समता का अधिकार ॥ Right to Equality

इस लेख में हम ‘समता का अधिकार (Right to Equality)’ के अंतर्गत आने वाले सारे अनुच्छेदों की सरल और सहज चर्चा करेंगे।

यह लेख पिछले लेख का कंटिन्यूएशन है। पिछले लेख में ↗️मौलिक अधिकारों की बेसिक्स की चर्चा की गयी है। अगर आपने उसे अभी तक नहीं पढ़ा है तो उसे अवश्य पढ़ें।

Basic understanding of Right to Equality

समता का अधिकार
समता का अधिकार

समता का अधिकार
(अनुच्छेद 14-अनुच्छेद 18)

🔹 समता के अधिकार को अनुच्छेद 14 से लेकर 18 तक में वर्णित किया गया है। समता का आशय समानता से होता है तो,

🔹 एक बात तो स्पष्ट है कि ‘समता का अधिकार’ अंतर्गत आने वाले पांचों अनुच्छेदों में समानता स्थापित करने वाली अधिकारों की चर्चा है।

एक लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना के लिए समानता एक मूलभूत तत्व है क्योंकि ये हमें सामाजिक,आर्थिक, राजनैतिक वंचितता से रोकता है।

🔹 समानता एक भाव है जो हमारी समाजीकरण (Socialization) की प्रक्रिया के दौरान ही हमारे अंतर्मन में उठने लगता है।

हम दूसरों से समान आदर की अपेक्षा करते हैं, हम समाज से समान व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं, हम अपने राज्य से समान अवसर प्रदान करने की अपेक्षा करते हैं। इत्यादि-इत्यादि।

🔹 उदाहरण के लिए देखें तो हम सब के वोट का मूल्य एक समान होता है, ये जो चीज़ है ये हमें एहसास दिलाता है कि ये देश मेरा भी उतना ही है जितना की किसी और का, इस देश को संवारने में, निखारने में मेरा भी उतना ही योगदान है जितना की किसी और का।

तो आइये एक-एक करके हमारे संविधान में उल्लेखित समानता के अधिकार को देखते हैं और समझने की कोशिश करते हैं। 

🔰अनुच्छेद 14 

विधि के समक्ष समता और विधियों का समान संरक्षण 
Equality before law and equal protection of laws

एक लोकतांत्रिक देश में समानता स्थापित करने के लिए न्याय बहुत जरूरी होता है। क्योंकि अगर सबके लिए अलग-अलग न्याय व्यवस्था हो या फिर अगर न्याय में दोहरी नीति को अपनाया जाता है तो फिर काहे का समानता। 

मोटे तौर पर कहें तो यहीं बात इसमें लिखी हुई है कि कानून के सामने सब एक समान है, और सबके लिए कानून एक समान है।

इसमें दो टर्म है पहला कि विधि के समक्ष समता (Equality before law) और दूसरा विधियों का समान संरक्षण (equal protection of laws) इन दोनों का ही संबंध न्याय की समानता से है पर दोनों में कुछ बारीक अंतर है। आइये उसे समझते हैं।

विधि के समक्ष समता
(Equality before Law)

इसे ब्रिटिश संविधान से लिया गया है। इसका मतलब है कि विधि के सामने कोई भी व्यक्ति चाहे अमीर गरीब, ऊंचा-नीचा, अधिकारी, गैर-अधिकारी सभी समान है किसी को भी कोई विशेषाधिकार नहीं दिया जाएगा। 

दूसरे शब्दों में इसे कहें तो ये कुछ देता नहीं है बस ये सुनिश्चित करता है कि विधि के समक्ष सब समान रहेगा।

आपने अक्सर फिल्मों में या फिर कहीं और एक औरत को हाथ में तराजू लेकर और आँख में पट्टी बांधे खड़ा देखा होगा ।

कई लोग इसका मतलब निकालते हैं कि कानून अंधा होता है पर इसे अगर और गहराई से जाने तो उसका मतलब होता है- कानून सबके लिए समान है और किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करता है।

ये इसीलिए क्योंकि वह किसी के तरफ नहीं देखता, इसीलिए उसे नहीं पता कि सामने कौन है।

विधियों का समान संरक्षण
(Equal Protection of Law)

इसे अमेरिकी संविधान से लिया गया है। इसकी खास बात ये है कि इसमें देने का भाव निहित होता है। इसका मतलब है बिना किसी भेदभाव के समान के साथ समान व्यवहार यानी कि समान विधि के लिए सभी के लिए समान नियम तो रहेंगे ही,

पर जैसा कि हम जानते है हम एक असमानता आधारित समाज में रहते हैं जहां पर जातिगत, धर्मगत, व्यवसायगत आदि बहुत प्रकार की असमानताएं हैं। ऐसे में हर बार समान के साथ समान व्यवहार काम नहीं आता।

इसे एक उदाहरण से समझिए- मान लीजिये कि एक पुलिस ने किसी को मार दिया और दूसरी तरफ एक सामान्य नागरिक ने किसी को मार दिया।

तो अगर इस सिद्धांत पर चलें कि कानून सब के लिए एक समान है और सजा भी सबको एक समान ही मिलेंगी तो इस आधार पर तो पुलिस को भी वहीं सजा मिलनी चाहिए जो कि सामान्य नागरिक को मिलेगा।

इसी स्थिति से बचने के लिए भारत ने ‘विधि का समान संरक्षण’ सिद्धांत को अपनाया ताकि इस आसमान समाज में भी समानता स्थापित की जा सकें।

इसको और अच्छे से समझें तो, अगर समाज के कमजोर वर्ग के लोगों को बराबरी पर लाने के लिए कुछ नियम-कानून बनाए जा सकते हैं तो वे बनाए जाएँगे।

अगर किसी एक वर्ग के हित में कोई विधान या कोई व्यवस्था झुका हुआ है, तो दूसरे वर्ग के उत्थान के लिए वांछित कानून बनाए जा सकते हैं। ताकि वो भी बराबरी महसूस कर सकें और वास्तविक समानता स्थापित हो पाये।

उम्मीद हैं इन दोनों टर्म्स के मध्य के बारीक अंतर को आप समझ गए होंगे।

एक बात हमेशा ध्यान रहें कि ये अपने आप में पूर्ण नहीं है और न ही अंतिम है। ये हो भी नहीं सकता! इसीलिए तो मूल अधिकारों के लिए न जाने कितने विवाद हुए है और अक्सर होते ही रहते हैं।

इसके कुछ अपवाद है- जैसे कि उदाहरण के लिए राष्ट्रपति और राज्यपाल के अपने पदावधि के दौरान लिए गए कोई निर्णय और किए गए कामों के लिए किसी न्यायालय में कोई मुकदमा नहीं किया जा सकता है।

यानी कि मान लीजिये कि अगर राष्ट्रपति अपने कार्यकाल के दौरान कोई ऐसा निर्णय लेता है जिससे कि बहुत से लोगों का नुकसान हो जाता है, या फिर किसी की मौत हो जाती है।

ऐसी स्थिति में आप न्यायालय नहीं जा सकते हैं। इसके अलावे भी कई अन्य प्राधिकृत व्यक्तियों को इस प्रकार की छूट प्राप्त है। 

🔰अनुच्छेद 15 

केवल धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध
Prohibition of discrimination only on the basis of religion, descent, caste, sex or place of birth 

इस को समझना तो आसान है इसका सीधा सा मतलब है कि राज्य- धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधारों पर किसी के साथ कोई पक्षपात या उसके विरुद्ध कोई काम नहीं कर सकता।

जैसे कि मान लीजिये कि सरकार ने एक चापाकल लगाया, तो सरकार किसी खास जाति को उस चापाकल से पानी पीने को मना नहीं कर सकती है।

🔹 बस यहाँ पर एक बात ध्यान देने योग्य है कि उस कथन में ‘केवल‘ लगा है इसका मतलब है कि अन्य आधारों पर कर सकता है।

