धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (Right to religious freedom)

इस लेख में हम सरल और सहज भाषा में ‘धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (Right to religious freedom)’ पर चर्चा करेंगे।

ये लेख मौलिक अधिकारों पर लिखे गए ↗️पिछले लेखों का कंटिन्यूएशन है। आप उसे भी जरूर पढ़ें।

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
(अनुच्छेद 25-अनुच्छेद 28)

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार और उसके प्रकार

💠 जैसा कि हम जानते हैं धार्मिक स्वतंत्रता का का उल्लेख हमारे प्रस्तावना में भी है और इससे इसके महत्व का पता चलता है।

धार्मिक स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी भी जानी चाहिए। क्योंकि एक तरह से देखें तो हमारे मूल्य, हमारे संस्कार, हमारे सामाजिक प्रतिमान बहुत हद तक धर्म से संचालित होता है।

हालांकि कभी-कभी ये जितना जोड़ने का काम करती है उतनी ही ये अलगाव भी पैदा करती है। पर अगर हम धर्म को इतनी स्वतंत्रता दें जिससे कि वो अपने आप को बदलते वक़्त के साथ अपडेट कर पायें वो भी दूसरे धर्मों की उपस्थिति को स्वीकारते हुए, तो इसमें कोई बुराई नहीं है।

शायद इसीलिए हमने धर्म निरपेक्षता की राह को चुना ताकि, सब धर्म मिलजुल कर एक बहुधार्मिक समाज की स्थापना कर सकें जिसका साझा लक्ष्य हो, भारत को समृद्ध बनाना, भारत को विश्व में वो प्रतिष्ठा दिलाना जिसके वो हकदार है, आदि-आदि।

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार‘ में कुल चार अनुच्छेद है। आइये बारी-बारी से उसे समझते हैं कि धार्मिक मामलों में हमें कितनी मौलिक स्वतंत्रता दी गयी है।

🔰अनुच्छेद 25

अन्तःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता
Freedom of conscience and free belief, conduct and propagation of religion 

अनुच्छेद 25, व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता (Personal religious freedom) को सुनिश्चित करता है। इसमें कुल चार टर्म है। चारों का मतलब कुछ इस प्रकार है।

अन्तःकरण की स्वतंत्रता
(Freedom of conscience)

इसका सीधा सा मतलब ये है कि आप अपने भगवान के साथ अपने सम्बन्धों को अपने अनुसार अर्थ दे सकते हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो कोई भी व्यक्ति अपने भगवान के साथ चाहे जो संबंध बना सकता है। कोई चाहे तो भगवान का भक्त भी बन सकता है और कोई चाहे तो दोस्त भी। तो इस मामले में आपकी अंतरात्मा जो कहें वहीं कीजिये।  

मानने का अधिकार
(Right to believe)

कहने को तो बहुत से लोगों का मानना है कि भगवान जैसा कोई चीज़ ही नहीं होता है फिर भी अगर आप मानते है कि भगवान है तो उसे दिल खोलकर मानिए, भगवान के जिस रूप को मानना है, उस रूप को मानिए, जैसे मानना है वैसे मानिए क्योंकि ये आपका मौलिक अधिकार है।

आचरण का अधिकार
(Right to conduct)

इसका मतलब है भगवान को आप जिस भी तरीके से चाहे पूज सकते है यानी कि कोई भी पूजा पद्धति (System of worship) अपना सकते हैं। जो भी आपको पसंद हो।

प्रचार का अधिकार
(Right of propagation)

और अंत में अपने धर्म के प्रचार-प्रसार करने का अधिकार भी दिया गया है ताकि आप अपने धर्म को फैला सकें, उसके अच्छी बातों को फैला सकें; जिससे कि धर्म में एक प्रकार की अविरलता रहें।

तो जैसा कि ऊपर भी बताया जा चुका है ये वाला अनुच्छेद कुल मिलाकर धर्म के व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।

