Short Hindi Motivational Story । प्रेरक लघुकथा

Interesting Short Hindi Motivational Story

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Short Hindi Motivational Story

क़िस्मत

किसी शहर में, सूरज और श्रीहर्ष नाम के दो भाई रहा करते थे. वे अक्सर अपनी बातें एक दूसरे से साझा करते. दिल्ली के एक कॉलेज में दोनों ने दाखिला लिया था।

श्रीहर्ष का रुझान फिल्मों और मीडिया कि तरफ था और वह उसी क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहता था. एक दिन उसने दिल्ली के समाचार पत्र में के एक विज्ञापन देखा. एक नयी फिल्म के मुख्य पात्र के लिए नए लड़कों को ऑडिशन के लिए बुलाया गया था.

क्योंकि उस फिल्म के निर्माता को अपनी फिल्म के लिए किसी नए चेहरे की तलाश थी। विज्ञापन को देखकर श्रीहर्ष की बाँछे खिल गयी और उसने ऑडिशन के लिए जाने की योजना बनाई।

श्रीहर्ष ने सूरज को कहा – भाई मुझे इस ऑडिशन के लिए जाना है। तुम भी मेरे साथ चलो। सूरज आराम करना चाहता था। उसने जाने से मना कर दिया।

श्री हर्ष ने कहा – यदि तुम मेरे साथ चलोगे तो, मैं तुम्हें पिज्जा खिलाऊँगा. सूरज पिज्जा का बहुत शौकीन था. इस ऑफर को वह ठुकरा न सका. श्रीहर्ष के साथ वह ऑडिशन की जगह पर पहुंचा।

कम से कम तीन-चार हज़ार प्रतियोगियों की भारी भीड़ जमा थी। श्रीहर्ष अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा था। सूरज वही कोने में चुपचाप बैठा था कि जल्दी ऑडिशन खत्म हो और उसे पिज्जा खाने को मिलेगा।

तभी एक फिल्म की यूनिट के एक कास्टिंग एजेंट की निगाह सूरज पर पड़ी। उसने सूरज से पूछा, कौन हो तुम? सूरज ने कहा मैं अपने भाई के साथ आया हूँ, वह यहाँ ऑडिशन देने आया है।

एजेंट ने कहा क्या तुम्हारी फिल्मों में रुचि है? सूरज ने कहा हाँ। अजेंट ने प्रस्ताव दिया, तो फिर क्यूँ नहीं ऑडिशन में हिस्सा लेते हो।

सूरज ने सोचा प्रस्ताव बुरा नहीं है। वह भी ऑडिशन वाली लाइन में खड़ा हो गया। ऑडिशन पूरा हुआ।

थोड़ी देर बाद आनेवाले फैसले पर हर किसी की निगाह थी। जब परिणाम की घोषणा

हुई तो हर कोई स्तब्ध रह गया. उन हजारों प्रतियोगियों को पछाड़ कर सूरज को इस भूमिका के लिए चुन लिया गया था। 

ये एक सच्ची कहानी है। उस लड़के का पूरा नाम सूरज शर्मा है और फिल्म का नाम ‘लाइफ ऑफ पाय’ जो वर्ष 2012 में दुनिया भर में रिलीज हुई।

सूरज शर्मा ने इस फिल्म में मुख्य भूमिका निभाया था और उनके सहयोगी कलाकार इरफान खान और तब्बू थे। सूरज की किस्मत ने उसका साथ इसलिए दिया क्योंकि उसमें प्रतिभा थी। 

एक विचारक ने कहा था – क़िस्मत भी आपका तभी साथ देती है जब आपमें प्रतिभा हो।

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विश्वास से बड़ी कोई चीज़ नहीं होती

एक बार दिल्ली से सैन फ्रांसिस्को के लिए एक विमान उड़ा। विमान खचाखच भरा हुआ था।

छुट्टीयों का मौसम शुरू हो चुका था, इसीलिए कई लोग परिवार के साथ छुट्टी मनाने जा रहे थे। लोगों का उत्साह चरम पर था।

कई लोग तो पहली बार विदेश का दौरा कर रहे थे। अभी विमान को उड़े एक घंटा भी नहीं गुजरा था, तभी विमान हिचकोले लेने लगा।

तभी सीट के ऊपर लगे स्पीकर पर एअर होस्टेस की आवाज सुनाई दी, मौसम खराब है, आप सभी से अनुरोध है कि अपनी सीट बेल्ट बांध लें।

लोगों में विशेषकर पहली बार हवाई सफर करने वालों में, थोड़ा दहशत का माहौल हो गया ।

कुछ समय गुजरा था कि फिर एयर होस्टेस ने अनाउंस किया, हमें खेद है कि मौसम के ज्यादा खराब होने के कररण नाश्ता नहीं पेश कर पाएंगे।

इसी के साथ विमान बुरी तरह से हिचकोले लेने लगा। अब यात्रियों की हालत खराब होने लगी। इन सभी के बीच के एक सीट पर एक लगभग 12 साल की बच्ची अपना विडियो गेम खेल रही थी।

उसके चेहरे पर मुस्कुराहट थी और उसके ऊपर आसपास के माहौल का कोई असर नहीं था। लेकिन विमान में कई लोग तो मंत्र जाप तक करने लगा।

थोड़ी देर में ज़ोर से बिजली कड़कने की आवाज सुनाई दी। यह आवाज इतनी कर्कश थी कि विमान के इंजन की आवाज भी उसमें खो गयी और विमान के अंदर बैठे यात्रियों को आवाज सुन कर लगा कि विमान शायद किसी चीज़ से टकराते हुए उसके बीच से आगे निकाल रह है।

अब यात्रियों के चेहरे पर बेहद डर था और कइयों के घबराहट से रोने की आवाज सुनाई दे रही थी।

कुछ समय में यात्रियों को ऐसा लगा की विमान का संतुलन बिगड़ गया है और अभी थोड़ी देर में विमान क्रैश हो जाएगा।

इन सभी हालातों में उस बच्ची के चेहरे पर भय या घबराहट के कोई भाव नहीं थे। खैर, थोड़ी देर बाद सब सामान्य हो गया।

जब विमान सैन फ्रांसिस्को एयर पोर्ट पर उतरा, तो एक व्यक्ति ने उस बच्ची से पूछा बेटा, हम सब लोग उस समय बहुत डर गए थे, लेकिन तुम बिल्कुल नॉर्मल थी बताओ क्या तुम्हें विमान में उस समय डर नहीं लगा? 

बच्ची ने मुस्कुराते हुए कहा- नहीं अंकल, मुझे बिल्कुल भी डर नहीं लगा, क्योंकि इस विमान के पायलट मेरे पापा है और मैं जानती हूँ कि वे मुझे किसी हाल में कुछ भी नहीं होने देंगे।

बच्ची के विश्वास को देख कर वह व्यक्ति दंग रह गया। 

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जीवन की बारीक समझ

वर्ष 1893 की बात है। यह स्वामी विवेकानंद के जीवन काल का समय था। अपनी विद्वता से स्वामी विवेकानंद देश ही नहीं बल्कि विदेश में भी बेहद चर्चित हो चुके थे।

उनको अक्सर किसी सेमिनार में बोलने के लिए बुलाया जाता था। एक बार उनको अमेरिका के शिकागो से एक सेमिनार में बोलने के लिए बुलाया गया।

विवेकानंद अपनी माँ से बेहद प्रभावित थे और उनकी माँ अक्सर उनका मार्गदर्शन किया करती।

माँ को जब विवेकानंद के अमेरिका जाने की बात पता चली, तो उन्होने विवेकानंद को सूचना भेजी और कहा, आज तुम घर पर खाना खाने आ जाओ, क्योंकि मैं यह भी जांच लेना चाहती हूँ कि तुम अभी विदेश जाकर सेमिनार में बोलने लायक परिपक्क्व हुए हो या नहीं।

दरअसल, उन दिनों स्वामीजी अक्सर भ्रमण पर रहा करते थे। माँ के आदेश पर आज नियत समय पर स्वामीजी घर पहुंचे। माँ ने उनकी पसंद का खाना बनाया था।

स्वामीजी ने स्वाद लेकर खाना खाया। उसके बाद माँ ने उनको एक सेब दिया और साथ में एक चाकू भी दिया और फल खाने को कहा। स्वामीजी ने सेब को काटा और खा लिया।

फिर माँ ने उनसे चाकू मांगा। स्वामीजी ने माँ को चाकू दे दिया। माँ ने कहा, बेटा, अब मैं आश्वस्त हूँ कि तुम विदेश जाकर लोगों को ज्ञान देने के लायक हो गए हो।

स्वामीजी को कुछ भी समझ मे नहीं आया। वे आश्चर्य से बोले, माँ, मैंने तो ऐसा कुछ किया ही नहीं और तुमने मेरी कोई परीक्षा भी नहीं ली।

माँ ने मुस्कुराते हुए बोली, बेटा, अभी मैंने तुमसे चाकू मांगा, तुमने इस तेज चाकू की धार की ओर से पकड़कर चाकू का लकड़ी वाला वह हिस्सा मेरे सामने कर दिया,

जिससे मैं इसे आराम से पकड़ सकूँ और मुझे चोट न लगे, परंतु ऐसा करते समय तुमने इस बात की परवाह नहीं की कि तेज धार से तुम्हें भी चोट लग सकती थी,

इसलिए तुम इस परीक्षा मे उतिर्ण हो गए, जाओ और देश दुनिया मे अपने ज्ञान का प्रसार करो।

यह बात सुनकर स्वामीजी का सिर माँ के सामने श्रद्धा से झुक गया और अपनी माँ को प्रणाम कर वे अमेरिका की ओर निकल पड़े।

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