Supreme Court of India (उच्चतम न्यायालय: भूमिका, गठन, इत्यादि)

इस लेख में हम उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे, भारत की न्यायिक व्यवस्था को समझने के क्रम में आप इसे पहला लेख मान सकते हैं। वैसे इससे पहले एक और लेख है जिसमें ↗️न्यायपालिका को परिचय के रूप में प्रस्तुत किया गया है। चाहे तो आप वहाँ से शुरुआत कर सकते हैं।
supreme court of india

उच्चतम न्यायालय की भूमिका (Role of Supreme Court of India)

26 जनवरी, 1950 को, भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बना इसके ठीक दो दिन बाद यानी कि 28 जनवरी, 1950 सर्वोच्च न्यायालय अस्तित्व में आया। इससे पहले एक फेडरल कोर्ट था जिसका संचालन संसद से (1937 से 1950 के बीच लगभग 12 वर्षों तक) किया जाता रहा। सुप्रीम कोर्ट ने इसी को रिप्लेस किया। यहाँ ये याद रखिए कि आज जिस बिल्डिंग में सुप्रीम कोर्ट काम करता है उसमें वह 1958 में आया।

दूसरी बात कि हमने बहुत सारी चीज़ें अमेरिकन संविधान से ली, पर न्यायिक व्यवस्था के मामले में हमने अमेरिकी संविधान के विपरीत, भारत में एक एकीकृत न्याय व्यवस्था की स्थापना की। जिसमें शीर्ष स्थान पर उच्चतम न्यायालय – उसके अधीन उच्च न्यायालय हैं – उच्च न्यायालय के अधीन (राज्य स्तर के नीचे) अधीनस्थ न्यायालयों की श्रेणियाँ हैं। एकीकृत न्याय व्यवस्था को हमने इसीलिए अपनाया क्योंकि 1935 में भारत सरकार अधिनियम के तहत अंग्रेजों ने इसी व्यवस्था को अपनाया इसीलिए इस प्रकार के न्यायालय का हमें अच्छा-खासा अनुभव प्राप्त हो चुका था और ये भारत के हित को भी साधता था।

तो सीधे-सीधे अगर हम ये सवाल करें कि सुप्रीम कोर्ट क्या है? तो कहेंगे कि ये भारतीय न्यायिक व्यवस्था में अपील का उच्चतम न्यायालय है। यानी कि भारत में ये अंतिम जगह है जहां पर अपील कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट विवादों पर फैसला सुनाने के अलावा भी बहुत सारे काम करती है जैसे कि – संसद द्वारा बनाये गए कानून की समीक्षा करना, मध्यस्थता करना, कानून की व्याख्या करना इत्यादि, जिसकी चर्चा हम आगे करने वाले हैं।

भारतीय संविधान के भाग 5 में (अनुच्छेद 124 से लेकर 147 तक) उच्चतम न्यायालय के गठन, स्वतंत्रता, न्यायक्षेत्र, शक्तियाँ, प्रक्रिया आदि का उल्लेख है। आइये हम इसके गठन से शुरू करते हैं।

उच्चतम न्यायालय का गठन (Constitution of Supreme Court of India)

अनुच्छेद 124 के तहत, 1950 के मूल संविधान में एक मुख्य न्यायाधीश और 7 उप न्यायाधीशों के साथ सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की गई थी। जैसे-जैसे कोर्ट का काम बढ़ता गया वैसे-वैसे संसद ने न्यायाधीशों की संख्या को बढ़ाया। 1956 में 11, 1960 में 14, 1978 में 18, 1986 में 26 और 2009 में 31, और 2019 में जजों की संख्या 34 कर दिया गया। ये जो बढ़ाने का काम होता है ये ”The Supreme Court (Number of Judges) Act, 1956” के आधार पर होता है।

तो कुल मिलाकर इस समय उच्चतम न्यायालय में 34 न्यायाधीश (एक मुख्य न्यायाधीश एवं 33 अन्य न्यायाधीश) हैं। जैसे-जैसे न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि हुई, वे दो और तीन की छोटी बेंच में बैठने लगे। इसका मतलब ये नहीं है जज़ अकेले नहीं बैठते है जब वो अकेले किसी केस की सुनवाई करता है तो उसे एकल बेंच कहा जाता है। आमतौर पर इस बेंच द्वारा छोटे-छोटे मामलों की सुनवाई की जाती है।

उसके बाद डिविजन बेंच होता है जिसमें कम से कम 2 जजों का होना जरूरी होता है, अगर उच्च न्यायालय द्वारा सुनाये गए मृत्युदंड पर सुप्रीम कोर्ट को सुनवाई करनी हो तो डिविजन बेंच में कम से कम 3 न्यायाधीशों का होना जरूरी होता है।

उसके बाद आता है संवैधानिक बेंच – जब किसी मामले में किसी कानून या संविधान की व्याख्या की जरूरत पड़ती है तो सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा अनुच्छेद 145(3) के तहत संवैधानिक बेंच का गठन किया जाता है। इस बेंच में कम से कम 5 जजों का होना जरूरी होता है। इस बेंच द्वारा जो भी फैसला दिया जाता है उसे इससे बड़ी बेंच ही बदल सकती है। उदाहरण के लिए ↗️केशवानन्द भारती मामले को देख सकते हैं।

न्यायाधीश की नियुक्ति (Appointment of judges)

उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है। गौरतलब है कि मुख्य न्यायधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति अन्य न्यायाधीशों एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की सलाह के बाद करता है। इसी तरह से अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति भी होती है लेकिन मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश का परामर्श आवश्यक है। हालांकि इस परामर्श पर काफी विवाद रहा है। विवाद तो वैसे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के चयन प्रक्रिया पर ही रहा है। अभी भी चल ही रहा है। आइये इसे थोड़ा सा समझ लेते हैं।

परामर्श पर विवाद

परामर्श शब्द पर इसलिए विवाद रहा क्योंकि यहाँ स्पष्ट नहीं था कि मुख्य न्यायाधीश का परामर्श राष्ट्रपति को माननी पड़ेगी या फिर उसके विवेक पर निर्भर करता है कि वे माने या न माने। इस संबंध में ‘परामर्श’ शब्द की उच्चतम न्यायालय द्वारा विभिन्न व्याख्याएं दी गई हैं-

प्रथम न्यायाधीश मामले (First Judges Case) 1982 – इसमें न्यायालय ने कहा की परामर्श का मतलब सहमति नहीं, बल्कि विचारों का आदान-प्रदान है।

लेकिन द्वितीय न्यायाधीश मामले (Second judges case) 1993 – में न्यायालय ने अपने पूर्व के फैसले को परिवर्तित किया और कहा की परामर्श का मतलब सहमति है। इसका मतलब ये था कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा दी गई सलाह, राष्ट्रपति को माननी ही होगी। लेकिन यहाँ पर एक व्यवस्था ये जोड़ दिया गया कि मुख्य न्यायाधीश यह सलाह अपने दो वरिष्ठतम सहयोगियों से विचार-विमर्श करने के बाद ही देगा।

तीसरे न्यायाधीश मामले (Third judges case) 1998 – में कुछ प्रावधान जोड़ दिया गया। अब प्रावधान ये बनाया गया कि मुख्य न्यायाधीश को चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों से सलाह करनी होगी, इनमे से अगर दो का मत भी पक्ष में नहीं है तो वह नियुक्ति के लिए सिफ़ारिश नहीं भेज सकता।

यहीं जो 5 न्यायाधीशों का ग्रुप है उसे ही कोलेजियम कहा जाता है और न्यायाधीशों की चुनने की इस व्यवस्था को कोलेजियम सिस्टम कहा जाता है। इस पर भी विवाद है। विवाद इसीलिए है क्योंकि इसमें पारदर्शिता का अभाव है और ये लोकतंत्र के मूल्यों के विरुद्ध है।

इसी कोलेजियम व्यवस्था को ठीक करने के उद्देश्य से 2014 में न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम लाया गया जिसके तहत सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए बने कोलेजियम सिस्टम को हटाकर एक नए निकाय राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाया गया।

लेकिन वर्ष 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने चतुर्थ न्यायाधीश मामले (Fourth Judges Case) में न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। और इस तरह पुरानी कोलेजियम सिस्टम पुनः बहाल हो गया। इसीलिए कोलेजियम सिस्टम आज भी विवादित सिस्टम है।

मुख्य न्यायाधीश कौन बनता है? –

1950 से 1973 तक व्यवहार में यह था कि उच्चतम न्यायालय में वरिष्ठत्तम न्यायाधीश को बतौर मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया जाता था। लेकिन 1973 में श्रीमती इंदिरा गांधी के शासनकाल के दौरान इस व्यवस्था को बाइपास करके ए एन राय को तीन वरिष्ठतम न्यायाधीशों से ऊपर भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया गया। दोबारा 1977 में एम यू बेग को वरिष्ठतम व्यक्ति के ऊपर बतौर मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया।

1993 में दूसरे न्यायाधीश मामले में न्यायालय ने उस पुरानी व्यवस्था को बहाल किया यानी कि उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश को ही भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया जाएगा। जो कि अब तक चल रहा है।

न्यायाधीशों की अर्हताएँ (Judges qualifications)

अनुच्छेद 124 (3) के तहत, उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) का न्यायाधीश बनने के लिए किसी व्यक्ति में निम्नलिखित अर्हताएँ होनी चाहिए।

1. उसे भारत का नागरिक होना चाहिए
2. (a) उसे किसी उच्च न्यायालय का कम से कम पाँच साल के लिए न्यायाधीश होना चाहिए, या, (b) उसे उच्च न्यायालय या विभिन्न न्यायालयों में मिलाकर 10 वर्षों तक वकील होना चाहिए या (c) राष्ट्रपति की दृष्टि में उसे सम्मानित व योग्य न्यायवादी होना चाहिए।

यहाँ पर एक बात याद रखिए कि संविधान में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए न्यूनतम आयु का उल्लेख नहीं है।

शपथ या प्रतिज्ञान (Oath or affirmation)

अनुच्छेद 124 (6) और संविधान की अनुसूची 3 के तहत, उच्चतम न्यायालय के लिए नियुक्त न्यायाधीश को अपना कार्यकाल संभालने से पूर्व राष्ट्रपति या इस कार्य के लिए उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के सामने निम्नलिखित शपथ लेनी पड़ती है कि मैं:

1. भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूँगा।
2. भारत की प्रभुता एवं अखंडता को अक्षुण्ण रखूँगा।
3. अपनी पूरी योग्यता ज्ञान और विवेक से अपने पद के कर्तव्यों का भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना पालन करूंगा।
4. संविधान और विधियों की मर्यादा बनाए रखूँगा।

न्यायाधीशों का कार्यकाल (Tenure of judges)

संविधान में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों का कार्यकाल तय नहीं किया गया लेकिन इस संबंध में तीन उपबंध बनाए गए हैं:
1. वह 65 वर्ष की आयु तक पद पर बना रह सकता है। उसके मामले में किसी प्रश्न के उठने पर संसद द्वारा स्थापित संस्था इसका निर्धारण करेगी
2. वह राष्ट्रपति को लिखित त्यागपत्र दे सकता है।
3. संसद की सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति द्वारा इसे पद से हटाया जा सकता है। कैसे हटाया जाता है आइये जानते हैं।

न्यायधीशों को हटाना (Removal of judges)

न्यायाधीश राष्ट्रपति द्वारा जरूर नियुक्त किए जाते हैं लेकिन राष्ट्रपति उसे अपने मन से हटा नहीं सकता है। अनुच्छेद 124(4) के तहत, राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को उसके पद से तभी हटा सकता है, जब उस न्यायाधीश को हटाने का आधार सिद्ध हो जाये और उसके बाद संसद के दोनों सदनों के ↗️विशेष बहुमत से इस प्रस्ताव को पास किया जाये।

इसके लिए बकायदे एक कानून है जिसका नाम है ‘न्यायाधीश जांच अधिनियम 1968’ इसमें उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने के संबंध में महाभियोग की प्रक्रिया वर्णन है। इसके अनुसार न्यायाधीश को हटाने की निम्नलिखित प्रक्रिया है –

1. निष्कासन प्रस्ताव पर लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति तभी विचार करेगा जब उस प्रस्ताव को लोकसभा में 100 सदस्यों और राज्यसभा में 50 सदस्यों से लिखित सहमति मिलेगी।
2. इतना होने के बावजूद भी ये अध्यक्ष/ सभापति पर निर्भर करता है कि वे इसे स्वीकृति दे या नहीं। यानी कि इस प्रस्ताव को ये शामिल भी कर सकते है या इसे अस्वीकार भी कर सकते हैं।
3. यदि इसे स्वीकार कर लिया जाये तो अध्यक्ष / सभापति को इसकी जांच के लिए तीन सदस्य समिति गठित करनी होगी। इस समिति में शामिल होना चाहिए- मुख्य न्यायाधीश या उच्चतम न्यायालय का कोई न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश और प्रतिष्ठित न्यायवादी।
4. यदि यह समिति न्यायाधीश को दुर्व्यवहार का दोषी या असक्षम पाती है तो इस प्रस्ताव पर विचार कर सकता है।
5. इसके बाद विशेष बहुमत से दोनों सदनों में प्रस्ताव पारित कर इसे राष्ट्रपति को भेजा जाता है और अंत में राष्ट्रपति न्यायाधीश को हटाने का आदेश जारी कर देते हैं।

यहाँ यह जानना रोचक है कि उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश पर अब तक महाभियोग नहीं लगाया गया है। एक बार ऐसा मौका बना भी था जब उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश वी रामास्वामी (1991-1993) को जांच समिति द्वारा दुर्व्यवहार का दोषी पाया गया था। पर वे इसलिए नहीं हटाए जा सके क्योंकि यह लोकसभा में पारित नहीं हो सका। कॉंग्रेस पार्टी मतदान से अलग हो गई।

तो कुल मिलाकर गठन के अंदर हमने अभी तक ऊपर जो भी पढ़ा है, ये सब अनुच्छेद 124 के तहत आते हैं। इसे आप याद रखें।

न्यायाधीशों का वेतन (Judges salary)

अनुच्छेद 125 न्यायाधीशों के वेतन से संबन्धित है। न्यायाधीशों के वेतन, अन्य भत्ते, पेंशन, आदि का निर्धारण भारतीय संसद द्वारा किया जाता है हालांकि संसद इसमें कोई अलाभकारी परिवर्तन नहीं कर सकता है।

वर्तमान में जब मैं ये लेख लिख रहा हूँ उच्चतम न्यायालय का एक न्यायाधीश प्रति माह 2,50,000 रूपये का वेतन प्राप्त कर रहा है। चूंकि ये बदलते रहते हैं इसीलिए मैं आपको ↗️विकिपीडिया का लिंक प्रोवाइड कर रहा हूँ अगर आप इंटेरेस्टेड हो उसे देख लें।

कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश (Executive Chief Justice)

अनुच्छेद 126 के तहत कार्यकारी न्यायाधीश की बात कही गयी है। दरअसल कुछ खास स्थितियों में राष्ट्रपति किसी न्यायाधीश को भारत के उच्चतम न्यायलय्य का कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर सकता है, ये स्थितियाँ है –
(1) जब मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त हो, या
(2) अस्थायी रूप से मुख्य न्यायाधीश अनुपस्थित हो,
(3) या फिर मुख्य न्यायाधीश अपने दायित्यों के निर्वहन में असमर्थ हो।

तदर्थ न्यायाधीश (Ad hoc judge)

तदर्थ का मतलब होता है जब जरूरत है और जब तक के लिए जरूरत है सिर्फ तब तक के लिए। इसीलिए जब कभी कोरम पूरा करने में स्थायी न्यायाधीशों की संख्या कम हो रही हो तो भारत का मुख्य न्यायाधीश किसी उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को अस्थायी काल के लिए उच्चतम न्यायालय में तदर्थ न्यायाधीश नियुक्ति कर सकता है। लेकिन ऐसा वह संबन्धित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श एवं राष्ट्रपति की पूर्ण मंजूरी के बाद ही कर सकता है।

दूसरी बात ये है कि इस पद पर नियुक्त व्यक्ति के पास उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की अर्हता होनी चाहिए। तदर्थ न्यायाधीश के पद पर नियुक्त होने वाले व्यक्ति को उसके कार्यकाल के दौरान उसी उच्चतम न्यायलाय के न्यायाधीश की न्यायनिर्णयत, शक्तियाँ और विशेषाधिकार प्राप्त होता है। इसका उल्लेख अनुच्छेद 127 में मिलता है।

सेवानिवृत न्यायाधीश (Retired Judge)

अनुच्छेद 128 के तहत प्रावधान किया गया है कि किसी भी समय भारत का मुख्य न्यायाधीश उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश से अल्पकाल के लिए उच्चतम न्यायालय में कार्य करने का अनुरोध कर सकता है। लेकिन मुख्य न्यायाधीश ऐसा संबन्धित व्यक्ति एवं राष्ट्रपति कि पूर्व अनुमति के बाद ही कर सकता है।

ऐसे न्यायाधीश राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित भत्तों का उपभोग करता है। वह उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की तरह न्यायनिर्णयन, शक्तियों और विशेषाधिकारों का अधिकारी तो होता है परंतु वह उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नहीं माना जाता है। जबकि तदर्थ न्यायाधीश को अन्य न्यायाधीशों की तरह ही एक न्यायाधीश माना जाता है।

उच्चतम न्यायालय का स्थान (Location of Supreme Court of India)

अनुच्छेद 130 के तहत संविधान ने उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) का स्थान दिल्ली घोषित किया। लेकिन मुख्य न्यायाधीश को यह अधिकार भी दिया गया है कि उच्चतम न्यायालय का स्थान कहीं और वे शिफ्ट करना चाहे तो वे कर सकते हैं, लेकिन ऐसा वह राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति के बाद ही कर सकता है।

न्यायालय की प्रक्रिया (Process of Supreme Court of India)

अनुच्छेद 145 के तहत उच्चतम न्यायालय न्यायालय के निमयन या संचालन के लिए नियम या परिनियम बना सकता है। लेकिन ऐसा वह राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ही कर सकता है।

आप यहाँ नोटिस किए होंगे कि ज़्यादातर मामलों में उच्चतम न्यायालय राष्ट्रपति की अनुमति के बाद ही कुछ कर सकता है। ऐसा इसीलिए किया गया है ताकि शक्ति संतुलन कायम रहें। अगर ऐसा न हो तो सुप्रीम कोर्ट निरंकुश हो सकता है।

लेकिन आप एक बात और गौर करेंगे कि न्यायाधीशों के हटाने की प्रक्रिया जटिल बनाया गया है, इस तरह के प्रावधानों से ये सुनिश्चित करने की कोशिश की गई है न्यायालय पर्याप्त मात्र में स्वतंत्र रहें। सही मायनों में उच्चतम न्यायालय कितना स्वतंत्र है इसे अगले लेख में समझेंगे,
Independence of supreme court

Supreme Court of India
⏬Download PDF

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *