संवैधानिक उपचारों का अधिकार ॥ Right to constitutional remedies

इस लेख में हम सरल और सहज भाषा में ‘संवैधानिक उपचारों का अधिकार (Right to constitutional remedies)’ पर चर्चा करेंगे। इसे पूरा पढ़िये आप समझ जाएँगे कि क्यों इसे मूल अधिकारों का रक्षक कहा जाता है।

संवैधानिक उपचारों का अधिकार

संवैधानिक उपचारों का अधिकार

🔰अनुच्छेद 32

हमारे संविधान में एक लोक कल्याणकारी राज्य बनाने के लिए मौलिक अधिकारों पर काफी ज़ोर दिया गया है।

पर जैसा कि हम जानते हैं कि शक्तियाँ राज्य के हाथ में होती है और हमारा संविधान संशोधनीय है यानी कि राज्य चाहे तो उसमें संसोधन कर सकती है।

ऐसे में इस बात की क्या गारंटी है वो मौलिक अधिकारों को भी संशोधन करके हटा न दें। ऐसा बिलकुल संभव था और ये बात संविधान सभा भी अच्छे से जानती थी।

तो कह लीजिये कि इसी आशंका और भविष्य के संभावित खतरे तो दूर करने के लिए अनुच्छेद 32 लाया गया।

अब आपके मन में एक बात आ सकता है कि अनुच्छेद 13 में भी तो यही प्रावधान है कि किसी भी विधि से मूल अधिकारों को कम या खत्म नहीं किया जा सकता है। फिर अनुच्छेद 32 की जरूरत क्यों पड़ी?

इसके लिए आइये कुछ स्वाभाविक प्रश्न पर विचार करते हैं। मान लीजिये कि संसद को किसी मूल अधिकार को हटाना है पर अनुच्छेद 13 के कारण वो इसे हटा नहीं पा रहा है तो उसके पास एक रास्ता ये है कि,

अनुच्छेद 368 जो कि संसद को संविधान में संशोधन की शक्ति देता है। उसकी मदद से वो पहले अनुच्छेद 13 को ही हटा दें। जैसे ही ये होगा उसके बाद आसानी से वो मौलिक अधिकारों में जो चाहे वो परिवर्तन कर सकता है।

और दूसरा प्रश्न ये उठता है कि संविधान ने मौलिक अधिकार को इतनी प्राथमिकता तो दी है पर अगर ये राज्य द्वारा ये किसी भी प्रकार से हनन किया जाता है तो जनता जाये तो जाये कहाँ?

अब तो समझ रहें है न कि मूल अधिकार तब तक किसी काम का नहीं है जब तक उसे संरक्षण न मिले और जब तक उसे लागू कराने के लिए कोई प्रभावी मशीनरी न हो।

इसी को ध्यान में रखकर मूल अधिकारों के संरक्षण के लिए अनुच्छेद 32 का प्रावधान संविधान में शामिल किया गया।

इसकी खास बात ये है कि ये खुद भी एक मूल अधिकार ही है और ये संवैधानिक उपचार का अधिकार प्रदान करता है। इसीलिए तो डॉ अंबेडकर ने इसे संविधान का आत्मा और हृदय कहा था।

इस अनुच्छेद 32 को कभी भी संशोधित नहीं किया जा सकता यानी कि ये ↗️संविधान के मूल ढांचे का एक हिस्सा है।

संवैधानिक उपचारों का अधिकार और इसके प्रावधान

अनुच्छेद 32 के तहत कुछ प्रावधान है, जो निम्न है।

🔷 1.जब भी मूल अधिकारों का उल्लंघन होगा कोई भी व्यक्ति सीधे उच्चतम न्यायालय जा सकता है। इसीलिए तो उच्चतम न्यायालय को मूल अधिकारों का संरक्षक कहा जाता है।

चूंकि हमारी न्याय प्रणाली एकीकृत है इसीलिए सामान्य मामलों में हम निचली न्यायालयों से शुरू करते हैं और अगर हम उससे संतुष्ट नहीं होते हैं तो फिर ऊपरी न्यायालयों की तरफ रुख करते हैं। हमारा आखिरी लक्ष्य उच्चतम न्यायालय होता है।

पर मूल अधिकारों के संबंध में हम चाहे तो सीधे उच्चतम न्यायालय जा सकते हैं।

🔷 2. उच्चतम न्यायालय के पास कुछ संवैधानिक अधिकार है जिसे रिट कहा जाता है। उच्चतम न्यायालय इस अधिकार का प्रयोग मूल अधिकारों के संबंध में निर्देश या आदेश जारी करने के लिए करता है।

यहाँ पर बताते चलूँ कि उच्च न्यायालय के पास भी रिट जारी करने का अधिकार है जो कि अनुच्छेद 226 में वर्णित है पर वो एक मौलिक अधिकार नहीं है।

इसका मतलब आप इस तरह से भी समझ सकते हैं कि अगर कोई व्यक्ति उच्चतम न्यायालय में अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर करता है तो उच्चतम न्यायालय सुनवाई से इंकार नहीं कर सकता है,

वहीं अनुच्छेद 226 के तहत अगर कोई व्यक्ति उच्च न्यायालय में याचिका दायर करता है तो उच्च न्यायालय इसके लिए बाध्य नहीं है कि वो सुनवाई करें ही, हालांकि प्रैक्टिकली ऐसा देखने को कम ही मिलता है।

💠 यहाँ पर एक बात और ध्यान रखने योग्य है कि उच्चतम न्यायालय केवल मूल अधिकारों के क्रियान्वयन को लेकर रिट जारी कर सकता है,

💠 जबकि उच्च न्यायालय इनके अलावा किसी और उद्देश्य को लेकर भी इस जारी कर सकता है। यानी कि इस मामले में उच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र उच्चतम न्यायालय से ज्यादा है।

🔷 3. उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय रिट का प्रयोग एक टूल की तरह करता है। इससे इन दोनों न्यायालयों का अधिकार क्षेत्र काफी बढ़ जाता है।

ऐसे कुल पाँच रिट है – बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas corpus), परमादेश (mandamus), प्रतिषेध (prohibition), उत्प्रेषण (certiorari) एवं अधिकार पृच्छा (quo warranto)। ये बहुत महत्वपूर्ण है इसीलिए इसे एक अलग लेख में जानेंगे। इसे अभी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

🔷 4. संसद को यह शक्ति है कि वह किसी अन्य न्यायालय को भी रिट जारी करने की शक्ति प्रदान कर सकती है, पर फिलहाल ये अभी उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के पास ही है।

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अनुच्छेद 31

अगर आप ये सोच रहे हैं कि अनुच्छेद 31 में बारे में हमने चर्चा क्यों नहीं की तो बता दूँ कि वो संपत्ति के अधिकार से संबन्धित है और उसे संविधान के मौलिक अधिकारों से हटा दिया गया है। ऐसा क्यों किया गया है, ये एक दिलचस्प स्टोरी है इसे समझने के लिए यहाँ क्लिक करें
संविधान की मूल संरचना

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