाने के लिए प्राधिकृत (Authorized) करती है। इसे प्रत्यायोजित विधान या कार्यपालिका विधान या अधीनस्थ विधान (Subordinate legislation) कहा जाता है। ऐसी नियमों और विनियमों को जांच के लिए संसद के समक्ष रखा जाता है।

2. संसद के कार्यकारी कार्य एवं शक्तियां

भारत में संविधान ने सरकार के संसदीय रूप की स्थापना की है। जिसमें कार्यपालिका अपनी नीतियों एवं कार्यों के लिए संसद के प्रति उत्तरदायी होती है। यानी कि कार्यपालिका तब तक ही सत्ता में बना रहता है जब तक लोकसभा का विश्वास उसमें हो। लोकसभा अगर चाहे तो किसी भी समय बहुमत द्वारा सरकार को विघटित कर सकता है। इसका मतलब है की मंत्रिपरिषद को अविश्वास प्रस्ताव पारित कर हटाया जा सकता है। लोकसभा सरकार के प्रति विश्वास की कमी का प्रस्ताव निम्नलिखित तरीके से ला सकती है :-

1. राष्ट्रपति के उद्घाटन भाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पास न कर,
2. धन विधेयक को अस्वीकार कर,
3. निंदा प्रस्ताव या स्थगन प्रस्ताव पास कर,
4. नीति संबंधी किसी आवश्यक मुद्दे पर सरकार को पराजित करके,
5. कटौती प्रस्ताव पास कर।

आमतौर पर संसद कार्यकारिणी पर प्रश्नकाल, शून्यकाल, आधे घंटे की चर्चा, अल्पावधि चर्चा, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, स्थगन प्रस्ताव, निंदा प्रस्ताव और अन्य चर्चाओं के जरिये नियंत्रण रखती है।

सदन अपनी अपनी समितियों जैसे सरकारी आश्वासनों संबंधी समिति, अधीनस्थ विधान संबंधी समिति, याचिका समिति इत्यादि के माध्यम से कार्यपालिका के कार्यों का अधीक्षण करती है।

3. संसद के वित्तीय कार्य एवं शक्तियां

कार्यपालिका को बजट (Budget) तैयार करने का अधिकार प्राप्त है पर संसद की सहमति के बिना कार्यपालिका न ही किसी कर (Tax) की उगाही कर सकती है, न ही कोई कर (Tax) लगा सकती और न ही किसी प्रकार का व्यय कर सकती है। इसीलिए बजट को स्वीकृति के लिए संसद के समक्ष रखा जाता है।

बजट के माध्यम से संसद सरकार को आगामी वित्त वर्ष में आय एवं व्यय की अनुमति प्रदान करती है। इसके अलावा संसद, विभिन्न वित्तीय समितियों के माध्यम से सरकार के खर्चों की भी जांच करती है और उस पर नियंत्रण रखती है। इन समितियों में शामिल हैं- लोक लेखा समति, प्राक्कलन समिति एवं सार्वजनिक उपक्रमों संबंधी समिति। ये अवैध, अनियमित, अमान्य, अनुचित प्रयोगों एवं सार्वजनिक खर्चों के दुरुपयोग के मामलों को भी सामने लाती है।

कार्यपालका के वित्तीय मामलों पर संसद का नियंत्रण निम्न दो तरीकों से संभव हो पाता है:-
1. बजटीय नियंत्रण (Budgetary control), जो कि बजट के प्रभावी होने से पूर्व अनुदान मांगों के रूपो में होता है। तथा,
2. उत्तर बजटीय नियंत्रण (Post budgetary control), जो अनुदान मांगों कों स्वीकृति दिये जाने के पश्चात तीन वित्तीय समितियों के माध्यम से स्थापित किया जाता है।

बजट, वार्षिकता के सिद्धान्त पर आधारित होता है। जिसमें संसद, सरकार को एक वर्ष में व्यय करने के लिय धन उपलब्ध कराती है। यदि मंजूर किया धन, वर्ष के अंत तक व्यय नहीं होता तो शेष धन का ‘छास’ हो जाता है तथा भारत की संचित निधि में चला जाता है। इस प्रक्रिया को ‘छास का सिद्धान्त‘ कहते हैं।

इससे संसद का प्रभावी वित्तीय नियंत्रण स्थापित होता है तथा उसकी अनुमति के बिना कोई भी आरक्षित कोश नहीं बनाया जा सकता है। हालांकि, इस सिद्धान्त के कारण वित्त वर्ष के अंत में व्यय का भारी कार्य उत्पन्न हो सकता है, जिसे ‘मार्च रश‘ कहते हैं।

4. संसद के संवैधानिक कार्य एवं शक्तियां

अनुच्छेद 368 के अंतर्गत, संसद में संविधान संशोधन की शक्तियाँ निहित है जिससे वह संविधान में किसी भी प्रावधान को जोड़कर, समाप्त करके या संशोधित करके इसमें संशोधन कर सकती है।

संविधान के कुछ भागों को विशेष बहुमत द्वारा तथा कुछ अन्य भागों को साधारण बहुमत द्वारा संसद बदल सकती है। यह बहुमत संसद में उपलब्ध सदस्यों के बीच से तय होती है। कुछ व्यवस्थाएं ऐसी भी हैं, जिसे संसद विशेष बहुमत एवं करीब आधे राज्य विधानमंडलों की सहमति के बाद ही संशोधित का सकती है।

कुछ मिलाकर देखें तो संसद संविधान को तीन प्रकार से संशोधित कर सकती है :- 1. साधारण बहुमत द्वारा 2. विशेष बहुमत द्वारा एवं 3. विशेष बहुमत द्वारा, लेकिन आधे राज्यों के विधानमंडलों की स्वीकृति के साथ।

[यहाँ से पढ़ेंबहुमत कितने प्रकार के होते हैं]

यहाँ पर याद रखने वाली बात ये है कि संसद की यह शक्ति असीमित नहीं है, यह संविधान के मूल ढांचे की शर्तानुसार है। दूसरे शब्दों में, संसद संविधान के मूल ढांचे के अतिरिक्त किसी भी व्यवस्था को संशोधित कर सकती है। यह निर्णय उच्चतम न्यायालय ने केशवानन्द भारती मामले 1973 में दिया था।

5. संसद के न्यायिक कार्य एवं शक्तियां

संसद के न्यायिक कार्य एवं शक्तियों के अंतर्गत निम्नलिखित प्रावधान आते हैं:
1. संविधान के उल्लंघन पर यह राष्ट्रपति को पदमुक्त कर सकती है। इसके लिए अनुच्छेद 61 में महाभियोग (Impeachment) की व्यवस्था है।
2. यह उपराष्ट्रपति को उसके पद से हटा सकती है।
3. यह उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों, मुख्य चुनाव आयुक्त, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक को हटाने के लिए राष्ट्रपति से सिफ़ारिश कर सकती है।
4. यह अपने सदस्यों या बाहरी लोगों को इसकी अवमानना या विशेषाधिकार के उल्लंघन के लिए दंडित कर सकती है।

6. संसद के निर्वाचक कार्य एवं शक्तियां

संसद, राष्ट्रपति के निर्वाचन में भाग लेती है और उप-राष्ट्रपति को चुनती है। लोकसभा अपने अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष को चुनती है, जबकि राज्यसभा, उप-सभापति का चयन करती है क्योंकि सभापति उप-राष्ट्रपति होता है।

संसद को यह भी शक्ति है कि वह राष्ट्रपति एवं उप-राष्ट्रपति के निर्वाचन से संबन्धित नियम बना सकती है या उनमें संशोधन कर सकती है। वह संसद के दोनों सदनों एवं राज्य विधायिका के निर्वाचन से संबन्धित नियम बना सकती है या उनमें संशोधन कर सकती है। इसी आधार पर संसद ने राष्ट्रपतीय एवं उप-राष्ट्रपतीय निर्वाचन अधिनियम 1952, लोक-प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 एवं लोक-प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 आदि बनाए हैं।

7. संसद_के_अन्य_कार्य_एवं_शक्तियां

जानकारी प्राप्त करने का अधिकार – जानकारी संसद के लिए बहुत महत्व रखती है। वैसे तो संसद को अनेक प्रकार से, विभिन्न स्रोतों से जानकारी प्राप्त होती है पर चूंकि सरकार जानकारी का सबसे बड़ा स्रोत होता है इसीलिए संसद एवं इसके सदस्यों को जानकारी की अपनी आवश्यकताओं के लिए सरकारी विभागों पर निर्भर रहना पड़ता है।

हालांकि सरकार का स्वयं ये कर्तव्य होता है कि वह समय पर पूरी, सही और स्पष्ट जानकारी संसद को उपलब्ध कराए। संसद के प्रश्न पुछने के व्यवस्था के माध्यम से सरकार जानकारी संसद के पटल पर रखती भी है।

संघर्षों का समाधान करना और राष्ट्रीय एकता सुनिश्चित करना – विचारों एवं हितों का टकराव मानव जीवन का एक स्वाभाविक पहलू है। संसदीय लोकतंत्र को बेहतर एवं अधिक सभ्य शासन प्रणाली इसीलिए माना जाता है क्योंकि टकरावों से उत्पन्न होने वाली लड़ाइयों का स्थान संसद में वाद-विवाद एवं चर्चाएं ले लेती है। इससे समाज के भीतर के तनाव और असंतोष प्रकाश में आ जाता है और संसदीय निमयों एवं प्रक्रियाओं के कारण समझौता करना आसान हो जाता है।

भर्ती और प्रशिक्षण – संसद प्रतिभा के राष्ट्रीय रक्षित भंडार के रूप में कार्य करता है जहां से राजनीतिक नेता उभरते है। विभिन्न संसदीय समितियों में काम करते हुए सदस्यगण विशिष्ट क्षेत्रों में काफी जानकारी और विशेषज्ञता प्राप्त कर लेते हैं और वे आमतौर पर योग्य मंत्री सिद्ध होते हैं।

⚫ इसके अलावा भी संसद की अन्य कई कार्य एवं शक्तियां हैं, जैसे कि
1. यह देश में विचार-विमर्श की सर्वोच्च इकाई है। यह राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर बहस करती है।
2. यह तीनों तरह के आपातकाल की संस्तुति करती है।
3. यह संबन्धित राज्य विधानसभा की स्वीकृति से विधान परिषद की समाप्ति या उसका गठन कर सकती है।
4. यह राज्यों के क्षेत्र, सीमा एवं नाम में परिवर्तन कर सकती है।
5. यह उच्चतम एवं उच्च न्यायालय के गठन एवं न्यायक्षेत्र को नियंत्रित करती है और दो या अधिक राज्यो के बीच समान न्यायालय की स्थापना कर सकती है।‌

इसी विषय से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण लेख

भारतीय संसद :संक्षिप्त परिचर्चा
Parliamentary motions (संसदीय प्रस्ताव : प्रकार, विशेषताएँ)
Parliamentary resolution (संसदीय संकल्प)
Law making process in parliament of India
भारतीय संसद में मतदान की प्रक्रिया
बजट – प्रक्रिया, क्रियान्वयन
Joint sitting of both houses explained
Parliamentary Group (संसदीय समूह)
Parliamentary committees
संचित निधि, लोक लेखा एवं आकस्मिक निधि ; संक्षिप्त चर्चा

⚫⚫⚫⚫‌

Article Based On,
एम लक्ष्मीकान्त – भारत की राजव्यवस्था↗️
मूल संविधान
हमारी संसद – सुभाष कश्यप आदि।

डाउनलोड‌‌‌‌ पीडीएफ़‌

[wpsr_share_icons icons=”pdf,print” icon_size=”40px” icon_bg_color=”red” icon_shape=”squircle” share_counter=”empty” layout=”fluid”]