इस लेख में हम राष्ट्रपति बनाम राज्यपाल (President vs Governor) के माध्यम से राष्ट्रपति और राज्यपाल के बीच वीटो शक्ति से संबन्धित शक्तियों में अंतर, अध्यादेश निर्माण में इन दोनों के बीच शक्तियों में अंतर तथा क्षमादान मामले में इन दोनों के मध्य शक्तियों में अंतर पर सरल और सहज चर्चा करेंगे।

President vs Governor
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राष्ट्रपति बनाम राज्यपाल (President vs Governor)

राष्ट्रपति और राज्यपाल पर अलग-अलग लेख भी साइट पर उपलब्ध है, अगर आप विस्तार से पढ़ना चाहते हैं तो नीचे लिंक दिया हुआ है।

राष्ट्रपति और राज्यपाल की वीटो शक्ति की तुलना

राष्ट्रपति
सामान्य विधेयकों से संबन्धित
राज्यपाल
सामान्य विधेयकों से संबन्धित
प्रत्येक साधारण विधेयक जब वह संसद के दोनों सदनों (चाहे अलग-अलग या संयुक्त बैठक) से पारित होकर आता है तो उसे राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजा जाता है। इस मामले में उसके पास तीन विकल्प होते हैं-
1. वह विधेयक को स्वीकृत दे सकता है, फिर विधेयक अधिनियम बन जाता है।
2. वह विधेयक को अपनी स्वीकृत रोक सकता है ऐसी स्थिति में विधेयक समाप्त हो जाएगा और अधिनियम नहीं बन पाएगा।
3. यदि विधेयक को बिना किसी परिवर्तन के फिर से दोनों सदनों द्वारा पारित कराकर राष्ट्रपति की स्वीकृत के लिए भेजा जाये तो राष्ट्रपति को उसे स्वीकृति अवश्य देनी होती है।
ऐसे मामलों में राष्ट्रपति के पास केस स्थगन वीटो का अधिकार होता है। यानी कि वह उसे रोक कर रख सकता है।
प्रत्येक साधारण विधेयक जब वह विधानमंडल के सदन या सदनों (अगर विधानपरिषद भी हो तो) से पारित होकर आता है तो इसे राज्यपाल के पास मंजूरी के लिए भेजा जाता है। इस मामले में राज्यपाल के पास चार विकल्प होते है-
1. वह विधेयक को स्वीकृति प्रदान कर सकता है, विधेयक फिर अधिनियम बन जाता है
2. वह विधायक को अपनी स्वीकृति रोक सकता है तब विधेयक समाप्त हो जाएगा और अधिनियम नहीं बन पाएगा।
3. यदि विधेयक को बिना किसी परिवर्तन के फिर से विधानमंडल द्वारा पारित करकर राज्यपाल की स्वीकृति के लिए भेजा जाये तो राज्यपाल के पास केवल स्थगन वीटो का अधिकार है।
4. वह विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए सुरक्षित रख सकता है।
जब भी कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखा जाता है तो राष्ट्रपति के पास तीन विकल्प होते हैं –
1. वह विधेयक को स्वीकृत दे सकता है जिसके बाद वह अधिनियम बन जाएगा
2. वह विधेयक को अपनी स्वीकृत रोक सकता है, फिर विधेयक खत्म हो जाएगा और अधिनियम नहीं बन पाएगा।
3. वह विधेयक को राज्य विधानमंडल के सदन या सदनों के पास पुनर्विचार के लिए भेज सकता है। सदन द्वारा छह महीने के भीतर इस पर पुनर्विचार करना आवश्यक है। यदि विधेयक को कुछ सुधार या बिना सुधार के राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए दोबारा भेजा जाये तो राष्ट्रपति इसे देने के लिए बाध्य नहीं है; वह स्वीकृत कर भी सकता है और नहीं भी।
जब राज्यपाल राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए किसी विधेयक को सुरक्षित रखता है तो उसके बाद विधेयक को अधिनियम बनाने में उसकी कोई भूमिका नहीं रहती । यदि राष्ट्रपति द्वारा उस विधेयक को पुनर्विचार के लिए सदन या सदनों के पास भेजा जाता है और उसे दोबारा पारित कर फिर राष्ट्रपति के पास स्वीकृत के लिए भेजा जाता है।
इसका मतलब ये है कि अब राज्यपाल की स्वीकृति कि आवश्यकता नहीं रह गई है।
धन विधेयकों से संबन्धित धन विधेयकों से संबन्धित
संसद द्वारा पारित प्रत्येक वित विधेयक को जब राष्ट्रपति के पास स्वीकृति के लिए भेजा जाता है तो उसके पास दो विकल्प होते है –
1. वह विधेयक को स्वीकृति दे सकता है ताकि वह अधिनियम बन जाये
2. वह स्वीकृति न दे तब विधेयक समाप्त हो जाएगा और अधिनियम नहीं बन पायगा। इस प्रकार राष्ट्रपति धन विधेयक को संसद को पुनर्विचार के लिए नहीं लौटा सकता।
वित्त विधेयक जब राज्य विधानमंडल द्वारा पारित कर राज्यपाल के पास स्वीकृति के लिए भेजा जाता है तो उसके पास तीन विकल्प होते है –
1. वह विधेयक को अपनी स्वीकृति दे सकता है, तब विधेयक अधिनियम बन जाएगा।
2. वह विधेयक को अपनी स्वीकृति रोक सकता है जिससे विधेयक समाप्त हो जाएगा और अधिनियम नहीं बन पाएगा।
3. वह विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रख सकता है। इस तरह राज्यपाल भी वित्त विधेयक को पुनर्विचार के लिय राज्य विधानसभा को वापस नहीं कर सकता।
जब वित्त विधेयक किसी राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति को विचारार्थ भेजा जाता है तो राष्ट्रपति के पास दो विकल्प होते हैं –
1. वह विधेयक को अपनी स्वीकृत दे सकता है, ताकि विधेयक अधिनियम बन सके,
2. वह उसे अपनी स्वीकृति रोक सकता है। तब विधेयक खत्म हो जाएगा और अधिनियम नहीं बन पायगा। इस प्रकार राष्ट्रपति वित्त विधेयक को राज्य विधानसभा के पास पुनर्विचार के लिए नहीं भेज सकता (बिल्कुल संसद जैसे ही)
जब राज्यपाल राष्ट्रपति के विचारार्थ वित्त विधेयक को सुरक्षित रखता है तो इस विधेयक के क्रियाकलाप पर फिर उसकी कोई भूमिका नहीं रह जाती है। यदि राष्ट्रपति विधेयक को स्वीकृति दे दे तो वह अधिनियम बन जाएगा। इसका मतलब ये है कि राज्यपाल की स्वीकृति अब आवश्यक नहीं है।
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राष्ट्रपति और राज्यपाल की अध्यादेश निर्माण शक्तियों की तुलना

राष्ट्रपति राज्यपाल
1. वह किसी अध्यादेश को केवल तभी प्रख्यापित कर सकता है जब संसद के दोनों सदन या कोई एक सदन सत्र में न हो। यानी कि अगर कोई एक सदन भी सत्र में न हो तो राष्ट्रपति अध्यादेश प्रख्यापित कर सकता है। ऐसा इसीलिए क्योंकि कोई भी विधि दोनों सदनों द्वारा पारित की जानी होती है न कि एक सदन द्वारा 1. वह किसी अध्यादेश को तभी प्रख्यापित कर सकता है, जब विधानमंडल के सदन सत्र में न हो। लेकिन अगर विधानपरिषद भी हो तब अगर कोई एक सदन भी सत्र में न हो तो राज्यपाल अध्यादेश जारी कर सकता है।
2. राष्ट्रपति किसी अध्यादेश को तभी प्रख्यापित कर सकता है, जब वह देखे कि ऐसी परिस्थितियाँ बन गयी कि त्वरित कदम उठाना आवश्यक है।2. जब वह इस बात से संतुष्ट हो कि अब ऐसी परिस्थितियाँ आ गयी है कि तुरंत कदम उठाया जाना जरूरी है तो वह अध्यादेश प्रख्यापित कर सकता है।
3. राष्ट्रपति केवल उन्ही विषयों पर अध्यादेश जारी कर सकता है, जिस विषय पर संसद विधि बनाती है। नहीं तो जारी अध्यादेश अवैध हो सकता है, यदि वह संसद द्वारा बना सकने योग्य न हो।3. राज्यपाल उन्ही मुद्दों पर अध्यादेश जारी कर सकता है, जिन पर विधानमण्डल को विधि बनाने का अधिकार है। नहीं तो जारी अध्यादेश अवैध हो सकता है, यदि वह विधानमंडल द्वारा बना सकने योग्य न हो।
4. उसके द्वारा जारी कोई अध्यादेश उसी तरह प्रभावी है, जैसे संसद द्वारा निर्मित कोई अधिनियम।4. उसके द्वारा अध्यादेश की मान्यता राज्य विधानमंडल के अधिनियम के बराबर ही होता है।
5. वह एक अध्यादेश को किसी भी समय वापस कर सकता है।5. वह एक अध्यादेश को किसी भी समय वापस कर सकता है।
6. उसकी अध्यादेश निर्माण की शक्ति स्वैच्छिक नहीं है, इसका मतलब वह कोई विधि बनाने या किसी अध्यादेश को वापस लेने का काम केवल प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद के परामर्श पर ही कर सकता है।6. उसकी अध्यादेश निर्माण की शक्ति स्वैच्छिक नहीं है इसका मतलब वह कोई विधि बनाने या किसी अध्यादेश को वापस लेने का काम केवल मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही कर सकता है।
7. उसके द्वारा जारी अध्यादेश को संसद के दोनों सदनों के सभा पटल पर रखा जाना चाहिए7. उसके द्वारा जारी अध्यादेश को विधानमंडल के पटल पर रखा जाना चाहिए।
8. उसके द्वारा जारी अध्यादेश संसद का सत्र प्रारम्भ होने के छह सप्ताह उपरांत समाप्त हो जाता है। यह उस स्थिति में पहले भी समाप्त हो जाता है, जब संसद के दोनों सदन इसे अस्वीकृत करने का संकल्प पारित करें।8. उसके द्वारा जारी अध्यादेश राज्य विधानसभा का सत्र प्रारम्भ होने के छह सप्ताह उपरांत समाप्त हो जाता है। यह इससे पहले भी समाप्त हो सकता है, यदि राज्य विधान सभा इसे अस्वीकृति को सहमति प्रदान करें।
9. उस अध्यादेश बनाने में किसी निर्देश की आवश्यकता नहीं होती।9. यह बिना राष्ट्रपति से निर्देश के निम्न तीन मामलों में अध्यादेश नहीं बना सकता यदि – (1) राज्य विधानमंडल में इसकी प्रस्तुति के लिए राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति आवश्यक हो, (2) यदि राज्यपाल समान उपबंधों वाले विधेयकों को राष्ट्रपति के विचारार्थ आवश्यक माने।
(3) यदि राज्य विधानमंडल का अधिनियम ऐसा हो कि राष्ट्रपति की स्वीकृति के बिना यह अवैध हो जाये।
President vs Governor

राष्ट्रपति और राज्यपाल की क्षमादान शक्तियों तुलना

राष्ट्रपतिराज्यपाल
1. वह केन्द्रीय विधि के विरुद्ध किसी अपराध के लिए दोष सिद्ध ठहराए गए किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा, उसक प्रतिलंबन, विराम अथवा दंडादेश का निलंबन, परिहार या लघुकरण कर सकता है। 1. वह राज्य विधि के तहत किसी अपराध मे सजा प्राप्त व्यक्ति को वह क्षमादान कर सकता है या दंड को स्थगित कर सकता है।
2. वह सजा-ए मौत को क्षमा कर सकता है, कम कर सकता है या स्थगित कर सकता है या बदल सकता है। एकमात्र उसे ही यह अधिकार है कि वह मृत्युदंड की सजा को माफ कर दे।2. वह मृत्युदंड की सजा को माफ नहीं कर सकता, चाहे किसी को राज्य विधि के तहत मौत की सजा मिली भी हो, तो भी उसे राज्यपाल की बजाए राष्ट्रपति से क्षमा याचना करनी होगी। लेकिन राज्यपाल इसे स्थगित कर सकता है। या पुनर्विचार के लिय कह सकता है।
3. वह कोर्ट मार्शल (सैन्य अदालत) के तहत सजा प्राप्त व्यक्ति की सजा माफ कर सकता है, कम कर सकता है या बदल सकता है।3. उसे कोर्ट मार्शल (सैन्य अदालत) के तहत सजा प्राप्त व्यक्ति की सजा माफ करने की कोई शक्ति प्राप्त नहीं है।
President vs Governor

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