मतलब आप समझ रहें है न कि सब में कुछ न कुछ अपवाद है। आप खुद ही सोचिए कुछ खास जाति या संप्रदाय को आरक्षण दिया जाता है तो ऐसे में एक तरह से देखें तो समानता बची ही नहीं।

क्योंकि राज्य किसी एक जाति, संप्रदाय या लिंग के साथ अलग व्यवहार कर रही है और बांकी बचे समुदाय के साथ अलग व्यवहार।

अब जाहिर ऐसी स्थिति में एक ही विकल्प बचता है कि इसे अपवाद की श्रेणी में रख दिया जाये और वहीं होता भी है।

समता का अधिकार और क्रीमीलेयर

इस अनुच्छेद के अंतर्गत एक क्रीमीलेयर का कान्सैप्ट आता है जिसे कि 2008 में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिया गया था।

इसका एक ही मकसद था कि आरक्षण से पिछड़े वर्ग के उन लोगों को वंचित किया जाये जो कि आर्थिक, सामाजिक रूप से सम्पन्न है।

🔳 क्रीमीलेयर का मतलब होता है मलाईदार परत यानी कि अगर आप पहले से मलाई खा रहें हैं तो खाइये, कोई नहीं रोक रहा है आपको, पर दूसरे के हिस्से का मलाई मत खाइये।

इसमें व्यवस्था ये है कि अगर आप एक खास रकम सलाना कमा रहें हैं तो आपको आरक्षण का लाभ लेने का कोई हक नहीं बनता है।

अभी ये रकम 8 लाख सलाना है। पर ये चूंकि बदलती रहती है, तो आप इसे अपने स्तर पर पता करते रहिए।

🔰अनुच्छेद 16 

लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता
Equality of opportunity regarding Public employment

राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्त से संबन्धित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता मतलब ये है कि लोक नियोजन में किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।

सबको सरकारी नौकरी करने का अधिकार है। इसीलिए जब आप सार्वजनिक नौकरी के लिए आवेदन देते हैं तो आप इसी अनुच्छेद का इस्तेमाल कर रहे होते हैं।

🔹 फिर से आपके दिमाग में ये सवाल आ सकता है कि अगर लोक नियोजन में समानता है तो फिर क्यूँ कुछ जाति या लिंग के लोगों को बहुत ही कम नंबर में पास कर दिया जाता है

जबकि कुछ जाति और लिंग के लोगों को पास होने के लिए उससे दुगुना नंबर लाना पड़ता है। ये तो समानता नहीं है।

हाँ ये सच है, पर क्या करेंगे ऐसा होता है क्योंकि इसके अलावा शायद और कोई विकल्प नहीं है नीति-नियंताओं के पास इन पिछड़े वर्गों को ऊपर लाने का।

एक तरह से देखें तो ये समानता स्थापित करने के लिए पिछड़े लोगों को दी जाने वाली प्रोत्साहन है। और हाँ ये एक अपवाद भी है। 

🔹 जब पिछड़े लोगों की बात हो तो मण्डल आयोग की चर्चा करना तो बनता है। क्योंकि आज जो 27 प्रतिशत का आरक्षण पिछड़े वर्ग (Backward class) को मिल रहा है, वो इसी की सिफ़ारिश थी।

समता का अधिकार और मण्डल आयोग
(Right to Equality and Mandal Commission)

मोरारजी देशाई ने 1979 में द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन बी. पी. मण्डल की अध्यक्षता में की। इसका मकसद था पिछड़े वर्ग के लोगों की सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति का पता लगाना और इसके लिए क्या किया जा सकता है इसका सुझाव सरकार को देना।

आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट पेश की। इसकी कुछ मूल बातें हैं जिसे ध्यान में रखना जरूरी है क्योंकि ये आज भी प्रासंगिक है।

 🔹 आयोग ने 3743 पिछड़ी जातियों की पहचान की और इन पिछड़े जातियों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफ़ारिश की। इन पिछड़ी जातियों की आबादी देश की कुल आबादी का लगभग 50 प्रतिशत था।

