शंख क्या है इसका धार्मिक महत्व क्यों है?

हिन्दू पुजा पद्धति में शंख की अहम भूमिका होती है। हम ज़्यादातर कुछ ही प्रकार के शंखों के बारे में जानते है पर, शंखों की दुनिया बहुत ही विशाल है जिसका इस्तेमाल खाने से लेकर विभिन्न प्रकारों के धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है।

तो आइये जानते है – ये क्या है और इसका धार्मिक महत्व क्यों है?

शंख क्या है

शंख होता क्या है?

शंख दरअसल और कुछ नहीं,  बड़े आकार के समुद्री घोंघे का खोल या शैल है। विज्ञान की दृष्टि में ये स्ट्राम्बिडा परिवार(Strombidae Family) के गस्त्रोपोड मोलस्क (Gastropoda Molluscs) है।

ये कई प्रकार के होते है जिसे आप तस्वीरों में देख सकते है पर इस परिवार के ज़्यादातर शंख हमारे धार्मिक महत्व  के नहीं होते है।

शंख

बल्कि इस प्रकार के जीवित शंखों या घोंघे की तमाम छोटी-बड़ी प्रजातियों को पूर्वी एशिया तथा दुनिया के अन्य देशों में सीफूड के रूप मे खाया जाता है। 

कई तो हमारे आस-पास भी मिल जाते है। जैसे कि आप इसे तो जरूर पहचानते होंगे

और इस परिवार के एक सदस्य को तो हम खाते भी हैं, हालांकि हम इसे डोका कहते है।

साधारणतया: जिस प्रकार के शंख हमारे धार्मिक महत्व के होते है वे स्ट्राम्बिडा परिवार से ताल्लुक नहीं रखते है बल्कि उसका ताल्लुक टर्बिनेलाइडा (Turbinellidae Family) परिवार से होता है।

जिसे हम टर्बिनेला पायरम (Turbinella pyrum) कहते हैं,जो कि कुछ ऐसा दिखता है। 

शंख

इसी प्रकार के शंखों के सर्पिल शिखर पर छेद करके इसका इस्तेमाल फूँक वाद्य के रूप में किया जाता है। अलग-अलग प्रकार के शंखों से निकलने वाली ध्वनि भी अलग-अलग होती है।  

शंखों का धार्मिक महत्व क्यों है?

हिन्दू मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों में एक रत्न शंख है। लक्ष्मी और विष्णु दोनों ही अपने हाथों में_शंख धारण करते है। 

वेदों के अनुसार शंखों का घोष विजय का प्रतीक है। महाभारत के युद्ध की शुरुआत भी अलग-अलग योद्धाओं की शंख ध्वनि से होती है। 

कृष्ण ने पांचजन्य, युधिष्ठिर ने अनंत विजय, भीम ने पौंड्र, अर्जुन ने देवदत, नकुल ने सुघोष और सहदेव ने मणिपुष्पक नामक शंखों का नाद किया । 

 वहीं भीष्म के शंख का नाम गगनाभ, दुर्योधन का विदारक और कर्ण का शंख हिरण्यगर्भ था। 

ऐसी धारणा है कि शंखों से निकलने वाली ध्वनि एक विशेष आवृति की होती है। जिससे कि वहाँ के वातावरण पर उसका एक सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। पूरा माहौल भक्तिमय हो जाता है,

इसीलिए इसे एक पवित्र ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। 

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, शंख चंद्रमा और सूर्य के समान देवस्वरूप है। इसके मध्य भाग में वरुण, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा और अग्रभाग में गंगा और सरस्वती का निवास है।

आमतौर पर शंख उल्टे हाथ के तरफ खुलते है। लक्ष्मी का शंख दक्षिणावर्ती अर्थात सीधे हाथ की तरफ खुलने वाले होते है।

वहीं विष्णु का शंख वामावर्ती अर्थात उल्टे हाथ के तरफ खुलने वाले होते हैं।

शंख की चुड़ियाँ

हिन्दू महिलाएं शंखों से बनी चुड़ियाँ भी पहनती है । ये कुछ इस प्रकार दिखती है।

⭕⭕⭕⭕⭕

इसी प्रकार के जानकारी पूर्ण लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

पसंद आया तो शेयर कीजिये

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *