संघ लोक सेवा आयोग; बड़े सपने और कुछ अलग करने वालों को आकर्षित करने के लिए अपनी स्थापना के समय से ही काफी मशहूर रहा है।

इस लेख में हम संघ लोक सेवा आयोग (Union Public Service Commission) पर सरल और सहज चर्चा करेंगे और इसके सभी महत्वपूर्ण पहलुओं को समझेंगे, तो अच्छी तरह से समझने के लिए इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें, बहुत कुछ नया जानने को मिलेगा।

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संघ लोक सेवा आयोग
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संघ लोक सेवा आयोग: परिचय

ये संस्था अपने आप में कितना बड़ा, व्यापक और शक्तिशाली है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि ये भारत के सबसे बड़े ब्यूरोक्रेट्स की नियुक्ति प्रक्रिया को पूरा करता है। इसके द्वारा कंडक्ट कराये गए एक्जाम को भारत के सबसे मुश्किल एक्जाम में से एक माना जाता है इसीलिए यूपीएससी एक्जाम क्लियर करना अपने आप में एक गर्व का विषय होता है। तो संघ लोक सेवा आयोग (Union Public Service Commission) आखिर है क्या?

संघ लोक सेवा आयोग, भारत का स्वतंत्र एवं संवैधानिक केन्द्रीय भर्ती अभिकरण (संस्था) है। स्वतंत्र इसीलिए है क्योंकि इस आयोग के सदस्यों को पदावधि की सुरक्षा प्राप्त है और संवैधानिक इसीलिए है क्योंकि मूल संविधान में इसको जगह मिला है।

संविधान के 14वें भाग में अनुच्छेद 315 से 323 तक में संघ लोक सेवा आयोग की स्वतंत्रता, शक्तियाँ व कार्य और इसके अलावा इसके संगठन तथा सदस्यों की नियुक्तियाँ व बर्खास्तगी आदि का विस्तार से वर्णन किया गया है। जिसमें से अनुच्छेद 315 संघ एवं राज्यों के लिए लोक सेवा आयोग की व्यवस्था करता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

ईस्ट इंडिया कंपनी जैसे-जैसे भारत में फैलता गया वैसे-वैसे उसको अपना प्रशासन चलाने के लिए अधिक प्रशासकों की जरूरत पड़ती गयी। उसने इस जरूरत को ब्रिटिश अधिकारियों से ही पूरा किया। कंपनी अपने हित और पसंद के अनुसार लोगों को चुनकर प्रशिक्षण के लिए लंदन के हेलिबरी कॉलेज भेज देता था। प्रशिक्षण उपरांत उसे भारत में प्रशासक बना दिया जाता था।

योग्यता आधारित आधुनिक सिविल सेवा की अवधारणा लॉर्ड मैकाले ने 1854 में प्रस्तुत किया। मैकाले की इस अवधारणा पर 1854 में लंदन में सिविल सेवा आयोग की स्थापना की गई और प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षाओं की शुरुआत 1855 से की गई।

उस समय सिलैबस कुछ इस तरह से डिज़ाइन किया गया था कि यूरोपियन लोग ही इसे उत्तीर्ण कर पाये। इसके बावजूद भी रवीन्द्रनाथ टैगोर के भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर पहले भारतीय बने जिन्होने इसे क्वालिफ़ाय किया (1864)।

1919 के मोण्टग्यु चेम्सफोर्ड सुधार के तहत इसका एक्जाम इंडिया में भी करवाया जाने लगा। ऐसा पहला एक्जाम 1922 में इलाहाबाद में हुआ था। 1926 में भारत में ही लोक सेवा आयोग का गठन किया गया।

भारत सरकार अधिनियम 1935 के अंतर्गत केंद्र और प्रांत के लिए अलग-अलग लोक सेवा आयोग का प्रावधान किया गया। केंद्र वाले लोक सेवा आयोग को फेडरल लोक सेवा आयोग कहा गया। यही फेडरल लोक सेवा आयोग भारत के आजाद होने के बाद संघ लोक सेवा आयोग के नाम से जाना गया। जिसे कि संविधान के अनुच्छेद 378 (खंड 1) के तहत अधिनियमित किया गया। इस पूरे ऐतिहासिक डोक्यूमेंट को विस्तार से आप इस पीडीएफ़↗️ में पढ़ सकते हैं।