यहाँ ये याद रखिए कि आज जो OBC को 27 प्रतिशत का आरक्षण मिलता है, वो इन्ही के सिफ़ारिशों का परिणाम है।

मोरार जी देशाई तो इसे लागू नहीं कर पाये क्योंकि सरकार ही गिर गयी पर 1990 में वी. पी. सिंह की सरकार ने इसे लागू की। ये आज भी धूमधाम से चल रहा है।

🔹 1991 में नरसिम्हा राव की सरकार ने 10 प्रतिशत अतिरिक्त आरक्षण आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को दी। मतलब ये आरक्षण उन सामान्य वर्ग के लोगों को दी गयी जो आर्थिक रूप से पिछड़े हुए थे,

पर इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा 1992 में खत्म कर दिया गया। सुप्रीम का बस सीधा सा कहना था कि कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो सकता।

क्योंकि 27 प्रतिशत आरक्षण OBC को मिल ही चुका था और इससे पहले ही SC और ST को 23 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त था, और इस 10 प्रतिशत को देने के बाद तो ये कुल 60 प्रतिशत हो गया था।

हालांकि फिर से मोदी सरकार ने इस दस प्रतिशत आरक्षण को बहाल कर दिया। और इस बार सुप्रीम कोर्ट को मानना पड़ा क्योंकि शायद सरकार ताकतवर था।

जो भी हो पर अभी वर्तमान की स्थिति यहीं है कि अभी कुल 60 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है।

🔰अनुच्छेद 17 

अस्पृश्यता का अंत
End of untouchability 

इसका मतलब है कि छुआछूत का पूरी तरह से अंत। इसका एक ही मकसद था कि लोगों में इंसानियत की भावना को मजबूत करना ताकि एक ही समाज में सभी वर्गों के लोग मिल जुल का रह सकें।

पर ये इतना आसान नहीं था। कमोबेश आज भी छुआछूत है ही। भले ही ये एक मौलिक अधिकार है।

सरकार ने भी देखा और समझा की सिर्फ इससे काम नहीं बनेगा।  इसीलिए ‘1955 में जन अधिकारों का सुरक्षा अधिनियम‘ लाया और इसके तहत बाक़ायदा छुआछूत को एक अपराध बनाया गया और सजा का भी प्रावधान किया गया।

🔹🔹 लेकिन इसमें भी अपवाद है जैसे कि अगर किसी व्यक्ति को कोई ऐसा रोग है जो उससे दूसरे में फैल सकता है तो राज्य क्या हम-आप भी उससे दूर ही रहेंगे और छूने की बात तो छोड़ ही दीजिये। तो यही तो इसके अपवाद है। 

🔷अनुच्छेद 35 को वैसे तो बाद में पढ़ेंगे लेकिन अभी यहाँ इतना जानना जरूरी है कि जब भी मौलिक अधिकार ठीक से काम नहीं कर पाती है तो उसको ताकत प्रदान करने के लिए सरकार अगल से कानून बनाती है,

जैसे कि – अस्पृश्यता के अंत नामक मौलिक अधिकार से अस्पृश्यता तो खत्म हुई नहीं। इसीलिए ‘जन अधिकारों का सुरक्षा अधिनियम‘ बनाया गया और उसमें कुछ सजा के प्रावधान को जोड़ दिया गया ताकि लोग इसे थोड़ा सिरियसली ले।

इस तरह के जीतने भी कानून बनाए जाते हैं, उसे बनाने का अधिकार अनुच्छेद 35 से मिलता है। इसके बारे में आगे चर्चा करेंगे।

🔰अनुच्छेद – 18 

उपाधियों का अंत
End of titles 

इसका मतलब है किसी भी व्यक्ति को कोई ऐसा पदवी न देना जो असमानता को दर्शाये 

ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि पहले होता ये था कि किसी खास कुल में जन्म लेने के कारण उसके नाम के आगे महाराज, महाराजाधिराज या इसी प्रकार का अन्य टाइटल लगा दिया जाता था।

यूरोपियन देशों में ‘सर’ की उपाधि मिलती थी। ऐसा समझा गया कि इससे अंतत: असमानता ही बढ़ती है इसीलिए इसे समाप्त कर दिया गया। 

पर आपके मन में सवाल आ सकता है कि अभी भी ढेरों उपाधि मिलती है जैसे कि डॉक्ट्रेट की उपाधि आदि। इसी कन्फ़्यूजन को दूर करने के लिए इसमें कुछ बातें कही गयी है।

🔷🔷इस संबंध में निम्नलिखित चार बातें संविधान में कहीं गयी है। 

🔷 राज्य सेना या विद्या संबंधी उपाधियों के अलावा और कोई उपाधि प्रदान नहीं करेगा। मतलब ये कि अगर किसी को डॉक्ट्रेट की उपाधि दी जाती है तो उसे इस मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं माना जाएगा।

🔷 भारत का नागरिक विदेशी से कोई उपाधि प्राप्त नहीं करेगा

🔷 कोई भी विदेशी जो भारत में राज्य के लिए कोई लाभ के पद पर कार्य कर रहा है वे बिना राष्ट्रपति के अनुमति के कोई भी विदेशी उपाधि ग्रहण नहीं करेगा। 

🔷 राज्य के अधीन लाभ के पद पर कार्य करने वाला कोई भी व्यक्ति किसी विदेशी से कोई उपाधि राष्ट्रपति के अनुमति के बिना प्राप्त नहीं करेगा। 

यहाँ भी अपवाद है जैसे किसी को पद्म भूषण, पद्म विभूषण, पद्म श्री और भारत रत्न मिलता है तो वो उपाधि नहीं मानी जाती है। 

और ऐसा स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि कोई भी व्यक्ति नाम के आगे इन शब्दों को नहीं लगा सकता है नहीं तो उससे ये छिन ली जाएगी। 

‘समता का अधिकार’ को याद कैसे रखें 

‘समता का अधिकार’ याद रखने का एक आसान तरीका है कि आप ये याद रखें कि अनुच्छेद 14 से लेकर 18 तक समता यानी कि समानता की बात कही गयी है।

आप पाएंगे कि अनुच्छेद 14 से लेकर अनुच्छेद 18 तक जितने भी प्रावधान है सब समानता की बात करता है 

जैसे – 🔷 अनुच्छेद 14 न्याय की समानता की बात करता है। 

🔷 अनुच्छेद 15 धर्म , लिंग, जन्मस्थान, जाति के आधार पर असमानता खत्म करने की बात करता है। 

🔷 अनुच्छेद 16 सार्वजनिक नौकरियों में समानता की बात करता है 

🔷 अनुच्छेद 17 छुआछूत जैसे रूढ़िवादी व्यवहार को खत्म करके समानता स्थापित करने की बात करता है, और 

🔷 अनुच्छेद 18 में कुछ क्षेत्रों कों छोड़ कर सभी प्रकार के उपाधियों का अंत कर दिया गया है ताकि समानता स्थापित हो सकें ।

तो आपने देखा यहाँ सिर्फ समानता की बात कही जा रही है। अगर कभी भी अनुच्छेद 14 से 18 तक की बात की जाएगी तो इतना तो जरूर याद रहेगा कि ये समानता के बारे में है।

अगर ये किवर्ड आपको याद रह जाती है तो आपको ऊपर वाला भी अपने आप याद आ जाएगा।

उम्मीद है आपको समता का अधिकार लेख समझ में आया होगा। ‘समता का अधिकार’ के पहले भी एक लेख है, आप उसे भी जरूर पढ़ें।

🔷🔷◾◾🔷🔷

इसी तरह से आगे अनुच्छेद 19 से लेकर 22 तक ‘स्वतंत्रता का अधिकार‘ की बात करेंगे। उसे अभी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
स्वतंत्रता का अधिकार

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *