Rajya Sabha in Hindi (राज्यसभा: गठन, संरचना, शक्तियाँ)

इस लेख में हम सरल और सहज हिन्दी में राज्यसभा (Rajya Sabha in Hindi) पर चर्चा करेंगे, तो लेख को अंत तक जरूर पढ़ें।
Rajya Sabha in Hindi

जैसा कि हम जानते हैं, संसद के तीन अंग होते है ↗️राष्ट्रपति, ↗️लोकसभा और राज्यसभा। संसद को अच्छे से समझने के लिए हमने इन तीनों की समझ होनी चाहिए। राष्ट्रपति और लोकसभा पर पहले से ही लेख उपलब्ध है।

राज्यसभा की संरचना (अनुच्छेद 80)
(Structure of Rajya Sabha in Hindi)

राज्यसभा को ऊपरी सदन भी कहा जाता है और ये जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है – राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है।

सविधान के अनुसार, राज्यसभा में अधिकतम 250 सीटें हो सकती है। इसमें से 238 सीटें राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रतिनिधित्व के लिए है वहीं 12 सीटें राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाने के लिए है।

वर्तमान की बात करें तो राज्यसभा में 245 सदस्य हैं। जिसमें से 225 सदस्य राज्यों का और 8 केंद्रशासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करते हैं इसके अलावा 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत हैं।

राज्यसभा के लिए राज्यों की सीटों का बंटवारा उनकी जनसंख्या के आधार पर होता है। इसीलिए जिस राज्य की जनसंख्या अधिक है उसे सीटें भी अधिक मिली है और कम जनसंख्या वाले राज्य को कम सीटें। जैसे उत्तर प्रदेश में राज्यसभा के लिए 31 सीटें है जबकि त्रिपुरा में सिर्फ 1। वहीं केंद्रशासित प्रदेश की बात करें तो दिल्ली व पुडुचेरी को ही राज्यसभा में सीटें मिली है। लेकिन अब चूंकि जम्मू-कश्मीर भी केंद्रशासित प्रदेश हो गया है जिसके पास राज्यसभा में 4 सीटें पहले से है तो अब उसकी भी गिनती केंद्रशासित प्रदेश में होगा। इसके अलावे जो 6 केंद्रशासित प्रदेश और है उसे राज्यसभा में इसलिए प्रतिनिधित्व नहीं मिला है क्योंकि इन प्रदेशों की जनसंख्या बहुत कम है।

किस राज्य को और केंद्रशासित प्रदेश को राज्यसभा में कितनी सीटें आवंटित की गई है इसका वर्णन संविधान की चौथी अनुसूची में किया गया है। जिसे आप यहाँ से देख सकते हैं ⏫4th schedule pdf

राज्यसभा की अवधि
(Term of Rajya Sabha in hindi)

लोकसभा का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है और हरेक 5 साल बाद वह भंग हो जाता है पर राज्यसभा कभी भंग नहीं होता है और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के आधार पर इसके सांसदों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है और व्यवस्था ये है कि प्रत्येक 2 वर्ष में एक तिहाई सदस्य सेवानिवृत हो जाता है। इसीलिए हर 2 वर्ष में लगभग एक तिहाई सीटों के लिए चुनाव होता है। सेवानिवृत व्यक्ति जितनी बार चाहे उतनी बार चुनाव लड़ सकता है। राष्ट्रपति द्वारा मनोनयित व्यक्ति अगर सेवानिवृत हुआ है तो उसे हर तीसरे वर्ष के शुरुआत में राष्ट्रपति द्वारा भरा जाता है।

राज्यसभा चुनाव प्रक्रिया
(Election Process of Rajya Sabha in Hindi)

राज्यसभा सदस्यों का निर्वाचन – राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन राज्य विधानसभा के निर्वाचित सदस्य करते हैं जिसे कि निर्वाचक मण्डल कहा जाता है। चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल हस्तांतरणीय मत द्वारा होता है।

चलिये दिल्ली का उदाहरण लेकर इसे समझते हैं। दिल्ली में राज्यसभा की 3 सीटें है मान लेते हैं कि 2 सीटें अभी खाली है और उस पर चुनाव होना है। दिल्ली में विधानसभा की कुल 70 सीटें है यानी कि कुल 70 वोटर है जो वोट डालेंगे। हरेक वोटर का वोट मूल्य 100 होता है। यानी कि कुल 7000 वोट हो गए। अब कितना न्यूनतम वोट किसी को मिले कि वो जीत जाये इसके लिए कोटा निकाल लिया जाता है। कोटा निकालने का सिम्पल सा फॉर्मूला होता है कि कुल वोट जितना है उसमें भाग दे दिया जाता है जितनी सीटें खाली है उसमें 1 जोड़कर। इससे जितना निकलकर आता है उसमें 1 और जोड़ दिया जाता है। यानी कि हमारे केस में 7000 में भाग दे दीजिये 2+1 से, तो निकलकर आएगा लगभग 2333, अब इसमें 1 और जोड़ दीजिये तो हो जाएगा 2334; यानी कि एक उम्मीदवार को कम से कम 2334 वोट चाहिए। इसका मतलब ये हुआ कि अगर किसी उम्मीदवार को 24 लोगों ने वोट दे दिया तो वो जीत जाएगा। अगर किसी को 24 लोग वोट नहीं करते हैं तो उस केस में वोट ट्रान्सफर होगा। ये कैसे होता है इसे मैंने पहले ही ↗️राष्ट्रपति चुनाव वाले लेख में समझा रखा है, आप वहाँ से उसे समझ लें नहीं तो लेख बहुत ज्यादा लंबा हो जाएगा।

राष्ट्रपति द्वारा नामित सदस्य :- राष्ट्रपति, राज्यसभा में 12 ऐसे सदस्यों को नामित करता है जिन्हे कला, साहित्य, विज्ञान और समाज सेवा, विषयों के संबंध में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव हो। ऐसे व्यक्तियों को नामांकित करने के पीछे उद्देश्य है कि नामी या प्रसिद्ध व्यक्ति बिना चुनाव के राज्यसभा भेजा जा सके।

राज्यसभा की संवैधानिक स्थिति
(Constitutional status of Rajya Sabha in hindi)

राज्यसभा की विशेष शक्तियाँ

संघीय चरित्र होने के कारण राज्यसभा को दो विशेष शक्तियाँ प्रदान की गई हैं, जो लोकसभा के पास नहीं हैं :- 1. अनुच्छेद 249 के तहत, राज्यसभा संसद को राज्य सूची के विषयों पर भी विधि बनाने हेतु अधिकृत कर सकती हैं। दूसरे शब्दों में जब राज्यसभा दो तिहाई बहुमत से एक प्रस्ताव पारित करें कि, संसद को किसी राज्य के लिए कानून बनानी चाहिए तो संसद को ये शक्ति मिल जाती है कि वो राज्य के लिए कानून बना सकती है। 

2. अनुच्छेद 312 के तहत, राज्यसभा संसद को केंद्र एवं राज्य दोनों के लिए नयी अखिल भारतीय सेवा के सृजन हेतु अधिकृत कर सकती है। यानी कि अगर IAS, IPS और IFoS के अलावे किसी सेवा को अखिल भारतीय सेवा बनाना हो तो राज्यसभा ऐसा कर सकती है।

राज्यसभा की जरूरत

हालांकि राज्यसभा को लोकसभा की तुलना में कम शक्तियाँ दी गई हैं लेकिन फिर भी इसकी निम्नलिखित उपयोगिता है जो इसे प्रासंगिक बनाती है। 1. यह लोकसभा दारा जल्दबाज़ी में बनाए गए दोषपूर्ण और अविवेकपूर्ण विधान की समीक्षा करता है उसकी त्रुटियों को दूर करने का काम करता है। 2. यह उन अनुभवी एवं पेशेगत लोगों को प्रतिनिधित्व का मौका देती है जो सीधे चुनाव का सामना नहीं कर सकते 3. यह केंद्र के अनावश्यक हस्तक्षेप के खिलाफ राज्यों के हितों की रक्षा करता है और संघीय संतुलन को बरकरार रखता है।

जहां राज्यसभा, लोकसभा के बराबर हो

निम्नलिखित मामलों में राज्यसभा की शक्तियाँ एवं स्थिति लोकसभा के समान होती हैं :-
1. सामान्य विधेयकों का प्रस्तुत किया जाना और उसको पारित करना
2. संवैधानिक संशोधन विधेयकों का प्रस्तुत किया जाना और उसको पारित करना
3. वित्तीय विधेयकों का प्रस्तुत किया जाना, जिसमें भारत की संचित निधि से व्यय शामिल होता है 4. राष्ट्रपति का निर्वाचन एवं महाभियोग
5. उपराष्ट्रपति का निर्वाचन और पद से हटाया जाना। राज्यसभा विशेष बहुमत से संकल्प पारित कर और लोकसभा सामान्य बहुमत की स्वीकृति द्वारा उपराष्ट्रपति को पद से हटा सकता है
6. राज्यसभा, राष्ट्रपति को उच्चतम एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों, मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं लेखा महानियंत्रक को हटाने की सिफ़ारिश कर सकता है
7. राष्ट्रपति द्वारा जारी अध्यादेश की स्वीकृति
8. राष्ट्रपति द्वारा घोषित तीनों प्रकार के आपातकालों कि स्वीकृति
9. प्रधानमंत्री सहित सभी मंत्री दोनों में से किसी एक सदन के सदस्य होने चाहिए, हालांकि वे होते केवल लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है।
10. संवैधानिक इकाइयों, जैसे वित्त आयोग, संघ लोक सेवा आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक आदि की रिपोर्ट पर विचार करना
11. उच्चतम न्यायालय एवं संघ लोक सेवा आयोग के न्याय क्षेत्र में विस्तार।

जहां राज्यसभा, लोकसभा के बराबर न हो

निम्नलिखित मामलों में राज्यसभा की शक्तियाँ एवं स्थिति लोकसभा से आसमान हैं :-
1. धन विधेयक को सिर्फ लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है, राज्यसभा में नहीं । राज्यसभा, धन विधेयक को अस्वीकृत या संशोधित नहीं कर सकती। उसे धन विधेयक को सिफ़ारिश या बिना सिफ़ारिश के 14 दिन के भीतर लोकसभा को लौटना अनिवार्य होता है। लोकसभा, राज्यसभा की सिफ़ारिशों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है। यदि अस्वीकार भी करती है तब भी इसे दोनों सदनों द्वारा स्वीकृत माना जाता है,
2. वहीं वित्त विधेयक की बात करें तो इसे सिर्फ लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है लेकिन इसे पारित करने के मामलों में लोकसभा और राज्यसभा दोनों की शक्तियाँ समान हैं
3. कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, ये तय करने की अंतिम शक्ति लोकसभा अध्यक्ष के पास है
4. दोनों सदनों की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष द्वारा किया जाता है
5. राज्यसभा सिर्फ बजट पर चर्चा कर सकती है, उसके अनुदानों की मांगों पर मतदान नहीं करती।
6. राष्ट्रीय आपातकाल समाप्त करने का संकल्प लोकसभा द्वारा ही पारित कराया जा सकता है
7. राज्यसभा अविश्वास प्रस्ताव पारित कर मंत्रिपरिषद को नहीं हटा सकती। ऐसा इसीलिए क्योंकि मंत्रिपरिषद का सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होता है, लेकिन राज्यसभा सरकार की नीतियों एवं कार्यों पर चर्चा और आलोचना कर सकती है।

लेख बड़ा हो जाता इसीलिए ↗️राज्यसभा सभापति और उपसभापति की चर्चा अगले लेख में की गई है, उसे भी जरूर पढ़ें।
Chairman of Rajya Sabha

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