🔰अनुच्छेद 26

धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता
Freedom to manage religious affairs 

जहां अनुच्छेद 25 व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है वहीं अनुच्छेद 26 समूहगत धार्मिक स्वतंत्रता (Collective religious freedom) के अधिकार को सुनिश्चित करती है।

मतलब ये कि ये धार्मिक समूहों, संगठनों, ट्रस्ट आदि के धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को सुनिश्चित करता है। ये निम्न अधिकारों की बात करता है।

🔷 ये धार्मिक कार्यों के लिए संस्थाओं की स्थापना का और उसे चलाने का अधिकार देता है, 

🔷 अपने धर्म से संबन्धित कार्यों के प्रबंधन (Management) का अधिकार देता है, 

🔷 धार्मिक कार्यों से संपत्ति अर्जित करने का अधिकार देता है। तथा, 🔷 ऐसी संपत्ति का विधि के अनुसार (According to the law) इस्तेमाल करने का अधिकार देता है।

मतलब कुल मिलाकर देखें तो इस अनुच्छेद के अनुसार आप एक धार्मिक संस्थान बना सकते हैं, उसको अपने हिसाब से चला सकते हैं, उससे पैसे कमा सकते हैं और उस पैसे का इस्तेमाल भी कर सकते हैं।

🔰अनुच्छेद 27 

धर्म की अविवृद्धि के लिए करों के संदाय से स्वतंत्रता
Freedom from payment of taxes for the growth of religion

जैसा कि हम जानते हैं भारत धर्मनिरपेक्षता को फॉलो करता है। यानी कि लोगों का तो यहाँ अपना धर्म हो सकता है पर राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होगा।

इसी से आगे की बातें इस अनुच्छेद में लिखी है कि – राज्य जनता के पैसे को, जो कि टैक्स के रूप में आता है; उसका इस्तेमाल किसी भी धार्मिक कार्यों में नहीं करेगा तथा न ही राज्य किसी धर्म को प्रोमोट करेगा।

या तो राज्य के नजर में कोई धर्म नहीं है या फिर उसके नजर में सब धर्म समान है। वैसे भी देखें तो राज्य का काम है लोककल्याण न कि धर्म कल्याण।

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार

🔰अनुछेद 28

धार्मिक शिक्षा में उपस्थित होने से स्वतंत्रता
Freedom from attending religious education 

ये मूलतः इस बात की चर्चा करता है कि कहाँ-कहाँ धार्मिक शिक्षा दी जा सकती है और कहाँ नहीं। इसके कुछ प्रावधान निम्न है।

🔷 जितने भी शिक्षण संस्थान जो कि राज्य द्वारा पूर्णतः पोषित हो उसमें किसी भी प्रकार का धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी। राज्य ऐसा क्यों नहीं कर सकता उसके बारे में अभी-अभी ऊपर पढ़ें हैं।

🔷 लेकिन ऐसा संस्थान जिसका प्रशासन तो राज्य कर रहा जो लेकिन उसकी स्थापना किसी ट्रस्ट के द्वारा की गयी हो तो वहाँ पर धर्मिक शिक्षा दी जा सकती है।

🔷 वही अगर किसी संस्थान को राज्य द्वारा मान्यता मिली हो या राज्य द्वारा कुछ अनुदान मिलता हो लेकिन उसका प्रशासन राज्य के हाथ में न हो तो ऐसे संस्थानों में स्वैच्छिक रूप से धार्मिक शिक्षा दी जा सकती है, यानी कि अगर कोई व्यक्ति चाहे तो धार्मिक शिक्षा ले सकता है और अगर चाहे तो नहीं भी ।

आगे शिक्षा और संस्कृति संबंधी अधिकारों की चर्चा की गयी है जो कि अनुच्छेद 29 और 30 के अंतर्गत आता है। उसे अभी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार

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चिंतक और दार्शनिक

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार

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