संघ लोक सेवा आयोग की संरचना

संघ लोक सेवा आयोग में एक अध्यक्ष व कुछ अन्य सदस्य होते हैं, जिसे कि भारत का राष्ट्रपति नियुक्त करता है। आयोग में कुल कितने सदस्य होंगे इसकी कोई बात संविधान में नहीं कही गई है इसीलिए आयोग की संरचना का निर्धारण राष्ट्रपति के ऊपर छोड़ दिया गया है। साधारणतया आयोग में अध्यक्ष समेत नौ से ग्यारह सदस्य होते हैं। वर्तमान की बात करें तो अभी एक अध्यक्ष और 9 सदस्य है।

इसके अलावा, संविधान में आयोग के सदस्य के लिए भी योग्यता का उल्लेख भी नहीं किया गया है। हालांकि अभी जो व्यवस्था है उसके तहत यह आवश्यक है की आयोग के आधे सदस्यों को भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन कम से कम 10 वर्ष काम करने का अनुभव हो।

संविधान के अनुच्छेद 318 के तहत राष्ट्रपति को अध्यक्ष तथा सदस्यों की सेवा की शर्तें निर्धारित करने का अधिकार दिया है।

अनुच्छेद 316 में आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों के कार्यकाल के बारे में बताया गया है। इसमें व्यवस्था ये है कि आयोग के अध्यक्ष व सदस्य पद ग्रहण करने की तारीख से छह वर्ष की अवधि तक या 65 वर्ष की आयु तक, (इनमें से जो भी पहले हो) अपना पद धारण करते हैं।

वैसे वे चाहे तो कभी भी राष्ट्रपति को संबोधित कर त्यागपत्र दे सकते हैं। उन्हे कार्यकाल के पहले भी राष्ट्रपति द्वारा संविधान में वर्णित प्रक्रिया में वर्णित प्रक्रिया के माध्यम से हटाया जा सकता है। वो कैसे? इसे आगे देखते हैं।

जब अध्यक्ष का पद रिक्त हो, या जब अध्यक्ष अपना काम अनुपस्थिति या अन्य दूसरे कारणों से नहीं कर पा रहा हो तो उस स्थिति में राष्ट्रपति संघ लोक सेवा आयोग के किसी सदस्य को कार्यवाहक अध्यक्ष नियुक्त कर सकता है। ये कार्यवाहक अध्यक्ष तब तक कार्य करता है, जब तक अध्यक्ष पुनः अपना काम नहीं संभाल लेता या अध्यक्ष फिर से नियुक्त न हो जाए।

बर्खास्तगी एवं निलंबन (Dismissal and suspension)

बर्खास्तगी एवं निलंबन से संबन्धित प्रावधानों को अनुच्छेद 317 में वर्णित किया गया है। राष्ट्रपति संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या दूसरे सदस्यों को निम्नलिखित परिस्थितियों में हटा सकता है;

(1) अगर उसे दिवालिया घोषित कर दिया जाता है, या
(2) अपनी पदावधि के दौरान अपने पद के कर्तव्यों के बाहर किसी अन्य वैतनिक कार्य में लगा हो, या
(3) अगर राष्ट्रपति ऐसा समझता है की वह मानसिक या शारीरिक अक्षमता के कारण पद पर बने रहते योग्य नहीं है।

राष्ट्रपति अगर आयोग के अध्यक्ष या दूसरे सदस्यों को उनके कदाचार (malpractice) के कारण हटाने की सोच रहा हो तो पहले उसे यह मामला जांच के लिए उच्चतम न्यायालय में भेजना होगा।

अगर उच्चतम न्यायालय जांच के बाद बर्खास्त करने के परामर्श का समर्थन करता है तो राष्ट्रपति, अध्यक्ष या दूसरे सदस्यों को पद से हटा सकते हैं। सविधान के इस उपबंध के अनुसार, उच्चतम न्यायालय द्वारा इस मामले में दी गई सलाह राष्ट्रपति के लिए बाध्य है।

संघ लोक सेवा आयोग की स्वतंत्रता

आयोग अपना काम बिना किसी राजनैतिक दवाब के कर सकें इसके लिए संविधान में कुछ प्रावधान दिये गए हैं। जैसे –

(1) संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या सदस्यों को पदावधि की सुरक्षा प्राप्त होती है यानी कि एक बार नियुक्त होने के बाद वे अपने पद पर कार्यकाल खत्म होने तक बने रह सकते हैं। अगर उसे हटाने की नौबत भी आई तो राष्ट्रपति, संविधान में वर्णित आधारों पर ही हटा सकते हैं जिसकी चर्चा अभी हमने ऊपर की है।

(2) राष्ट्रपति अध्यक्ष या सदस्य की सेवा की शर्तें तय तो करते है लेकिन नियुक्ति के बाद इनमें अलाभकारी परिवर्तन नहीं कर सकते। यानी कि उसकी सुविधाओं को कम नहीं किया जा सकता है।

(3) आयोग के अध्यक्ष या सदस्य को वेतन, भत्ते व पेंशन सहित सभी खर्चे भारत की संचित निधि से प्राप्त होते हैं जिस पर कि संसद में मतदान नहीं होता।

(4) संघ लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष (कार्यकाल के बाद) भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी और नियोजन का पात्र नहीं हो सकता।

(5) वहीं संघ लोक सेवा आयोग का सदस्य की बात करें तो वे अपने कार्यकाल के बाद संघ लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष या किसी राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त होने का पात्र तो होगा लेकिन भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी अन्य नियोजन का पात्र नहीं होगा।

(6) संघ लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष या सदस्य कार्यकाल के बाद के उसी पद पर पुनः नियुक्त नहीं किया जा सकता।

संघ लोक सेवा आयोग के कार्य

संघ लोक सेवा आयोग निम्नलिखित काम करता है –

1. यह अखिल भारतीय सेवाओं, केन्द्रीय सेवाओं व केंद्रशासित क्षेत्रों की लोक सेवाओं में नियुक्ति के लिए परीक्षाओं का आयोजन करता है।

2. आयोग, राज्य को किसी ऐसी सेवाओं के लिए जिसके लिए विशेष अर्हता वाले अभ्यर्थी की जरूरत है, उनके लिए संयुक्त भर्ती की योजना व प्रवर्तन करने में सहायता करता है।

3. यह किसी राज्यपाल के अनुरोध पर (राष्ट्रपति की स्वीकृति के उपरांत) सभी या किन्ही मामलों पर राज्यों को सलाह प्रदान करता है।

4. सिविल सेवक द्वारा अपने कर्तव्य के निष्पादन के अंतर्गत उसके विरुद्ध विधिक कार्यवाहियों की प्रतिरक्षा में उसके द्वारा खर्च की अदायगी का दावा करना।

5. यह भारत सरकार के अधीन काम करने के दौरान किसी व्यक्ति को हुई क्षति को लेकर पेंशन का दावा करता है और पेंशन की राशि का निर्धारण करता है।

6. अल्पकालीन नियुक्त, एक वर्ष से अधिक तक व नियुक्तियों की नियमिकरण से संबन्धित विषय, सेवा विस्तार व कुछ सेवानिवृत नौकरशाहों की पुनर्नियुक्ति से संबन्धित विषय एवं कार्मिक प्रबंधन से संबन्धित अन्य विषयों को भी एड्रेस करता है।

7. कार्मिक प्रबंधन से संबन्धित निम्नलिखित विषयों पर परामर्श देता है: जैसे कि –
(1) सिविल सेवाओं और सिविल पदों के लिए भर्ती को पद्धतियों से संबन्धित सभी विषयों पर,
(2) सिविल सेवाओं और पदों पर नियुक्ति करने में तथा सेवा प्रोन्नति व एक सेवा से दूसरे सेवा में तबादले के लिए अनुसरण किए जाने वाले सिद्धान्त के संबंध में,
(3) सिविल सेवाओं और पदों पर स्थानांतरण करने में, प्रोन्नति या एक सेवा से दूसरी सेवा में तबादला या प्रतिनियुक्ति के लिए अभ्यर्थियों की उपयुक्तता पर। संबन्धित विभाग प्रोन्नति की अनुशंसा करता है और राज्य लोक सेवा से अनुमोदित करने का आग्रह करता है,
(4) राज्य सरकार में सिविल हैसियत में कार्य करते हुए सभी अन्य अनुशासनिक विषय। जैसे कि निंदा प्रस्ताव रोकना, वेतन वृद्धि रोकना, पदोन्नति रोकना, धन हानि की पुनः प्राप्ति, निम्न सेवाओं या पद में कर देना, अनिवार्य , सेवा से हटा देना, सेवा से बर्खास्त कर देना, इत्यादि।

◾संसद, संघ लोक सेवा आयोग के अधिकार क्षेत्र में किसी प्राधिकरण, कॉर्पोरेट निकाय या सार्वजनिक संस्थान के निजी प्रबंधन का कार्य भी दे सकती है। अत: संसद के अधिनियम के द्वारा संघ लोक सेवा आयोग के कार्यक्षेत्र का विस्तार किया जा सकता है

◾अनुच्छेद 323 के तहत, संघ लोक सेवा आयोग हर वर्ष अपने कामों की रिपोर्ट राष्ट्रपति को देता है। राष्ट्रपति इस रिपोर्ट को दोनों सदनों के समक्ष प्रस्तुत करता है। किसी स्वतंत्र मंत्रालय या विभाग को संघ लोक सेवा आयोग के परामर्श को खारिज करने का अधिकार नहीं है। किसी प्रकार की अस्वीकृति की स्थिति में केन्द्रीय कैबिनेट की नियक्ति समिति द्वारा स्वीकृति लेनी पड़ती है।

सीमाएं (Limitations)

कुछ विषय संघ लोक सेवा आयोग के कार्यों के अधिकार क्षेत्र के बाहर है जिस पर आयोग से कोई परामर्श नहीं किया जाता है, जैसे कि –

1. पिछड़ी जाति की नियुक्तियों पर आरक्षण देने के मामले पर।
2. आयोग की अध्यक्षता या सदस्यता उच्च राजनयिक पद, ग्रुप सी व डी सेवाओं के अधिकतर पदों के चयन से संबंधी मामले पर।
3. किसी पद के लिए अस्थायी या स्थानापन्न नियुक्तियाँ, अगर वह व्यक्ति एक वर्ष से कम से लिए पद धारण करता है।

इसके अलावा राष्ट्रपति संघ लोक सेवा आयोग के दायरे से किसी पद, सेवा व विषय को हटा सकता है जिसके लिए उसे संघ लोक सेवा आयोग से परामर्श की आवश्यकता नहीं है परंतु इस तरह के नियमन को राष्ट्रपति को कम से कम 14 दिन तक के लिए संसद के सदन में रखना होगा। संसद इसे संशोधित या खारिज कर सकती है।

समापन टिप्पणी (Closing Remarks)

कुल मिलाकर संघ लोक सेवा आयोग, अखिल भारतीय सेवाओं व केन्द्रीय सेवाओं (ग्रुप ए व ग्रुप बी) में भर्ती व सरकार को सलाह देने से संबन्धित है। सेवाओं में वर्गीकरण, वेतन या सेवाओं की स्थिति, कैडर प्रबंधन, प्रशिक्षण आदि से इसका कोई संबंध नहीं है। ये काम कार्मिक व प्रशिक्षण विभाग (कार्मिक, जन-लोक शिकायत व पेंशन मंत्रालय) के अंतर्गत आता है।

चूंकि इसके द्वारा दिये गए सुझाव सलाहकारी प्रवृति के होते हैं यानी कि केंद्र सरकार उन सुझावों पर अमल भी कर सकती है और खारिज भी इसीलिए आयोग की भूमिका थोड़ी सीमित हो जाती है। इसके अलावा सरकार ऐसे नियम बना सकती है, जिससे संघ लोक सेवा आयोग के सलाहकारी कार्य को नियंत्रित किया जा सकता है।

इसके अलावा 1964 में केन्द्रीय सतर्कता आयोग के गठन ने भी अनुशासनात्मक विषयों पर संघ लोक सेवा आयोग के कार्यों को प्रभावित किया। ऐसा इसीलिए क्योंकि सरकार द्वारा किसी नौकरशाह पर अनुशासनात्मक कार्यवाही करने से पहले दोनों से संपर्क किया जाने लगा। आमतौर पर इसमें कोई समस्या नहीं है लेकिन दिक्कत तब होती है, जब दोनों की सलाहों मे मतभेद हो।

लेकिन चूंकि संघ लोक सेवा आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है इसीलिए वो ज्यादा प्रभावी है। जबकि केन्द्रीय सतर्कता आयोग का गठन भारत सरकार के कार्यकारी प्रस्ताव द्वारा किया गया है (जिसे कि अक्तूबर 2003 में इसे सांविधक (Statutory) दर्जा मिला) इसीलिए ये उसके सामने थोड़ा कम प्रभावी है।

जो भी हो जरूरत और समय के हिसाब से खुद को बदलते हुए संघ लोक सेवा आयोग अपनी प्रासंगिकता और बढ़ाता गया है और एक बेहतर संस्था के रूप में अपनी छवि बनाने में कामयाब हुआ है।

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